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Showing posts from June, 2012

मै जुदा सी एक कहानी लिख जाऊंगा !!!

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                                                 मै जुदा सी एक कहानी लिख जाऊंगा !!!                                                  इकदिन अपनी जिंदगानी लिख जाऊंगा                                                   सूरज  से रोशनी  लेकर चमकता है  चाँद!! ...

श्रीमतभगवतगीता। श्रीमुख से निश्रत गीत

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                                                      ओम श्री गणेशाय नमः                                   श्रीमतभगवतगीता। श्रीमुख से निश्रत गीत    आदमी जब मस्ती मे होता है। तरंग मे होता है । आनंद में होता है, या कोई खुशी है, जो समाये नही समाती। तो आदमी गीत गाता है। वही गीत जव श्रीमुख से निश्रत होता है तो गीता कहाती है। हालाकि श्री तो हमेशा अपनी मस्ती मे ही होते हैं। गीत गाते ही रहते है कोयल की कुहुक मे। झीगुर की सू सूं मे। पेडों की सर सर मे। बच्चों की किलकारियों मे। भक्तो के भजन मे, अनंत अनंत तरह सें पर बात यहां समझाने के प्रयोजन से ही कही गयी है। और यहां बात उस गीत की है जो उन्होने र्धम क्षेत्र कुरुक्षेत्र  मे रणभेरी के संगीत मे गाया गया है  जहां युद्ध के ...

लकीरें ----------

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लकीरें ---------- लकीरें कहीं भी खिंची हों किसी भी तरह देती हैं प्रभाव अपनी तरह लकीरें पानी में खिंचती हैं न दिखने की तरह पत्थर पे खिंच जाती हैं न मिटने की तरह हांथों में खिच आती हैं कर्म और भाग्य की तरह लकीरें आदमियत को बांट देती हैं देश व परिवार की सीमा रेखा की तरह लकीरें खिंच कर आईने में बांट देती हैं अक्श को न जुड़ने की तरह क्या बता सकते हैं आप जहों कोई लकीर न हो अनंत आकाश की तरह मुकेश इलाहाबादी

बेबसी-----------------------

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                                                                                                कितनी बेबस होती हूं मैं                                                देख कर अपने बूढ़े बाप को                  ...

तुम तो न करोगी हमसे इशरार की बातें

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बैठे ठाले की तरंग --------------------- तुम तो न करोगी हमसे इशरार की बातें आओ चलो फिर करलें तकरार की बातें मय है, महफ़िल है, मौका  है  माहौल भी ऐसे में अच्छी नहीं लगती इंकार की बातें मुकेश इलाहाबादी ----------------------

सूरत अपनी देख कर मन उदास है

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बैठे ठाले की तरंग ----------- सूरत  अपनी  देख कर मन उदास है चेहरा बदल गया या आईना खराब है                                           हर सिम्त अभी तक फ़ैली है तीरगी ये घिर आये बादल या लम्बी रात है पूछता हूँ हाल  तो  कुछ  बोलते  नहीं हमसे खफा हैं, या कोइ और बात है ? चला था मंदिर को पहूचता हूँ  मैक़दे रिंद बन गया हूँ या मौसम की बात है ? मुकेश इलाहाबादी -------------------

रेत में न पाओगे, मेरे पैरों के निशाँ

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बैठे ठाले की तरंग ------------------ रेत में न पाओगे, मेरे पैरों के निशाँ पत्थरों में ढूंढ लो मेरे हाथो के निशाँ कलियों सा दिल तुमने तोड़ तो दिया खुशबू में पाओगे मेरे ज़ख्मो के निशाँ ख़त मेरे दरिया में बहा तो आये हो,तुम    अब लहरों में देखना मेरी यादों के निशाँ चेहरे की झुर्रियों में पढ़ लेना एक दिन हर शिकन में पाओगे मेरी बातों के निशाँ मासूम था दिल मेरा, तुमने चीर तो दिया पाओगे फिर भी तुम , मेरी दुआओं के निशाँ मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

