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Showing posts from August, 2016

तुमसे मिलना बतियाना अच्छा लगता है

तुमसे मिलना बतियाना अच्छा लगता है ये आदत न बन जाये ये भी डर लगता है  मुकेश इलाहाबादी ------------------------

जैसे किसी के ज़ेहन से यह बात उतर जाये

जैसे ज़ेहन से यह बात उतर जाये कि उसने किताब के पन्नो के बीच गुलाब की एक कली आहिस्ते से रखी थी कभी  या कि  किसी बहुत आत्मीय का प्यारा सा ख़त अलमारी में रखा था बस ऐसे ही तुम मुझे भूली नहीं हो तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ किसी दिन अचानक किसी किताब को उलटते हुए मुरझाए फूल सा मिलूंगा या फिर ज़र्द पड़ गए खत सा अलमारी में दबा मिलूँगा तब तुम फिर फिर मुझे याद करोगी प्यार करोगी पूरी शिद्दत से क्यूँ की तुम मुझे भूली नहीं हो बस तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ (मेरी प्यारी सुमी) मुकेश इलाहाबादी ----  बस ऐसे ही तुम मुझे भूली नहीं हो और यह बात ज़ेहन से उतर जाए  भूल जाए बहुत बहुत दिनों के लिए या कि किसी आत्मीय का प्यारा सा ख़त अलमारी में या किसी बक्से में अख़बार के नीचे छुपा के भूल जाए बहुत बहुत दिनों के लिए बस ऐसे ही मैं तुम्हारे ज़ेहन से उतर भूल जाए बहुत बहुत दिनों के लिए

तुझे देखता हूँ तो हैरत सी होती है

तुझे देखता हूँ तो हैरत सी होती है इतनी खूबसूरत औरत भी होती है तेरा दीदारे हुस्न जब भी जो करे है उसे ही तुमसे मोहब्बत सी होती है इश्क मे भले पहले हो ले रूसुवाइयां बाद मरने के तो शोहरत होती है संग साथ पा के तेरा खुश रहता हूँ बिन तेरे ज़िन्दगी बेगैरत सी होती है मुकेश इलाहाबादी ...............

ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी

ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी कश्ती हमारी डगमगाने लगी देख तेरे खिले महुए सी हंसी हसरते फिर मुस्कुराने लगी मुद्दतों से  वीरान  था आँगन तुम  क्यूँ पायल बजाने लगी पुरानी  हवेली  टूटी  मुंडेर पेएए फिर बुलबुल चहचहाने लगी बेवजह  आग  लगा दी तुमने गीली  थी लकड़ी धुआने लगी मुकेश इलाहाबादी ............

अपनी धुन का पक्का है

अपनी धुन का पक्का है मन का लेकिन सच्चा है थोडा गुस्सा थोडा प्यार दिल तो उसका बच्चा है कभी न उतरे तेरा रंगएए रंग तेरा इतना पक्का है तेरी महकी . 2 साँसों से दिल धडके जैसे पत्ता है बातें तेरी मीठी मीठी पर बोसा तेरा खट मिट्ठा है मुकेश इलाहाबादी .......

रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं

रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं भूल बैठा चॉद कि हम इक आस ले के बैठे हैं कभी तो चस्मा ऐ मुहब्बत उनके दिल मे फूटेगा सदियों से इसी सहरा मे हम प्यास लेके बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

रोशनी कम होती जा रही है

रोशनी कम होती जा रही है परछाइयां बढती जा रही हैं विष्वास और प्रेम की नदी हर रोज सूखती जा रही है यादों ने जोड़ रखा था तुमसे वह कडी भी टूटती जा रही है विरह यामिनी सौत बन गयी प्रेम की लडी टूटती जा रही है तुम्हारे वियोग मे सखी देह रात दिन गलती जा रही है मुकेश इलाहाबादी --------------------

