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Showing posts from July, 2017

सपनो में कभी कोई राजकुमारी नहीं आयी

सपनो में कभी कोई राजकुमारी नहीं आयी ------------------------------------------------ मेरे सपनो में कभी कोई राजकुमारी नहीं आयी उसके सपनो में भी कोई राजकुमार और  घोडा नहीं आता था शायद सपने भी औकात देख कर आते हैं उसका बाप कचहरी में चपरासी था मेरा बाप भी सरकारी बाबू उसे मेरे स्कूल आने जाने और खले के मैदान जाने  का वक़्त पता था मुझे भी उसके सहेलियों के झुण्ड में स्कूल आने जाने का वक़्त पता था वह कब छत पे आएगी पता होता काफी दिन तो एक दुसरे को सिर्फ देखते थे मैँ अपनी साइकिल तेज़ कर लेता वो भी तेज़ कदमो से घर की तरफ चल देती एक दो बार दरवाज़े पे कागज़ की पुर्ज़ियों में ख़त भी फेंके गए आस पड़ोस में फुसफुसाहट शुरू होती इसके पहले उसके जीवन में एक राजकुमार आ गया जो सपनो में  नहीं आया था कभी उस सच्ची मुच्ची के राजकुमार के घोड़े  की पूछ में सरकारी बाबू का टैग लगा और मेरी पुरानी कमीज में 'बेरोज़गारी' का टैग मुँह चिढ़ा रहा था जिस दिन वो राजकुमार अपने घोड़े पे अपनी राजकुमारी लेने आया उस दिन मैंने अकेले में कई पैकेट सिगरेट पिया पहली बार खांसते खांसते अपने ...

फ़क़त धूप ही धूप थी कोई साया न था

फ़क़त धूप ही धूप थी कोई साया न था तुम्हारे जाने के बाद कोई हमारा न था इक तुम ही तो थे, जिस्से सबकुछ कहा किसी और को दर्द अपना सुनाया न था किसी के पास मेरे ज़ख्म की दवा न थी इसी लिए घाव किसी को दिखाया न था तुमसे मिल कर हंसा था इक दिन फिर उम्र भर बाद उसके खुलकर हंसा न था इक दिन तूने मेरी हथेलो को चूमा था बहुत दिनों तक हथेली को धोया न था मुकेश ख़ुदा और मुहब्बत के सिवा मैंने किसी और दर पे सिर को झुकाया न था मुकेश इलाहाबादी ---------------------

साथ साथ चलें

काश ! हम तुम साथ साथ चलें और रुक जाए 'वक़्त ' मुकेश इलाहाबादी -------

मेरा ख़त,

मेरा ख़त, मेरा ख़त पढ़ पढ़ के अकेले में हंसा करते हो मुझसे मुहब्बत नहीं तो क्यूँ पढ़ा करते हो ?? मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

ज़िंन्दगी कुछ इस तरह गुज़रती है -----------------------------------------

ज़िंन्दगी कुछ इस तरह गुज़रती है ----------------------------------------- सुबह होते ही तेरी यादों के फूल खिल उठते हैं और मेरी सुबह महक उठती है दोपहर ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप तुम्हारी हँसी की छाँव में गुज़र जाती है सांझ यादों की झील में चाँद बन उतर आती हो तुम और मेरी रात चाँदनी चाँदनी हो जाती है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

खनखनाती हंसी के

उस दिन से मै बहुत अमीर हो गया जिस दिन से तुम्हारी खनखनाती हंसी के सिक्के मेरी जेब में आये (सुमी ) मुकेश इलाहाबादी -----

खुली आँखे तेरी राह तकती हैं

खुली आँखे तेरी राह तकती हैं बंद आँखे तेरे ख्वाब देखती हैं तू मेरे मुक़द्दर में नहीं,ये बात मेरे  हाथ  की लकीरें कहती हैं   तुझसे तो अच्छी तेरी तस्वीर मेरी नज़्म व ग़ज़लें सुनती है   मुकेश इलाहाबादी -----------

झरना

जैसे बहता है झरना चट्टानों के भीतर - भीतर वैसे ही तुम बहती हो मेरे भीतर - भीतर मुकेश इलाहाबादी ---------

तुम्हारे आने के बाद से )

इक लम्बी अंधेरी रात के बाद कई सौ सूरज कई हज़ार चाँद उग आये हैं हमारे दिन और हमारी रातों में (तुम्हारे आने  के बाद से ) मुकेश इलाहाबादी --

क़तरा- क़तरा प्यासा निकला

क़तरा- क़तरा प्यासा निकला दिल का दरिया सूखा निकला चिकने -चिकने चेहरे के अंदर भालू - बंदर - भेंडिया निकला दिल में जिसके बर्फ  जमी थी बहते आग का दरिया निकला सावन में बादल का घूँघट ले देखो देखो बाहर चँदा निकला मुकेश, जनता गूंगी मंत्री भ्रष्ट राजा भी अपना बहरा निकला मुकेश इलाहाबादी -----------

सांझ उतर आयी है

सांझ उतर आयी है चाँद भी निकलने वाला होगा आओ छत पे चलते हैं रात चाँद सफर में है आओ हम भी निकलें ख्वाबों के सफर में सुबह चाँद डूब जायेगा कुछ देर में खिड़िकयों के परदे लगा दो हम भी कुछ देर सो लें मुकेश इलाहाबादी --

काफी रात गए तक वो जागती है

काफी रात गए तक वो जागती है शायद किसी का इंतज़ार करती है जब भी बात करना चाहता, हूँ तो ज़ुबाँ से नहीं निगाहों से बोलती है हर वक़्त ख़ुद को मसरूफ रख कर अपने अंदर का खालीपन भरती है मुकेश इलाहाबादी ---------------

'रिक्तस्थान-1

देखना एक दिन 'मै' घुल जाऊंगा हवा, पानी, मिट्टी में मिल जाऊँगा घुल - घुल कर आकाश बन जाऊँगा और फिरलिपट जाऊँगा तुम्हारे इर्द - गिर्द फैले 'रिक्तस्थान' में मुकेश इलाहाबादी --------------

रिक्त स्थान

प्रेम से लबालब कविता का भाव हो तुम रस हो तुम ओर 'मै' शब्दों के बीच का खालीपन इस खालीपन भर सकती है न तो धूप न हवा न पानी न वेद की ऋचाएँ न कोई शुक्ति वाक्य इस रिक्त स्थान को भर सकती हैं तो, बस तुम्हारी खिलखिलाती हँसी और मेरे प्रति तुम्हारे 'प्रेम'  की स्वीकृति मुकेश इलाहाबादी ---------------

