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Showing posts from January, 2012

धुंआ बनाम गुलाब

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10.12.2009 ‘एक बेहद अच्छे इंसान व दोस्त, सुदेंद्र पवार जी को नज़र जिनकी ज़िंदगी से यह कहानी चुरायी है’        मै समझता था मुहब्बत की ज़बां  खुशबू है        फूल  से  लोग  इसे  खूब  समझते होंगे बाल्कनी से ताजा खिलें फूलों की भीनी भीनी खुशबू  उसे पूरा का पूरा कब भिगो गयी  राजा को पता ही न लगा। राजा को यह भी पता न लगा कब सुबह की नर्म मुलायम गुलाबी किरणों ने चुपके से आ के  रात के अंधेरे को, व ओस की बूंदों को सोखना शुरू कर दिया था। पंक्षियो की चहचह और फूलों  की खुशबू से चारों तरफ एक उत्सव सा लगने लगा था। यही सुबह तो रोज होती थी। सूरज तो रोज खिलता था। हवा रोज ही तो चलती थी। फूल तो रोज ही खिलते थे। पर राजा क्यों नही देख पाता था। क्यों नही इन खुशबुओं को अपने नथूनों में भर पाता था। क्यों नही इन किरणों को आखों से पीने की ख्वाहिश  होती थी। सना का जादू भी तो न जाने कब धीरे धीरे चुपके - चुपके उसके वजूद को घेरने लगा था। सना का जादू ही तो है जो हर चीज को हर बात को हर एहसास को ...

झूठ और फरेब जिनका ईमान है

झूठ और फरेब जिनका ईमान है अखबार में उनका चर्चा तमाम है एक वोट डाल हम समझे  है  कि हमारे हाथ में सत्ता की कमान है गरीब  से  ज़रा पूँछ के तो देखिये कितना महंगा सत्तू और पिसान है   लाख कमी और बुराईया हों मगर सबसे अच्छा हमारा हिन्दुस्तान है मुकेश इलाहाबादी -----------------
एक बोर आदमी के कुछ पुराने दिन 30.12.05 साक्षी भाव । बुड्ढे के सिर में सुबह से र्दद था । हरारत भी महसूस हो रही थी । देह, पोर-पोर दुख रही थी । सिर भारी-भारी था । आंखो में जलन थी । सारा शरीर  जकडा-जकडा सा था । बी.पी. नापा वह भी बढा था । रजाई से उठा न जाता था । बुढिया बहुत याद आयी । खैर ... । परदा हटा के देखा सूरज भगवान कोहरे की चदरिया ओढे पहाड की ओट में थे । कालोनी का कोई भी आदमी बाहर नही दिख रहा था । नाक सुडकते हुए मुंह लिहाफ के अंदर दोबारा कर लिया । बुड्ढा सोचने लगा । षायद बुढापा ओैर बीमारी पर्यायवाची है । दूसरे रुप में कहा जाय तो बुढापा ही अपने आप में बीमारी है । उसके बाद सठियाना दूसरी बीमारी, षरीर में झुर्री पड जाना, दांत गिर जाना, बाल पक जाना, बाल गिर जाना, कमजोर हो जाना, आंखो से कम दिखना, याददाष्त का कम होना आदि आदि भी अपने आप में बीमारियां ही तो हैं जिनका श्रीगणेषाय नमः हो चुका है । उसके बाद उपरोक्त बीमारियां । खुदा कसम ऐसे में जिंदगी एक लाइलाज आजार बन जाती है जिसका इलाज मौत ही है । कुछ साक्षी भाव के बारे में । अरुण कुमार षर्मा मारण पात्र के अनुसार मनोनाष हो...

