सुबह की धूप


जैसे
सुबह की धूप
भर देती है
अंतरतम तक को
रोशनी से
पूरी दुनिया के लोगों के

वैसे ही
तुम्हारी
हंसी भर देती है
उजास से
उल्लास से
पूरी सृष्टि को

और
मेरे अंतरतम को

मुकेश इलाहाबादी ---

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