दिन में ही करो हमसे होश की बात

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बैठे ठाले की तरंग ------------------ दिन में ही करो हमसे होश की बात होश में ना आऊँगा मै, शाम के बाद अभी तो भूले हो हमें कोई बात नहीं याद बहुत आऊँगा,मर जाने के बाद मुकेश इलाहाबादी -------------------

धुप निखर आयेगी

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बैठे ठाले की तरंग ------ धुप निखर आयेगी रात गुज़र जायेगी शराब ज़हर बन के सीने में उतर जायेगी खुशबू गुलशन छोड़ फिर किधर जायेगी सामने हो हुश्न बेपनाह नज़र सिर्फ उधर जायेगी महफ़िल में आयेगी तो चांदनी बिखर जायेगी मुकेश इलाहाबादी -------

चाँद मुस्कुराता है,, खामोश दरिया बुलाता है ,,,

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चाँद मुस्कुराता है,, खामोश दरिया बुलाता है ,,, मै .... अपने ज़ख्मो को देखता हूँ फिर -- न जाने क्या सोच, लंगडाते हुए दरिया में डूब जाता हूँ दरिया कुनमुना कर एक बार फिर चुप हो जाता है उधर,,,,,,,,,, चांदनी भी ......... धीरे ------ धीरे --------- बादलों की ओट में डूब जाती  है अब चांदनी  और मै दोनों डूब चुके हैं खामोश दरिया में खामोशी के साथ उधर --------- सितारे भी , टिमटिमाकर छुप गए हैं न जाने किस अँधेरे जंगल में और --------- अब ,,,,,,,,, चारों तरफ भयावह सन्नाटे के साथ सनसनाता हुआ कायनात बच रहा है बस --------------- मुकेश इलाहाबादी

नींद से जगाकर -ख्वाब सारे सो गए

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बैठे ठाले की तरंग ------------------- नींद से जागकर -ख्वाब सारे सो गए एक बार फिर हम  तीरगी में खो गए नीमबाज़ आखो से देख लिया आपने दुनिया ज़हान छोड़,आपके हम हो गए मुस्कराहट से हम समझे कुछ और सुनायी जो दास्ताँ आपने हम रो गए   मुकेश इलाहाबादी ---------------------

गर आँचल से वक़्त की गर्द पोंछ दी होती

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बैठे ठाले की तरंग ---------------------- गर आँचल से वक़्त की गर्द पोंछ दी होती तस्वीर हमारी फिर से  निखर  गयी होती यूँ वक़्त से पहले चरागे मुहब्बत न बुझता गर आँचल से ज़माने को यूँ हवा न दी होती मुकेश इलाहाबादी ------------------------

जो तुम्हे, धुंधला नज़र आता है

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बैठे ठाले की तरंग ---------------- जो तुम्हे, धुंधला नज़र आता है चेहरा हमारा वो कुछ और नहीं वक़्त की गर्द जम गयी है बस -- हौले से एक बार अपने आँचल से पोंछ दो आईना ऐ दिल को देखना फिर से साफ़ नज़र आयेगा चेहरा हमारा मुकेश इलाहाबादी ------------------

हथेली पे जान रखना

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बैठे ठाले की तरंग -------------- हथेली पे जान रखना बातों की शान रखना पैरों की छाप से अपने पत्थर पे नीशान रखना  सियासत ही करना है तो अपने हाथो कमान रखना इतने भोले मत बनो तुम अपने मुह में जबान रखना हवन ही यदि कर रहे हो तो दामन न जले ध्यान रखना मुंसिफ बिक चुका है, मुकेश ज़रा सम्हाल के बयान रखना मुकेश इलाहाबादी -----------

