सुमी, क्या तुम जानती हो, सुबह और सांझ का आलम इतना खूबसूरत और हंसी क्यूं होता ह ? ग़र नही तो सुनो ... यामिनी, जब अपना सांवला ऑचल फैलाये फैलाये क़ायनात के आँगन मे चॉद तारों के संग खेल खेल के थक चुकी होती है तब उसे अपने प्रेमी ‘उजाला’ यानी कि दिवस की याद आती है और वह अपना आंचल समेट चल देती है, दिवस से मिलने, उधर दिवस भी अपनी प्रेमिका यामिनी के लिये पलकें पांवडें बिछाये इंतजार कर रहा होता है। और वह अपनी सूरज की किरणों रुपी बाहें फैला देता है स्वागत में। यामिनी धीरे धीेरे दिवस की बाहों मे सिमटने लगती है, गलने लगती है, पिघलने लगती है खोने लगती है। और .... उधर .... यामिनी और दिवस के इस महामिलन को देख क़ायनात का ज़र्रा ज़र्रा नाच उठता है। फूल खिलने लगते है, कलियॉ मुस्कुराने लगती है, चिडियॉ चहचहाने लगती हैं भंवरे बाग मे गुनगुनाने लगते हैं। मंदिर में घंटे और मस्जिद में अजान के स्वर सुनाई देने लगते हैं। नदियॉ अंगडाई ले के बहने लगती हैं हवांएं ठण्डी हो कर बहने लगती हैं बृक्ष झूमने लगते है। तुम कह सकती हो पूरी की पूरी क़ायनात खिलखिलाने लगती है। सारा इस महामिलन का साक्षी हो उठता है। तभी तो इस ...