कभी गेंदा, तो कभी गुलाब याद आता है

कभी गेंदा, तो कभी गुलाब याद आता है तुझे  देखता हूँ तो महताब याद आता है समंदर से निकली जलपरी हो अप्सरा हो जो भी हो तुझपे प्यार बेहिसाब आता है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

इंतज़ार

हमने कभी भी जीने मरने की  कसमें खायीं नहीं थीं न ही वादे किये  थे........ न ही नौका विहार किया चाँदनी रातों में और ,न ही कॉफी हाउस के कोने वाली मेज पर इंतज़ार किया था कभी एक दूसरे का....... और .... हाँ... खुश्बू  में लिपटे ख़त भी नहीं लिखे थे कभी हम दोनों ने....... तुम अपनी दुनिया में खुश थीं और मैं अपनी दुनिया में फिर ....भी क्यूँ ? भीड़ में आते ही तुम्हें खोजता रहता हूँ कहीँ ये प्यार तो नही था ..... जो न आँखों से बयां कर सके थे हम न ज़ुबा ही गुनगुना सकी थी...... फिर इन आँखों को आज भी ..क्यूँ इंतज़ार है  तुम्हारा...........।।  मुकेश इलाहाबादी -----------

तेरा नाम लिखता हूँ ख़त महकने लगता है

तेरा नाम लिखता हूँ ख़त महकने लगता है तेरी याद आती है, ये दिल चहकने लगता है जाने क्या क्या ख्वाब बुनता है, दिले नादाँ सर्द रातों में भी तनबदन सुलगने लगता है तेरी बातों में तेरी संगत में कोई तो नशा है तुझसे मिल के हर शख्श बहकने लगता है लेटता है,  बैठता है  फिर -फिर उठ जाता है मुकेश रातों में उठ उठ कर टहलने लगता है मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

तेरा नाम लिखता हूँ ख़त महकने लगता है

तेरा नाम लिखता हूँ ख़त महकने लगता है तेरी याद आती है,ये दिल चहकने लगता है जाने क्या क्या ख्वाब बुनता है, दिले नादाँ सर्द रातों में भी तनबदन सुलगने लगता है मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

Didi

आकाश जाते जाते कह गया था 'पूजा, आज तुम सब्जी ले आना मुझे ऑफिस से आने में देर हो जाएगी' . लिहाजा पूजा ने जल्दी जल्दी बर्तन धोये घर के काम निपटाए, अलमारी से 1000 /- का नोट निकला और बाज़ार की तरफ चल दी, पूजा अपनी उधेड़बुन में चली जा रही थी, कि वह कॉलेज की लड़कियों के एक झुण्ड से टकरा गयी. लड़कियां 'सॉरी , आंटी ' कह के आगे बढ़ गयीं। पूजा कुछ समझ पाती तब तक लड़कियों का झुण्ड पास के ही रेडीमेड कपड़ों शोरूम में घुस गया। पूजा भी जाने क्या सोच कर उसी शोरूम में घुस गयी। लड़कियां हंसती ठिठोली करती कपड़ें देखने लगीं , पूजा को भी अपने कॉलेज के दिन याद आ गए। लड़कियों ने कई सेट सूट के देखे फिर शायद उन्हें कुछ समझ नहीं आया वे खिलखिलाती हुई दुसरे शोरूम की तरफ चल दीं। पूजा को याद आया उसे तो कुछ लेना ही नहीं था वो तो ऐसे ही शोरूम में आ गयी थी। अकबका के वो बाहर निकलने लगी तभी लगभग सत्रह - अठारह साल के एक लड़के ने कहा 'दीदी आप को क्या दिखाऊं ?' पूजा ने दुकान में इधर उधर नज़र दौड़ाई सोचा शायद लड़के ने किसी और को 'दीदी' कहा हो। वो कुछ समझ पाती। लड़के ने फिर कहा 'द...

लड़की अकेली रोती है

प्रेम में लड़की हंसती है तो हँसता है हँसता है आसमान खिलते हैं फूल मुस्कुराता है चाँद खुश होती है क़ायनात पर प्रेम में धोखा खाती है तो न आसमान हँसता है न फूल खिलते हैं न मुस्कुराता है चाँद तब लड़की अकेली रोती है मुकेश इलाहाबादी ------------

मै - तुम- प्रेम और षड ऋतुएं

जेठ के तपते मौसम में तुम करना 'प्रेम' मै तुम पर फेंकूँगा बर्फ के लड्डू फिर तुम खिलखिला के लिपट जाना हमसे माघ पूस की ठण्ड में तुम करना 'प्रेम' सुबह की नर्म गर्म धूप सा उतर आऊंगा और लिपट जाऊँगा तुमसे सावन भादों के मौसम में तुम करना 'प्रेम' मै बादल बन बरसूँगा तुम भीगना झम झमा झम मुकेश इलाहाबादी -----------

सुबह की धूप

जैसे सुबह की धूप उतरती है, छूती है धरती को   धरती खिल जाती है मुस्कुराने लगती है बस, ऐसे ही मै आऊँगा तुम्हे छू कर लौट जाउँग शांझ, फिर तुम मुस्कुराती रहना रात भर सुबह के इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी --------------

चाँद की जुस्तजूं में रोती रही मुसलसल

चाँद की जुस्तजूं में रोती रही मुसलसल आँख में इक झील बहती रही मुसलसल जब तलक हवा तेज़ बहती रही,कलियाँ टूटने के डर से सहमती रही मुसलसल आँखे रह - रह  कुछ न कुछ बोलती रही  चुप्पियाँ उसकी सुनती रही मुसलसल मुकेश इलाहाबादी -------------------------

ज़ेहन किसी को भूलना चाहता रहा

ज़ेहन किसी को भूलना चाहता रहा दिल किसी का इंतज़ार करता रहा दिलो दिमाग में दुश्मनी ठनी रही मुकेश इलाहाबादी ----------------

कुछ मिस्ड, कॉल्स कुछ, इनकमिंग कॉल्स

कुछ मिस्ड, कॉल्स कुछ, इनकमिंग कॉल्स कुछ आउटगोइंग कॉल्स,बस इतनी सी यादें एक बार फिर वीरान से दिन अंधेरी राते हैं

भले ही आग व पानी का रक्खो

भले ही आग व  पानी का रक्खो रिश्ता पहाड़ और खाई का रक्खो मुझसे कोइ तो एक रिश्ता रक्खो दोस्ती न सही दुश्मनी का रक्खो गर चाहत है महकता रहे घर तेरा सहन में खिलाये रातरानी रक्खो मुझसे कोई रिश्ता रखना चाहो तो रिश्ता  महिवाल सोणी का रक्खो रिश्ता या तो दिल से दिल का हो या फिर राह चलते अजनबी को हो मुकेश इलाहाबादी --------------