पत्थर की हवेली है

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बैठे ठाले की तरंग ------------- पत्थर  की  हवेली है अन्दर  से  अकेली है जबान मुह में रख के अब  तक  न बोली है मासूम  सी  आखों से लगती भोली भोली है खुशबू  उसके बदन की महके तो चंपा चमेली है  यूँ तो मेले में हैं हँसी कई पर वह तो अलबेली है खिलखिला के हँसे तो लगे परियों की सहेली है मुकेश इलाहाबादी --------

ये अलग बात कि हम हथेली पे सूरज उगाये बैठे हैं

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ये अलग बात कि हम हथेली पे सूरज उगाये बैठे हैं मगर आपके लिए तो जुल्फों की छांह सजाये बैठे हैं औरत हो  के तो हमेसा जलना हमारा मुक़द्दर ठहरा पर हर बार हमी  आपके  लिए  पलकें बिछाए बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------- 

एक शब्द चित्र ----------------

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 एक शब्द चित्र ---------------- (पूने जम्मूतवी एक्सप्रेस ट्रेन ) सामने की बर्थ, जिसपे यह आदमी सोया है अभी अभी रात सोयी थी एक सुन्दर लडकी मासूम और खूबसूरत सी खरगोश सा रंग चूहे सी चंचल आखें व भूरे बालों वाली वह लडकी नीली जींस व आसमानी टॉप में बिना किसी मेकप के भी खूबसूरत लग रही थी जो अपनी माँ से नाराज़ थी वह मोबाइल से गाना सुनना चाह रही थी पर माँ नहीं दे रही थी, शायद उसे डर था वह अपने बॉयफ्रेंड से बात करेगी थोड़ी देर रूठने मनाने के बाद वह इसी बर्थ पे सो गयी थी रूठ कर अपनी माँ से --- सुबह लडकी भोपाल के स्टेशन पर उतर चुकी है -- अपनी माँ के साथ खिड़की के अन्दर से मैंने उसे देखा था पर उसने मुझे नहीं देखा मै उसे और उसकी खूबसूरत मासूम आखों में रात का गुस्सा पढ़ रहा था --- और ---- रेलगाड़ी रेंग चुकी थी कुछ देर बाद मेरे ज़ेहन से यह बात खो जायेगी जिस तरह वह लडकी स्टेशन के प्लेटफार्म की भीड़ में खो गयी है अभी अभी मुकेश इलाहाबादी ---------------

ख़त तुम्हारे गंगा में बहा डाले हैं

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ख़त तुम्हारे गंगा में बहा डाले हैं ख्वाब  हमने  सारे जला डाले  हैं सब के सब पेड़ शहर के कट गए  सभी परिंदे गुम्बदों में डेरा डाले हैं  बोलने  बतियाने  की  आज़ादी रहे इस लिए  अपने  शर  कटा  डाले हैं तुम  होते  तो  और बेहतर गुज़रती तुम बिनभी दिन अच्छे बिता डाले हैं उसने अपने दामन के फूल दिखाए हमने भी अपने ज़ख्म गिना डाले हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------

पहले चश्मे की तरह दश्ते तीरगी में बहा करते थे

पहले चश्मे की तरह दश्ते तीरगी में बहा करते थे अब आखों के समंदर में मौजों के संग रन्वा रहते हैं

तू अपने हाथो से मेरी प्यास बुझाए

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बैठे ठाले की तरंग ----------------- तू अपने हाथो से मेरी प्यास बुझाए मै अपने हाथो से तुझे जाम पिलाऊ क्या  अजब शमा  होगा  मैखाने का जब शाकी और दोनों को नशा होगा मुकेश इलाहाबादी ------------------

अब कोई पत्ता हरा नहीं होगा

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बैठे ठाले की तरंग ------------- अब  कोई  पत्ता  हरा  नहीं  होगा सूख चुका है पानी इन ज़मीनों का तीर  तलवार  बेशक  छूट  चुके हैं तहजीब नहीं बदला इन कबीलों का  ज़रा  सी  हवा  का  रुख  क्या बदला नकाब  हट  गया  इन  मह्जीबों का गर तूफाँ का जोर बढ़ता ही रहा,तो सोच लो अंजाम क्या होगा सफीनो का मुकेश इलाहाबादी --------------------