उम्र गुज़र गई सलीका न आया

बैठे ठाले की तरंग -----------   उम्र   गुज़र  गई  सलीका  न   आया इज़हारे मुहब्बत का तरीका  न आया   हजारहां  बार आया गया मयखाने में इक हम हैं पीने का सलीका न आया   जब जब  मिले तब तब  कसा ताना कसना मुझे एक भी फिकरा न आया   चेहरा  आइना, हर  बात  बता देता गम  को छुपा सकूं, तरीका न आया   मुकेश इलाहाबादी

ईद का मेला

ईद का मेला                                                ईद के मेले में खिलौनों की दुकान तो थी पर इस बार मिट्टी का सिपाही अपनी बन्दूक के साथ गायब था और मिट्टी का भिश्ती भी अपनी मशक के साथ वहाँ नहीं था लिहाजा दुकानदार प्लास्टिक के नेता, बन्दूक और तोप लेकर हाज़िर था हामिद के एक दोस्त ने बन्दूक खरीदी वह लादेन बनना चाहता था और दूसरे ने नेता का पुतला खरीदा  वह प्रधानमंत्री बनना चाहता था पर हामिद  अभी तक लोहे का चीमटा  ढूंढ रहा था ताकि उसकी  बूढ़ी दादी की कांपती उंगलियाँ आग में न जलें     मुकेश इलाहाबादी 

खट मिट्ठी गोली हो

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Doston कभी किसी रोज़ किसी अच्छी लगने वाले सूरत से निम्न पंक्तियाँ कही थी. और वोह मोहतरमा नाराज़ हो गयी थी. क्या आप बातायेंगे की इसमें क्या नाराज़ होने की कोई बात है ? तुम खट मिट्ठी गोली हो जिसमे चेहरे का नमक व ढेर सारा प्यार रचा बसा है जिसे देखकर मुह में पानी आ जाता है लगता है तुम भी गोली सा घुल जाओ ताकी आनंद स्वाद और महक के साथ मै भी हो जाऊ तुम्हारी तरह खट मिट्ठा मुकेश इलाहाबादी

अरसा हुआ बंद है उनसे गुफ्तगूँ

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एक शे'र हो जाए ---------------- अरसा हुआ बंद है उनसे गुफ्तगू पहले दुआ सलाम हुआ करती थी मुकेश इलाहाबादी

फुर्सत है किसे जो सुने फ़साना ऐ जिंदगी

एक शे'र हो जाए ----------------------- फुर्सत है किसे जो  सुने फ़साना ऐ जिंदगी हर शख्श  है अपने गम  से गाफिल बहुत मुकेश इलाहाबादी

कैसा होगा नए युग की कविता का चेहरा

आओ कल्पना करें कैसा होगा नए युग की कविता का चेहरा हो जायेगी कविता पुनः छंद बद्ध- लय बद्ध या रहेगी अतुकांत इसी तरह या फिर हो जायेगा कविता का चेहरा आज की दुनिया जैसा भाव शून्य, संवेदना शून्य या, होगी कविता कम्प्यूटर की भाषा कोबोल और पश्कल की तरह लय, छंद, भाव, ताल सभी कुछ फीड होंगे जिसमे बिट और बाईट की तरह मुकेश इलाहाबादी

पहाड़ और पीठ

पहाड़ और पीठ एक पहाड़ सिर्फ पीठ होता है मुह  होता तो बोलता पहाड़ के पैर भी नही होते हाथ भी वरना वह चलता कुछ करता या, उठता बैठता भी पहाड़, अपनी पीठ पर लाद लेता है तमाम जंगल नदी नाले, हरी भरी झील भी सड़क और बस्तियां  भी और कुछ नही बोलता क्यों कि पहाड़ सिर्फ पीठ है और पीठ कुछ नही बोलती दो पीठ, पहाड़ नही होती पर लाद लेती है पहाड़ पीठ के भी मुह नही होता पहाड़ की तरह होती है एक सतह जो थपथपायी जाती है पहाड़ लाद लेने के एवज में, यही पीठ गोरी व चिकनी है तो फिसलती हैं नजरें व हांथ भी और, लद आते हैं पहाड़ और उग आते हैं आखों  के जंगल खुंखार व भयावह यही पीठ सख्त और मजबूत है तो नही दिखा सकती पीठ तमाम नस्तर व खंजर लगने के बाद भी  क्यांकि पीठ पर पहाड़ होते हैं, और पहाड़ के मुह नही होता और पीठ के भी मुकेश इलाहाबादी

लोहे सा जिस्म, भट्टी में गल गया

बैठे ठाले की तरंग --------------- लोहे सा  जिस्म, भट्टी में गल गया पुर्जा पुर्जा बनकर, मशीनों में ढल गया एक ही मैदान था, बच्चों के वास्ते, देखते ही देखते, मकानों में बदल गया मुकेश इलाहाबादी