कुँआ

बूँद बूँद पानी को तरसते हैंड पम्प को देखकर हम लौट जाते हैं खाली बाल्टी लिये अपने सूखे होठों को अपनी ही जीभ से तर करते हुए इस उम्मीद से किए शायद अगली बार आने पर यह सूखा हैंड पम्प ठन्डे पानी की फुहार बहा रहा होगा पर ए हम कभी नहीं झांकते गाँव के उस कुंए मे जिसे वर्षों पहले ढक दिया गया है कि फिर से कोई हादसा न हो उस हादसे के बाद जबए इसी कुँए मे गांव की रधिया मर गयी थी अपने होने वाले बच्चे के साथ लोक लाज के डर से सुना हैए इस हादसे के पहले भी किसी को मार के इस सूनसान कुंए मे फेंक दिया गया था बहरहाल ए यह वही कुँआ है जिसने सदियों सदियों बुझाई है प्यास पूरे गाँव की हमारे बाप दादाओं की और उनके भी बाप दादाओं की भी न जाने कितने पुरखों की आज वही अभिशप्त कुँआ लोहे की जाली से ढँक दिया गया है जो की अब महज़ निशानी बन के रह गया है गाँव की कभी यही कुंआ गाँव का कम्युनिटी सेंटर हुआ करता था जिसकी जगत पे गाँव भर कि औरतें और बहुएं आती थी भर. भर घड़े मे पानी के साथ साथ गाँव भर की ख़बरों से खुद को भर ले जाती थीं उनकी तमाम हंसी ठिठोली भी तो यही हुआ करती थी इसी कुँएं की जगत पे ही तो वो कुछ देर खुला आकाशए ठंडी हवा औ...

तू इतनी शिद्दत से न मिला कर हमसे

तू इतनी शिद्दत से न मिला कर हमसे बड़ी तक़लीफ़ होगी बिछड़ कर तुझसे मुकेश इलाहाबादी ----------------------

फूल कैसे खिलते हैं ?

फूल कैसे खिलते हैं ? हवा कैसे, ठुनकती हुई चलती है ? जिस्म कैसे सांस लेता है ? ये सब कुछ मैंने जाना तुमसे मिलने के बाद ज़िदंगी क्या होती है मैंने जाना - तुमसे मिलने के बाद सुमी,- तुम्ही से मुकेश इलाहाबादी -------------

ज़िदंगी क्या होती है

फूल कैसे खिलते हैं ? हवा कैसे, ठुनकती हुई चलती है ? जिस्म कैसे सांस लेता है ? ये सब कुछ मैंने जाना तुमसे मिलने के बाद ज़िदंगी क्या होती है मैंने जाना - तुमसे मिलने के बाद सुमी,- तुम्ही से मुकेश इलाहाबादी -------------

परती धरती और पहली बारिस

परती धरती और पहली बारिस बारिस की हल्की हल्की बूंदो के गिरते ही लगा बरसों की परती पडी धरती थरथरा उठी हो। माटी की पोर पोर से भीनी भीनी सुगंध चारों ओर अद्रष्य रुप से व्याप्त हो गयी थी। लॉन से आ रही हरसिंगार, मोगरा, गुड़हल और चमेली की खुषबू को संध्या अपने नथूनों में ही नही महसूस कर रही थी बल्कि अपनी संदीली काया के रोम रोम में सिहरन सा महसूस कर रही थी। बेहद तपन के बाद बारिष के मौसम की तरह वह अपने अंदर आये इस बदलाव से वह अंजान नही थी। पर उम्र के इस उत्तरायण में इस क़दर भावुक मन होना वह स्वीकार नही कर पा रही थी और अस्विकार भी। फिलहाल, संध्या अपने मन के सारे विक्षोभों को परे धकेल, अपने आप को पूरी तरह मन के हवाले कर देना चाह रही थी। और फूलों की तरह किसी डाली से लगी रह कर डोलना व तितली की तरह उडना चाह रही थी। इस हल्की हल्की बारिस की बूंदों की सिहरन, मन के अंतरतम तल तक महसूस कर लेना चाहती थी। दिल तक। इस अंजानी खुषी व षीतल छुअन ने पेड़ पौधों लताओं व गुल्मों को हौले हौले तो कभी जोर से हिलते पत्तों के संगीत में डूब जाना ही चाहती थी। बाहर गुलमोहर की पत्तियों से छन छन करती बूदें स्वर लहरियों में खो जाना...

