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Showing posts from October, 2012

चुरा कर फिर ले गयी दिल मेरा वो आज

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                                                                 चुरा कर फिर ले गयी दिल मेरा वो आज                                                                  ओढ़, हया की चुनरी फिर आई वो आज                            ...

बड़ा मासूम और दिलकश है वो,

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  बड़ा मासूम और दिलकश है वो, अब तो उसके हाथो क़त्ल होने को जी चाहे है    मुकेश इलाहाबादी ---------------------------                                                                               

गर हवा बन गुलशन में बहूँ तो फूल तुम बनो

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                                     गर हवा बन गुलशन में बहूँ तो फूल तुम बनो                                    दिल हमारा  जो धडके  तो  धड़कन  तुम बनो                                    गर सवाल तुम्हारा मै बनू तो जवाब तुम बनो                                    ग़ज़ल का काफिया मै बनू तो रदीफ़ तुम ...

हमने तो चाहा था, बहुत कुछ समझना समझाना

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                                                                          हमने तो चाहा था, बहुत कुछ समझना समझाना                                                                           तुम ही तो जिद पे अड़े थे हमें है कुछ ना समझना       ...

कुछ मजबूरियां रही होंगी जो साथ रह गया

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कुछ मजबूरियां रही होंगी जो साथ  रह गया वर्ना वो शख्श तो आया ही था लौट  जाने को अब हम भी शिकायत नहीं करते  ज़िन्दगी से यूँ ही बहुत कुछ होता है अक्शर, भूल जाने को  मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

अंदाज़ ऐ फकीरी में रहा उम्रभर,,,,,,,,

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अंदाज़ ऐ फकीरी में रहा उम्रभर,,,,,,,, कि जाम ऐ मुफलिसी पिए जा रहा हूँ एहसास ऐ मुहब्बत कह न सका,,,,,,,, कि तनहा ही ज़िन्दगी जीए जा रहा हूँ लुटा के सारे जज्बातों की दौलत,,,,,,,,,, फकत संग अपने रुसुवाई लिए जा रहा हूँ बाद मरने के भी मुझे याद करती रहो ,,,, सो अपनी यादों के लतीफे दिए जा रहा हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

जी तो चाहता है तुझे जी भर के देखूं

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                                             जी तो चाहता है तुझे जी भर के देखूं                                          डरता हूँ कंही मेरी नज़र न लग जाए                                          मुकेश इलाहाबादी -----------------

अपनी साँसे मेरी साँसों से मिला दे

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                                                                                 अपनी साँसे मेरी साँसों से मिला दे                                                                                की तुझसे मिल के...

तुम ही अपने हया के चिलमन से न निकली

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  तुम ही अपने हया के चिलमन से न निकली वरना ये हशरत बाकी न रहती मुलाक़ात की मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

मना कौन करता है जलाने को चराग ऐ मुहब्बत

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                                                                                मना कौन करता है जलाने को चराग ऐ मुहब्बत,,                                                                               फिर ये न कहना हमने तु...

तुम अपने सितम हमपे कम न करो

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                                            तुम अपने सितम हमपे कम न करो                                             हमें ज़ख्म सहने की पुरानी आदत है                                            मुकेश इलाहाबादी -------------------

हमने ज़नाब से मुहब्बत का इशारा क्या किया

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हमने ज़नाब से मुहब्बत का इशारा क्या किया कुछ हंस  के  कुछ इठला के अंगूठा दिखा दिया भीगी जुल्फों को झटका तो  सितारे बिखर गए, कुछ इस अदा से ज़नाब ने क़यामत हिला दिया   मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

चांद मुझको जलता हुआ लगे

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चांद मुझको जलता हुआ लगे जिस्म अपना उबलता हुआ लगे सदियों की जमी बर्फ हो जैसे आज कुछ पिघलता हुआ लगे आसमा से टूट कर सितारा जमीन से मिलता हुआ लगे मौसम है खिजां का, मगर, फूल कोई  खिलता हुआ लगे जो दिल उदास रहा करता था आज क्यूं मचलता हुआ लगे मुकेश इलाहाबादी ------------

