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Showing posts from October, 2014

जिस घाव को भरने में हमको इक ज़माना लगा

जिस घाव को भरने में हमको इक ज़माना लगा उस ज़ख्म को फिर से हरा करने में लम्हा लगा जिसे लोग बेवज़ह पागल दीवाना कहा करते थे हमें तो वो शख्श बातचीत में बहोत दाना लगा कभी पतझड़ कभी बादल तो कभी लू के थपेड़े तुम्हारे आने के बाद, मौसम कुछ सुहाना लगा पंडित हो, क़ाज़ी हो या कि शहर का  हाक़िम हो मुझे तो हर शख्श तुम्हारे हुस्न का दीवाना लगा मुकेश उस हादसे को फिर से क्यूँ याद दिलाते हो जिस बात को भूलने में हमको इक ज़माना लगा मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

ग़र चाँद होते तेरी राह में चांदनी सा बिछ गए होते

ग़र चाँद होते तेरी राह में चांदनी सा बिछ गए होते ये किस्मत की बात, ख़ुदा ने मुझे सूरज बनाया है मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

बादलों की ज़मीं पे ग़ज़ल लिख दिया

बादलों की ज़मीं पे ग़ज़ल लिख दिया यूँ कि चाँद को हमने ख़त लिख दिया साँसों में बेला, चमेली, रात रानी झरे नाम हमने उसका महक लिख दिया झील सी आखों में खिलखिलाती हंसी उस फूल को हमने कँवल लिख दिया रूई के फाॉहों से उजले उजले आरिज़ गालों पे उसके मुहब्बत लिख दिया मुद्दत हुई हमसे बोलता नहीं मुकेश अब तो उसे बेवफा सनम लिख दिया मुकेश इलाहाबादी -------------------

आँखे जागती हैं, ख्वाब सो गये

आँखे जागती हैं, ख्वाब सो गये कभी बहती नदी थे,बर्फ हो गये तमाम चेहरे बसे गये ज़ेहन में यादों की भीड़ में हम खो गये कभी हंसी -खुशी की मिसाल थे  क्या थे हम और क्या हो गये ? फूल खिला रहे थे जिनके लिए वो ही हमारे लिए कांटे बो गये मुकेश तमाम खुशनसीब लोग अपना सारा दुःख मुझसे रो गये मुकेश इलाहाबादी -------------

ताज़ा कली सी मुस्कुराती दिखी

ताज़ा कली सी मुस्कुराती दिखी छत पर वो कपडे सुखाती दिखी है बदन जिसका चांदनी चांदनी सजी संवरी बाज़ार जाती दिखी सोचता रहता हूँ जिसे दिन रात छज्जे पे कुछ सोचती सी दिखी जिसे नाज़ुक समझते रहे लोग ज़रुरत पे झांसी की रानी दिखी वो लड़की जिसे छुई - मुई कहा हर काम में आगे से आगे दिखी मुकेश इलाहाबादी ---------------

आ तुझे इक हसीन तोहफा दे दूँ

आ तुझे इक हसीन तोहफा दे दूँ तेरे आरिज़ के तिल पे बोसा दे दूँ तेरे संग थोड़ी सी शरारत करूँ औ ख़फ़ा होने का तुझे इक मौका दे दूँ मुकेश इलाहाबादी -----------------

मुहब्बत करना और इज़हार न करना तेरी पुरानी आदत है

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मुहब्बत करना और इज़हार न करना तेरी पुरानी आदत है अब तो मै हर राज़ तेरी खामोशी निगाहों से  समझ लेता हूँ मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------------

