धुंआ बनाम गुलाब
10.12.2009 ‘एक बेहद अच्छे इंसान व दोस्त, सुदेंद्र पवार जी को नज़र जिनकी ज़िंदगी से यह कहानी चुरायी है’ मै समझता था मुहब्बत की ज़बां खुशबू है फूल से लोग इसे खूब समझते होंगे बाल्कनी से ताजा खिलें फूलों की भीनी भीनी खुशबू उसे पूरा का पूरा कब भिगो गयी राजा को पता ही न लगा। राजा को यह भी पता न लगा कब सुबह की नर्म मुलायम गुलाबी किरणों ने चुपके से आ के रात के अंधेरे को, व ओस की बूंदों को सोखना शुरू कर दिया था। पंक्षियो की चहचह और फूलों की खुशबू से चारों तरफ एक उत्सव सा लगने लगा था। यही सुबह तो रोज होती थी। सूरज तो रोज खिलता था। हवा रोज ही तो चलती थी। फूल तो रोज ही खिलते थे। पर राजा क्यों नही देख पाता था। क्यों नही इन खुशबुओं को अपने नथूनों में भर पाता था। क्यों नही इन किरणों को आखों से पीने की ख्वाहिश होती थी। सना का जादू भी तो न जाने कब धीरे धीरे चुपके - चुपके उसके वजूद को घेरने लगा था। सना का जादू ही तो है जो हर चीज को हर बात को हर एहसास को ...