नका़ब के भीतर चेहरा देखा

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नका़ब के भीतर चेहरा देखा चेहरे के उपर  चेहरा देखा मासूम बच्चों की मुस्कानो मे कितना उजला चेहरा देखा, मुददतों बाद आइना देखा, शिकन  से भरा चेहरा देखा मुखौटा उतार के हमने देखा सबका भददा चेहरा देखा दिन मे  जिसको हंसता देखा उसका रात मे रोता चेहरा देखा अपने अंदरा जा के देखा स्वार्थ से लिपटा चेहरा देखा मुकेश इलाहाबादी ----------

वो बुलबुल सा चहकना

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वो बुलबुल सा चहकना और फुदकना भा गया हमारा भी उस मासूम पे जाने कब दिल आ गया कच्ची अमिया खाना और वो खिलखिलाना भा गया चाय थमा कर हाथो  मे, फिर भाग जाना भा गया अपनी मॉ के  पीछे  पीछे , उसका मंदिर जाना भा गया सखियों संग धौल - धप्पा  घर मे चुप रहना भा गया दो चुटिया और लाल चुन्नी पे छीटदार कुर्ता पहनना भा गया तुम कैसी हो पूछा तो सिर्फ उसका सर हिलाना भा गया  यूँ दरवाजे के पीछे से उसका, मुझको बेवजह तकना भा गया मुकेश इलाहाबादी --------------

चलो हम अपनी कहानी लिखते हैं और तुम अपनी

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                                   चलो हम अपनी कहानी लिखते हैं और तुम अपनी                                  तुम लिखना दास्तन ऐ मुहब्बत और हम बेरुखी..                                 मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

सितम आपकी अदाओं का क्या कम था ?

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                                         सितम आपकी अदाओं का क्या कम थे  ?                                          जो आपने हमसे की बेवफाई ????????                                          मुकेश इलाहाबादी -------------------------

तकलीफ तो उनको भी है, अलविदा कहने से,

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                                    तकलीफ तो उनको भी है, अलविदा कहने से,                                   ये अलग बात है चेहरे से ज़ाहिर होने नहीं देते                                   मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

दाग दामन में लगा बैठे

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दाग दामन में लगा बैठे दिल हम उनसे लगा बैठे आब सा बहता हुआ बदन वो आग पानी में लगा बैठे दवा मिलती नहीं जिसकी मर्ज़ ऐसा दिल से लगा बैठे मुकेश इलाहाबादी --------

कभी तन्हा रहे,

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कभी तन्हा रहे, कभी महफ़िल में बैठे अजब हाल है मेरा दिल कंही लगता नहीं कभी यंहा बैठे कभी वंहा बैठे मुकेश इलाहाबादी  -----

तुम कहते थे न हम बुरे है, लो हमने किनारा कर लिया

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                               तुम कहते थे न हम बुरे है, लो  हमने किनारा कर लिया                                अब तुझसे ही नहीं तेरी यादों से भी अलविदा कह दिया                                तुम भी कभी मेरी बातो को याद कर के रो न दो, इसलिए                                तेरे शहर से ही नहीं इस जन्हा को ही अलविदा कह लिया..            ...

तेरी कैदे ज़ुल्फ़ में ही,

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तेरी कैदे ज़ुल्फ़ में ही, जवानी  गुज़र  गयी, रिहाई की उम्मीद में जिंदगानी गुज़र गयी, सुबह जाग के जो देखा रात तूफानी गुज़र गयी    मुकेश इलाहाबादी ----

तेरी मासूमियत का तो हर अंदाज़ निराला है,,,

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                                        तेरी मासूमियत का तो हर अंदाज़ निराला है,,,                                       इत्ती मासूम हो कि तुझे प्यार पे गुस्सा आता है                                       मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

वे इत्ते मासूम , कि

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वे इत्ते मासूम , कि न तिजारत समझते हैं न मुहब्बत समझते है और हम हैं, कि उनको अपनी दुनिया समझते हैं   मुकेश इलाहाबादी -----

हम फूलों की मुहब्बत मे,

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हम फूलों की मुहब्बत मे, कांटो से उलझे थे, कांटो ने दामन थाम लिया, पर फूलों ने मुखड़ा मोड़ लिया    मुकेश इलाहाबादी -------