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो हद से ज़्यादा नाज़ो नखरे न दिखाया करो पानी पे लिखो रेत पे लिखो दिल पे लिखो इश्क़ लिख कर फिर फिर मिटाया न करो तुम अपने सारे रंजो ग़म मुझको सुना देना अपना सुख दुःख किसी को सुनाया न करो इक बार कह दिया तो कह दिया 'तू मेरी है' बार बार मुझसे यही बात कहलाया न करो पुराना रिन्द हूँ मैखाना का मैखाना पी जाऊँ अपनी आँखों से इस क़दर पिलाया न कर दिल हमारा कच्ची ज़मीन का है जानेमन सावन भादों सा मुहब्बत बरसाया का करो मुकेश इलाहाबादी --------------------------- 

चाहे आग और पानी का रक्खो

चाहे आग और पानी का रक्खो रिश्ता पहाड़ और खाई का रक्खो मुझसे कोइ तो एक रिश्ता रक्खो दोस्ती न सही दुश्मनी का रक्खो

शुबो रोशनदान तक आती धू

शुबो रोशनदान तक आती धूप जाने क्या सोच लौट गयी धूप इंद्रधनुष का आँचल सतरंगी देखो कित्ती प्यारी लगती धूप जाड़े में जब कोहरे में से झांके सब को अच्छी लगती है धूप है सुबह मुस्काती दोपहर,चुप सांझ छत पे गुनगुनाती धूप जब जब तू सज कर निकले तेरे चेहरे पे खिलती है धूप मुकेश इलाहाबादी -------------

हारिल चिड़िया

एक हारिल चिड़िया रोज़ मेरे कमरे में आती है एक चक्कर लगाती है कुछ देर बंद पंखे की पंखुड़ी पे या रोशन दान पे बैठेगी अपनी चोंच वाली गर्दन इधर उधर घुमाएगी और फिर फुर्र से उड़ जाती है बाहर शायद वो अपने चिड़े को ढूंढने आती है और फिर चिड़े को न पा के लौट जाती है मै अपने कमरे में उदास बैठ के सोचता हूँ काश तुम भी हारिल चिड़िया होती ? और फिर उदास हो कर मुँह में सिगरेट दबा खिड़की के बाहर न जाने क्या - क्या देखता रहता हूँ शायद खाली आसमान शायद दूर तक सूनी सड़क या फिर इनमे से कुछ भी नहीं मुकेश इलाहाबादी ---------------------

तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे

ये और बात तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे मगर तुमसे  मिलने के बाद मेरे पास, और कोई विकल्प न था सिवाय तुमको चाहते रहने के मुकेश इलाहाबादी ---------------

माना कि तुम्हारी आँखे सुंदर हैं

माना कि तुम्हारी आँखे सुंदर हैं पर तुम्हारी आँखों से सुंदर है तुम्हारा 'दिल' माना तुम्हारे गाल बहुत मोहक हैं गोरे, गुलगुले और रूई के फाहे से मुलायम पर तुम्हारी बातें इससे भी प्यारी हैं माना कि तुम्हारे बाल बहुत सुंदर हैं काले , घुंघराले और प्यारे पर तुम्हारे विचार और व्यवहार इससे भी अच्छे हैं मै ये मानता हूँ तुम बहुत सुंदर हो पर तुमसे भी सुंदर और प्यारा है 'प्रेम' व 'अपनापन' जो तुमने दिया है मुझे इस लिए 'मै' तुम्हे तुम्हारे प्रेम से कम सुंदर कहूंगा मुकेश इलाहाबादी ---------------

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है तुमसे मिलूं तो, बिखरी दुनिया भी संवर जाती है तुम साथ चलो तो, ज़िंदगी ज़िंदगी सी जी लूँगा ज़िंदगी का क्या? ज़िंदगी सभी की कट जाती है मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

उन्मुक्त हंसी

तुम्हारी उन्मुक्त हंसी भर देती है उजास से मेरे अंतरतम को और मै डूबने से बच जाता हूँ उदासी के गहन गह्वर में मुकेश इलाहाबादी ---------

सुबह की धूप

जैसे सुबह की धूप भर देती है अंतरतम तक को रोशनी से पूरी दुनिया के लोगों के वैसे ही तुम्हारी हंसी भर देती है उजास से उल्लास से पूरी सृष्टि को और मेरे अंतरतम को मुकेश इलाहाबादी ---

ishq charm pe

ईश्क़ शुरू में बहुत बोलता है जैसे -जैसे गहराता है कम बोलता है अपने चरम पे मौन हो जाता है आज कल तुम भी मौन रहती हो कंही ये मेरे प्रति तुम्हारे प्यार का चरम तो नहीं ?? मुकेश इलाहाबादी -----

दंतकथाओं सा

चाह के भी तुम्हारी यादों को नहीं मिटा पाता हूँ अपने ज़ेहन से वे बरसों बाद आज भी ज़िंदा हैं दंतकथाओं सा मेरी स्मृतियों में और रहेंगी न जाने कब तक मुकेश इलाहाबादी ---------------

हवा फुसफुसाते हुए हौले से बहती है

हवा फुसफुसाते हुए हौले से बहती है गुलाब की दो पत्तियां कांप के रह जाती हैं हवा मुस्कुरा के बढ़ जाती है पत्तियां शरमा के सिर झुका लेती हैं दोनों जान लेते हैं क्या कुछ  पूछा गया क्या कुछ कहा गया मुकेश इलाहाबादी ------

तुम मुझसे मिलने चाँदनी रातों में मत आना

तुम मुझसे मिलने चाँदनी रातों में मत आना चाँद तो पुराना आशिक़ है ही सितारे भी तुम्हारे दीदार के लिए बेक़रार हैं ये तुम्हे छेड़ सकते हैं तुम मुझसे मिलने तब मत आना जब हवा चल रही हो मद्धम मद्धम भी किसी ने बताया, ये हवा तुम्हारे बदन की खुशबू से जलती है तुम्हारे ऊपर जादू टोना कर सकती है सुनो तुम मुझसे मिलने तब भी मत जाना जब सूरज आसमान में ऊगा हो ये तुम्हे अपना न बना पायेगा तो जला देगा फिर भी तुम मिलने आना मुकेश इलाहाबादी -------------

