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Showing posts from December, 2013

मौत अच्छी लगी जीना गवारा न हुआ,

मौत अच्छी लगी जीना गवारा न हुआ, बिछड़ के तुमसे कोई भी हमारा न हुआ चाहत तो थी जी लूं कुछ और दिन, पर तेरे बिन ज़माने मे अपना गुज़ारा न हुआ अपने ही क़द के लोगों से मिलता रहा ओहदेदार लोगों से कभी याराना न हुआ हुईं नज़रें अचानक तुमसे चार उस दिन ज़िंदगी में फिर वो हादसा दोबारा न हुआ मुक़द्दर मे जो लिखी थी यायावरी मुकेश गाँव या शहर कहीं भी ठिकाना न हुआ मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

ज़ख्मे इश्क़ अपना हुआ

ज़ख्मे इश्क़ अपना हुआ दर्द से रिस्ता पुराना हुआ आज फिर तेरी याद आयी सर्द मौसम भी सुहाना हुआ ज़ीस्त अमावस की रात हुई चाँद देखे हुए ज़माना हुआ तेरा नाम मुझसे क्या जुड़ा सारा शहर ही बेगाना हुआ हमने दास्ताने दिल सुनाया दुनिया के लिए फ़साना हुआ मुकेश इलाहाबादी  -------------