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Showing posts from May, 2014

कुछ तो ख़्वाब सुनहरे बुन लूँ

कुछ तो ख़्वाब सुनहरे बुन लूँ तुझको अपना साथी चुन लूँ तू मेरे घर आये इसके पहले मै प्रेम पंथ के कंकर चुन लूँ  राग मिलन न जाना अबतक कहे तो तेरी धड़कन सुन लूँ ? कहे तो तेरे गज़रे की ख़ातिर फ़लक से चाँद सितारे चुन लूँ तो बोले तो जैसे सरगम बाजे  ग़र छेड़ूँ ग़ज़ल तो तेरी धुन लूँ मुकेश इलाहाबादी -------------

तमाम उरियाँ लोगों के बीच

तमाम उरियाँ लोगों के बीच मुकेश,हो के बालिबास नंगा था मुर्दों के शहर में मरा साबित किया गया,जो शख्श ज़िंदा था मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------------------

बाबू राज़नीत का देखो खेल

बाबू राज़नीत का देखो खेल बने हैं शिक्षा मंत्री इंटर फेल अजब ज़माना आया बाबू हम पढ़ लिख कर बेचे तेल बाबू साम दाम दंड और भेद है सरपट भागी भगवा  रेल हर कोई होना चाहे न० एक बाबू मची है देखो रेलम पेल  जो सच के साथ खड़ा है बाबू वो कब का पँहुच गया है जेल मुकेश इलाहाबादी ------------

बहुत नज़दीकियों के तलबगार नहीं

बहुत नज़दीकियों के तलबगार नहीं मुहब्बत में मगर दूरियां भी अच्छी नहीं मुकेश इलाहाबादी ------------------------

दोस्त दर्द ग़मे जुदाई का हम क्या जाने ?

दोस्त दर्द ग़मे जुदाई का हम क्या जाने ? तू तो मेरे साथ याद बन के आज भी है -- मुकेश जिस्म न सही रूह तो आज भी है तू किसी न किसी रूप में साथ आज भी है मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

संभल के चलाकर

संभल के चलाकर इतना न  डराकर तू मुश्किलों में भी फूल सा खिलाकर माना कि तू बडा है कुछ तो झुकाकर  दिन रात क्यूँ चले थोड़ा तो रुकाकर मुकेश की ग़ज़ल कभी तो सुनाकर मुकेश इलाहाबादी --

शेर भालू बन्दर मिलेंगे

शेर भालू बन्दर मिलेंगे गिद्ध और कबूतर मिलेंगे आदमी की खाल में तुम्हे    कितने रंगे सियार मिलेंगे मियाँ शहर के हर हौराहे पे चीता चित्तीदार मिलेंगे घूम आओ सारी बस्ती इंसान दो चार मिलेंगे एक बात जान लो तुम जानवर समझदार मिलेंगे  मुकेश इलाहाबादी ---------

हौसला तो तूफाँ से लड़ने का रखता हूँ

हौसला तो तूफाँ से लड़ने का रखता हूँ ये अलग बात कश्ती साथ नहीं देती मुकेश इलाहाबादी -----------------------

आसमाँ से बड़ी है

आसमाँ से बड़ी है ख्वाब की नदी है हम - तुम वही हैं ज़माना भी वही है बीच में मगर यह दीवार क्यूँ खड़ी है दरम्याँ दो रूहों के हवस हंस रही है हिज़्र के चार पल सदियों से बड़ी है साहिलों के बीच नदी बह रही है मुकेश इलाहाबादी -

इतनी उदासी तेरे दामन में अच्छी नहीं लगती

इतनी उदासी तेरे दामन में अच्छी नहीं लगती आ, खिलखिला ले तो कुछ फूल चुन में लाया हूँ मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

गाल गुलाबी हो गया

गाल गुलाबी हो गया समाँ फागुनी हो गया तेरी आखों की मय से जँहा शराबी हो गया नफरत दिल वाला भी प्रेम पुजारी हो गया इंद्रधनुषी आँचल से मन सतरंगी हो गया तो जब से ग़ज़ल बनी दिल सारंगी हो गया मुकेश इलाहाबादी --

मै इंक़लाबी हो गया

मै इंक़लाबी हो गया लहज़ा बाग़ी हो गया नेता की अगवानी में शहर छावनी हो गया मज़हबी बातों से ही तो  आलम बारूदी हो गया कल तक जो शायर था वो भी व्यापारी हो गया मुकेश इलाहाबादी --------

दर्द की बारिस है,

दर्द की बारिस है, और तुम बेलिबास निकले हो मुहब्बत न सही, मेरी दुआओं के साये में हो लेते मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

दर्द के आँसू छलक रहे हैं

दर्द के आँसू छलक रहे हैं अपने अंदर दहक रहे हैं ऊपर से तो दिखते सख्त भीतर- भीतर दरक रहे हैं घर आँगन में सन्नाटा है छत पे पंछी चहक रहे हैं ग़म पीकर बैठे दुनिया का प्यार में तेरे बहक रहे हैं जूही, बेला, चंपा, हरश्रृंगार यार की खुशबू,महक रहे हैं मुकेश इलाहाबादी -----------

ऐ दोस्त , ख़याल तो अच्छा है, अपने ज़ख्मों को ज़ुबाँ देने का

ऐ दोस्त , ख़याल तो अच्छा है, अपने ज़ख्मों को ज़ुबाँ देने का ज़माने वाले जिस्म से ज़्यादा जुबां पे खंज़र चलाते हैं मुकेश मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------------------

हमांरे में वो हुनर कँहा जो खिलाड़ी बन सकें

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हमांरे में वो हुनर कँहा जो खिलाड़ी बन सकें मोहरों सा बिसात पे पीटना मुक़द्दर रहा है मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

खिलौना बन के रहोगे

खिलौना बन के रहोगे तो लोग खेलेंगे भी, तोड़ेंगे भी कि ज़माना अभी अपने बचपने में ही है मुकेश मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -------

मुझसे मुखातिब था वो ग़ैरों की तरह

मुझसे मुखातिब था वो ग़ैरों की तरह जिसे हम अपना बनाये बैठे थे, मुकेश मुकेश इलाहाबादी ----------------------

