जैसे अँधेरे बंद कमरे में

जैसे
अँधेरे बंद कमरे में
किसी झिर्री से आती है
थोड़ी सी रोशनी
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी हवा
बस
ऐसे ही तुम आती हो
मुझ तक
यादों की पतली सुनहरी
रोशनी की तरह
और दे जाती हैं
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी हवा
थोड़ी सी ज़िदंगी

कुछ समझी, लाडो  ??
मेरी सुमी,

मुकेश इलाहाबादी ---------

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