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Showing posts from July, 2016

फ़लक पे ये जोे आफताब है न !

सुमी, फ़लक पे ये जोे आफताब है न  ! सूरज ! लाल सुर्ख लाल। डहलिया के फूल सा टह टह करता लाल आफताब। अपनी मस्ती में घूमता हुआ सब को रोशनी देता हुआ। खुद को राख करता हुआ नाराज हो जाये तो क़ायनात को भी राख कर देने वाला आफताब। ये आफताब हमेसा से इतना गरम न था। इक जमाना था जब इसकी किरणें रोशनी तो देती थी पर जलाती न थी जिस्म कोे दिल को रुह को चॉदनी से भी ज्यादा ठंडक पहुंचाती थी। और ये आफताब अपनी मस्ती मे मगन अपनी विशालता और भव्यता के साथ अपनी धूरी पे घूमता हुआ क़ायनात के चक्कर लगाता रहता। और जानती हो ? क़ायनात की तमाम निहानकायें और हमारी प्रथ्विी जैसी न जाने कितनी प्रथ्वियां इस आफताब पे मुग्ध हो जातीं। अपना दिल हथेली पे ले, इसके चारों ओर चक्कर लगाने व साथ पाने के लिये बेताब रहतीं । मगर, ये आफताब ! अपने गुरुर मे मगन कायनात के चक्कर पे चक्कर लगाता रहता और खुश रहता अपने अकेले पन मे ही। मगर ! एक दिन जब वह अपनी ही निहारिका यानी आकाशगंगा मे घ्ूाम रहा था। और हमेसा सा अपनी धुरी पे नाच रहा था कि अचानक उसे अपने से दूर बहुत दूर एक छोटी सी मगर बेहद खूबसूरत सी समंदर का घांघरा ओर हरियाली चुनरी ओढे प्रिथ्...

घात लगाये बेजुबानों पे

घात  लगाये बेजुबानों पे बैठे हैं शिकारी मचानो पे गर आप खरीदना चाहो? सच मिलता है दुकानों पे  ज़ुल्म हमेशा होता आया सिर्फ ईश्क के दीवानों पे मुकेश इलाहाबादी ----

महफ़िलों में जब भी आप सज-संवर के आते हैं

महफ़िलों में जब भी आप सज-संवर के आते हैं आप को देखने फ़रिश्ते भी आसमान से आते हैं मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

जिंदगी अपनी मुस्कुराने लगी है तब से

जिंदगी अपनी मुस्कुराने लगी है तब से  नज़दीक मेरे आप आने लगे हैं, जब से  इक बार आप आ कर देखें ज़रा छत से  खड़े हैं आपके दर पे हम न जाने कब से  दे दें गर इज़ाज़त बटोर लूँ दौलत को,जो हंसी के हीरे मोती झरते हैं आपके लब से फक्त  आप की  झलक पाने के बाद से ही इबादत में  आप को ही मांगते हैं रब से मुकेश इलाहाबादी -----------------------

बे - बहर हैं हम

बे - बहर  हैं  हम बे - शहर हैं हम इक  ज़माने   से दर- बदर हैं हम अपने ही हाल से बे -ख़बर हैं  हम संसार  सागर मे इक लहर हैं  हम कोई चला ही नहीं  सूनी, डगर हैं हम मुकेश इलाहाबादी -

कि सावन आ गया अब तो

कि सावन आ गया अब तो आ हमसे मिल जा अब तो विरह अगनि में जले बहुत आ कुछ तो प्यास बुझा जा है हुई, रात अंधियारी बहुत तू दीपक तो, एक जला जा जेठ बैसाख, हम सूखे बहुत बादल,तू पानी तो बरसा जा  अपनी-अपनी सबने कह दी मुकेश तू भी ग़ज़ल सुना जा मुकेश इलाहाबादी ----------

सारी क़ायनात की ख़ूबसूरती

सारे, क़ायनात की ख़ूबसूरती तुम पे उतर आती है जब, तुम सजा लेती हो माथे पे लाल बिंदी और, सिर को ढँक कर पल्लू से झुका लेती हो बड़ेरी अँखियाँ सच ! तब तुम बहुत प्यारी लगती हो सच, बहुत - बहुत प्यारी लगती हो तुम, सुमी मुकेश इलाहाबादी -----

ये ज़िन्दगी ईश्क़गाह में गुज़रे

तू फूल की मानिंद खिल और खुशबू सा महक या परिंदा बन जाए, मुंडेर पे बुलबुल सा चहक मेरी चाहत है कि इक दिन तू महताब बन जाये चाँद बन कर मेरी अंधेरी स्याह रातों में चमक मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

नदी से क्या दोस्ती कर ली

नदी से क्या दोस्ती कर ली समंदर से दुश्मनी कर ली फ़लक़ भी है, ख़फ़ा, जबसे चाँदनी से आशिक़ी कर ली कूचाए ईश्क से क्या गुज़रे ज़माने में रुसवाई कर ली मुकेश तुम भी नहीं बोलते, तुमसे क्या दिल्लगी कर ली मुकेश इलाहाबादी -------