सब कुछ छोड़ दोगे पर यादों को कैसे छोड़ पाओगे

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सब कुछ छोड़ दोगे पर  यादों को कैसे छोड़ पाओगे ये वो असबाब है जो सिर्फ मैयत के साथ जाता है.। मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------  

सुबह और सांझ का आलम इतना खूबसूरत और हंसी क्यूं होता ह

सुमी, क्या तुम जानती हो, सुबह और सांझ का आलम इतना खूबसूरत और हंसी क्यूं होता ह ? ग़र नही तो सुनो ... यामिनी, जब अपना सांवला ऑचल फैलाये फैलाये क़ायनात के आँगन  मे चॉद तारों के संग खेल खेल के थक चुकी होती है तब उसे अपने प्रेमी ‘उजाला’ यानी कि दिवस की याद आती है और वह अपना आंचल समेट चल देती है, दिवस से मिलने, उधर दिवस भी अपनी प्रेमिका यामिनी के लिये पलकें पांवडें बिछाये इंतजार कर रहा होता है। और वह अपनी सूरज की किरणों रुपी बाहें फैला देता है स्वागत में। यामिनी धीरे धीेरे दिवस की बाहों मे सिमटने लगती है, गलने लगती है, पिघलने लगती है खोने लगती है।  और .... उधर .... यामिनी और दिवस के इस महामिलन को देख क़ायनात का ज़र्रा ज़र्रा नाच उठता है। फूल खिलने लगते है, कलियॉ मुस्कुराने लगती है, चिडियॉ चहचहाने लगती हैं भंवरे बाग मे गुनगुनाने लगते हैं। मंदिर में घंटे और मस्जिद में अजान के स्वर सुनाई देने लगते हैं। नदियॉ अंगडाई ले के बहने लगती हैं हवांएं ठण्डी हो कर बहने लगती हैं बृक्ष झूमने लगते है। तुम कह सकती हो पूरी की पूरी क़ायनात खिलखिलाने लगती है। सारा इस महामिलन का साक्षी हो उठता है। तभी तो इस ...

आधी सदी चलते रहे

आधी सदी चलते रहे यूँ ही तनहा बढ़ते रहे वो और लोग रहे होंगे कारवाँ  में चलते रहे धुंध तीरगी आँधियाँ  मुश्किलों में बढ़ते रहे सोचता हूँ तो लगता है ज्यूँ ख्वाब में चलते रहे मुहब्बत आग का दरिया मुकेश डूब कर बढ़ते रहे  मुकेश इलाहाबादी ----

तीरगी से दुश्मनी नहीं,

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तीरगी से दुश्मनी नहीं,पर लड़ रहा हूँ रोशनी के लिए मुकेश इलाहाबादी --------

भले ही मकाँ छोटा रक्खो

भले ही मकाँ छोटा रक्खो पै दिल अपना बड़ा रक्खो इतनी तंगख़याली क्यूँ है? विचार थोड़ा खुला रक्खो अँधेरे में भटक जाओगे चराग इक  जला रक्खो इतनी खुदगर्ज़ी ठीक नहीं थोड़ी शराफत बचा रक्खो ख़ुदा औ बुज़ुर्गों के सामने सर अपना नीचा रक्खो मुकेश इलाहाबादी --------

रात भर के जागे; लगते हो

रात भर के जागे; लगते हो किसी ग़म में डूबे लगते हो चलो मै दरख़्त बन जाता हूँ मुसाफिर तुम थके लगते हो इतना भोलापन भी ठीक नहीं इंसान तो तुम भले लगते हो कहो तो मै दरिया बन जाऊं बहुत दिनों के प्यासे लगते हो,, मुझे भी अपने कारवाँ में ले लो मुसाफिर तुम अच्छे लगते हो मुकेश इलाहाबादी --------------

मिलती होगी दरख़्त से ज़िंदगी ऐ दोस्त ?

मिलती होगी दरख़्त से ज़िंदगी ऐ दोस्त ? मौत के सौदागर इसे जड़ से उखाड़ लेते हैं मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

दिल जलाने से भी रोशनी नहीं होती

दिल जलाने से भी रोशनी नहीं होती मुकेश रूह के इर्द-गिर्द कोहरा घना है मुकेश इलाहाबादी ---------------------

चराग़ जला नहीं,चाँद भी उगा नहीं

चराग़ जला नहीं, चाँद भी उगा नहीं तीरगी दूर हो तरीका,कोई बचा नहीं साँझ से जाने क्यूँ,दिल है बुझा बुझा उदासी का शबब, किसी ने पूछा नहीं जाने किस बात से यार खफा हो गया वज़ह जानूँ ऐसी कोशिश किया नहीं फक्त ज़रा सी बात पे खफा हो गया मुलाक़ात के लिए मैंने भी कहा नहीं ऐ दोस्त लाख उदास है मुकेश,लेकिन ग़ज़ल में मैंने ज़िक्र उसका किया नहीं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

एक अंधी सुरंग

एक अंधी सुरंग सूखी तलहटी पाओगे मै एक सूखा कुँआ हूँ मुझसे कुछ न पाओगे तुम दरिया हो रास्ता बदल दो मै एक सहरा हूँ तुम भी सूख जाओगे जाओ , खुले आकाश में उड़ जाओ तुम्हे आज़ाद करता हूँ मै इक बंजारा, मुझसे कुछ न पाओगे मुकेश इलाहाबादी ----

खुदा न करे ग़म और तन्हाई आपका दामन छुए

खुदा न करे ग़म और तन्हाई आपका दामन छुए  वैसे ये तोहफे खुदा ने हम जैसों  के लिए बनाये हैं  मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

गर इतना ही डर है दिल किसी के टूट जाने का

गर इतना ही डर है दिल किसी के टूट जाने का फिर लेते ही क्यों हो ये अंगड़ाई जिस्म तोड़ के मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