होठो पे हँसी रखते हो

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होठो पे हँसी रखते  हो ज़ख्म छुपाये फिरते हो हमसे तुम अपना  क्यूँ, हर राज़ निहा रखते हो नज़दीक तुम्हारे दरिया फिर क्यूँ प्यासे रहते हो जब दुनिया सोई रहती तुम क्यूँ जागे रहते हो कांटो के शहर में रह के फूलों सा क्यूँ खिलते हो मुकेश इलाहाबादी -------

हम तो बस उसकी मासूमियत के कद्रदान थे

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हम तो बस उसकी मासूमियत के कद्रदान थे पर वो हमसे कुछ और सोच के खफा हुआ होगा जानता हूँ ,रात भर वो शख्श भी न सोया होगा कल जब हमने उससे अलविदा कहा होगा,   मुकेश इलाहाबादी --------------------------

दरिया सी रवानी है

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दरिया की रवानी है अल्ल्हड़ सी जवानी है रेशम से बालों मे, खुशबू मस्तानी है बातों में उसके परियों की कहानी है मिल जाए अगर वह तो वो रात सुहानी है  मुकेश इलाहाबादी -----------

ऐ हवाओं, अब तुम कंही और जाके खेलो

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ऐ हवाओं, अब तुम कंही और जाके खेलो ये मेरे महबूब की जुल्फे हैं, तुम इनसे न खेलो ऐ सिरफिरे गुलाब तुम भी मेरे महबूब ने घूंघट उठाया है कंही और जा के खिल लो बादलों से भी कह दूंगा, कंही और जा के बरसें मेरे महबूब ने, गीले बालों को झटका है मुकेश इलाहाबादी --------------

अच्छा हुआ जो, मुहब्बत दिमाग का नहीं,

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अच्छा हुआ जो, मुहब्बत दिमाग का नहीं,  दिल का कहा करती है, वरना ये मुहब्बत भी तिजारत हो जाती और अब तक अमीरों की तिजोरी मे होती हम गरीबों के हाथो मे फक्त खाली झोली होती  मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

अजब है तेरी चाहत का दस्तूर ---

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अजब है तेरी चाहत का दस्तूर --- पास आता हूँ  तो कहते हो 'इतनी नजदीकिया अच्छी नहीं' दूर जाता हूँ तो कहते हो 'तुम्हारे बिन अच्छा नहीं लगता? मुकेश इलाहाबादी -------------------

हुश्न के इन नायब मोतियों को यूँ ही न बिखर जाने दो

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                           हुश्न के इन नायब मोतियों को यूँ ही न बिखर जाने दो                            पल भर मेरी बाहों मे तो आ , अब इन्हें संवर जाने दो                            मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

चाहने वाले भी भला कब तक तेरे दर पे खड़े रहते ?

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                                    चाहने वाले भी भला कब तक तेरे दर पे खड़े रहते ?                                   तुम्हे न थी फुर्सत अपना  जलवा ऐ हुस्न संवारने से                                 मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

अपने सहन मे बोगन बलिया खिलाये रखता हूँ

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अपने सहन मे बोगन बलिया खिलाये रखता हूँ खुशबू तो नही, पर कुछ फूल तो खिलाये रखता हूँ जानता हूँ हमारी ग़ुरबत मे न काम आयेंगे फिर भी बचपन की दोस्ती है दोस्ती निभाये रखता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -

हम पे किया तो हम सह गए सितम

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  हम पे किया तो हम सह गए सितम अब किसी और पे न करिएगा ये सितम दिल दे के मुकर जाना आपका कि, 'हम तो मजाक कर रहे थे -जनाब'  मुकेश इलाहाबादी -----

कभी तनहा भी रहा कीजिये

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कभी  तनहा  भी  रहा  कीजिये ज़िन्दगी को यूँ भी जिया कीजिये ज़रूरी तो नहीं रात भर सोया करें कुछ देर तारों को भी गिना कीजिये दोस्तों से तो रोज़ मिला करते हो कभी हम जैसों से भी मिला कीजिये बहुत उदास है बुलबुल कफस मे, चहक सुनने के लिए उसे रिहा कीजिये ज़िन्दगी कोई गणित का सवाल नहीं कभी ग़ज़ल की तरह लिखा कीजिये मुकेश इलाहाबादी -----------------------

