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Showing posts from December, 2018

काँच की तरह कुछ चटका हुआ तो है

काँच की तरह कुछ चटका हुआ तो है दिल के अंदर कुछ तो टूटा हुआ तो है गिनता हूँ तो सारे असबाब हैं फिर भी तुम्हारे पास मेरा कुछ छूटा हुआ तो है समेट लिया है हमने, अपने आप को वज़ूद में अपने कुछ बिखरा हुआ तो है चाँद भी वही सूरज भी वही तारे वही हैं बाद दिसम्बर के कुछ बदला हुआ तो है  हँसता है मुस्कुराता है, बतियाता भी है लगता है मुकेश खुद से रूठा हुआ तो है मुकेश इलाहाबादी ----------------

मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा

मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा इक ख़त  तुम्हारे नाम  से लिखूंगा सुना! नदी सा कल -कल बहती हो  तुम्हारे गालों पे लहरों से लिखूंगा गुलाब सा महकने लगेंगे अल्फ़ाज़  ग़ज़ल तुझे बाँहों में ले के लिखूँगा मुकेश इलाहाबादी ----------------

अलविदा 2018

गुज़रते हुए साल की चादर में लपेट ली है दोस्तों का प्यार अपनों का एहसास चाहने वालों की बातें खूबसूरत चेहरे वालों की हंसी  अपनों का गुस्सा और प्यार  कुछ खट्टी - कुछ मीठी यादें तुम्हारा गुस्सा और इस असबाब को ले के क़दम बढ़ा दूंगा साल 2019 की पायदान पे फिलहाल - अलविदा 2018 मुकेश इलाहाबादी -------------

ईश्क़ , भी महक जाता है तेरी साँसोँ में आ के

ईश्क़ , भी महक जाता है तेरी साँसोँ में आ के बिन पिये बहक जाता हूँ तेरी बाँहों में आ के बेरुखी सह लेता हूँ ज़माने भर की पर, ज़न्नत सा महसूस करता हूँ ख़ुद को तेरी निगाहों में पा के और ,,,, दिन गुज़र जाता है चिलचिलाती धूप में, पर रात खिलखिला उठती है तुझे ख्वाबों में पा  के मुकेश इलाहाबादी -------------

कहीं दुर्गम पहाड़ियां कंही गहरी खाइयाँ हैं

कहीं दुर्गम पहाड़ियां कंही गहरी खाइयाँ हैं राह में अपनी दुश्वारियाँ  ही  दुश्वारियाँ हैं  कुछ दूर तो मै  भी ईश्क़ की  राह पर चला राहे इश्क़ में तो रुस्वाइयाँ ही रुस्वाइयाँ हैं हमारे पास बैठ के तुम क्या करोगे, मुकेश पास अपने सिर्फ तन्हाईयाँ ही तन्हाईयाँ हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------

अँधेरे की उजाले से यारी कैसे हो

अँधेरे की उजाले से यारी कैसे हो धूप - छाँह की रिश्तेदारी कैसे हो  मुफलिसी परेशान है,ये सोच कर मेहमान की खातिरदारी कैसे हो अगर बेईमान के हाथ हो फैसला  फिर सत्य की तरफदारी कैसे हो झूठे फरेबी जालसाज़ों के शह्र में तू ही ये बता ईमानदारी कैसे हो हर इक के अपने अपने मसले हैं मेरी ये उलझन तू हमारी कैसे हो  मुकेश इलाहाबादी ----------------

सर को धड़ से अलग कर दिया है

सर को धड़ से अलग कर दिया है खुद को छिन्नमस्ता कर लिया है नीलकंठ बनूँ ऐसा इरादा तो न था पर उम्र भर ज़हर ही ज़हर पिया है ज़ख्म मेरे कोई देख न ले,लिहाज़ा सफाई से हर घाव तुरपाई किया है इश्क़ तेज़ाब की नदी गल जाऊँगा फिर भी प्यार किया प्यार किया है दुनिया के मेले में घूम घूम थका हूँ तन्हाई में बैठा हूँ यही मेरा ठिया है मुकेश इलाहाबादी ------------------

बहुत देर से खामोशी से बह रहा था दरिया

बहुत देर से खामोशी से बह रहा था दरिया मेरे पानी में उतरते ही उफ़ना गया दरिया सख्त जान समझता रहा उम्र भर जिसको रात उसी पत्थर के सीने से खूब बहा दरिया जो पूछा तुम भी इठला के क्यूँ नही बहते हो सुना चुप रहा हौले से मुस्कुरा दिया दरिया ईश्क़ की नाव पे बैठ बाँहों के चप्पू चला दिए फिर तो मेरे साथ खुश खुश खूब बहा दरिया देर औ दूर तक बहते बहते  थक गया दरिया मै बन गया समंदर मुझमे समा गया दरिया मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मुझे अपने दर्दो ग़म का कोइ पता न था