तुम सबसे जुदा हो

तुम्हारी तस्वीर किसी भी तरफ से देखो खूबसूरत ही लगती हो तुम्हे किसी भी रूप में सोचो आसमानी परी लगती हो जज़्बात और ऊर्जा से भरपूर दिखती हो षड ऋतुओं में बसंत ऋतु हो ब्रह्माण्ड  की तमाम निहारिकाओं में आकाश गंगा हो सितारों की भीड़ में शुक्र तारा हो वर्णमाला के सारे वर्ण मिला के भी तुम्हारे बारे में सब कुछ नहीं कह पाएंगे लिहाज़ा इतना ही कहूँगा तुम सबसे जुदा हो सब से अलहदा हो मुकेश इलाहाबादी -----------------

किसी गर्मी की

किसी गर्मी की ऊँघती दोपहर में ही आ जाओ छाँव बन के फिर सो जाऊँ मै तुमको ओढ़ कर निचिंत - खुश - खुश किसी जाड़े की सुबह सुबह आ जाओ गुनगुनी धूप सा दिन भर बैठा रहूँ छत पे बदन सेंकता हुआ मुकेश इलाहाबादी ---------

धुऑ बनाम गुलाब

धुऑ बनाम गुलाब 10.12.2009 ‘एक बेहद अच्छे इंसान व दोस्त, सुरेंद्र पवार जी को नज़र . जिनकी ज़िंदगी से यह कहानी चुरायी है’ बाल्कनी से ताजा खिलें फूलों की भीनी भीनी खुषबू उसे पूरा का पूरा कब भिगो गयी  राजा को पता ही न लगा। राजा को यह भी पता न लगा कब सुबह की नर्म मुलायम गुलाबी किरणों ने चुपके से आ के  रात के अंधेरे को, व ओस की बूंदों को सोखना षुरु कर दिया था। पंक्षियो की चहचह और फूलों  की खुषबू से चारों तरफ एक उत्सव सा लगने लगा था। यही सुबह तो रोज होती थी। सूरज तो रोज खिलता था। हवा रोज ही तो चलती थी। फूल तो रोज ही खिलते थे। पर राजा क्यों नही देख पाता था। क्यों नही इन खुषबुओं को अपने नथूनों में भर पाता था। क्यांे नही इन किरणों को आखों से पीने की ख्वाहिष होती थी। सना का जादू भी तो न जाने कब धीरे धीरे चुपकेे चुपके उसके वजूद को घेरने लगा था। सना का जादू ही तो है जो हर चीज को हर बात को हर एहसास को यहां तक की राजा को पूरा का पूरा बदल दे रहा है। अगर नही तो फिर यह सुबह पहले की तरह उदास क्यों नही लगती। क्यों उसे नही लगता कि यह वही तो सूरज है जो रोज रोज उगा करता है। यह वही तो गुलाब...

तुम नदी नहीं हो

एक --- तुम नदी नहीं हो मै भी समुंदर नही हूँ फिर क्यूँ डूबती जा रही नाव, नहीं सम्भलते जीवन के पाल दो ---- तुम नदी नहीं हो फिर क्यूँ तुझसे हिल मिल मै हो जाता हूँ तजा दम तीन ---- वही बादल तो तुमको भी आपूरित करते हैं जल से और तुम बन जाती हो नदी मीठे पानी की वही बादल तो मुझपे भी बरसते हैं वही मीठे पानी की नदी मुझे आपूरित करती है फिर भी 'मै कितना खारा ? चार ---- नदी तुम मेरे प्रेम में अपने उद्गम को छोड़ तमाम जंगल पर्वत बाधाओं को पार करती रही मै, समंदर तुम्हारे लिए तिल भर भी न हिला अपने दर से सिर्फ और सिर्फ अहंकार वश राह ताकता रहा तुम्हारे आने की तुम्हारे समर्पण की तुम आती हो  हरहरा के समां जाती मुझमे समां जाती हो मुझमे पा जाती हो सर्वस जब की मै वहीं का वहीं रह जाता हूँ मीठे जल को तरसता और और नदियों की राह ताकता हे नदी ! तुम्हारे प्रेम व समर्पण को नमन मुकेश इलाहाबादी -------

चाँद सितारे तेरी झोली में डालूं तो

चाँद सितारे तेरी झोली में डालूं तो तुझको, जबरन अपना बना लूँ तो बारिश के मस्त - मस्त  मौसम में आवारा सड़कों पे तुझ संग भीगूँ तो तू बना रही हो जब चाय या कॉफी चुपके से आ के बाहों में भर लूँ तो तू चाहे मल्टी प्लेक्स में मूवी देखें पर मै तुझे गांधी मैदान घुमाऊं तो काली- काली ज़ुल्फ़ों में गज़रा बन तेरी साँसों में, रातों दिन महकूँ तो तू चाहे सुनना रोमांटिक गाना पर तुझको मै अपनी ग़ज़ल सुनाऊँ तो मुकेश इलाहाबादी -----------------

रंग

मुझे हर वो रंग अच्छा लगता है जो तुमपे फबता है ये और बात तुम पे हर रंग फबता है मुकेश इलाहाबादी ------------

एकांत मुझे अच्छा लगता है

एक ---- एकांत मुझे अच्छा लगता है क्यूंकि, तुम्हारे बारे में 'मै ' सोच सकता हूँ तफ्सील से 'मै ' रो सकता हूँ अपने दुःखो पे अपने मर्दपन के अहंकार से अलग हो के लिख सकता हूँ तुम्हे प्रेम पत्र बिना डर के एकांत मुझे अच्छा लगता है क्यूँकि तब 'मै ' पूर्ण स्वतंत्र और मौलिक बिना किसी मुखौटे के और इस लिए भी कि तुमसे चैट कर सकता हूँ आराम से मुकेश इलाहाबादी -----

ये तिल ही तो है

ऐे, शोख़, चंचल आँखों और आबनूसी गेसुओं वाली भोली, मासूम अल्हड लड़की तू , अपने खूबसूरत गालों पे बैठे इस काले तिल को मुझे दे दे जिसे मै फेंक आना चाहता हूँ किसी कुआँ, खाई या बहा आऊँ किसी नदी नाले में क्यूँ कि यही वो मरदूद काला तिल है जो किसी सजग चौकीदार सा मेरी नज़रों को रोक लेता है अपने पास और नहीं निहारने देता तुम्हारे गालों की गोराई को ज़ुल्फ़ों के पेचोख़म को प्यारी मुस्कान को और नहीं निहारने देता तुम्हे जी भर के इसलिए, ऐ मेरी प्यारी भोली दोस्त अपना ये क्यूट , नटखट और बदमाश तिल मुझे दे दे ताकि इसे फेंक आऊं दरिया में (पर सच ये तिल ही तो है - जो जान ले लेता है ) ओ! माय सोणी ओ ! माय लव डू यू हियर मी ??) मुकेश इलाहाबादी ------------------