साँझ होते ही उफ़ुक़ पे जा कर खो गया है

साँझ होते ही उफ़ुक़ पे जा कर खो गया है शायद आफताब भी थक कर सो गया है रात ने चारों तरफ  स्याह चादर फैला दी लोग सो गए बस्ती में सन्नाटा हो गया है आज तक समझते रहे बहुत खुश होगा वह भी आकर अपना दुखड़ा रो गया है कभी होली दिवाली खुशियों का शबब थे गरीब के लिए त्यौहार बोझ हो गया है भले पाँव तमाम कांटो से ज़ख़्मी हो गया मुहब्बत के बीज मगर मुकेश बो गया है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

जल्दी मै मायूस नहीं होता

जल्दी मै मायूस नहीं होता बेवज़ह खामोश नहीं होता यूँ तो रिन्द नहीं हूँ लेकिन पी कर यूँ बेहोस नहीं होता लोग दगा दे जाते हैं मगर मुझे अफ़सोस नहीं होता खोखले इंकलाबी नारों से मेरे अंदर जोश नहीं होता सीधे - सादे बहुत मिलेंगे हर कोई मुकेश नहीं होता मुकेश इलाहाबादी -------

तमाम धूप और छाँव से बचाते रहे

तमाम धूप और छाँव से बचाते रहे उम्रभर तमन्नाए गुल खिलाते रहे इक तेरी बेरुखी की धूप सह न सके रह-रह के गुले तमन्ना मुरझाते रहे ----------------------------------------- मुकेश इलाहाबादी -

कि,कोई बात समझता ही नहीं

कि,कोई बात समझता ही नहीं दिल है कि कहीं लगता ही नहीं घर तो भर लिया खिलौनों से दिल  है  कि बहलता  ही नहीं चाँद सी सूरत देख कर भी अब अब मेरा दिल मचलता ही नहीं तेरी जुल्फों के सिवा, कमबख्त दिल मेरा कही उलझता ही नहीं बहुत बार तो समझाता है मुकेश  तू उसकी बात समझता ही नहीं ? मुकेश इलाहाबादी -----------

देख रहा ज़माना उसे साँसे रोक के

देख रहा ज़माना उसे साँसे रोक के निकला है चाँद बादलों की ओट से मुकेश इलाहाबादी -----------------

ईश्क के घर में चराग़े दिल जलाये बैठे हैं

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ईश्क के घर में चराग़े दिल जलाये बैठे हैं तब से हम आग के दरिया में नहाये बैठे हैं ज़माने की झूठी तसल्ली हमें गवारा नहीं अपने ज़ख्म अपने सीने से लगाये बैठे हैं जाने किस पल बुत में दिल धड़क जाए यही सोच के पत्थर से दिल लगाये बैठे हैं गुलबदन है छिल न जाए उसका जिस्म महबूब के लिए हम चाँदनी बिछाए बैठे हैं सुना है अकेले में मेरी ग़ज़ल गुनगुनाते हैं आज उसी के लिए महफ़िल सजाये बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

ह्या का परदा का हटा के देखो

ह्या का परदा का हटा के देखो ज़रा पलकें अपनी उठा के देखो आईना तेरा बन तो जाऊं अगर तुम नज़रें मुझसे मिला के देखो रूठ के मुझसे बैठो न तुम ज़रा शिकवा शिकायत मिटा के देखो क़ायनात सारी नाच उठेगी,तुम मेरे सुर  से सुर मिला के देखो मुकेश दो साहिल मिल जाएंगे प्यार का पल तुम बना के देखो मुकेश इलाहाबादी --------------

मिटा के सारी इबारत यादों की सलेट के

मिटा के सारी इबारत यादों की सलेट के सो गया हूँ मुँह ढक कर  चादर लपेट के तोड़ डाले सारे जाम मुहब्बत के नाम के बिन रहा हूँ ,अब टुकड़े दिल की पलेट के थक गया हूँ चल चल के तेरी तलाश में ख़ाबों से दिल बहलाऊँ बिस्तर पे लेट के तुमको न दिखेगा मुकेश अब शहर में वो जा चुका है  साज़ो सामान समेट के मुकेश इलाहाबादी ----------------------