अपना कह सकूं ऐसा कोई,

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अपना कह सकूं ऐसा कोई, जहां मे कोई हमारा न हुआ राह मे मिल गया था अजनबी काम तो आया हमारा हुआ न हुआ कागजी सही फूल खिले तो हैं अब गुलशन हमारा हुआ न हुआ सब उसे मेरा महबूब कहते थे भले बेवफा हमारा हुआ न हुआ अब तुम तो हमारे हो गये मुकेश भले सारा जहां हमारा हुआ न हुआ मुकेश इलाहाबादी -------------------

क्या तुम्हे वो शाम याद है ?

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प्रिये, क्या तुम्हे वो शाम याद है ? जब तुम मेरे साथ थी। सुहानी शाम थी। पुरनम हवा, फूलों की बातें तितली की उडाने और भौंरों की गुन्जन थी। सूरज दिन की तपन लपेट के पश्चिमांचल  हो रहा था। चांद अपनी मुस्कुराहट के साथ  दूसरी दिशा से खिल रहा था। और हम तुम ... गांव और शहर के सीवान से लगी वीरान पुलिया पे बैठे थे तुम कभी अपनी लटों को हल्के से संवारती थी तो कभी बिखर जाने के लिये यूं ही छोड दिया करती थीं। उस वक्त मै तुम्हे देखता रहता था और तुम -- दूर कहीं बहुत दूर प्रथ्वी और आकाश  को एककार होते हुये देख रही थीं। मुस्कुरा रही थी। सांझ धीरे धीरे संवला रही थी। तुम्हारी उंगलियां मेरी मुठिठयों मे भिंचती जा रही थी। एक गहरा मीठा मीठा सोंधा सोंधा एहसास पसरा था चहुंओर तभी आकाश मे दूर बहुत दूर कोई सितारा टूटता है, तुम घबरा कर मुझसे लिपट जाती हो जैसे दूर धरती आकाश से लिपट रही होती है सिमट रही होती है और, तब मै ---- तुम्हारी घबराई हुयी बंद पलकों पे अपने होंठ रख दिये थे  हौले से न जुदा होने के लिये न जुदा होने के लिये मुकेश इलाहाबादी --------------------

तुम मुहब्बत में तिजारत क्यूँ ले आते हो ?

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                                                       तुम मुहब्बत में तिजारत क्यूँ ले आते हो ?                                                      हम तो वैसे ही बेमोल बिक चुके तेरे हाथो                                                ...

तुमने कभी सांवली सलोनी सजीली रात को देखा है ?

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 सुमी -- तुमने कभी  सांवली सलोनी सजीली रात को देखा है  ? जब आसमा में न तारे होते है न चन्दा होता है - सब के सब जुदा हो गए होते हैं ये रूठ चुके होते है - तब भी ये सांवरी कजरारी रात अपने में खोई खोई - सिमटी सकुचाई सी अपना आँचल पसारे सारी कायनात को अपने में समेटे रहती है -  और --- ---- उसे ये एहसास रहता है की कभी तो सहर होगी और वो दिन के मजबूत बाजुओं में अपना सर रख के सो जायेगी - शाम होने तक के लिए और फिर   ------- रात इसी इंतज़ार में गलने लगती है धीरे धीरे हौले हौले - कभी कभी वो भी संवराई रात उदास होने लगती है की शय सहर न भी हो और वो यूँ ही दम तोड़ दे इन स्याह ऋतुओं में पर ऐसा होता नहीं ऐसा होता नहीं  -- सहर होती है - रात मुस्कुराती है  - और फिर फिर दिन के बाजुओं में आ के मुस्कुरा देती है  - तब ये फूल ये पत्ते ये भंवरे - या हवाएं सब मस्त मगन नाचते हैं - गुनगुनाते है - और इसी तरह मेरे सुमी एक दिन तुम भी सुबह की तरह खिलोगी हंसोगी मुस्कुराओगी और उस दिन तुम हमें भूल जाओगी - भूल जाओगी  - भूल जाओगी मुकेश इलाहाबादी -----------------------------...