प्यारी डिंपल वाली भोली लड़की

जी चाहता है तुम्हारे गालों के डिम्पल पे आहिस्ता से रख दूँ अपनी तर्जनी उंगली और महसूस करूँ गुलाब से भी गुलाबी रेशम से भी मुलायम इस छोटे से क्यूट  से गड्ढे को जिसके आगे सारी क़ायनात भी फीकी हैं ओ ! प्यारे गालों और उसपे खूबसूरत डिम्पल वाली भोली लड़की कभी कभी तो मेरा जी चाहता है तुम्हारे गालों के इस डिम्पल के इस छोटे से गड्ढे में डूब जाऊँ जैसे नाव डूब जाती है नदी की भंवर में ओ मेरी प्यारी डिंपल वाली भोली लड़की सुन रही हो न ??? मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

तनहा रातों में हम आज भी मुस्कुराते है

तनहा रातों में हम आज भी मुस्कुराते है जब भी तेरी यादों के सितारे जगमगाते हैं यूँ तो तेरे बगैर जीने का कोई शबब न रहा मुलाकात की इक उम्मीद में जिए जाते हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------

न बिखरने देता है,न संवरने देता है

न बिखरने देता है,न संवरने देता है न मिलता है न ही बिछड़ने देता है कभी पानी में रखता है कभी बाहर न मरने देता है, न  तड़पने देता है हवा का झोंका  आ के उड़ा ले जाए न गरजने देता है न बरसने देता है मुकेश इलाहाबादी -----------------

असमंजस

तुम्हारी शोख चंचल आँखों की मासूम चितवन को कच्ची अमिया सी खट - मिट्टी बातों को झरने सी करती कल-कल मधुर हंसी को और,,,, तुम्हारे ढेर सारे अल्हड़ प्यार को अपने दिल के छोटे से रुमाल में कैसे बाँध पाऊँगा ? कैसे इस असमंजस से उबर पाऊंगा ? तू ही बता, ओ ! मेरी प्रिये ओ री, मेरी सुमी मुकेश इलाहाबादी -----------------

जिस दिन भी तू मेरे घर आयेगी

जिस दिन भी तू मेरे घर आयेगी ज़िंदगी अपनी हसीन हो जायेगी झूम के बादल बरसेगा आँगन में रातरानी खिलेगी खिलखिलाएगी कबूतर का जोड़ा गुंटूर- गुं करेगा मुंडेर पे बैठी कोयल गुनगुनायेगी तू ज़रा सी बात पे रूठ के बैठेगी मै मनाऊंगा तू मान भी जाएगी अपने हाथो से गूँथूँगा इक गज़रा जिसे तू अपने बालों में सजाएगी मुकेश इलाहाबादी ---------------

चटक रंग

जो सब  से चटक रंग है मेरे दिल के कैनवास में जिसमे हरे सी हरियाली है गुलाब सा गुलाबी पन भी है सफ़ेद की सादगी है गेरुआ सी सात्विकता है वो तुम हो तुम हो तुम हो वो तुम ही हो जिसमे हरे  के भी हज़ार शेड हैं और ???? मुहब्बत के - अनगिनत क्यूँ , सच है न मेरी सुमी ? मुकेश इलाहाबादी ----

लापता हो जाता है

चाँद, लापता हो जाता है सूरज कहीं समंदर में डूब जाता है सितारें अंतरिक्ष की अतल गहराइयों में खो जाते हैं मै 'मै ' नहीं रह जाता 'मै' चेतना शून्य हो जाता है ऐसा तब होता है जब तुम मुझसे दूर होती हो या नाराज़ होती हो सुन रही हो न ? मेरी दुनिया मेरी ब्रह्माण्ड मेरी सुमी मुकेश इलाहाबादी ---------

गोल बिंदी

जैसे सुबह के आँचल में किसी ने टाँक दिया हो गुलाबी सूरज बस, ऐसे ही चमकती है तुम्हारे माथे की गोल बिंदी (तुम बहुत प्यारी हो - सच्ची मुच्ची ) मुकेश इलाहाबादी --------------------

ख़ुद को और सजा लूँगा

ख़ुद को और सजा लूँगा दिल के दाग़ छुपा लूँगा चेहरे पे  मुस्कान  होगी मुखौटा एक लगा लूँगा तेरे कोमल कोमल पांव राह  में फूल बिछा दूंगा प्यारी प्यारी ग़ज़लों से अपना तुझे  बना  लूँगा मुकेश इलाहाबादी ----

आ ईश्क़ का दरिया है कूद जाते हैं

आ ईश्क़ का दरिया है कूद जाते हैं तन्हाई से तो बेहतर है डूब जाते हैं ईश्क़ का लुत्फ़ कुछ और बढ़ा लें हम तुम इक दुसरे से  रूठ जाते हैं है बारिश का मौसम और हवा ठंडी आओ टहलते हुए कुछ दूर जाते हैं बेवफा दोस्तों को याद रक्खा जाए इससे बेहतर है इनको भूल जाते हैं मुकेश इलाहबादी -----------------

मेरी ठिठोली पे

मेरी ठिठोली पे तुम्हारा 'धत्त' कह के भाग जाना जैसे, महुआ चू पड़ा हो वीरान तपती दोपहरिया में मुकेश इलाहाबादी -----------

जब कभी तुम अपनी सिसकियों में सुनोगी

जब कभी तुम अपनी सिसकियों में सुनोगी जो तुम्हारे गले में ही घुट के रह गयी और याद करोगी ऐसे वक़्त में किसका नाम याद आया था जब कभी तुम बहुत खुश रही होगी और वो खुशी किसी विशेष से शेयर करनी चाही होगी तो किसका नाम याद आया था गौर से सोचोगी तो शायद मेरा ही नाम याद आया होगा गर ये सच है तो मेरे लिए सब से बड़ा खूबसूरत सच है प्यार मुहब्बत झूठी बातें मुकेश इलाहाबादी ------------------------

कपास के फूल

चाहता हूँ तुम्हारी हँसी कपास के फूल सा खिलती है   जिसे मै हवा सा ले उड़ना  चाहता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------

उजली हथेली पे

मेरे उजली हथेली पे अपने गुलाबी होठों से लिख दो अपना नाम जिसे मै छाप दूंगा अपनी तनहा दीवार पे और पढूंगा - खल्वत में मुकेश इलाहाबादी -------------------