रह रह के चिलमन से झांक जाते हैं

रह रह के चिलमन से झांक जाते हैं हर बार हमको वंही पर खड़ा पाते हैं झट से परदा सरका के लौट जाते हैं कुछ सोचते हैं मुस्काते हैं झुंझलाते हैं टी वी ऑन करके चैनल कई बदलते हैं कभी पुरानी किताब के पन्ने पलटाते हैं कभी बेवज़ह पंखा तो कभी घड़ी देखते हैं दो चार फालतू फालतू फ़ोन घनघनाते हैं फिर अचानक चिलमन पे लौट आते हैं हमको वंही पा के फिर झुंझला जाते हैं देख देख कर उनकी ये बेचैनी बेकरारी हम  सोचते हैं वे हमारे लिए ही आते हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------  

खामोश समंदर में

एक --- मेरे, उसके बीच बहता है एक खामोश दरिया जिस पे कोई पुल नहीं है चाहूँ तो शब्दों के खम्बो वादों के फट्टों का पल खड़ा कर सकता हूँ मगर मुझे अच्छा लगता है  दरिया में उतारना खामोशी से और फिर डूबते उतराते उतर जाना उस पार दो ---- अनवरत चल रहा हूँ नापता शब्दों की सड़क ताकि पहुंच सकूँ अंतिम छोर तक कूद जाने के लिए एक खामोश समंदर में हमेशा हमेशा के लिए मुकेश इलाहाबादी ----------- उस पार

जीवन इक प्यास है

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जीवन इक प्यास है बस तुमसे ही आस है तुम साथ- साथ हो ज़िंदगी मधुमास है बिखेर दो लटों को हर साँस  सुवास है तुम्हारा संग साथ लगता कुछ ख़ास है रात काली ही सही तू है तो उजास है मुकेश इलाहाबादी --

लड़कियाँ ----

लड़कियाँ ---- ज़्यादातर लडकियां मासूम और पाक दिल की होती हैं। जिनकी ज़िंदगी की चादर की बनावट और बुनावट बहुत झीनी होती है। जो फूल से मुलायम और कपास सी उजली होती है।  इस चादर को बहुत ही आहिस्ता व नज़ाक़त से ओढ़ना बिछाना पड़ता है , वरना ज़रा में ही मैली व बेनूर हो जाती है।  अक्सरहाँ , अपनी इस फूल सी चादर को बचाने के लिए खुद को तार तार करती रहती हैं। अगर लड़कियों  को फूल कहा जाए तो गलत न होगा, अक्सरहाँ ये फूलों सा खिलखिलाती और मह्माती रहती हैं , तो ज़रा सी आंच और धुप से मुरझा जाती हैं।  मगर  ये बात ज़माना कब समझेगा ? लडकियां चन्दन होती हैं।  पवित्र और न ख़त्म होने वाली खुशबू, शीतलता लिए हुए।  जिसके जिस्म पे तमाम शार्प लिपटने को आकुल व्याकुल  हैं। जिन्हे ज़माना काटता है  घिसता है और अपने बदबूदार बदन पे मलता है - खुशबू के लिए। मगर ये चन्दन रूपी लडकियां बार बार काटे और घिसे जाने के बावजूद अपनी सुगंध और शीतलता नहीं छोड़तीं। लडकियां चादर हैं , फूल हैं , चन्दन हैं।  अल्द्कीयां आधी आबादी और पूरी आबादी की जननी हैं।  फिर भी आज भी इतनी शोषित और उपेक्षित ...

एक दिन मै छत पे,तनहा था

एक दिन मै छत पे,तनहा था और तनहा चाँद को देख रहा था चाँद रूई के फाहे सा शुभ्र और कोमल था चाँद की मुस्कराहट में हल्की सी उदासी थी वो उदासी सब को नहीं दिखती थी सिर्फ तनहा लोगों को दिखती थी मै रोज़ रोज़ उसे देखता सिर्फ, चुप-चाप उसे देखता बोलता कुछ भी न था मै एक दिन चाँद ने खुद ब खुद पूछा 'तुम मुझे इतने गौर से क्यों देखते हो' मैंने कहा ' तुम्हे तो मै  ही नहीं पूरी दुनिया देखती है ' चाँद ने कहा ' तुम्हारे देखने में और दुनिया दे देखने में अंतर नज़र आता है इस लिए पुछा वैसे मुझे भी मालूम है मै सुन्दर हूँ मैंने जवाब दिया ' हाँ ये सही है - मै भी तुम्हारी सुंदरता के कारण अाकर्षित  हूँ पर  मै तुम्हरी इस खूबसूरत मुखड़े के पीछे एक उदासी भी देखता हूँ ' चाँद मुस्कुरा दिया 'तुम्हे इससे क्या - तुम्हे तो मेरी सुंदरता से मतलब है तुम्हे मेरी चांदनी से ग़रज़ है' मैंने भी ज़िद ठान ली 'अगर तुम अपना दुःख नहीं बताओगी मुझसे तो मै यही बैठा रहूँगा तनहा खाली छत पे अनंत अनंत काल तक के लिए यंहा तक की बैठे बैठे फना हो जाऊंगा तब से चाँद से मेरी दोस्ती हो गयी है और अब हम दोनों खूब बातें ...

तुम, इस खामोशी से यह मत समझो

तुम, इस खामोशी से यह मत समझो हमें कुछ कहना नहीं दर असल, जब कभी तुम अनसुनी कर देते हो बात,  तब सारे के सारे शब्द उतर जाते हैं एक गहन गह्वर में और वंहा से फिर कभी लौट कर नहीं आते हमारे शब्द लिहाज़ा तुम्हे सीख लेना चाहिए इस खामोशी को भी समझने का हुनर वर्ना , तुम वंचित रह जाओगे हमसे गुफ्तगू करने के लिए हमेषा हमेषा के लिए तुम, खामोश दरिया को भी देखकर मत समझना इसे कुछ कहना नही दर असल यह भी अपनी आरज़ूओं को लेकर इतना मचल चुका है कि कुछ कहने से बेहतर, इसे चुपचाप बहना अच्छा लगता है लिहाज़ा तुम भी इसके साथ गुप चुप बहना सीख लो वर्ना चुप रहना ही बेहतर होगा हमारे लिए तुम्हारे लिए मुकेश इलाहाबादी ---------