मिट गयी सारे जहां की हसरते आपको देखकर

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                                              मिट गयी सारे जहां की हसरते आपको देखकर                                               सिर्फ रह गयी आपकी चाहते आपको देखकर --                                               मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

तुम हमारे साथ क़यामत तक रहोगी

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                                                       तुम हमारे साथ क़यामत तक रहोगी                                                         बिन एक दूजे के  हमारा गुज़ारा नहीं                                               ...

जो यादों के समंदर मे हर वक्त मचलती है

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जो यादों के समंदर मे हर वक्त मचलती है हो के तसव्वुर से जुदा मछली सी तडपती है सांझ होते ही फलक पे चांद सा खिल कर रात भर ख्वाब मे चांदनी सा बिछलती है तुम कहते हो देखूं न छुऊँ न सूघूं न उसे कैसे हो सकता है वो सांसों मे महकती है सरगम हो जाए है हमारी हर सुबह तब, जब आंगन मे वह बुलबुल सा चहकती है कभी बाहों मे झुलाऊँ कभी उर मे बसाऊँ गुलशन सी लगे जब वो सजती संवरती है बादल सा मुखड़ा और  समंदर  सी आखें परी सी लगे है जब वो बाहों में उतरती है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

अलाव बुझ चुका है अब शरारे नही हैं

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अलाव बुझ चुका है अब शरारे नही हैं फिजाओ मे भी अब वो नजारे नही हैं क्यूं बेवजह राह तकते हो तुम उसकी गैर हो चुके हैं वो अब तुम्हारे नही हैं  स्याह नागिन सी रात फैली है चुपके.2 फलक पे चांद नही है सितारे नही हैं तुम्हे क्या पता है मुफलिसी के मायने तुमने कठिन दौर अभी गुजारे नही है हर सिम्त नजर आता आब ही आब है बीच समंदर मे हो तुम किनारे नही हैं अलग से --------------- उदासी की चादर ओढ के बैठे हैं सब !!! महफिल मे अब पहले से ठहाके नही हैं कभी फागुन कभी सावन कभी चैती गाते थे मुददत हुयी अब कोई गीत गुनगुनाते नही हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------

ज़िन्दगी की कोई भी राह मुस्किल नहीं

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                                                   ज़िन्दगी की कोई भी राह मुस्किल नहीं                                                    हमने तो हँस के काटी है दश्ते तीरगी भी                                                     मुकेश इलाहाबादी -------------------

गुफ्तगू करती निगोड़ी हवाओं को सुना है-

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गुफ्तगू करती निगोड़ी हवाओं को सुना है- हमने तनहा रातों में तेरी आहों को सुना है तू कुछ कहे न कहे  हमने तेरे  धड़कते हुए हर सांस हर एहसास हर जज़्बात को सुना है   मुकेश इलाहाबादी -------------------------

शुक्रिया - आपने गम के आंसू तो बहाए

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शुक्रिया - आपने गम के आंसू तो बहाए वर्ना लोग तो मुह फेर लेते है -कह के ' किसी सिरफिरे आशिक का जनाज़ा है - हमे क्या करना है ' मुकेश इलाहाबादी --------------------------  

पीने पिलाने का हमे कभी शौक ही न रहा

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  पीने पिलाने का हमे कभी शौक ही न रहा कभी हुआ भी तो अपने दीवाने के घर का रुख किया वो अपनी आखों से तो कभी बातों से पिलाता रहा कभी हम बेहोस भी हुए तो वो संभाला किया  मुकेश इलाहाबादी --------------------------

मुहब्बत न सही उल्फत सही दोस्त तुमसे

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  मुहब्बत न सही उल्फत सही दोस्त तुमसे मुलाक़ात का कोई न कोई तो बहाना चाहिए बेवजह तो कोई किसी से मिलता जुलता नहीं   मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

हमने तो सिर्फ मुहब्बत की - ये अलग बात

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                                                   हमने तो सिर्फ मुहब्बत की - ये अलग बात                                                    लोगों ने इसे जाने क्या क्या नाम दे दिया !!                                                     मुकेश इलाहा...