तुम्हारी बातों के आरोह अवरोह में

तुम्हारी बातों के आरोह अवरोह में एक संगीत है - जो बजता है अहर्निश - मेरे कानो में मुकेश इलाहाबादी --------------------

बेवज़ह दिल मेरा जलाया न कर

बेवज़ह दिल मेरा जलाया न कर बात बात पे खिलखिलाया न कर देखती नहीं मै ग़मज़दा ज़माने से तू ज़ालिम सा मुस्कुराया न कर गर तुझे मुझसे मुहब्बत नहीं तो रोज़ रोज़ तू मुझसे मिला न कर मुझको ये नाज़ो नखरे पसंद नहीं बात बात पे, प्यार जताया न कर मुझको न 'मय' पसंद न मैखाना यूँ आँखों से जाम पिलाया न कर मुकेश इलाहाबादी --------------

तुम, तनहा मुसाफिर

तुम,कहती हो  'मै, तनहा मुसाफिर मै,कहता हूँ 'मै,  सूनी और लम्बी सड़क (तुम्हे मंज़िल की तलाश है , और सड़क की कोइ मंज़िल नहीं होती ) मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------------------

संग तराश

संग तराश तुम्हे क्या पता ? पत्थर के अंदर एक ठस और बेजान मूर्ति भर नहीं थी जिसे तुमने अपनी छेनी हथौड़ी से तराशा है इस पत्थर के अंदर एक झरना भी था जो फूटना और बहना चाहता था एक मोम की गुड़िया भी थी जो धीमी -धीमी आँच में पिघलना चाहती थी और रोशनी भी देना चाहती थी खैर ! तुम पत्थर की देवी से खुश हो तो खुश रहो ओ ! मेरे संग तराश मुकेश इलाहाबादी -----------------

तीर्थ यात्रा

मेरी तुम तक पहुंचने। के लिए काफी दूरी तय करनी है एक लम्बी चढ़ाई तय करनी है आखिर तीर्थ यात्रा के लिए इतना तो करना ही होगा ओ ! मेरी देवी ओ ! मेरी आराध्य मुकेश इलाहाबादी -----

किसी दिन सुबह मै आँख खोलूं

किसी दिन सुबह मै आँख खोलूं तुम 'जाड़े की नर्म धूप सा उतर आओ खिड़की से मेरे कमरे में और बिछ जाओ बिस्तर पे और मै तम्हे नर्म -गर्म लिहाफ सा ओढ़ कर फिर से सो जाऊँ दिन भर के लिए खिड़की पे परदे डाल के (सोचो  ! ऐसा हो तो कैसा हो ? मेरी सुमी ) मुकेश इलाहाबादी -------------------------

एक समुन्दर है

मेरे अंदर एक समुन्दर है हरहराता हुआ एक सुप्तज्वाला मुखी है जो जिसके अंदर का लावा कभी फूट के नहीं बहा एक पहाड़ है दुखों का एक टिमटिमाता तारा है उम्मीदों का एक सूरज है अपने भरोसे का एक चाँद है तुम्हारी मुस्कान का यादों की आकाशगंगा है देखो तो ! मेरे अंदर पूरा ब्रम्हांड है  मुकेश इलाहाबादी ---------------

इसके पहले कि

इसके पहले कि उम्र, मेरी आँखों में मोतियाबिंद उतार दे और वे धुंधला देखने लगें तुम्हे देख लेना चाहता हूँ जी भर के - और बसा लेना चाहता हूँ आँखों में - उम्र भर के लिए इसके पहले कि याददास्त कमज़ोर हो मुझे तुम्हारा नाम याद करने में वक़्त लगे तुम्हे याद कर लेना चाहता हूँ पूरी तसल्ली से इसके पहले कि मेरे पार्किंसन से हिलते हाथ तुम्हारे स्पर्श को महसुने में असमर्थ हों तुम्हारा स्पर्श हथेलियों में क़ैद कर लेना चाहता हूँ इसके पहले कि मै विदा हो जाऊँ तुम मिल जाओ एक बार मुकेश इलाहाबादी -----------

नेट खोलता हूँ

एक ---- नेट खोलता हूँ तुम ऑन लाइन नहीं दिखती उदास हो के कुछ देर स्क्रीन को स्क्रॉल करता हूँ दो चार पोस्ट वजह - बेवज़ह लाइक करता हूँ तुम अब भी ऑन लाइन नहीं दिखी एक गहरी साँस भर के नेट ऑफ़ कर देता हूँ कुछ देर बाद फिर से ऑन करने के लिए शायद तुम्हारी डी पी के आगे हरी बत्ती जल चुकी हो शायद, दो --------- नेट खोलता हूँ तुम्हारी डी पी के आगे हरी बत्ती जल रही है मै खुश हो के तुम्हारे चैट बॉक्स में इक प्यारा सा कैप्शन उछाल देता हूँ तुम्हारी तरफ से कोई जवाब नहीं मै फिर उदास हो कर कुछ देर स्क्रीन को स्क्रॉल करता हूँ तुम ऑफ लाइन हो जाती हो या हमें ऑन लाइन देखे मुझे अपने चैट से ऑफ कर देती हो मै उदास हो कर नेट ऑफ कर देता हूँ कुछ देर बाद फिर से नेट खोलने के लिए तीन ------- मेरे बहुत सरे मैसेज का तुमने जवाब नहीं दिया अब सिर्फ तुम्हे गुड़ मॉर्निंग गुड़ इवनिंग का मेसेज भेजता हूँ इस उम्मीद से शायद किसी दिन इस हरी बत्ती से कोई प्यारा सा मैसेज 'हाँ' का मेरे लिए उछल कर बाहर आये चार ------- उसकी तमाम उम्मीदें न उम्मीदी में बदल चुकी हैं अब उसके  मेसेज ...