रश्मे उल्फत मै निभाऊं कैसे

रश्मे उल्फत मै निभाऊं कैसे है पाँव में मेहंदी तेरे दर आऊँ कैसे इज़हार कर तो दूँ निगाहों से हया का बोझ है पलकें उठाऊं कैसे आ तो जाऊं किसी बहाने से लौट के मै पीहर घर जाऊं कैसे सखियाँ छेड़े हैं तेरे नाम से पहले भी बातें दिल की मै सुनाऊँ कैसे जले है दिल मेरा इक ज़माने से हिज़्र की आग को बुझाऊं मै कैसे मुकेश इलाहाबादी -----------------

मशगूल रखता हूँ खुद को

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मशगूल रखता हूँ खुद को तुझे भूल जाने के लिए वर्ना इतने बड़े कारोबार की मुझे ज़रुरत क्या है ? मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

ऐतबार कर के देखा होता

ऐतबार कर के देखा होता फिर मुझे झूठा कहा होता फैसला लेने के पहले मेरी बेगुनाही सुन लिया होता बेशक रास्ता बदल लेते मुझे तो बता दिया होता अग़र कोई शिकायत थी मुझको तो बताया होता ग़ज़ल में अपनी कहीं तो मेरा भी ज़िक्र किया होता मुकेश इलाहाबादी ------------

जो भी हुआ अच्छा न हुआ

जो भी हुआ अच्छा न हुआ वक़्त कभी हमारा न हुआ तारीखें बदलीं हैं कलैंडर में साल, लेकिन नया न हुआ चलो आज दिन अच्छा गुज़रा शहर में कोई हादसा न हुआ अपनी सूरत तेरे दिल में देखूं हमारे पास आइना न हुआ अपनी दास्ताँ फिर से सूना दूँ अभी ये किस्सा पुराना न हुआ  मुकेश इलाहाबादी ----------------

जब भी चाँद उगता है

जब भी चाँद उगता है हरदम बातें करता है   आज सुबह से चुप है कुछ उदास लगता है   हमसे न बोले है, पर  अपना सा लगता है   चिलमन से वो झांके है औ हौले से मुस्काता है चाहत है कि पूंछूं हाल, पै मुझको डर लगता है  मुकेश इलाहाबादी -----

गर उगेगा चाँद तो चाँदनी बरसेगी ही बरसेगी

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गर उगेगा चाँद तो चाँदनी बरसेगी ही बरसेगी रक़ीबों के घर पूरी, हमारे घर कुछ तो बरसेगी मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

दिल में दरिया बहा रक्खा है

दिल में दरिया बहा रक्खा है तमाम ज़ख्म छुपा रक्खा है ज़ालिम ने हुस्न के दम पर ज़माना सर पे उठा रक्खा है बहुत मासूम सा है क़ातिल ग़दर जिसने मचा रक्खा है खामोश निगाहों के पीछे तमाम राज़ छुपा रक्खा है मरने वालों की फेहरिस्त में हमने  नाम लिखा रक्खा है मुकेश इलाहाबादी ---------

बुरी हो अच्छीे हो जी लिया जाए

बुरी हो अच्छीे हो जी लिया जाए ज़िंदगी ज़हर सही पी लिया जाए हो गया अज़नबी तेरे जाने के बाद अब, शहर से रुखसती लिया जाए  ख़ुद को जला के रौशन हुआ जाए अपनी ख़ुदी से रोशनी लिया जाये मुकेश इलाहाबादी -------------------

सुना था बहारों से मिल के

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सुना था बहारों से मिल के तबीयत बहल जाती है बस यही सोच के तेरे पहलू में हम आ कर  बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

कब्र पे अपनी खुद फ़ातिहा पढ़ आये

कब्र पे अपनी खुद फ़ातिहा पढ़ आये बाद मरने के मेरे कोई आये न आये पैगामे आख़िरी रुखसती कहला दिया मेरी बला से अब चाहे आएं या न आएं हमने तो दे दिया जाँ मुहब्बत के नाम मातमपुर्शी को भी कोई आये  न आये मुकेश इलाहाबादी -----------------------

कौन किसको याद रखता है

कौन किसको याद रखता है मुकेश मर जाने के बाद लोग बेवज़ह बात करते हैं इतिहास में लिखे जाने की मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ----------

रघुवा तू अपना सूना

रघुवा तू अपना सूना दुःख का आल्हा सुना झोपड़पट्टी , फुटपाथ ईंट और  गारा सुना  गिरवी रक्खा खेत घर, बूढ़ी माँ सुना  रात, रोटी -आचार,, दिन में फांका सुना  नेता को झंडा मिला तुझे मिला डंडा सुना खैनी, बीड़ी औ सुर्ती तू अपना बिरहा सुना मुकेश इलाहाबादी ---

आ मै तुझे संवार दूँ

आ मै तुझे संवार दूँ प्यार को विस्तार दूँ सारा जँहा समेट कर तेरे आँचल में डाल दूँ आ बैठ पहलू में मेरे तू जो कहे उपहार दूँ मन की वीणा को छू प्रेम को नई झंकार दूँ गूँथ के तारों की माला तुझे नया पुष्पहार दूँ मुकेश इलाहाबादी ---

समय से संवाद कर

समय से संवाद कर खुद से भी बात कर इतना तनहा क्यों है मेल मुलाक़ात कर क्यों लेटा आलस में चल, उठ, काम कर पहले मेहनत कर ले फिर, तू आराम कर कोई छोटा हो कि बड़ा तू सबको परनाम कर मुकेश इलाहाबादी ----

बात साहिल की कब सूनी नदी

बात साहिल की कब सूनी नदी  अपनी ही रौ में बहती रही नदी न चैनो क़रार आया साहिल को न चैनो शुकूं से है बह सकी नदी बेवफा चाँद की मुहब्बत में नदी रात पूनो में तड़पती दिखी नदी तोड़ तटबंध जब जब बही नदी मुकेश सिर्फ लाई बरबादी नदी मुकेश इलाहाबादी -----------------

लो फिर वो आ गया

लो फिर वो आ गया बुझे चराग़ जला गया बुझी -बुझी आखों में फिर से नूर आ गया तपते माह में फिर बादल बन छा गया कुछ देर को ही सही गीत प्रेम का गा गया  आशिक़ आवारा सही दिल को मेरे भा गया मुकेश इलाहाबादी ----