ख़त मेरे महबूब ------------------

ख़त मेरे महबूब ------------------ ख़त मेरे महबूब ------------------ मेरे महबूब, यह ख़त नही, गुफ़तगूं है। जो की गयी है, बोगनबेलिया, कचनार और गुलाब की कतारों से। अषोक, देवदार और युकलिप्टस के उंचे उंचे लहराते पेडों से। तुम्हारी यादों से ये वो बातें हैं, जो गुपचुप गुपचुप की गयी हैं। खामोषी की उन गहराइयों से। जो इस पहाड़ की अतल गहराइयों से प्रतिघ्वनित हुयी है। वेद की ऋचाओं सी या कुरान की पाकीजां आयतों सी। यह वह पवित्र एहसास  है। जो  महसूस गया है। इन पेड पहाड़ पगड़ंड़ी घास फूस कोैवे गिलहरी सांप गोजर और ग्रामवासियों के बीच फ़ैली रहने वाली अनवरत खामोशी के साथ। जिसे कभी कोई झींगूर की सूं सूं या दूर चलती पनचक्की की पुक पुक या किसी बैलवाले की र्हड़ र्हड़ ही तोड़ पाती है। उसी खामोषी को कैद करने की कोषिष की है। लिहाजा .... मेरी जानू मेरी अच्छी जानू .... कई दिनो की जददो जहद के बाद तुम्हे खत लिखने का साहस कर पाया हूं। यह जददो जहद किसी और से नही अपने आप से थी। यह जददोजहद अपने विचारों से अपने सिद्धांतों से थी। इन दो तीन दिनो मे न जाने कितने विचारों के बवंडर आये और चले गये। कलम उठायी और फिर रख...

मैं खुशबू सा बिखर जाऊँ तो

मैं खुशबू सा बिखर जाऊँ तो तेरा जिस्म छू कर आऊँ तो हज़ारों हज़ार ग़म लेकर भी हर वक़्त  हँसू मुस्कुराऊँ तो तू चाँद है तेरा वज़ूद चाँदनी  रात बन के लिपट जाऊँ तो क्या मुझको गले लगाओगे किसी रोज़ तेरे घर आऊं तो   क्या मुझको वेणी में गूँथोगी फूल बन कर खिल जाऊँ तो मुकेश इलाहाबादी -------------

समंदर बादल बन जाये तो भी क्या होगा

समंदर बादल बन जाये तो भी क्या होगा कुछ  दिन बारिश होगी फिर  सूखा होगा आज तुम मेरे घर आये तो रौशनी सी है तेरे जाने के बाद फिर गुप्प अँधेरा होगा तुमने हाले दिल पुछा, साँस चलने लगी तुम्हारे जाने के बाद न जाने क्या होगा? रात महताब रो रहा था सितारे रो रहे थे फ़लक़ से ज़रूर कोई सितारा टूटा होगा ? यूँ तो फितरत नहीं मुकेश की रोने की, ज़रूर किसी ने दिल उसका दुखाया होगा मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

चाँद मुझे आग का गोला लगता है

चाँद मुझे आग का गोला लगता है तुझ बिन गुलशन सहरा लगता है कहीं जाऊं कहीं आऊं कहीं बैठूँ ?? तुझ बिन जग सूना-सूना लगता है मुकेश इलाहाबादी ------------------

रात ऑगन में चॉदनी नही आती

रात ऑगन में चॉदनी नही आती मेरे चेहरे पे अब हंसी नही आती मीलों फैला रेगिस्तान हो गया हूं मेरे घर तक कोई नदी नही आती मुकंश तू भी मुझको भूल गया है ? अर्सा हुआ तेरी चिठठी नही आती मुकेश इलाहाबादी .................

रात, नींद तो नहीं आई,

रात, नींद तो नहीं आई, आप के ख्वाब ज़रूर आये रात से अब, कोई  शिकायत नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------  

तू फूल की मानिंद खिल और खुशबू सा महक

तू फूल की मानिंद खिल और खुशबू सा महक या परिंदा बन कर , मुंडेर पे बुलबुल सा चहक वज़ूद में अपने यूँ बर्फ सा ठंडापन मत रख तू पहले शोला बन फिर अंगारा सा देर तक दहक मेरी चाहत है तू इक दिन तू महताब बन जाये चाँद बन कर मेरी अंधेरी स्याह रातों में चमक मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

देर तक सोचता हूँ फिर लिखता हूँ

देर तक सोचता हूँ फिर लिखता हूँ तुझको ख़त लिखता हूँ मिटाता हूँ   कभी उठता हूँ ,कभी बैठ जाता हूँ जैसे तैसे मैं रातों दिन बिताता हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------------