थोड़ा बहुत तो धड़कता है

थोड़ा  बहुत तो धड़कता है प्यार करो तो डर लगता है बैठे रहना गुपचुप गुपचुप तुझको सोचू मन करता है चंदा बादल बरखा बिजली हर मौसम सावन लगता है दुनिया के सारे सुख फीके ईश्क़ ही सब कुछ लगता है मुकेश इलाहाबादी -------

रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है

रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है फिर क्यूँ आब को तरसता है गर चाँद नहीं है तेरी आँखों में इस झील में कौन लरज़ता है तू कहती है मुझसे प्यार नहीं फिर सीने में कौन धड़कता है किसकी यादें फलक पे टंगी है सितारे सा शब भर चमकता हैं मुद्दतें हुई तुझको गए हुए पर ये दिल तेरे लिए ही ठुनकता है मुकेश इलाहाबादी ------------

अंजुरी के कटोरे में

सोचता हूँ, अपनी अंजुरी के कटोरे में तुम्हारी दूधिया हंसी समेट लूँ और, उसमे तुम्हारे होंठों का गुलाबीपन मिला कर उछाल दूँ आसमान में फिर दुनिया को गुलाबी गुलाबी देखूं मुकेश इलाहाबादी --------------------
ऊँचे ऊँचे देवदार और चिनार के दरख्तों, घनी झाड़ियों, झरनो के बीच एक मीठे पानी  की झील बहती थी बिलकुल तुम्हारी आँखों की तरह उस झील का पानी निस्तरंग बहता दिन में रात - हौले - हौले बहता झील में सुनहरी मछलियां मचलती रहती सांझ होते ही उस झील में अससमाँ से गुलाबी परिधान पहने चँदा उतर आता और झील से एक खूबसूरत जलपरी निकलती फिर दोनों देर तक क्रीड़ा करते किलोल करते उन खूबसूरत वादियों में जिसे देख आखेटक अपना आखेट करना भूल जाते वादी की गिलहरी, फुदकना छोड़ चुप हो जाती कोयल अपनी डाल पे सांस रोक बैठ जाती हिरन कुलांचे भरना छोड़ देते हवाएं बहना भूल जाती अगर बहती भी तो मलय गंध के साथ आकाश अपनी मौन स्वीकृत दे देता धरती मगन हो इस किलोल को देखती ऐसा युगों युगों से होता रहा है और शायद होता रहता किन्तु एक दिन कुछ विकास पुरुष आए इन वादियों में और उन्होंने इस वादी को और बेहतर और खूबसूरत बनाने की ठानी इसके लिए उन्हें बहुत सारे पेड़ काटने पड़े बहुत सरे झरनो को सुखाना पड़ा पर्वतों की भुजाओं और सीने पे बुलडोज़र चलाना पड़ा कई मॉल, इमारतें और सड़कें बनानी पडी लेकिन झील  की जलपरी जो प्...

उन्ही - उन्ही गलियों में अटका हुआ है

उन्ही - उन्ही गलियों में अटका हुआ है मुसाफिर, शायद राह से भटका हुआ है दरवाज़ा खोल के देखा, कोइ नही, फिर क्यूं किसी के होने का खटका हुआ है ? न वो हाँ कहती है, न  ही 'न' कहती है, दिल अजब कश्मकश में लटका हुआ है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

'कस्तूरी'

न जाने कब चुपके से रख गयी हो 'तुम' मेरे ज़ेहन की अलमारी में 'कस्तूरी' आज तक महकती है मेरी साँसे मेरी रातें मेरा दिन मुकेश इलाहाबादी ------------

उसके द्वार तक गया

वह उसके द्वार तक गया कुछ देर ठहरा कुछ सोचा फिर बरसों से बंद दरवाज़े को बिना सांकल खटकाये लौट आया अब वह सिगरेट के धुंए में गौर से देख रहा है खुद को विलीन होते हुए न जाने क्या सोचते हुए मुकेश इलाहाबादी -------------

किसी , दिन तो

किसी , दिन तो सावन से ऊब कर तुम देखोगी पतझड़ को और --- अचानक याद आ जाऊँगा 'मै' किसी दिन तो तुम देखोगी गरजते - बरसते मेघों को और तुम्हे 'मै ' याद आ जाऊँगा किसी दिन तो ........ ... फुर्सत मिलते ही तुम सोचोगी मेरे बारे में तब तक मै घुल चूका होऊँगा आकाश में फिर कभी न जमने के लिए फिर कभी न बरसने के लिए सावन भादों के मेघ सा मुकेश इलाहाबादी -------------- 

यादों के पत्ते पर

यादों के पत्ते पर तुम्हारे नाम का चराग़ जला कर वक़्त के दरिया में बहा आया हूँ देखना ये चराग़ कभी न कभी तुम तक पंहुचेगा ज़रूर मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

और रात करवट बदलते बीत जाती है

सुबह की ताज़ी हवा मुझे इंसान की तरह जगाती है किन्तु कुछ देर बाद 'मै' अपने अंदर के इंसान को मार के कुत्ते की खाल ओढ़ कर ऑफिस चल देता हूँ दिन भर अपने अधीनस्थों पे भौंकने, बॉस के आगे दुम हिलाने के बाद सांझ हाँफता हुआ घर लौटता हूँ रात कुत्ते की खाल उतार भेड़िया बन जाता हूँ बिस्तर पे मेमने का शिकार करने के लिए नींद में फिर इंसान बनना चाहता हूँ पर निगोड़े सपने बनने नहीं देते और रात करवट बदलते बीत जाती है मुकेश इलाहाबादी ------------------------
कुछ चुप्पियाँ   कुछ सिसकियाँ  कुछ चीखें  कुछ आहटें  जिन्हे हमारे बहरे कान नहीं सुनते  या फिर हलके से कुछ सुनाई भी दिया तो  करवट बदल के सो जाते हैं  अपने लिए एक हसीं सुबह का ख्वाब देखते हुए  मुकेश इलाहाबादी --------

जैसे लौट लौट आता है बसंत

तुम जाना चाहती हो ? बेशक चली जाना बस, अपने मेहंदी लगे पाँवो की छाप पायल की खनखन छोड़ जाना मेरे द्वार तुम जाना चाहती हो तो , बेशक चली जाओ पर अपनी  चाँद चकोरी चितवन गोरे - सकोरे चूड़ी भरे हाथों की छन -छन रख जाना आले पे और माथे से सरकी बिंदी चिपका जाना आईने पे और फिर - लौट आना जैसे लौट लौट आता है बसंत फिर - फिर मुकेश इलाहाबादी -----------------

तेरे ख्वाबों में उड़ रहा हूँ मै

तेरे ख्वाबों में उड़ रहा हूँ मै रूई का बादल हो गया हूँ मै आँचल का नीला आसमान चाँद - सितारा हो रहा हूँ मैं लोग खेलते  हैं तोड़  देते हैं इक खिलौना बन गया हूँ मै क्यूँ ढूंढते हो इधर - उधर ? तेरे दिल में हीतो बसा हूँ मै मुकेश इतना डसा गया हूँ ज़हर मोहरा हो गया हूँ मै मुकेश इलाहबादी ----------

