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Showing posts from October, 2013

तेरे ज़ख्मो के निशाँ इतने गहरे हैं

तेरे ज़ख्मो के निशाँ इतने गहरे हैं हमे वर्षो लग जाएंगे इन्हे धोने मे मुकेश इलाहाबादी -----------------

चाहा तो था दर्द उनका सीने मे छुपा लूं ,

चाहा तो था दर्द उनका सीने मे छुपा लूं , वो तो कम्बख्त आंसुओं ने दागा दे दिया मुकेश इलाहाबादी -------------------------

कल तक तो जाँ था ज़िगर था साँसे था,,,

कल तक तो जाँ था ज़िगर था साँसे था,,, ज़रा सी बेरुखी मे सनम बेवफा हो गया? मुकेश  इलाहाबादी ------------------------

तेरी मासूमियत और पाकीज़गी ने उसे लब् न खोलने दिया

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तेरी मासूमियत और पाकीज़गी ने उसे लब्  न खोलने दिया पर ये सच है बाद जाने के तेरे वो शख्श टूट कर रोया मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------

खुद और ख़ुदा से भी दूर हो गए ,

खुद और ख़ुदा से भी दूर हो गए , तेरे यार मे इतने मज़बूर हो गए जब से तूने अपनी चांदनी समेटी फलक के  सारे तारे बेनूर हो गए ज़रा सा हुस्न ज़रा सी नज़ाकत खुदा की दौलत पे मगरूर हो गए हमने तो न की थी किसी से चर्चा फिर अपने चर्चे क्यूँ मशूर हो गए हर रिश्ते मे शको सुबह करना ही  शहर का चलन व दस्तूर हो गए 

हर इक लफ्ज़ के साथ खुशबू रख दिया

हर इक लफ्ज़ के साथ खुशबू रख दिया तेरे नाम का ख़त चन्दन से लिख दिया तीरगी तेरे आखों की हमसे देखी न गयी जला के दिल अपना तेरे दर पे रख दिया मुकेश इलाहाबादी ------------------------

वह बर्बाद हो के भी खिलखिलाता है

वह बर्बाद हो के भी खिलखिलाता है कि आइना टूट कर भी छनछनाता है जब जब भी तीरगी औ तंहाई होती है तब तब वो तेरा ही गीत गुनगुनाता है अजब फकीराना अंदाज़ है मुकेश का   ग़म आता है तो और भी मुस्कुराता है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

इबादत से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं,

इबादत से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं, इसी उम्मीद पे तेरे दर पे सिर पटकता हूँ मुकेश इलाहाबादी -------------------------

आपकी क़ातिल निग़ाह ने ज़िन्दगी बदल की

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आपकी क़ातिल निग़ाह ने ज़िन्दगी बदल की वरना  कारवाँ ऐ जीस्त किसी और राह पे था मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

सच, जब तेरी साँसों की खुशबू

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सच, जब तेरी  साँसों की खुशबू बातों का जादू सर चढ़ के बोलता है तो बहुत बोलता है मुकेश इलाहाबादी -----  

एक और मुल्क बनवा दीजिये मज़हब के नाम पे

एक और मुल्क बनवा दीजिये मज़हब के नाम पे कुछ और  दंगे करवा दीजिये महज़ब के नाम पे,, सिर्फ नारों और बातों से फिर  मिल जाएगी सत्ता कुछ और सिर कटवा दीजिये महज़ब के नाम पे अमन  और  खुशहाली देश मे अच्छी नहीं लगती   भाई - भाई को लडवा दीजिये महज़ब के नाम पे घोटालों और नाकामियों से जनता न हो जाए बागी फिर सौ दो सौ घर जलवा दीजिये महज़ब के नाम पे गर कुछ शर्म और गैरत बाकी रह गयी हो दिल मे बंद करो जनता को बरगलाना महज़ब के नाम पे  मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

यूँ तो कोई वज़ह न थी नाराज़ होने की,ये

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यूँ तो कोई वज़ह न थी नाराज़ होने की,ये उनकी ख्वाहिश थी हम उन्हें मनाने आयें मुकेश इलाहाबादी --------------------------

जिंदगी जीना सीख लिया

जिंदगी जीना सीख लिया तेरे बगैर रहना सीख लिया महफ़िलों मे हँसते ही रहे छुप -२ के रोना सीख लिया तुम्हारी यादों की डोर संग,  पतंग सा उड़ना सीख लिया अपनी बातों को हमने भी, ग़ज़ल में कहना सीख लिया मुकेश इलाहाबादी -----------

बेरुखी औ तोहमद सही, कुछ तो दिया

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बेरुखी औ तोहमद सही, कुछ तो दिया तोहफा ये आपका अब हमको क़ुबूल है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

आज भी हम उसकी दोस्ती के काबिल न हुए,

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आज भी हम उसकी दोस्ती के काबिल न हुए, जब कि ज़माना हमको झुक के सलाम करे है मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