सोचता हूँ

सोचता हूँ बन के तराना तेरे होठों पे गुनगुनाऊँ बन के सितारा तेरे आँचल से लिपट जाऊंं कि , ऐ कँवल तेरे शाख पे भँवरे सा बैठ जाऊं वैसे, अब तो दिल ने भी कर दी बग़ावत अपने सीने से निकल तेरी धड़कनों में बस जाऊं मुकेश इलाहाबादी -------

मै खुशबू हूँ,

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मै खुशबू हूँ, मुझको भी लिपट जाने दो झट्कोगी  इन ज़ुल्फ़ों को तो और भी महक जाओगी मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

है ज़माने का दस्तूर चेहरे कई रखता हूँ

है ज़माने का दस्तूर चेहरे कई रखता हूँ ख़ुदा कसम दिल मगर एक ही रखता हूँ ये अलग बात कि मुहब्बत में झुक जाऊं तबियत में अपनी मगर खुद्दारी रखता हूँ मुकेश यूँ तो कई चेहरे हँसी पसंद हैं हमें जेब में तस्वीर मैँ तुम्हारी ही रखता हूँ ,, मुकेश इलाहाबादी ----------------------

ख़त का हमारे जवाब आया लेकिन

ख़त का हमारे जवाब आया लेकिन हमको दुश्मने जाना लिखा लेकिन बैठे तो थे हम भी महफ़िल में उनके सबको देखा हमको न देखा लेकिन हुई तबीयत ऐ नाशाज़ जिनके वास्ते मिज़ाज़पुर्शी को भी न आया लेकिन जी तो उसका भी बहलता है मुझी से फिर क्यूँ मुझको न बुलाया लेकिन ? ख़ाक बन के लिपट जाऊं कदमो से फिर कुछ सोच के रुक गया लेकिन मुकेश इलाहाबादी ----------------------

ले के आये हैं हम उसके पाँव का बोसा

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ले के आये हैं हम उसके पाँव का बोसा हमारे लबों पे अभी भी खुशबू ताज़ा दम है मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

है क्या दरिया के दिल में क्या जानू

है क्या दरिया के दिल में क्या जानू डूब रहा हूँ या उबर रहा हूँ क्या जानू लफ़्ज़ों में कुछ बोले तो कुछ समझूँ खामोश निगाहों में है क्या क्या जानू हमने तो कह दी अपने  दिल की बात अब इंकार मिले या इक़रार क्या जानू सूरज बनकर टंग गया हूँ आसमान में जल रहा हूँ या चमक रहा हूँ क्या जानू हूँ इंतज़ार में मै पथ में फूल बिछाकर आएंगे या न आएंगे मै अब क्या जानू मुकेश इलाहाबादी ------------------------

मुख़्तसर सी सही मुलाक़ात तो कर

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मुख़्तसर ही  सही मुलाक़ात तो कर कुछ और न सही कुछ बात तो कर क्यूँ अज़नबी शहर में अज़नबी सा रहें आओ एक दूजे से जान पहचान तो कर मुकेश इलाहाबादी -----------------------

कोई न कोई बहाना ढूंढ लेता हूँ ,

कोई न कोई बहाना ढूंढ लेता हूँ ,, रोज़ ब रोज़ तुझे याद कर लेता हूँ जब भी तनहा और उदास होता हूँ तेरे खतों को बार बार पढ़ लेता हूँ तेरी यादों का ज़खीरा और माज़ी सफर किसी तरह से काट लेता हूँ कोई आरज़ू नहीं शिकायत  नहीं ज़माना जो भी कहे है सुन लेता हूँ रोज़ रोज़ पीने की कुव्वत कंहा रही कभी कदात गला तर कर लेता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------

तहरीर मेरी खामोशी की पढ़ लो

तहरीर मेरी खामोशी की पढ़ लो कह न सका जो बात समझ लो हों जोभी गीले शिकवे शिकायत हूँ फुर्सत में मै आज तुम कह लो खुद डूब के भी तुझको बचा लूंगा बस इक बार मेरा हाथ पकड़ लो बचा लूंगा तुझे सूरज की तपन से हूँ मै दरख़्त  मेरी छाँह में रुक लो होंगे सुख़नवर ज़माने में और भी बस इक बार मेरी ग़ज़ल सुन लो मुकेश इलाहाबादी ---------------------

ज़िंदगी जब तक रही

ज़िंदगी जब तक रही तिश्नगी तब तक रही हुस्न और जवानी साथ कब तक रही कुछ कह न सके बात लब तब रही तूफ़ान के बाद भी ख़ामुशी देर तक रही रुस्वाइयां हमारी दूर दूर तक रही मुकेश इलाहाबादी ---

खुशबू ऐ बदन जिसकी

खुशबू ऐ बदन जिसकी रूह में मेरे अबतक रही दो चोटी हिरनी सी आँखें मुझे याद अब तक रही निगाहें वहीं टिकी रहीं मेले मे वो जबतक रही बात उस मुलाक़ात की दिल की दिल तक रही मत्ला और मक़्ता वही ग़ज़ल की मेरे बहर वही मुकेश इलाहाबादी ---------

ज़ख्मो पे मरहम इस लिए नहीं रखते

ज़ख्मो पे मरहम इस लिए नहीं रखते ज़ालिम की कोई तो निशानी साथ रहे मुकेश इलाहाबादी ----------------------

भले शिकवा करो शिकायत करो

भले शिकवा करो शिकायत करो यूँ खामोश न रहो कुछ बात करो अनदेखा करके गुज़रना ठीक नही कुछ और न सही दुआ सलाम करो ज़िंदगी मशरूफ़ियत का ही नाम है कभी कभी तो मेल - मुलाकात करो मियाँ खाने ,कमाने, घूमने के सिवा दुनिया याद करे ऐसा कोई काम करो ज़िदंगी की तमाम भाग दौड़ के बीच मुकेश बंदगी खुदा की शुबो शाम करो मुकेश इलाहाबादी ----------------------

सिर्फ चेहरा धोकर क्या होगा ?