नींद आये तो, तेरा ख्वाब रहता है

नींद आये तो,  तेरा ख्वाब रहता है आँख खोलूँ तो तेरा खयाल रहता है  गर तेरी  सूरत देखना चाहूँ मैं  तो तेरे चाँद से मुखड़े पे हिज़ाब रहता मुलाकात की इल्तज़ा करता हूँ तो तेरा हमेशा इंकार में जवाब होता है मुकेश इलाहाबादी --------------------

फिजॉ

फिजॉ ने बच्चे को स्कूल की बस पे बैठा के घर की तरफ का रुख किया ही था। अचानक एक छोटा बच्चा उसकी हाथ मे एक कागज थमा के यह कहते हुये भाग गया कि ‘आपको ये कागज उन अंकल ने देने के लिये कहा है’ वह कुछ समझ और सम्हल पाती तब तक वह लडका सडक के पार की गली मे न जाने कहां खो गया था। और जिस अंकल की तरफ इषारा किया था उस तरफ भी उसे कोई नजर नही आया। कागज का पुरजा अभी भी उसकी हथेलियों मे किसी अंगारे सा दबा दहक रहा था। पर वह उस कागज के टुकडे को कुछ डर और कुछ बदहवाषी मे फेक भी नही पा रही थी, और यह भी नही समझ पा रही थी कि वह इस टुकडे का क्या करे। लिहाजा इसी उहापोह की स्थिति मे उस कागज के टुकडे को हथेलियों मे लिये दिये जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ चली। न जाने कव उसके हाथों ने उस टुकडे को अपने कपडों मे छुपा लिया। और अपनी उखडी सांसों को सहेजते हुये व चेहरे पे उभर आयी बदहवासी को छुपाने के लिये। अपने सिर के पल्लू के आदतन सही किया, आंचल से नाक व माथे पे चमक आयी पसीने की बूंदों को पोछा और सीधे किचन की तरफ चली आयी। सासू मॉ कुरान षरीफ पढने के लिये बैठी थीं। अब्बू रोज की तरह अखबार मे मुॅह गडाये चाय की चुस्कियों मे व्यस्त...

ज़मी ने चॉद से इठलाते हुये कहा

सुमी जानती हो ? एक दिन, ज़मी ने चॉद से इठलाते हुये कहा, ‘चॉद ! एक तो तुम महीने मे सिर्फ एक दिन पूरा का पूरा खिलते हो। बाकी दिन खिलते ही हो तो कभी आधा तो कभी अधूरा खिलते हो, और फिर तुम फ़लक मे इतनी दूर हो कि तुम्हे इतनी दूर से देखने से जी नहीं भरता। मै चाहती हूं, तुम मेरे बहुत बहुत नजदीक रहो। ताकि मै तुमसे बतिया सकूं तुम्हारे संग हंस सकूं खिलखिला सकूं।’ यह सुन चॉद हंसा, मुस्कुराया, बोला ‘ठीक है मेरी प्यारी ज़मी, ऐसा करो तुम अपनी आखें खोलो। ज़मी किसी चंचल किशोरी सा अपनी बडी बडी न ीर भरी ठहरे पानी की झील सी गहरी पलकें खोल दी। और ,,,,,,,,, चॉद उस ठहरी हुयी झील में उतर गया। ज़्ामी बहुत खुश हुयी। चॉद भी जमी की आगोंश मे आ के खुश था। दोनो अठखेलियॉ करने लगे, देर तक मुहब्बत करते रहे। और सुबह जैसे ही आफताब के आने का वक्त हुआ। चंचल चॉद झील से बाहर निकल फिर से आसमान में रोज सा टंग गया। फिर से रात होने के इंतजार में । धरती ने भी उसे फिस संाझ आने का वायदा लिया। और,, सुमी तब से ही शायर और प्रेमी अपनी मासूका की ऑखों की तुलना झील से करने लगे। खैर ,,, मै तुम्हारा चॉद हूं या नही ये तो मु...

भर गये ज़ख्मों के निशान कौन रक्खे

भर गये ज़ख्मों के निशान कौन रक्खे गमजदा रातों का हिसाब कौन रक्खे ऑखें मेरी पत्थर की हो गयी, दोस्त इन ऑखोमें हसीन ख्वाब कौन रक्खे है आग सा जलता हुआ बदन मेरा जिस्म पे मखमली लिबास कौन रक्खे दिल निकाल के भेजा खत में तुझे तेरी नही नही का जवाब कौन रक्खे तुझे भूला हूं मुकेश बडी मुस्किल से बीते हुये लम्हों को याद कौन रक्खे मुकेश इलाहाबादी ..........................