अफ़सोस ये नही हमको किनारा न मिला

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अफ़सोस  ये नही हमको किनारा न मिला दुःख ये  है कि  तुमको भी सहारा न मिला काँधे पे जुल्फें मासूम चेहरा बोलती आखें मेले मे  वो  मासूम  चेहरा  दुबारा  न मिला मुकेश इलाहाबादी --------------- -------------

झूठ और फरेब से सने हैं,,

झूठ और फरेब से सने हैं,, जाने किस माटी के बने हैं बेशरम के पेड़ हो गए हम तभी यत्र तत्र सर्वत्र तने हैं बेवज़ह लड़ रहे भाई भाई सभी तो भारत माँ के जने हैं वे अपने दुःख से नही दुखी ज़माने के सुख से अनमने हैं दहकते सूरज की तपन है मगर उम्मीद के साए घने हैं मुकेश इलाहाबादी --------------

हालात से समझौता करना नही आया

हालात से समझौता करना नही आया अपने हक के लिए लड़ना नहीं आया पिंजड़े में बैठ कर परों को तौलता रहा खुले  आसमान मे उड़ना नहीं आया सैकड़ों बार लिख लिख के काट दिया ख़त इक प्यारा सा लिखना नहीं आया अपनों ने काटा और तूफ़ान ने तोडा पर तिनके सा झुक के फिर तनना नहीं आया मुकेश इलाहाबादी -------------------------

कौन कमबख्त है जो रोज़ रोज़ पीना चाहे है,,,

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कौन कमबख्त है जो रोज़ रोज़ पीना चाहे है,,,  वो तो तेरी आखें हैं, जो  पीने को मजबूर करे है  मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

न की शिकायत कभी साहिल ने लहरों की बेवफाई की

न की शिकायत कभी साहिल ने लहरों की बेवफाई की जो कभी सीने पे सर पटकती हैं तो कभी दूर जा के उछलती हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------------

हवेलियों से हमे डर लगता है

हवेलियों से हमे डर लगता है फुटपाथ अपना घर लगता है पक्के  मकान औ चौड़ी सड़कें, अब तो गाँव भी शहर लगता है गर दिल में मुहब्बत नहीं तो,,, दिया अमृत भी ज़हर लगता है जिसमे दया औ ममता नही है वो बिन फलों का शज़र लगता है अपनी ग़ज़ल औ बातों से मुकेश इक  पहुचा हुआ फकीर लगता है मुकेश इलाहाबादी -----------------

ख्वाहिशें अपनी घटा के देखा

ख्वाहिशें अपनी घटा के देखा रफ्तारे ज़िन्दगी बढ़ा के देखा ता-उम्र तनहा के तनहा रहे सब से दोस्ती निभा के देखा इक दिन तुम भी चले जाओगे तुमसे भी रिश्ता बना के देखा हिस्से मे रेत् ही रेत् मिली प्यार की गंगा बहा के देखा शायद हमारी ही गलती थी खुद को बढ़ा चढ़ा के देखा मुकेश इलाहाबादी -------------

कभी चंदा कभी बिजली कभी सितारा कहे है

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कभी  चंदा कभी बिजली  कभी सितारा कहे है लोग तो मेरे महबूब को जाने क्या क्या कहे हैं कभी रांझा कभी मजनू कभी सिरफिरा कहे हैं दुनिया मुझे तेरे प्यार मे जाने क्या क्या कहे हैं मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

ये तो तेरी बेरुखी है जो ज़मी और चाँद सी दूरी है

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  ये तो तेरी बेरुखी है जो ज़मी और चाँद सी दूरी है  वर्ना अबतक तेरे हाथो मे हिना सा रचे बसे होते मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------- 

तेरी खुद्दारी हमे रास आ गयी

तेरी खुद्दारी हमे रास आ गयी वर्ना हम कहाँ किसी से दिल लगाने वाले थे मुकेश इलाहाबादी --------------------------

शीरी जुबान का हमें लहज़ा नही आया

शीरी जुबान का हमें लहज़ा नही आया घुमा - फिरा के बात करना नहीं आया पथरीली कंटीली राहों की आदत रही कालीन पे हमे पाँव रखना नहीं आया रुख की  मानिंद  सीधा  चलता  रहा हूँ ऊँट की तरह तिरछा चलना नहीं आया बेशक तूफ़ान औ आंधियां बुझा दे, पर  ज़रा सी फूंक से हमे बुझना नहीं आया जब जब भी लिखा सच औ तीखा लिखा मुकेश तुझे कभी कसीदे गढ़ना नहीं आया मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ये तो ज़माना है जिसने तजुर्बे की तहरीर लिख दी

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ये तो ज़माना है जिसने तजुर्बे की तहरीर लिख दी वरना हम तो साफ़ और खाली सफा हुआ करते थे मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -------

तजुर्बा और काबलियत उम्र की मोहताज़ नहीं होती ,

तजुर्बा और काबलियत उम्र की मोहताज़ नहीं होती , ये तो वो चमक है जो आग मे जल कर ही के आती है मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