सन्नाटा

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एक सन्नाटा बुनता है एक चादर उदासी की जिसे  ओढ कर सो जाता हूं चुपचाप रोज रात के इस अंधेरे में दो अंधेरा फुसफुसता है लोरियां कान मे रात भर और दे जाता है एक टोकरा नींद का जिसे चुन लेते हैं कुछ भयावह, व  ड़रावने सपने बुनता है जिन्हे सन्नाटा दिन के उजाले, रात की चांदनी में तीन लिहाजा, चांद से थोड़ी चांदनी सूरज से थोड़ी रोशनी नोच कर रख लूं अपनी जेब मे फिर नाचूं प्रथ्वी और आकाश  में मुकेश इलाहाबादी

आवारा फितरत को लगाम दे दूँ

बैठे ठाले की तरंग ---------- आवारा फितरत को लगाम दे दूँ तुम्हारे जिम्मे ये काम दे दूं बहुत उड़ चुका खलाओं में अब तक जिस्म को थोडा आराम दे दूं मै, फैसला कब तक  मुल्तवी  रक्ख्नूं आ, आज इसे मुहब्बत नाम दे दूं, बहुत तिश्न्नालब है मुसाफिर, कहो तो तुम्हारे  लबों से एक जाम दे दूं मुकेश इलाहाबादी

दीवाने दिल को हर रोज़ रोकता हूँ

बैठे ठाले की तरंग ---------- दीवाने दिल को हर रोज़ रोकता हूँ फिर भी दिन रात तुझे खोजता हूँ जो भी तुमने कहा वह सब किया कंहा चूक हुई मुझसे, सोचता हूँ समझते हैं लोग मै बहुत खुश हूँ आंसूं अपने तन्हाई में पोछता हूँ ज़माने की रावायत मै न समझा महफिलों में बहुत कम बोलता हूँ मुकेश इलाहाबादी

आदतन मै बेवफा नहीं

बैठे ठाले की तरंग  ! आदतन मै बेवफा नहीं कोई क्यूँ समझता नहीं वक़्त के साथ बह गया कभी कुछ समेटा नहीं मुट्ठी भर एहसास भी रिस गए संजोया नहीं एक अंजुरी भर मुस्कान क्यूँ अब तक भूला नहीं मुकेश इलाहाबादी-----

दीवाने दिल को हर रोज़ रोकता हूँ

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बैठे ठाले की तरंग ----------- दीवाने दिल को हर रोज़ रोकता हूँ फिर भी दिन रात तुझे खोजता हूँ जो भी तुमने कहा वह सब किया कंहा चूक हुई मुझसे, सोचता हूँ समझते हैं लोग मै बहुत खुश हूँ आंसूं अपने तन्हाई में पोछता हूँ ज़माने की रावायत मै न समझा  महफिलों में बहुत कम बोलता हूँ   मुकेश इलाहाबादी-------------------

ज़िन्दगी ने कुछ दिया, न दिया,

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अर्ज़ किया है ! (कुछ फुटकर शेर)    ज़िन्दगी ने कुछ दिया, न दिया,          तजुर्बात  कितने दिए सोचता हूँ            कभी खुशबू मेरे घर भी आयेगी               यही सोच, रोज़ दरीचे खोलता हूँ                    बहुत तुनक मिजाज़ है, यार मेरा                        बोलने के पहले  बहुत  तोलता  हूँ                                                                मुकेश इलाहाबादी

जिस्म नहीं, रूह की कहानी लिखी जाए

एक शेर हो जाए ----- जिस्म नहीं, रूह की कहानी लिखी जाए इश्क की अब तो सच्ची कहानी लिखी जाए मुकेश इलाहाबादी ----

क़यामत तक आपकी सादगी रहे कायम

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  एक शेर हो जाए ---- क़यामत तक आपकी सादगी रहे कायम  बस  यही  एक  दुआ रब से हमने चाही है मुकेश  इलाहाबादी ----