सिर्फ चेहरा धोकर क्या होगा ? लिबास बदलकर क्या होगा ? जब तक सोच न बदलोगे ,,,, सिर्फ भाषण देकर क्या होगा ? दिल का मैल न निकले तो ,,, फिर हाथ मिलाकर क्या होगा ? गर मन मे श्रृद्धा न हो तो पूजा घर जा कर क्या होगा ?? प्रेम का पत्तर पढ़ा नहीं तो पोथी पढ़ पढ़ कर क्या होगा ?? मुकेश इलाहाबादी -----------------

बगैर चराग़ तुम रोशनी न पाओगे

बगैर चराग़ तुम रोशनी न पाओगे मै अँधेरा हूँ मुझे हर जगह पाओगे जा रहे तो जाओ अब न मनाऊँगा लौट के तुम फ़िर मेरे पास आओगे यकीनन लोग बात करेंगे फलक की मेरे पास तो फ़क़त मुहब्बत पाओगे माना कि मै समंदर सा गहरा नही मगर प्यास के लिये आब पाओगे भले ही मशरूफ़ियत मिलने न दे करोगे याद तो अपने पास पाओगे मुकेश इलाहाबादी -------------------

ऐ दोस्त ! मै तो बदनाम ही अच्छा ठहरा

ऐ दोस्त ! मै तो बदनाम ही अच्छा ठहरा पर तेरी ये रुसवाई हमसे सही नहीं जाती मुकेश इलाहाबादी ------------------------

एक इल्तज़ा -----------------------------

या ख़ुदा कुछ ऐसी सज़ा मुझको भी दे दे छीन के आज़ादी मेरी क़ैदे मुहब्बत दे दे भूल जाऊंगा मै ग़म सारे ज़माने भर के बस इक बार मुझको मेरी मुहब्बत दे दे मुकेश इलाहाबादी ------------------------

अच्छा लगा सुन के आप भी किसी को याद करते हो

अच्छा लगा सुन के आप भी किसी को याद करते हो हमने तो सुना था के आप तो सिर्फ़ मशरूफ रहतें हो मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------

तेरे जिस्म औ ज़ेहन का ज़र्रा - ज़र्रा

तेरे जिस्म औ ज़ेहन का ज़र्रा - ज़र्रा मेरे वजूद का हिस्सा है कि, तेरी इन महकती साँसों से ही ज़िंदगी मिलती  है  मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------------

जानते हो वज़ह बीमार ऐ दिल का

जानते हो वज़ह बीमार ऐ दिल का कहते हो फिर भी, वज़ह हम नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------------

कि बेचराग़, बेधुआँ जल रहे हैं हम

कि बेचराग़, बेधुआँ  जल रहे हैं हम रंग नहीं खुशबू नहीं खिल रहे हैं हम राह नहीं मंज़िल नहीं हमसफ़र नही औ बेवज़ह मुद्दतों से चल रहे हैं हम धूप ही धूप है कुछ इस क़दर राह में क़तरा  - २ बर्फ सा पिघल रहे हैं हम हादसों की फेहरिश्त क्या सुनाएँ अब जान लो किसी तरह संभल रहे हैँ हम आफ़ताब की तपन ने  है सुखा दिया वरना इस तालाब के कँवल रहे हैं हम मुकेश इलाहाबादी ------------------------

ठाकुर जी से मांगे घरभर कि ख़ुशहाली अम्मां

ठाकुर जी से मांगे घरभर कि ख़ुशहाली अम्मां नाती पोता की किलकारी से खुश रहतीं अम्मा जबतक हम घर नलौटें घड़ी देखती रहतीं अम्मां बदले में अपनी खातिर हैं कुछ न कहतीं अम्मा घरभर खाये मालपुआ अम्मा खायें केवल दलिया  बात -२ पे बहूकी झिडकी सुन चुप रह जातीं अम्मां बिजली का बिल पानी का बिल सब हैं भरती अम्माँ गर बाबू की पेंशन न होती तो फ़िर क्या करतीं अम्मां जब घर वाले मेला देखें चौकीदारी करतीं रहतीं अम्मां बाबूजी जी के जाने के बाद हुई कितनी अकेली अम्मा मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

आग हवा और पानी लिखूंगा,,

आग हवा और पानी लिखूंगा,, जो भी लिखूंगा तूफानी लिखुंगा एक हासिये पे अल्ला हो अकबर दुसरे पे राजा रामचंदजी लिखुंगा इश्क्बाज़ों को तोहफे तमाम दहशतगर्ज़ों को फाँसी लिखूंगा बच्चों को तालीम भूखो को रोटी हर घर हर रात दिवाली लिखूंगा स्याह फलक को फ़िर आसमानी ज़मीं का रंग फ़िर से धानी  लिखूंगा मुकेश इलाहाबादी -------------------  

वक्त के टंडीले पे एक षोकगीत

वक्त के टंडीले पे एक षोकगीत उभरेगा जिसमें नाचेगें कंकाल झूमेंगे प्रेत बजेंगी हडिडयॉ झांझ- मजीरों की तरह दर असल यह उत्सव आयोजित है सूरज के बेहद गरम और चॉद के बेहद ठंडा हो जाने  ओजोन परत में छेद हो जाने मानवता के छीजने और सभ्यता के तीसरे विष्व युद्ध के मुहाने पे पहुच जाने के उपलक्ष्य में षायद जब यह षोकगीत गाया जा रहा होगा किसी आदि कवि दवारा किसी जंगल या पहाड की चोटी पर या कि समुंदर के रेतीले ढूह पर नंगे पांव हव्वा के साथ चलते हुये तम हम जिंदा न हों 05.05.2014 तुम्हारे वक्त में कविता धानी हुआ करती थी अब मेरे वक्त में होती है लाल नीली और कभी कभी तो पीली भी तुम छीट देते थे थोडे से सरसों के बीज और पूरी धरती हो जाती थी धानी धानी तब तुम गाते थे प्रेम गीत हालांकि मै भी चाहता हूं बरसात में मेढ़क की तरह टर्राना या कि मोर सा नाचना और भीगते हुए धान रोपना पर हत भाग्य एक विरुआ भी नहीं उगा पाता इस लाल जमीन पर लिहाजा उकेर आया हूं इन पत्थरों पे एक चिड़िया एक  औरत और धान की बाली इस उम्मीद पे कि अगली बार लौटते वक्त तक मेरी भी कविता हो जायेगी धानी और मै गाउंगा एक प्रेम गीत Mukesh Allahaabaadee ...