न तो काबलियत रखते हैं न तो ख्वाहिश रखते हैं

न तो काबलियत रखते हैं न तो ख्वाहिश रखते हैं हम जैसे तो ज़माने मे गुमनाम ही अच्छे लगते हैं मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

मेरे घर की हर दरो दीवार गीली है,

मेरे घर की हर दरो दीवार गीली है, बरसात से नहीं आसुओं से सीली है तुम्हारे शहर का मौसम होगा गुलाबी मेरे गुलशन की तो हर पत्ती पीली है मुद्दत्तों बाद आज भी याद है उसकी जिसकी ज़ुल्फ़ सुनहरी आखें  पीली है  आसान  नही है इस राह मे चलना कि सच की राह बड़ी  ली पथरीली है कभी खुशनुमा और ताज़ी होती थी अब तो शहर की हवा ज़हरीली है मुकेश इलाहाबादी ------------------

जंहा से जंहा तक देखता हूँ

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जंहा से जंहा तक देखता हूँ झूठ  और  फरेब  देखता हूँ पढ़े लिखे समाज मे भी मै लकीर के फकीर देखता हूँ तुम्हारी कजरारी आखों मे आंसू  की  दो बूँद देखता हूँ निराशा के गहन गहवर मे  आशा का इक द्वीप देखता हूँ मुकेश की गजल मे हरबार इंकलाबी तहरीर देखता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------

क़ाफिला तो क़ाफिला था कब तक रुका रहता ??

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क़ाफिला तो क़ाफिला था कब तक रुका रहता ?? गुजरा तो था तेरे कूचे से तेरी ही जुस्तजूं मे !!!!!! मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ------

हर बार वही होती है

हर बार वही होती है सरकार वही होती है शिर बदल जाते हैं पै तलवार वही होती है कश्ती कोई भी डूबे है मझधार वही होती है हथकड़ी सोने की सही झनकार वही होती है ज़ुल्म सहे औरत और शरमशार वही होती है मुकेश इलाहाबादी ---

कहानी ... फिजॉ

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 फिजॉ ने बच्चे को स्कूल की बस पे बैठा के घर की तरफ का रुख किया ही था। अचानक एक छोटा बच्चा उसकी हाथ मे एक कागज थमा के यह कहते हुये भाग गया कि ‘आपको ये कागज उन अंकल ने देने के लिये कहा है’ वह कुछ समझ और सम्हल पाती तब तक वह लडका सडक के पार की गली मे न जाने कहां खो गया था। उसने जिस अंकल की तरफ इषारा किया था उस तरफ भी उसे कोई नजर नही आया। कागज का पुरजा अभी भी उसकी हथेलियों मे किसी अंगारे सा दबा दहक रहा था। पर वह उस कागज के टुकडे को कुछ डर और कुछ बदहवाषी मे फेक भी नही पा रही थी, और यह भी नही समझ पा रही थी कि वह इस टुकडे का क्या करे। लिहाजा इसी उहापोह की स्थिति मे उस कागज के टुकडे को हथेलियों मे लिये दिये जल्दी जल्दी घर की तरफ बढ चली। न जाने कव उसके हाथों ने उस टुकडे को अपने कपडों मे छुपा लिया। और अपनी उखडी सांसों को सहेजते हुये व चेहरे पे उभर आयी बदहवासी को छुपाने के लिये। अपने सिर के पल्लू को आदतन सही किया,आंचल से नाक, माथे पे चमक आयी पसीने की बूंदों को पोछा और सीधे किचन की तरफ चली आयी। सासू मॉ कुरान षरीफ पढन के लिये बैठी थीं। अब्बू रोज की तरह अखबार मे मुॅह गडाये चाय...

तुम्हारे आने से हंसने लगा है

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तुम्हारे आने से हंसने लगा है उदास था घर चहकने लगा है तुम्हारी खुशबू से कोना कोना गुलमोहर सा महकने लगा है सांझ होते ही उदास हो जाता, तुझे देख मन मचलने लगा है रंगत उड़ गयी थी जिसकी अब वो फलाश फिर दहकने लगा है बरफ की मानिंद जम गया था   क़तरा क़तरा पिघलने लगा है मुकेश इलाहाबादी ---------------

अपने अन्दर डूब रहा हूँ

अपने अन्दर डूब रहा हूँ सच के मोती ढूंढ  रहा हूँ राम नाम की मदिरा पी  सांझ सकारे झूम रहा हूँ रिश्ते नाते कागजी फूल  नकली खुशबू सूँघ रहा हूँ जन्म औ मृत्यु का बंधन लख लख योनी घूम रहा हूँ तेरा औ मेरा के चक्कर मे परम पिता को भूल रहा हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------

अभी तक तेरी याद लिए बैठे हैं

अभी तक तेरी याद लिए बैठे हैं उदासी  बेहिसाब लिए बैठे हैं जो ख़त तूने लिखा ही नहीं उस ख़त का जवाब लिए बैठे हैं सूख चुका है किताब में लेकिन तेरा दिया गुलाब लिए बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी --------------