झील सी आखों में लरजता सा महताब

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 झील सी आखों  में लरजता सा महताब दूज के चाँद सा तबस्सुम आपने पायी है ये हुस्न, हया और गज़ब की नज़ाकत ख़ुदा ने आपपे बेइइंतहां दौलत लुटाई है  ख़ुदा ने तो अपनी कारीगरी दिखा दी,, मग़र देखने वालों की जाँ पे बन आयी है  मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

एक दिन -------------

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एक दिन हथेलियों पे उग आये कुछ बर्फ के गोले सोखने लगे धीरे धीरे मेरा गुनगुनापन और अब मै गल कर बह चूका हूँ दूर तक जंहा तक ये सूखी रेखाएं देखते हो इस जमी पे मुकेश इलाहाबादी

अश्क थे जो पैमानों में ढल गए,

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                                                           अश्क थे जो पैमानों में ढल गए,                                                           यूँ हमने शराब पी बहुत ज्यादा  .                                        ...

चलो मत बताओ, अपने घर का पता

एक शेर हो जाए ----- चलो मत बताओ, अपने घर का पता खुशबुओं से पूँछ लूँगा तेरे घर का पता                           मुकेश इलाहाबादी

हम तो अब गुज़रे ज़माने के गुल हुए हैं

एक शेर हो जाए ------------------------ हम तो अब गुज़रे ज़माने के गुल हुए हैं देख कर  ज़माने  का चलन  बेनूर हुए हैं मुकेश इलाहाबादी

मै तुम्हारे इतने करीब इस लिए नहीं आना चाहता कि,

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बैठे ठाले की तरंग  ------------------------------------------------------- (अर्धनारीश्वर की अवधारणा से प्रेरित हो कर) मै तुम्हारे इतने करीब इस लिए नहीं आना चाहता कि, तुम एक औरत हो, और मै एक मर्द जो टटोलना चाहता है तुम्हारी देह में उगे खेत खलिहान को और रपटना चाहता है तुम्हारी चिकनी और चमकदार सतह पर और फिर  खुश हो चल पड़े फिर किसी और शिकार की तलाश में बल्कि मै तुम्हारे नज़दीक इसलिए आना चाहता हूँ कि तुम्हारी सुरमई आखों के अन्दर बहते हुए पनीले झरने में नहा के ताज़ा दम हो जाऊं गंगा स्नान की तरह या फिर तुम्हारी काली घनी आबनूषी लटों की छाह में बैठ, रूहानी तान छेड़ सकूं  फिर प्रेम गीत गाते हुए अनहत नाद में डूब जाएँ  ताकी जब मेरे अन्दर की पार्वती तुमारे अन्दर के शिव से एकाकार हो और तुम्हारे बाहर की भवानी मेरे बाहर के शिव से तादात्म्य करे और एक वर्तुल सा बने जिसमे एक नाद हो ब्रम्ह्बाद ------------------------------------------------------------मुकेश इलाहाबादी  

हाथ की लकीरों में कुछ न पाओगे

एक शेर हो जाए -------------------- हाथ की लकीरों में कुछ न  पाओगे मेरे दिल के ज़ख्मो को पढो तो जाने ---------------------मुकेश इलाहाबादी

फितरत ऐ परिन्दगी काफी नहीं उड़ान के वास्ते

फितरत ऐ परिन्दगी काफी नहीं उड़ान के वास्ते खुला हुआ आसमान भी चाहिए उठान के वास्ते सिर्फ बाज़ार से ही कारोबार होता नहीं ज़नाब बनियागीरी की समझ भी चाहिए दूकान के वास्ते दौलत ऐ ज़हान से बच्चे को क्या गरज, उसे बस माँ की गोद चाहिए मुश्कान के वास्ते मुकेश इलाहाबादी