तुम्हे क्या मालूम नदी मे भी आग होती है

तुम्हे क्या मालूम नदी मे भी आग होती है  बुझाकर प्यास औरों की खुद सुलगती है   साँझ होते - होते  किनारे सो जाते हैँ साहिल क्या जानें नदी दिन - रात बहती है कभी सहरा कभी जंगळ कभी बस्ती नदी जाने किस- किस राह गुज़रती है सैकड़ों नदियां हैं समंदर क़ी बाहों मे फिर भी नदी उसी की आस मे बहती है है मुकेश मीलों तक फैला रेत का मंजर जाने क्यूँ हर नदी मुझसे दूर बहती है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

धूप तो खिली है खिलखिलाहट गायब है

धूप तो खिली है खिलखिलाहट गायब है शाम से ही हवा की सरसराहट गायब है तितलियाँ शाख पे पँख मोड़ कर बैठी हैं बाग़ में भँवरों की गुनगुनाहट गायब है ,, बाज़ार की सड़क पे सरपट दौडने वाले रेस के घोड़ों की हिनहिनाहट गायब है साँझ फ़िर दो बम फट गये  बाजार मे सुबो से शहर की मिनमिनाहट गायब है खा गये हैं धोखा आशिकी मे मुकेश जी पीके बैठे हैं चेहरे की मुस्कराहट गायब है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

तुम्हारा ही सहारा था

तुम्हारा ही सहारा था वरना कौन हमारा था बस्ती लुट गयी कबकी अपना जंहा ठिकाना था सूरज को गौर से देखा बड़ा सा काला धब्बा था तुनक मिज़ाज चाँद का शाम से ही मुँह टेढ़ा था गुलाब की गोदी मे इक काला भंवरा  बैठा था धुप सिर पे नाचती थी मै मुँह  ढककर सोता था  तुम आ जाओ इक दिन ढेरों दुख- सुख कहना था  मुकेश इलाहाबादी ----------

चलो अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ न हुई

चलो अच्छा हुआ दिल टूटने की आवाज़ न हुई वरना लोग इस बात का भी अफ़साना बना देते मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

हाल-चाल लिये जाओ

हाल-चाल लिये जाओ खोज खबर दिये जाओ बहुत दिनों पे आये हो रुको,चाय पीये जाओ ज़िंदगी इसी का नाम है हंसी- खुशी जिये जाओ कुछ मिले याकि न मिले ज़हरे ज़ीस्त पियें जाओ तरक्की मिलेगी ज़रूर,, बड़ों की दुआ लिये जाओ मुकेश इलाहाबादी ---------

हवा में खुनक सी है

हवा में खुनक सी है कंही तो बारिस हुई है चलो कुछ दूर चलते हैं वहाँ इक नदी बहती है दर्द से बोझिल हैं आखें तुम्हारी पीर नई नही है तिनकों के इस घोसले मे इक सुन्दर बया रहतीं है अक्सर नानी कहा करतीं वीराने मे इक शै रहतीं है नदी के उस मुहाने पे रात इक सुन्दर परी उतरतीं है चलो अब घर लौट चलते हैं बारिस  तेज़  होने वाली है मुकेश इलाहाबादी ---------

ज़िंदगी को लतीफे सा सुनाया जाये

ज़िंदगी को लतीफे सा सुनाया जाये चलो सारा ग़म हंसी मे उड़ाया जाये जला कर राख कर देगी सारा चमन ये आग है नफरत की बुझाया जाये ये इल्म और मुहब्बत की दौलत है इज़ाफ़ा ही होगा जितना लुटाया जाये ज़िंदगी मशरूफ़ियत का नाम है प्यारे पल दो  पल तो हंसा गुनगुनाया जाये मुकेश इलाहाबादी ---------------------

चेतावनी --- हर सवाल का जवाब कंप्यूटर से निकाला जायेगा

चेतावनी --- हर सवाल का जवाब कंप्यूटर से निकाला जायेगा देखना एक दिन इन्सान मशीनो में ढ़ाला जाएगा आज़ादी क़ैद होगी चन्द मुट्ठी भर लोगों के हाथ में बाकी जनता को गुलामी का टीका लगाया जायेगा बादल नदियां और समंदर सब के सब सुख जाएंगे देखना फ़िर रेत से बून्द बून्द पानी निकाला जायेगा न  सुख़नवर होंगे हम जैसे न सुनने वाले आप जैसे मशीने ग़ज़ल लिक्खेंगी मशीनो से दाद दिया जायेगा  बाद कुछ दिनो के ऐसा भी आयेगा, सुन लो ऐ मुकेश इंसानियत का पाठ सिर्फ़ किताबोँ मे पढ़ाया जाएगा मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------  

शब्द तोड़ देते हैं

शब्द तोड़ देते हैं गहन मौन को भी अपने पदचाप से हरहरा कर उलीच देते हैँ खुद को कागज़ के कैनवास पे या कि, राख की ढेरी मे सुलगते रहते हैं देर तक लगभग बुझ चुके अलाव मे  पर कभी धू - धू करके नहीं जलते दावानल सा या कि फट नहीं पड़ते किसी ज्वालामुखी सा  शायद शब्दों की कोई सीमा रेखा / मज़बूरी हो जिसे हम न समझ पा रहे हों मुकेश इलाहाबादी -------------

अब जात कुजात का हम जानी

अब जात कुजात का हम जानी मानुष हौं मानुष की भाषा जानीं  ई ठाकुर ऊ बाम्हन तुम मल्ला बस इ है ककहरा हम ना जानी ई आलिम-फ़ाज़िल होइहैं कोई बांचै प्रेम का पत्रा पंड़ित जानी मुकेश इलाहाबादी ---------------------

रात, मेरी हथेली ;पे

रात, मेरी हथेली ;पे उलीच देती है एक चाँद और, ढेर सारे तारे जिनसे मै प्यार करना चाहता हूँ मगर तारे मेरी हथेली से दूर छिटक जाते हैं और,,,, चाँद मैरी बाँहो से बाहर गुलमोहर मेरी इस बेबसी पर मुस्कुराता है तब मै उदास हो कर रात के आँचल मे मुँह  ढक कर सो जाता हूँ एक सुहानी सुबह के इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी ------------

जेब का वज़न कंहा बढ़ता है ?