तेरा चेहरा किताब है

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बैठे ठाले की तरंग ------ तेरा चेहरा किताब है कविता है शब्द है -- पढ़ लूं हर्फ़ दर हर्फ़ तेरा चेहरा गुलाब है सुर्ख है नर्म है सूंघ लूं सांस दर सांस मुकेश इलाहाबादी ------

खामोशी स्याह और लम्बी रात के बाद - टूटेगी

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बैठे ठाले की तरंग -----   खामोशी स्याह और लम्बी  रात के बाद - टूटेगी इस उम्मीद के साथ सोया था किन्तु, वह सुबह की धुप के साथ फैलती गयी और अब तपती दोपहर में और गाढ़ी होकर मौत की खामोशी के साथ छितरा गयी है दरवाजे, खिड़की, देहरी मन, देह व देह के पार भी यंहा तक कि सूख गए हैं आंसू भी लान में पीली पड़ती डूब की तरह --- मुकेश इलाहाबादी -------------------- 

दिल हमारा जिनपे आसना हुआ

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बैठे ठाले की तरंग ---------------- दिल  हमारा जिनपे आसना  हुआ उनसे कभी न आमना सामना हुआ चिलमन से ही हम उन्हे देखा किये ख़तोकिताबत का ही दोस्ताना हुआ अब तो चेहरे के नुकूष भी याद नही कि उनको दखे हुए इक जमाना हुआ ऐ मुकेष राहे ज़िंदगी मे थी बड़ी तपिश साथ चले वे तो सफर कुछ सुहाना हुआ मुकेश इलाहाबादी ----------------------
----------------- मुद्दत  हो  गयी  यायावरी  करते करते ज़िन्दगी हो गयी अपनी एक बंजारे जैसे मुकेश इलाहाबादी -------------------------

ख़त मेरे महबूब ------------------

ख़त मेरे महबूब ------------------ मेरे महबूब, यह ख़त नही, गुफ़तगूं है। जो की गयी है, बोगनबेलिया, कचनार और गुलाब की कतारों से। अषोक, देवदार और युकलिप्टस के उंचे उंचे लहराते पेडों से। तुम्हारी यादों से ये वो बातें हैं, जो गुपचुप गुपचुप की गयी हैं। खामोषी की उन गहराइयों से। जो इस पहाड़ की अतल गहराइयों से प्रतिघ्वनित हुयी है। वेद की ऋचाओं सी या कुरान की पाकीजां आयतों सी। यह वह पवित्र एहसास  है। जो  महसूस गया है। इन पेड पहाड़ पगड़ंड़ी घास फूस कोैवे गिलहरी सांप गोजर और ग्रामवासियों के बीच फ़ैली रहने वाली अनवरत खामोशी के साथ। जिसे कभी कोई झींगूर की सूं सूं या दूर चलती पनचक्की की पुक पुक या किसी बैलवाले की र्हड़ र्हड़ ही तोड़ पाती है। उसी खामोषी को कैद करने की कोषिष की है। लिहाजा .... मेरी जानू मेरी अच्छी जानू .... कई दिनो की जददो जहद के बाद तुम्हे खत लिखने का साहस कर पाया हूं। यह जददो जहद किसी और से नही अपने आप से थी। यह जददोजहद अपने विचारों से अपने सिद्धांतों से थी। इन दो तीन दिनो मे न जाने कितने विचारों के बवंडर आये और चले गये। कलम उठायी और फिर रख दी। दो चार लाइने लिखी और फिर काट दी। ...