रातो दिन का हिसाब मांगेगी

रातो  दिन  का हिसाब मांगेगी ज़िंदगी कुछ तो जवाब मांगेगी परदेसी पिया !किसी दिन गोरी सूने सावन का हिसाब मांगेगी अगर  आब न  हो मयस्सर, तो देखना यही प्यास शराब मांगेगी चेहरों पे यूँ ही पड़ते रहे तेज़ाब यही ख़ूबसूरती हिज़ाब मांगेगी रात और अँधेरा ही काफी नहीं,, सोने के लिए नींद ख्वाब मांगेगी मुकेश इलाहाबादी -----------------

उदासी घर सजाती रही

उदासी  घर सजाती रही तंहाई साथ निभाती रही हंसना खिलखिलाना चाहूँ होंठो से हंसी रूठ जाती है मुकेश इलाहाबादी ---------

खुशबू है, खूबसूरती है , बला की नाज़ुकी है

खुशबू है, खूबसूरती है , बला की नाज़ुकी है ऐ दोस्त तुझमे फूल की कौन सी खूबी नही है ? मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

सुना है, दुनिया गोल है

सुना है, दुनिया गोल है पर् , शायद , इतनी भी गोल नही कि, चल - चल कर हम फिर, वहीं मिल् जाते जहां से बिछड़े थे क्यूँ , सुमी, सही कह रहा हूँ न ?? मुकेश इलाहाबादी -----  

ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं।

सुमी, ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं। इन्सान के अंदर ख्वाहिश न हो कुछ पाने की कुछ जानने की कुछ करने की तो समझ लो वह इन्सान इन्सान नही जड है पत्थर है, एक बेजान मूरत है। यही ख्वाहिशे ही तो हैं जो इन्सान को आगे आगे और आगे बढाती है। यही ख्वाहिशे तो है जो इन्सान को तरक्की के रास्ते पे ले जाती हैं। ख्वाहिशे न होती तो इन्सान इन्सान नही जानवर होता। एक बात जान लो ख्वाहिशों मे और अमरबेल मे कोई फर्क नही है। अमर बेल की सिफ़त होती है कि उसकी कोई जड नही होती वह किसी न किसी पेड का सहारा ले के बढती है, और वह जिस पेड का सहारा और खाद पानी लेकर बढती है उसी को सुखा देती है। बस उसी तरह इन ख्वाहिशों का समझो। ये ख्वाहिशें वो अमर बेल हैं जो हर इंसान के अंदर जन्म लेती हैं और फिर इन्सान इस बेल को पुष्पित और पल्लवित करने मे लगा रहता है, और नतीजा यह होता है कि उसकी ख्वाहिशों की अमर बेल तो फलती फूलती रहती है दिन दूनी बढती रहती है पर वह इन्सान दिन प्रतिदिन सूखता जाता है, सूखता जाता है, और एक दिन सूख कर खुद को ही खत्म कर लेता है। और जिसने इस ख्वाहिशों रुपी जहरीली अमरबेल को शुरुआत मे ही बढने से रोक ...

ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं

सुमी, ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं। इन्सान के अंदर ख्वाहिश न हो कुछ पाने की कुछ जानने की कुछ करने की तो समझ लो वह इन्सान इन्सान नही जड है पत्थर है, एक बेजान मूरत है। यही ख्वाहिशे ही तो हैं जो इन्सान को आगे आगे और आगे बढाती है। यही ख्वाहिशे तो है जो इन्सान को तरक्की के रास्ते पे ले जाती हैं। ख्वाहिशे न होती तो इन्सान इन्सान नही जानवर होता। एक बात जान लो ख्वाहिशों मे और अमरबेल मे कोई फर्क नही है। अमर बेल की सिफ़त होती है कि उसकी कोई जड नही होती वह किसी न किसी पेड का सहारा ले के बढती है, और वह जिस पेड का सहारा और खाद पानी लेकर बढती है उसी को सुखा देती है। बस उसी तरह इन ख्वाहिशों का समझो। ये ख्वाहिशें वो अमर बेल हैं जो हर इंसान के अंदर जन्म लेती हैं और फिर इन्सान इस बेल को पुष्पित और पल्लवित करने मे लगा रहता है, और नतीजा यह होता है कि उसकी ख्वाहिशों की अमर बेल तो फलती फूलती रहती है दिन दूनी बढती रहती है पर वह इन्सान दिन प्रतिदिन सूखता जाता है, सूखता जाता है, और एक दिन सूख कर खुद को ही खत्म कर लेता है। और जिसने इस ख्वाहिशों रुपी जहरीली अमरबेल को शुरुआत मे ही बढने से रोक द...

ऊपर - ऊपर राख दिखेगी

ऊपर - ऊपर  राख दिखेगी अंदर - अंदर अाग मिलेगी रफ़्ता - रफ़्ता बढ़ता जा तू मंज़िल अपने अाप मिलेगी मुकेश इलाहाबादी -------------