इस तरफ समन्दर समन्दर है

इस तरफ समन्दर समन्दर है
उधर धूल धक्कड़ औ बवंडर है

जंगे खूंरेज़ी से कैसे बचेगी ज़मी
इधर तैमूर लंग उधर सिकंदर है

आसमान  चूमती थी ये इमारत
वक़्त की मार से आज खंडहर है

दशहत उदासी बेबसी व खामोशी
हर गली कूचे मे बस यही मंज़र है

खुद पी के हलालाल बहा दे गंगा
ज़माने मे अब कंहा कोई शंकर है

मुकेश इलाहाबादी -----------------

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