मन के आँगन में

अपने मन के आँगन में सफ़ेद चौकोर पत्थरों के बीच थोड़ी कच्ची ज़मीन छोड़ रखना देखना एक दिन मै उगूँगा रजनीगंधा सा और महकूँगा तुम्हारी साँसों में मुकेश इलाहाबादी ------------

एक छत - एक बॉलकनी -एक दृश्य

एक छत - एक बॉलकनी -एक दृश्य ----------------------------------------- पहले, उसने छत पे बंधी अलगनी पे  बाल्टी में रखे धुले कपड़ों को फैलाया सूखने के लिए फिर, शैम्पू की भीनी - भीनी खुशबू से तर अपने धुले गीले बालों में बंधे तौलियो को अदा से खोल के बालों को झटका और फिर उसी तौलिये से झटक- झटक के बालों से तमाम मोतियों को छत पे बिखर जाने दिया अब वह जा चुकी है सामने की खिड़की पे एक उचटती सी अजनबी नज़र डालते हुए उसका - गुलाबी, रोंये दार, हल्का भीगा बालों की खुशबू से तर तौलिया अलगनी में शान से टंगा मुँह चिढ़ाने लगा खिड़की को खिड़की के भीतर से दो हाथ खिड़की को बंद कर के सिगरेट केश की ओर बढ़ गए मुकेश इलाहाबादी -------------

मै, सूरज सा उगूँ

मै, सूरज सा उगूँ तुम चाँदनी सा छिटक जाओ आ ! इस तरह हम तुम एक हो जाएँ आ ! हम तुम रातों दिन हो जाएँ तुम, फूल सा खिलो मै , सुगंध हो जाऊँ आ ! हम तुम गुलशन गुलशन हो जाएँ मुकेश इलाहाबादी --------------

एक दिन कुछ ऐसा करते हैं

सुनो एक दिन कुछ ऐसा करते हैं तुम अपने शैम्पू लगे बालों की जगह किसी दिन तेल चुपड़े बालों को नारंगी रिबन से कास के बाँधी गयी दो चुटिया कर के, अपने कंधे पे पुराने दुपट्टे को सजाए हुए आओ न एक बार फिर देखना चाहता हूँ तुम्हे तुम्हारे पुराने रूप में अल्हड , मासूम और अलमस्त और मै अमिताभ स्टाइल में कानो पे बाल और लम्बे कालेर की शर्ट पे बेलबाटम , आँखों पे बड़े ग्लास का चस्मा लगा के आऊं और हम दोनों देखें चोरी से शहर के सबसे पुराने पिक्चर हाल की पिछली सीट पे बैठ के कोइ फिल्म और फिर धड़कते दिल से वापस घर आयें मुकेश इलाहाबादी ---------

दिल की ज़मीन में

अपनी साँसों की खुशबू छोड़ आयी थी तुम मेरे घर जिसे मैंने 'बो' दिया था दिल की ज़मीन में फिर वक़्त के सूरज ने धूप दी यादों ने खाद पानी दिया मेरी धड़कती सांसो ने हवा दी अब - तुम्हारी साँसे रजनीगंधा सा खिल के महकाती हैं मेरी रातों को (तुम अपनी सांसो को हर जगह मत भूलना) मुकेश इलाहाबादी -----------

जमा हुआ दर्द पिघला होगा

जमा हुआ दर्द पिघला होगा दरिया यूँ ही नहीं बहा होगा कंठ उसका यूँ नहीं नीला है ज़रूर हलाहल  पिया  होगा  धुँए  की लकीर बता  रही है दिया अभी अभी बुझा होगा झूला, गोरी, कोयल उदास हैं बसंत आके चला गया होगा  मुकेश आजकल हँसता नहीं तुमने भी ये बात सुना होगा मुकेश इलाहाबादी -------------

बड़े और बहुत बड़े आसमान से एक थोड़ा पर काफी बड़ा सा आसमान ले आया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ रातरानी की ढेर सारी खुशबू से थोड़ी सी पर थोड़ी से कुछ ज़्यादा खुशबू मांग लाया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ तितली से मांग लाया हूँ दो पर जिन्हे सजा देना चाहता हूँ तुम्हारी बाँहों पे ताकि तुम देख सको थोड़े से महकते सपने और उड़ कर आ सको मेरे पास सपनो में ही सही मुकेश इलाहाबादी -----------------

बड़े और बहुत बड़े आसमान से एक थोड़ा पर काफी बड़ा सा आसमान ले आया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ रातरानी की ढेर सारी खुशबू से थोड़ी सी पर थोड़ी से कुछ ज़्यादा खुशबू मांग लाया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ तितली से मांग लाया हूँ दो पर जिन्हे सजा देना चाहता हूँ तुम्हारी बाँहों पे ताकि तुम देख सको थोड़े से महकते सपने और उड़ कर आ सको मेरे पास सपनो में ही सही मुकेश इलाहाबादी -----------------

जीवन के उत्तरार्ध मे

प्रिय। जीवन के उत्तरार्ध मे, अब जब जीवन सूर्य म्रत्यु की गोद मे समा जाने को आतुर है। तब एक बार फिर मेरे सारे भाव मुखरित हो जाना चाहते हैं जो सदैव निश्रत होते रहे हैं, मेरे मौन मे, मेरी ऑखों से, मेरे क्रिया कलापों से मेरे वयवहार से, पर शायद तुम्हे वे भाव, वे शब्द्लाहरियाँ तुम्हे वे अर्थ व आनंद नही दे पायीं। जो तुम्हारी चाहना थी। और तुम हमेशा आतुर रहीं मात्र कुछ शब्दों को सुनने को। प्रिय, ऐसा नही कि मै उस प्रेमाभिव्यिक्ति को शब्दावरण देना नही चाहता था। ऐसा नही कि मै तुम्हे अपने  बाहुपाश मे लेकर कुछ प्रेमगीत गुनगुनाना नही चाहता था। या कि ऐसा नही कि मै सावन की घटाओं मे तुम्हारे साथ किलोल करना नही चाहता था। कि, चांदनी रात मे तुम्हारे साथ नौका विहार नही करना चाहता था। लेकिन मै ही पुराने आर्दशवाद को अपने सीने से लगाये रहा। और इसके अलावा, मेरा ऐसा मानना था कि क्या मौन ह्रदय की प्रगाढ़ प्रेम की सुकुमार भावनाओं को भावषून्य शब्दों मे प्रकट करना आवष्यक है ? यदि वह ऑखों से नही पढी जा पा रही है। भावों से व्यक्त नही हो पा रही है। व्यवहार उसे नही समझा पा रहे हैं। तो ये खोखले शब्द क्या कर पायेंगे ...