एक मुसाफिर की डायरी से

एक मुसाफिर की डायरी से    ज़िदंगी की दो तिहाई सड़क नाप आया। न जाने कितने जंगलात, खाई, खंदक और रेगिस्तान पार कर आया। लेकिन मंजिल के नाम पर महज कुछ सराय खाने या भटियार खाने मिले। जहां चंद लम्हात की सहूलियत और फिर रवानगी, न मिलने वाली मंजिल की। लिहाजा अब तो सारे अरमानों को कफ़न दे दिया है और सफ़र को ही मुक़ददर मान लिया है।  अपने मुकददर को ही लिये दिये उन दिनों भी चल रहा था, कि राह में एक सरायखाने से इत्तिफाक हुआ। जिसकी बातें आज एक अर्से के बाद भी यादों की पगड़डी में मील के पत्थर सा ठुंकी हुयी हैं।   बात उन दिनों की है जब यह षख्स जवान हुआ करता था। दिल में जोष व बदन में ताकत हुआ करती थी। चटटान को तोड़ने व नदियों को पार करने का हौसला हुआ करता था। लेकिन जिसका दिल बच्चों सा मासूम था। अंदाज मस्ती भरा था। वह अपने कधों तक झूलते बालों व अलमस्त फक्कडी अंदाज को लिये दिये एक दिन अपनी मुकम्मल मंजिल की तलाष में निकल पड़ा। भटकता रहा षहर दर षहर जंगल दर जंगल। उस दौरान न जाने कितने दरख्तों को अपना साया बनाया न जाने कितने पड़ावों पे रात गुजारी न जाने कितने खेत खलिहानों को रौंदा मगर ...

उँगलियों के ज़ख्म बताते हैं

उँगलियों के ज़ख्म बताते हैं उंगलियों के ज़ख्म बताते हैं हमने पत्थर पे बुत तराशे हैं अपने आंसू पलकों में छुपाकर कुछ लोग दूसरों को  हंसाते  हैं दश्ते तीरगी में भी रह कर, हम दूसरों के दर  पे  दिए जलाते हैं जिनके घुनघुने में दाने  हैं कम  वे ही अक्शर बहुत शोर मचाते हैं ये हुनर तू भी सीख ले ऐ मुकेश,   कैसे हर शेर मोती सा सजाते हैं मुकेश इलाहाबादी

छोटी की मनुहार

छोटी की मनुहार पापा मुझको इक भाई ला दो कुछ  नहीं  तो  गुड्डा  ला  दो फिर सुंदर सी इक राखी लाऊँ उसको अपना  भाई   बनाऊँ रोरी अक्षत - तिलक लगाऊँ लड्डू, बर्फी  खूब  खिलाऊँ दीदी बन कर रौब जमाऊँ क  ख  ग  घ  उसे  पढाऊँ न माने जब कहना मेरा कान पकड़ कर करू खिचाई   फिर टाफी देकर उसे मनाऊँ पापा मुझको इक भाई ला दो कुछ नहीं तो गुड्डा ला दो मुकेश इलाहाबादी

दरिया-ऐ-मुहब्बत में बहता रहा बदन

अर्ज़ किया है, दरिया-ऐ-मुहब्बत में  बहता रहा बदन आग  में  तप  कर   कुंदन  हुआ  बदन हिज्र के इज़तिराब में ज़लता रहा बदन रात मेरा  यार  आया  चन्दन हुआ बदन अलग से, चेहरा खिला  गुलाब,  आँखे  हुई कमल इश्क के एहसास में गुलशन हुआ बदन   मुकेश इलाहाबादी

अब्बू

दोस्तों, पिछले साल पिताजी के न रहने पर चंद लाईने लिखी थी जिसे आपसे शेयर करना चाहूंगा,   अब्बू --- एक   अब्बू खूंटी थे दीवाल के कोने से लगी जिसमे  हम टांग देते अपनी छोटी मोटी समस्याएं इच्छाएं, मसलन कापी, किताब, पेन, पेन्सिल टाफी, बैट, बाल आदि आदि और मम्मी टांग देती छोटी बड़ी ज़रूरतें मसलन धनिया, मिर्ची , सब्जी आदि आदि और अब्बू खूंटी में टंगे झोले से निकाल लाते एक एक चीज़े सच्ची मुच्ची की सब के मर्जी की व ज़रुरियत की   अब्बू --- दो   अब्बू एलार्म घडी थे हर वक़्त टिक टिक करती न चाबी देने की दिक न बैटरी भरने की ज़रूरत पर हर वक़्त आगाह करती कि, पढ़ाई का वक़्त हो गया है पढ़ लो सोने का वक़्त हो गया है सोलो या कि अमुक काम का वक़्त हो गया है न करोगे तो पछताओगे आदि आदि   अब्बू -- तीन   अब्बू घर की दीवार थे बाहर सहती धुप पानी और तूफ़ान अन्दर साफ़ चिकनी रंगी पुती दीवार जिसके सेहन में हम भाई बहिन व माँ रहते निस्फिकिर और निश्चिंत अब्बू न जाने किस मिट्टी के बने थे   अब्बू --- चार   खूंटी, दीवार और घडी तो अभी  भी है, पर अब खूंटी से हमारी ज़रूरत...