सूरज मेरे हिस्से की धूप दे दे

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सूरज मेरे हिस्से की धूप दे दे वज़ूद में सर्दपन है तपन दे दे उसकी यादों में इत्र सा महकूँ ऐ कँवल थोड़ी सी महक दे दे वज़ूद मेरा सांवलापन लिए है ऐ चाँद मुझे भी गोरापन दे दे तनहा कब तक सफर में रहूँ इक साथी तो खूबसूरत दे दे कब तक दर्द से तड़पता रहूँ तू ही मरहम ऐ मुहब्बत दे दे मुकेश इलाहाबादी -----------

मेरे काँधे पे धूप का दुशाला दे दे

मेरे काँधे पे धूप का दुशाला दे दे सूरज मुझे थोड़ा सा उजाला दे दे फ़क़त गुब्बारे के लिए रूठ जाऊं फिर से  वही बचपन दुबारा दे दे मुकेश इलाहाबादी ---------------

दिल चन्दन जलाते रहे

दिल चन्दन जलाते रहे  शबे - हिज़्र महकाते रहे कँवल सी तेरी मुस्कान तसव्वुर में खिलाते रहे घर की हर दरो दीवार पे तेरी तस्वीर सजाते रहे तुम खूबसूरत ग़ज़ल हो तेरा नाम गुनगुनाते रहे दर्द से जान जाती रही ज़ख्म मगर छुपाते रहे मुकेश इलाहाबादी -----

ख़ूबसूरती हो खुशबू हो और ताज़गी भी हो

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तस्वीर कुछ कहती है ----------------------- ख़ूबसूरती हो खुशबू हो और ताज़गी भी हो फूल से अलफ़ाज़ मिलें तो ख़त तुझे लिखूं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

ग़र तू हमसफ़र हो जाएगा

ग़र तू हमसफ़र हो जाएगा सफर खूबसूरत हो जाएगा प्यार इक पाक़ सी नदी है नहाके ताज़ादम हो जाएगा उज़डे चमन सा तेरा वज़ूद हरा भरा चमन हो जाएगा इक बार जो मुस्कुरा दो,तो चेहरा गुलमोहर हो जाएगा बादल सी ज़ुल्फ़ें झटक दो ये सहरा समंदर हो जाएगा  मुकेश इलाहाबादी ---------

अँधेरे के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दिया है

अँधेरे के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दिया है छोटा ही सही एक चराग़ जला दिया है कुछ सिरफिरों ने गुलशन उजाड़ दिया हमने फिर गुले मुहब्बत लगा दिया है हमारी तरफ इक पत्थर उछाल उसने बदले में इक गुलदस्ता भिजा दिया है कलन्दरी रास आ गयी जिस दिन से दौलते जहान  की हमने लुटा दिया है यादों के सफे पे उसका नाम लिखा था मुकेश हमने वो नाम भी मिटा दिया है मुकेश इलाहाबादी -------------------- ----

गुलों का खिलना न हुआ

गुलों का खिलना न हुआ मौसम खुशनुमा न हुआ वह ग़ैर था ग़ैर ही रहा मेरा वह अपना न हुआ चिलमन से झांकता रहा रू ब रू सामना न हुआ रात हो गयी अभी तक चाँद का उगना न हुआ हम मिश्रा ऐ सानी रहे मिश्रा ऐ ऊला न मिला मुकेश इलाहाबादी ----

दर्द ख़ुद ही जुबां हो गयी

दर्द ख़ुद ही जुबां हो गयी ज़ुल्म की इंतहां हो गयी बर्फ की इक नदी थे हम तेरे प्यार में रवां हो गयी ग़म हमारा सबके लिए  मज़े की दास्तां हो गयी  तुम हमसे मिल गए हो  हसरतें जवां हो  गयीं तेरी सादगी मेरा प्यार अबतो हमनवां हो गयी मुकेश इलाहाबादी -------