जेब का वज़न कंहा बढ़ता है ? राशन का वज़न घट जाता है पहले किलो भर दुध आता था अब पाव भर मे काम चलता है अंग्रेज़ी दवा शूट नही करती,,,, माँ का इलाज़ वैद जी से होता है बिटिया सरकारी स्कूल मे ही है,, बेटा कान्वेंट स्कूल मे पढ़ता है.. कुछ पगार कुछ उधार का सहरा महीना किसी तरह कट जाता है मुकेश इलाहाबादी -----------------

हर चेहरे पे मुस्कान दिखाई देती है

हर चेहरे पे मुस्कान दिखाई देती है मुखौटों पे झूठी शान दिखाई देती है ये झूठ है ज़िंदगी ख़ुदा की नेमत है हमको तो इम्तहान दिखाई देती है स्कूल से बच्ची अभी घर नही आयी लड़की की माँ परेशान दिखाई देती है खुशी और शुकूनियत की तलाश में सारी दुनिया हलकान दिखाई देती है भीड़ ही भीड़ है झूठ की राह पे मुकेश सच की राह सुनसान दिखाई देती है मुकेश इलाहाबादी --------------------

ज़मीन कराहती है, आसमान रोता है

ज़मीन कराहती है, आसमान रोता है हम मर भी जाएं तो कौन पूछ्ता है ? तुम तो दो चार हादसों से घबरा गये,, हमारे शहर मे तो रोज़ ही ऐसा होता है ज़िंदगी से लड़ने  उसका ये तारीका है शाम दो चार पैग लगा मस्त सोता है ज़मींदारी  ख़त्म हो गयी तो क्या हुआ अब गाँव का सरपंच हमको लूटता है हादसे इक खबर हुआ करते हैँ मुकेश ख़बर के बारे में कौन इतना सोंचता है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

हर सिम्त फ़ैली तीरगी बताती है र

हर सिम्त फ़ैली तीरगी बताती है रात ढलने में वक़्त अभी बाक़ी है मुझे संगमारी की सज़ा दी गयी है तेरे हाथ का पत्थर आना बाक़ी है फ़क़त ग़ज़ल सुन के मत लौटो मेरी मौतकी खबर आना बाकी है आज जी भर के पिलाओ मुकेश मैखाने में जब तक शराब बाकी है मुकेश इलाहाबादी --------------

रिटायरमेंट

 केदार के मरने की खबर सुनते ही एक मिनट को राय साहब चौंके फिर अपने को सामान्य करते हुये बस इतना ही कहा अरे अभी उसी दिन तो आफिस में आया था पेंशन लेने तब तो ठीक ठाक था। ‘हां, रात हार्ट अटैक पड गया अचानक डाक्टर के यहां भी नही ले जा पाया गया’ राय साहब ने कोई जवाब नहीं दिया बस हॉथो से इशरा किय, सब उपर वाले की माया है, और चुपचाप चाय की प्याली के साथ साथ अखबार की खबरों को पढने लगे। खबर क्या पढ रहे थे। इसी बहाने कुछ सोच रहे थे। चाय खत्म करके राय साहब ने अपनी अलमारी खोल के देखा पचपन हजार नकद थे। उन्होने पचास हजार की गडडी निकाली जेब में रखा और गाडी की तरफ चल दिये। आज उन्होने ड्राइवर को भी नही पुकारा। अकेले ही चल दिये केदार के घर की तरफ। चार दषक से ज्यादा के फैलाव में वो चौथी बार केदार के घर जा रहे थे। पहली बार वो केदार की शादी पे गये थे दूसरी बार उसके पिता सूरज के मरने पे तीसरी बार तब गये थे जब केदार बहुत बीमार पड गया था। और आज चौथी बार उसके घर जा रहे थे। वैसे तो राय साहब अपने किसी कामगार के यहां कभी नहीं आते जाते सिवाय एक दो मैनेजर लोगों के। केदार ही उनमे अपवाद रहा। राय साहब की गाडी आगे आगे...

मुहब्बत का सफ़र कौन रूह तक तय करता है ?

मुहब्बत का सफ़र कौन रूह तक तय करता है ? तसव्वुर से हो के जिस्म पे जा कर रुक जाता है मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

जब कि नशों मे दौड़ता हो

जब कि नशों मे दौड़ता हो लहू बन के व्यभिचार भ्रष्ट्राचार, क्रोध उत्तेजना उद्दिग्नता बन गए हों स्थायी भाव तब भी हम उम्मीद रखते हों खुशहाली की शुकूनियत की रूहानियत की शायद,  यह हमारी मूर्खता है विवशता है या की , प्रकृति का कोई खेल ? मुकेश इलाहाबादी -----

औरत , मर्द और रोटी

दृश्य एक ----------- औरत, गीले आटे की गोलाइयों को हथेलियों के बीच और ज़्यादा गोलाई दे रही है अब, उस गोलाई को थपकी देकर पलेथन लगा रही  है पलेथन लगीं गोलाई चकले बेलन के बीच गोल - गोल घूम रही है  सुडौल हो चुकी रोटी तवे पे सिझाई जा रही है आँच पे अलट - पलट के पकाई जा रही है लो, अब रोटी पक चूकी है गोल, फूली , चकत्तेदार मर्द रोटी खा कर खुश और तृप्त है दृश्य दो --------- औरत तब्दील हो गयी है गीले आटे की लोई में मर्द गोलाइयों को थपकी देकर बेल रहा है सिझा रहा है पका रहा है खुश हो रहा है रोटी बेल के  औरत तृप्त है रोटी सा सीझ के  मुकेश इलाहाबादी ---------