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Showing posts from November, 2013

लफ़्ज़ों को धारदार कर लूं

लफ़्ज़ों को धारदार कर लूं कलम को तलवार कर लूं चुनौतियों से घबराकर क्यूँ दामन को दागदार कर लूं ? सोच के दरीचों को खोलकर अपना  दर हवादार  कर लूं दिल मैला है तो क्या हुआ ? पैरहन तो कलफदार कर लूं मुकेश इलाहाबादी --------------

इस तरफ समन्दर समन्दर है

इस तरफ समन्दर समन्दर है उधर धूल धक्कड़ औ बवंडर है जंगे खूंरेज़ी से कैसे बचेगी ज़मी इधर तैमूर लंग उधर सिकंदर है आसमान  चूमती थी ये इमारत वक़्त की मार से आज खंडहर है दशहत उदासी बेबसी व खामोशी हर गली कूचे मे बस यही मंज़र है खुद पी के हलालाल बहा दे गंगा ज़माने मे अब कंहा कोई शंकर है मुकेश इलाहाबादी -----------------

जो मौसमी फलों से लदे हैं,

जो मौसमी फलों से लदे हैं, वे शज़र सिर झुकाये खड़े हैं रेत  पे खिची लकीर हैं हम ज़रा सी हवा से मिट गए हैं था कदमो तले जिन्हे झुकना घास के तिनके फिर से खड़े हैं आहिस्ता - 2 लोग जान लेंगे अभी तो हम शहर मे नये हैं जला पायेगी हमे हिज्र की धूप कि तेरी यादों के साये घने हैं मुकेश इलाहाबादी -------------

लब पे सजा लो तो तराना हूँ मै,

लब पे सजा लो तो तराना हूँ मै, वरना एक पागल दीवाना हूँ मै हर गली कूचे मे है किस्सा मेरा शहर के लिये इक फ़साना हूँ मै रोज़ मिलते हैं मुलाक़ात होती है फिर भी उसके लिये बेगाना हूँ मै वक़्त के सांचे मे ढलना न आया तभी तो बीता हुआ ज़माना हूँ मै मर्ज़ी है तुम्हारी चाहे जो कह लो आदतों से फ़क़ीर सूफियाना हूँ मै मुकेश इलाहाबादी -----------------

चलो आओ काम हम कोई तूफानी करें

चलो आओ काम हम कोई तूफानी करें हवा मे रंग घोलें मौसम शादमानी करें लहरा के तेरी चुनरी इन फ़िज़ाओं मे सुर्ख बादलों का रंग फिर आसमानी करें तुम चुराओ चैन मेरा औ मै चुराऊँ दिल आओ एक दूजे से थोड़ी बेईमानी करें तुम कहो मुझे दीवाना औ मै कहूँ  मगरूर आओ शीरी बातों के बीच बदज़ुबानी करें तुम मुझे उकसाओ और मै लूं तेरा बोसा आओ मुहब्बत मे थोडा छेड़खानी करें मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

अंधेरा सब कुछ लील गया,

अंधेरा सब कुछ लील गया, परछांई को भी निगल गया सफ़रे इंतज़ामात मे रह गया कारवाँ तब तक निकल गया फितरत उसकी चाँद सी है सांझ होते ही खिल गया कुछ तो खौलन पहले से थी  ज़रा सी आंच पिघल गया सदियों का जमा हिमखंड था ज़रा से प्यार में पिघल गया मुकेश इलाहाबादी ------------

जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा तपता हुआ लगे

जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा तपता हुआ लगे जाने क्यूँ सब कुछ जलता हुआ लगे देख कर ख़ाक ही ख़ाक हर सिम्त आफताब  मुँह चिढ़ाता हुआ लगे देख आँगन मे बिछी पीली चांदनी फलक पे महताब ढलता हुआ लगे देख कर दूर तक ये उड़ता गर्दो गुबार कारवां मुझे छोड़ के बढ़ता हुआ लगे जब भी तेरा ग़मज़दा चेहरा याद आये दूर कंही कोई सितारा टूटता हुआ लगे मुकेश इलाहाबादी -----------------------

आफताब से कुछ और नही माँगता हूँ

आफताब से कुछ और नही माँगता हूँ फक़त अपने हिस्से की धुप चाहता हूँ शाम से ही शराबखाने मे बैठा ज़रूर हूँ मगर पैमाने मे अपना ग़म ढालता हूँ रात जब भी चांदनी बरसे है आँगन मे वज़ूद पे खामोशी की चादर तानता हूँ मुकेश राह जब से पकड़ी सच की हमने हो गया हूँ अकेला कारवां में जानता हूँ मुकेश इलाहाबादी -------------------------

मै पूरी तफसील से तुझे याद करूं

मै पूरी तफसील से तुझे याद करूं मौसमे तन्हाई को कुछ खाश करूं अभी यंहा बैठा हूँ फिर वहाँ बैठूंगा जंहा जंहा भी बैठू तेरी ही बात करूं दूर तक सिर्फ ज़मी और आसमा हो फिर तुझसे तंहाई मे मुलाक़ात करूं तुम गुस्से में और भी हँसी लगती हो आ आज तुझे थोड़ा सा नाराज़ करूं होती होगी मुहब्बत आग का दरिया आओ डूब कर इसे आबे हयात करूं मुकेश इलाहाबादी ------------------