बातों में तल्खियॉ देखी

बातों में तल्खियॉ देखी दिलों में बेचैनियॉ देखी जिस्म तो पास पास हैं रिश्तों मे तल्खियॉ देखी उूबे और थके हुये लोग चहरों पे उबासियॉ देखी मुरझाये मुरझाये से फूल डरी हुयी तितलियॉ देखी जाने कैसा शहर है ये ? हर जगह बेचैनयॉ देखी मुकेश इलाहाबा

मै, कोई नजूमी तो नहीं

मै, कोई नजूमी तो नहीं जो तेरे हाथों की लकीरें पढ सकूं हॉ, मै तेरी खामोश निगाहों और, धडकती सॉसो को पढने का हुनर जरुर रखता हूं ‘नजूमी ... हाथ देखने वाला ज्यातिषी’ मुकेश इलाहाबादी...

ज़मी ने चॉद से कहा,

सुमी, जानती हो? एक दिन ज़मी ने चॉद से कहा, ‘तुम मेरे बहुत बहुत प्यारे दोस्त हो पर तुम मुझे अर्हिनिश निहारते रहते हो देखते रहते हो पर जब मेरे और तुम्हारे बीच मे बादल आ जाते हैं और तुम मुझे देख नही पाते हो, तब तुम मुझे कैसे महसूसते हो पहचानते हो? चॉद पहले मुस्कुराया फिर हॅसा और बोला ‘ मै तुम्हे तुम्हारे रुप के अलावा तुम्हे तुम्हारी गंध से पहचान लेता हूं। तुम्हारे बदन से गेंदा, गुलाब, गुलमोहर और तमाम तमाम फूलों के अलावा जो माटी की सोंधी सोंधी महक आती है मै उससे तुम्हे पहचान लेता हूं। ज़मी ये सुन के खिलखिलाने लगी, इतराने लगी, बाली ‘ और इसी लिये तो ज़मीन, धरती, वसुधा आदि आदि नामों के अलावा मेरा एक नाम ‘गन्धा’ भी है। चॉद ने कहा ‘ हूॅ ! जानता हूं प्रिये’ फिर ज़मी ने कहा ‘अच्छा ये बताओ जैसेे मुझमे तमाम खुशबुऐं हैं तो कया तुममे भी कोई खुशबू है? और अगर है तो मै कैसे जानूं कि तुम भी मेरी तरह महकते हो‘। चॉद ने कहा ‘अच्छा ! ऐसी बात, तो तुम अपनी अंजुरी फैलाऔ, ज़मी ने अपनी अंजुरी मे ऑचल लपेट के चॉद के सामने कर दिया। चॉद ने ज़मी के ऑचल मे सुगंध के कुछ बीज छितरा दिये। और कहा ‘प्रिय...

गर कुछ अच्छा लगता है

अच्छी कविता खुशनुमा शाम या , बादलोंके बीच अधखिला चाँद और ,, रजनीगंधा के फूलों के अलावा गर कुछ अच्छा लगता है तो, वो सिर्फ और सिर्फ तुम हो  - सुमी मुकेश इलाहाबादी ------

रातों में जुगनू सा चमकता है

रातों में जुगनू सा चमकता है यादों में चन्दन सा  महकता है सुर्ख रंग हैं  उसके  आरिज़ के चेहरा गुलमोहर सा दमकता है लगा लेती है जब लाल बिंदी माथा उसका खूब चमकता है वो झटक दे अपनी ज़ुल्फ़ें तो बादल भी देरतक बरसता है जिसके हिज़्र में,मुकेश बाबू दिल मेरा देर तक सुलगता है मुकेश इलाहाबादी ---------

कह तो दूं सुनेगा कौन

कह तो दूं सुनेगा कौन बात मेरी मानेगा कौन सच की राह कारवां है साथ मेरे चलेगा कौन दुनिया सरांयखाना है यहां पर रहेगा कौन दिल मेरा खाली मकॉ इस घर मे रहेगा कौन ईश्क की झीनी चादर बता मुुकेश बुनेगा कौन मुकेश इलाहाबादी .....