चुप्पा

बैठे ठाले की तरंग --------- चुप्पा सामान्यतह उसके चेहरे पर कोई भाव नही होते ‘चुप्पा’ ज्यादातर चुप ही रहता है सारे भाव विभाव, हंसी खुशी, और यहां तक कि सहमति और असहमति को भी शून्य मे टांग दिया हो शायद शून्य मे कोई खूंटी हो या, हो सकता है उसके सभी भाव और विभाव इस चुप्पी के साथ हवा मे घुल मिल कर शून्य मे विलीन हो गये हों बुजुर्गों का कहना है, वह जन्म से ‘चुप्पा’ न था अनुभव व उम्र ने चुप्पा बना दिया है पर, कुछ लोगों का विष्वास है किसी बड़े हादसे ने, उसे चुप्पा बना दिया है बहरहाल कुछ भी हो उसे ‘चुप्पा’ कहे जाने से कोई एतराज नही है मुकेश इलाहाबादी --------------

तिलचटटा

बैठे ठाले की तरंग ---------- तिलचटटा अपनी नाक पर उगी तलवार सी मूंछो को लेकर किसी सेनापति से बहुत खुश  था और नाली की जाली में अलमस्त घूमता फिरता या बिलबिलाता था पर एक दिन उसे न जाने क्या सूझी शायाद उसे अपने तिलचटटेपन के कारण यह बात सूझी होगी और वह ब्रम्हांड़ नापने चल दिया अपने कमजोर पैरों और तलवार सी मूंछो के साथ वह बहुत खुश था नाली के आगे चिकने लम्बे फर्श को देखकर वह उसपे रपटने और दौड़ने लगा अचानक चिकने फर्श के मालिक ने देखा इस साफ सुथरे फर्श पर तिलचटटा !!! झट उसने ‘हिट मी’ के बटन को दबाया और कुछ गैस निकल कर तिलचटटे को दर का दर खत्म कर गयी जिस तरह कुछ लाख नाजियों को गैस चैम्बर मे खत्म कर दिया गया था कुछ सिरफिरों के दवारा तिलचटटा, अब फिर नाली मे था अपनी मूछों के साथ पर अब वह मर चुका था। मुकेश इलाहाबादी ---------------------

अक्सर, एक शरारत मीठी सी

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बैठे ठाले की तरंग ---- अक्सर, एक शरारत मीठी सी तुम्हारे चेहरे पे खिलती जिसे तुम मेरी तरफ उछल कर, चल देतीं मुड़कर चाय, काफी या ऐसा ही कुछ लाने सच तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती सच बहुत अच्छी लगतीं तुम - तब मुकेश इलाहाबादी -------------------

आप से हमारी मुलाक़ात हो गयी

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बैठे ठाले की तरंग --------------- आप से हमारी मुलाक़ात हो गयी तपती ज़िन्दगी, बरसात हो गयी कांटो की बेतरतीब झाड ज़िन्दगी आपसे मिल के गेंदा गुलाब हो गयी साजे दिल पे आपने  हाथ रख दिया ज़िन्दगी  हमारी  सितार  हो  गयी आपकी मुहब्बत के पैमाने में ढलके ज़िन्दगी  आब  थी  शराब  हो  गयी    मुकेश इलाहाबादी -------------------

गम उदासी और तनहा रात लाई है

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बैठे ठाले की तरंग ----------- गम उदासी और तनहा रात लाई है जिंदगी मेरे लिए क्या क्या सौगात लाई है समझे थे की, इश्क में गुजरेगी मौज से पै मुहब्बत मेरे लिए हादसात लाई है सोचा था अब तो शब् घर सोयेंगे चैन से रात मेरे लिए आंसुओ की बरसात लाई है ज़िन्दगी तेरे बिना मुहाल हो गयी तेरी याद ही है जो मेरे लिए हयात लाई है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