मुझे अपने दर्दो ग़म का कोइ पता न था मै तो तुम्हारे ख्वाब देख रहा था,खुश था तुम बाएँ हो के बैठे, मेरी कीमत बढ़ गयी उसके पहले तलक तो मै फक्त सिफर था तुमने होश दिलाया तो जा के होश आया  वर्ना मुझे क्या मालूम था  मै किधर था मुकेश इलाहाबादी ------------------------

काँच का दिल ले पत्थरों से ज़ोर आजमाईश न कर

काँच का दिल ले पत्थरों से ज़ोर आजमाईश न कर बेदिल लोगों का शहर है ये तू कोई फरमाईश न कर मुकेश यहां कोई तुम्हारी चोट पे मरहम न रक्खेगा लिहाज़ा अपने ज़ख्मो की इस तरह नुमाईश न कर मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

काश मेरा भी हुआ करे कोई

काश मेरा भी हुआ करे कोई मेरे लिए भी दुआ करे कोई  न ही मै मिलूं न मै याद करूँ पर मेरे लिए तड़पा करे कोई  दुश्मन तो मेरे बहुत सारे हैं अपना समझ लड़ा करे कोई जब कभी फुरसत दे ज़िंदगी बगलगीर हो, बैठा करे कोई हाथ तो सभी मिला लेते हैं  दिल से भी मिला करे कोई मुकेश इलाहाबादी ---------

वो ख़रामा ख़रामा अपने सफर में था

वो ख़रामा ख़रामा अपने सफर में था मै भी चुपचाप उसके रहगुज़र में था मै उसकी निगाहों में कंही भी न था  मगर वो मुद्दतों से मेरी नज़र में था दरिया में हम दोनों साथ ही उतरे थे वो पार हो गया, मै बीच भंवर में था जिन दिनों मै गुमनामियों में डूबा था  उन  दिनों वो शह्र की हर ख़बर में था चाहता तो मुझसे भी मिल सकता था सुना है वो कल तलक मेरे शहर में था मुकेश इलाहाबादी ---------------------

अजब, तरह से इक़रार करती हो

अजब, तरह से इक़रार करती हो आँखों से हाँ होंठो से इंकार करती हो कभी शोखी, कभी अदा कभी सादगी  हज़ारों  तरीकों से बेकरार करती हो कभी हंस के कभी मुस्का के कभी चुप रह के महफ़िल को गुलज़ार करती हो मुकेश इलाहाबादी ----------------

कुछ तमन्नाएँ कुछ फरियाद ले कर

कुछ तमन्नाएँ कुछ फरियाद ले कर जी रहा हूँ,सिर्फ तुम्हारे ख़्वाब ले कर सोचा था इक घर बसाऊँगा तेरे साथ जा रहा हूँ अपना दिल बर्बाद ले कर अब तक तो बहा खामोश दरिया सा आज के बाद मै बहूँगा सैलाब ले कर वैसे तो पीने का मुझे कोई शौक़ नहीं आज मै पिऊँगा तुम्हारा नाम ले कर ग़मे ईश्क़ भर होता तो मै सुना देता कहाँ जाऊँ मै अपने ग़म हज़ार ले कर मुकेश इलाहाबादी -------------------

अपनी पलकें झुका के देखो

अपनी पलकें झुका के देखो इश्क़ का काजल लगा के देखो मै भी फूलों सा महकूँगा गर मुझको अपने गले लगा के देखो मौसम सावन भादों हो जाएगा अपने भीगे गेसू लहरा के देखो स्याह रातें चाँदी सा चमकेंगी बस तुम थोड़ा सा मुस्का के देखो ये उदास दिल मेरा खुश हो जाएगा इक बार अपने पास बुला के देखो मुकेश इलाहाबादी,,,,,, ,

मुझको झूठी तसल्ली दे के गया

मुझको झूठी तसल्ली दे के गया वो लौट कर आएगा कह दे गया मै मुफ़लिस मेरे पास कुछ न था जो चैनो शुकूँ था, वो भी ले गया मैंने समझा,मुझे पार ले जाएगा चढ़ी नदी नाव मै ख़ुद खे के गया जी तो न था बेवफा से मिलने का दिल से मज़बूर था इस लिये गया लड़ लेता झगड़ लेता ग़म न होता ग़म ये मुझे अनदेखा कर के गया मुकेश इलाहाबादी -----------------