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Showing posts from August, 2013

दुनिया अजब झमेला है

दुनिया अजब झमेला है देखो रंग बिरंगा मेला है मिल जुल कर रह ले तू ये चार दिनो का मेला है जिसने सच को जाना है उसने हंस के खेला है आगे बढ़ने की चाहत मे कितना तो रेलम रेला है इक दिन गल जायेगा ते तन तो माटी का ढेला है मुकेष इलाहाबादी .....

दिन चढे़ तू सोता है कयूं ?

दिन चढे़ तू सोता है कयूं ? सेहत अपनी खोता है क्यू? मेहनत से काम किया कर, खुदी को तू रोता है क्यू ? गर षराब सिगरेट जहर है, फिर रोज रोज पीता है क्यूं? सच कहने की ताब रख, जुल्मो सितम ढोता है क्यूं ? जरा तनहा बैठ और सोच तू ही गलत होता है कयूं ? मुकेष इलाहाबादी ........

आत्मा अमर है

आत्मा अमर है षरीर नष्वर है संसार कुरुक्षेत्र, जीवन समर है कल क्या होगा? किसको खबर है ज्ञान ही अमृत, अज्ञान जहर है श्रद्धा से देख तू कण-2 ईष्वर है मुकेष इलाहाबादी..

फूल सा खिला कर

फूल सा खिला कर सब से मिला कर बड़ों की सेवा कर आर्षिवाद लिया कर पूजा पाठ रोजा नमाज हरदम किया कर कमाई का थोड़ा हिस्सा दान भी दिया कर गरीब दुखी व लाचार इन सब पेे दया कर फुरसत मे मुकेष की गजल तू पढा कर मुकेष इलाहाबादी ...

इक आह निकलती है दर्द सा उठता है

इक आह निकलती है दर्द सा उठता है जब भी कहीं तेरा जिक्र हुआ करता है रोषनी तो नही तीरगी ही बढ़ जाती है चरागे इष्क से लौ नही धुऑ उठता है ऑखों का समन्दर बादल बनता है फिर जज्बात बरसते हैं औ जिस्म पिघलता है जब भी तेरे इष्क की ऑज इधर आये है वजूद मेरा होकर क़तरा कतरा पिघलता है मुकेष इलाहाबादी ......................

इतना घना कुहासा है

इतना घना कुहासा है दर्द औ गम का साया है कितने पंछी प्यासे हैं ? ताल पोखरा सूखा है बेवज़ह दरिया ढूंढ रहे मीलों तक तो सहरा है थका मुसाफिर सोच रहा न तरुवर न छाया है वक़्त कभी तो बदलेगा? दिल को यही दिलासा है मुकेश इलाहाबादी -----

अभी तो शाम का झुटपुटा है

अभी तो शाम का झुटपुटा है फिर क्यूं अंधेरा इतना घना है तीरगी ही तीरगी बच गयी कि दिन का उजला छिन गया है जमी तो पहले ही बिक चुकी अब आसमॉ भी बट गया है सैकडों लोग भूख से मर गये औ अनाज गोदामो मे भरा है हमारा खून क्यूं खौलता नही सरहद पे भाई शहीद हुआ है मुकेश  इलाहाबादी ...............

ऑखों मे ये वीरानी अच्छी नही लगती

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ऑखों मे ये वीरानी अच्छी नही लगती तेरे चेहरे पे उदासी अच्छी नही लगती कि लौट आओ दिले मकॉ सूना सूना है शामो सहर वीरानी अच्छी नही लगती सुलझा दूं तेरी ये उलझी - उलझी जुल्फें ये लटें बिखरी बिखरी अच्छी नही लगती आओ फिर से जला लें चरागे मुहब्ब्त कि स्याह नागन सी तीरगी अच्छी नही लगती मुहब्ब्त भी क्या अजब शै होती है मुकेश इक पल की भी दूरी अच्छी नही लगती मुकेश इलाहाबादी .......................

कदमबोसी कर ही लेगा आपका अब ये दिल हमारा

कदमबोसी कर ही लेगा आपका अब ये दिल हमारा कलजे की ख़ाक बिछा आया हूं शहर के हर कूचे मे मुकेश   इलाहाबादी ................................

खुद ही अपना फसाना लिखा

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खुद ही अपना फसाना लिखा लिख लिख के रोये हर लफ्ज़ मे तुम याद आये रह रह के रोये हम जाके किससे कहते ? तेरा किस्सा ए बेवफाई याद करके तेरी हर बात हम घुट घुट के रोये वह तेरा मुस्कुराना बेवजह और खिलखिला के भाग जाना कि हम तेरी हर अदायें याद कर कर के रोये मेरे चेहरे की तहरीर से कहीं कोई तेरा नाम न पढ़ ले एहतियातन हम जमाने से छुप छुप के रोये मुकेश   इलाहाबादी ..........

नफस नफस मे मेरे तेरा ही नाम महकता है

नफस नफस मे मेरे तेरा ही नाम महकता है लोग समझे हैं हम गुलिस्तॉ से हो के आये हैं मुकेष इलाहाबादी.......................

कूचा ए इष्क हमने है छोडा जबसे

कूचा ए इष्क हमने है छोडा जबसे उदास रहने लगी हैं कलियॉ तबसे मुकेश   इलाहाबादी .................

करके दोस्ती लहरों के साथ

करके दोस्ती लहरों के साथ छोड दी कस्ती हवाओं के साथ सजा के बेंदी उसके माथे पे करदी जुल्फें फजाओं के साथ चंद क़तरे बचा के पलकों पे अष्क कर दिये घटाओं के साथ बोल के बादशाह के खिलाफ सर रख दिया तलवारों के साथ अंजाम को नही डरता है मुकेश आया हूं बुलंद इरादों के साथ मुकेश  इलाहाबादी ..............