अपनी कविता के बारे में --------

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अपनी कविता के बारे में -------- मित्रों, मै, कवि नही कवि मना हूं भावों से बना हूं जीवन भर उन्मुक्त बहा हूं न मानूं बंधन को न जानू कविता के छंदो बंदों के तटबंधों को हरदम भावों में ही बहा हूं जब भाव बहा करते हैं उसमें खूब नहाता हूं फिर कुछ भावों कों शब्दों की अंजुरी में भर भर लाता हूं उसको ही अपनी कविता कहता हूं मालूम है मुझको मेरी कविताएं, कविता के मीटर के बाहर रह जाती है सारे नियमों को तोड़ बहा करती है पर यह भी मालूम है मित्रों आप न देते इस पर ध्यान इन कमियों को मुझे बता कर इन भावों को देते पूरा मान मुकेश इलाहाबादी -------------------

बहेलिये तेरे जाल में न आयेंगे परिंदे

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बैठे ठाले की तरंग ---------- बहेलिये तेरे जाल में न आयेंगे परिंदे नई शदी के हैं बेख़ौफ़ बेबाक से परिंदे ऊंची से ऊंची उड़ान को तैयार हैं सभी ये अब तेरी हर चाल हैं समझते परिंदे रह रह  के हवा का रुख परखते हैं, औ  हरबार अपने जंवा पर तोलते हैं परिंदे ज़मी से  अपना जाल  समेत  बहेलिये ये ऊंचे से ऊंचे  मचानों पे बैठते हैं परिंदे अब कुछ न कुछ तबदीली हो के रहेगी   हर  रोज़ नई नई उड़ान भरते हैं ये परिंदे मुकेश इलाहाबादी ----------------------

ब ज़िद हैं हम,कि हर बार करेंगे

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बैठे ठाले की तरंग ------------- ब ज़िद हैं हम,कि हर बार करेंगे गुनाह-ऐ-मुहब्बत सौ बार करेंगे कितनी ही बेवफाई कर लो मुझसे हम तो  तुम्ही  पे  ऐतबार  करेंगे जब तक आने का वादा न करोगी मिन्नतें हम तुमसे बार बार करेंगे मुकेश इलाहाबादी -----------------

फिजाओं में मिस्री सी क्यूँ घुली है ?

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फिजाओं में मिस्री सी क्यूँ घुली है ? सुना है -------- उन्होंने अपनी बिखरी जुल्फों को झटक के फिर समेटा है मुकेश इलाहाबादी -----------

वो -- मुस्कुराना ख्वाब में

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बैठे ठाले की तरंग --------------- वो -- मुस्कुराना ख्वाब में औ  ---- कुनमुनाना नींद में अच्छा लगा ---- देखना तुमको - तुम्हारी नींद में वो -- ढलका हुआ आँचल औ -- करवट बदलना - नींद में अच्छा लगा --- देखना तुमको - तुम्हारी नींद में सोचता हूँ --- एक बोसा दे दूं तुमको - तुम्हारी नींद में फिर --- बाहों में मुस्कुराता देखूं तुमको तुम्हारी -- नींद में मुकेश इलाहाबादी ------------

ख्वाब में ही सही

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बैठे ठाले की तरंग ------------- ख्वाब में ही सही तेरी सूरत तो नज़र आती है गो की मेरा घर तेरे घर से दूर बहोत है पै, तेरे रूह की सेंक इधर तक आती तो है गर निगोड़ी हवा राह में यूँ न भटकती तेरे आँचल की खुशबू मेरे तक आती तो है ये शहर की चुप्पियाँ कानो में फुफुफुसाती हैं ज़माने में कंही न कंही अपनी रुसवाई तो है मुकेश इलाहाबादी ----------------

वह ज़मी की तह तक गया है

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बैठे ठाले की तरंग ----------- वह ज़मी की तह तक गया है तभी बुलंदियों को छू गया है देखना समंदर के पार जाएगा तूफां और सफीनो से न डरा है आफताब सा उगेगा एक दिन खुद को इतना जला लिया है बीज बन के माटी में मिला था वही आज फूल बन के खिला है पत्थर बना डाला है खुद को अब वो सदियों तक का सिला है मुकेश इलाहाबादी ----------------