खट्टे इमली औ कैथा, ठंडी नीम की छाँव

बैठे थाले की तरंग खट्टे इमली औ कैथा, ठंडी नीम की छाँव कंहा  गया  वो गोरी और पनघट का गाँव चना  चबैना  नास्ता,  ताज़ी  गाढ़ी छांछ , महके माई का आंचरा, ज्यों मेथी सा साग मुकेश इलाहाबादी

दर्द मेरा जिस दिन हद से गुज़र जायेगा

एक नहीं दो शेर हो जाए ------ दर्द मेरा जिस दिन हद से गुज़र जायेगा हर सिम्त आग और धुंआ  नज़र आयेगा तुमने ठहरे हुए पानी में कंकड़ फेंका है देखना  इसका दूर तक  असर  जायेगा  मुकेश इलाहाबादी

महफ़िल से जायेंगे आप, तय था

बैठे  ठाले   की तरंग --------- महफ़िल से जायेंगे आप, तय था इतनी ज़ल्दी जायंगे कंब  तय था ये शोखियाँ, ये बांकपन, ऑ मचलना घटा बन बन के बरसेंगे   कहाँ  तय था मुकेश इलाहाबादी

अक्सर, एक शरारत मीठी सी

एक शरारत   ------ अक्सर, एक शरारत मीठी सी तुम्हारे चेहरे पे खिलती जिसे तुम मेरी तरफ उछाल कर चल देतीं हो , मुड़कर चाय, शरबत या ऐसा ही कुछ लाने सच, तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो                           मुकेश इलाहाबादी

सुर्ख गालों, आबनूशी गेसू ऑ,

बैठे ठाले की तरंग ------- सुर्ख गालों, आबनूशी  गेसू ऑ, बसन्ती दामन से लिपट आया, यूँ मै बहारों से गले मिल आया         -------  मुकेश इलाहाबादी

भीगे हुए मौसम में ,

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बैठे ठाले की तरंग --------- भीगे हुए मौसम  में , सीली हुई यादों से धुंआ  सा उठता है धुंए में इक  अक्श उभरता है फिर मेरा वजूद भी धीरे धीरे, धुआंता  जाता  है, कुछ देर बाद 'मै' भी इस धुंए के साथ गड्ड मड्ड होकर  आसमा  में जाने कहाँ विलीन हो जाता  हूँ ----------------------- मुकेश इलाहाबादी

उदास नगमो का दीवान दिया जाता हूँ

बैठे ठाले की तरंग -------------- उदास नगमो का दीवान दिया जाता हूँ ये वसीयत तुम्हारे नाम किये जाता हूँ तेरी दास्ताने   बेवाफाई  याद  कर  के, जाम ऐ तन्हाई सुबह शाम पिए जाता हूँ अंदाज़ - ऐ - फकीरी  में काट दी ज़िन्दगी अब ये तबियत तुम्हारे नाम किये जाता हूँ बाद मरने की भी  मुझे  याद करती रहो यादों के कुछ लतीफे ईनाम दिए जाता हूँ ----------------- मुकेश इलाहाबादी

चाँद को हमने खिलते हुए देखा है

बैठे ठाले की तरंग ---------------- चाँद को हमने खिलते हुए देखा है हुश्न  को बेनकाब होते हुए देखा है धान के लहलहाते हुए  खेत को भी हमने अक्शर  जलते  हुए  देखा है ज़र, जोरू  ज़मीन की खातिर  भाई भाई को हमने  लड़ते हुए  देखा है   फक्त एक गुब्बारे की खातिर, बहुत बार  बच्चों  को  हमने मचलते हुए  देखा है ऐ मुकेश अच्छों अच्छों को कई बार, हमने   गिरगिट की तरह  रंग बदलते हुए देखा है ----------------------------- मुकेश इलाहबादी