देख रहा ज़माना उसे साँसे रोक के

देख रहा ज़माना उसे साँसे रोक के
निकला है चाँद बादलों की ओट से
मुकेश इलाहाबादी -----------------

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एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है