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Showing posts from November, 2019

ज़िन्दगी, सत्यनारायण की कथा नहीं,

एक ------ ज़िन्दगी, सत्यनारायण की कथा नहीं, जिसे कोई ब्राह्मण देवता आ कर बाँचेंगे, जिसके सुखद अंत पे शंख बजेगा , प्रसाद बंटेगा हम खुश- खुश घर जायें ज़िंदगी तो पोथी है जिसे ख़ुद ही लिखना ख़ुद ही बांचना पड़ता है ज़िंदगी की पोथी पढ़ने के लिए ख़ुद ही जजमान और खुद ही पुरोहित बनना पड़ता है फल फूल और हवन में खुद की आहुति देनी होती है ज़िंदगी की कथा का अंत हर बार सत्यनाराण की कथा सा सुखद नहीं होता है  बहुत बार इसका अंत दुःखद ही होता है इस कथा की समाप्ति पर  शंख ध्वनि की जगह हमारे रुदन का मौन कोलाहल होता है और एक न खत्म होने वाला सन्नाटा भी हो सकता है दो ------- ईश्क, किसी कथा से कम नहीं बस, बात इतनी सी है इसे कोई पुरोहित नहीं बाँचता न कोई जजमान सुनता है इसमें तो जोड़े में से ही कभी,एक जजमान बनता है तो दूसरा पुरोहित बन जाता है फिर कभी दूसरा जजमान बनता है तो पहला पुरोहित बन जाता है और इस तरह ईश्क़ की कथा सुन के आनंदित होते हैं दो प्रेमी पर - इस कथा का अंत भी कोई ज़रूरी नहीं सत्यनारायण की कथा सा सुखद हो, बहुत बार कथाए ईश्क़ दुःखद ही होती है पर ये तो स...

रात, आँगन में चाँदनी नहीं आती

रात, आँगन में चाँदनी नहीं आती मेरे चेहरे पे अब हँसी नहीं आती मीलो फैला रेगिस्तान हो गया हूँ मेरे घर तक कोई नदी नहीं आती इस वक़्त तन्हाई के गुप्प अँधेरे में हूँ जहाँ कभी  रोशनी नहीं आती मुकेश इलाहाबादी -------------

पति, और प्रेमी के बाद

पति, और प्रेमी के बाद उसने तलाशना चाहा एक ऐसे पुरुष मित्र को जिससे वो शेयर कर सके अपने सारे भाव - विभाव सुख - दुःख , अच्छा बुरा सब कुछ और जिसकी नीव देह व स्वार्थ से परे की ईंटो से बनी हो किन्तु हर बार और हर पुरुष मित्र की आँखों में चाशनी में लिपटी लिप्सा वहशीपन देख वो उदास हो फिर से लौट गयी अपने अंदर के एकाकीपन में मित्रता की किसी भी आकांक्षा को मन की दहलीज़ पे ही छोड़ के मुकेश इलाहाबादी -----------

इंद्रधनुष देखती हुईं फूल सूंघती हुई लड़की

इंद्रधनुष देखती हुईं फूल सूंघती हुई लड़की बहुत प्रसन्न थी सागर किनारे तभी लड़के ने कहा आओ - घरौंदा बनाते हैं और खेलते हैं लड़की ने चहक के फूल फेंक दिया इंद्रधनुष देखना छोड़ खेलने लगी - बनाने लगी पूरे मन से घरौंदा अभी लड़की घरौंदा बना के सजा ही रही थी लड़के का जी ऊब गया इस खेल से उसने एक झटके से रेत् का घरौंदा तोड़ छलांग लगा दी समंदर में मछली पकड़ने और तैरने के खेल के लिए अब -- लड़की सुबुक रही है समंदर किनारे रेत् में लिथड़े फूल और इंद्रधनुष को याद कर के अपने टूटे घरौंदे के पास मुकेश इलाहाबादी ---------

सुगंध लिखता हूँ

मै सुगंध लिखता हूँ कागज़ पे तुम्हारी देह गंध उतर आती है झरना लिखता हूँ तुम्हारी हंसी बिखर जाती है आकाश लिखूं तो तुम्हारा आँचल लहरा जाता है इस तरह टुकड़े - टुकड़े मे उतर आती हो मेरे शब्दों के कैनवास मे और मै तुम्हें महसूस कर लेता हूँ, पूरा का पूरा तुम्हें, तुम्हारे पूरे वजूद के साथ मुकेश इलाहाबादी,,,,,

लड़की ! तुम प्रेम में कभी मछली मत बनना

एक ----- प्रेम में वो मछली बन गयी खुशी - खुशी तैरने लगी अपने समंदर की बाँहों में समंदर भी खुश था मछली भी लेकिन कुछ मगरमच्छों से देखा न गया वो मछली को गटक गए दो ---- प्रेम में, वो मछली बन गयी तैरने लगी खुशी - खुशी अपने समंदर की बाँहों में मछुवारे ने देखा - "इत्ती सुंदर मछली " उसने - काँटे में आटा लगाया और फेंक दिया पानी में में मछली एक ही झटके में समंदर के बहार रेत् में तड़पने लगी मछुवारा खुश हुआ लड़की ! तुम प्रेम में कभी मछली मत बनना मुकेश इलाहाबादी ------------------------

जैसे, कोई बिछा दे मखमली घास

जैसे, कोई बिछा दे मखमली घास खुरदुरी राहों में और, राही की राह हो जाए आसान बस ऐसे ही तुम हँसती हो तो बिछ जाती है रजनीगंधा की महमहाती चादर हो जाती है राहे ज़िंदगी खुशबू - खुशबू, खुशनुमा - खुशनुमा देखो ! अब ये सुन के तुम सिर्फ मुस्कुराना नहीं बल्कि खिलखिलाना ज़ोर से मुकेश इलाहाबादी ----------------

या तो ख़ुदा की ख़ुदाई से डरता हूँ

या तो ख़ुदा की ख़ुदाई से डरता हूँ या तो मै तेरी जुदाई से डरता हूँ ईश्क़ में जान जाने का ख़ौफ़ नहीं मै बेवज़ह की रुसवाई से डरता हूँ महफ़िलों में इस लिए जाता हूँ मै अपने अंदर की तनहाई से डरता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------

समेटने की नाकाम कोशिशों में लगी हूँ,

अवि, अपने को समेटने की नाकाम कोशिशों में लगी हूँ, जितना समेटती हूँ उतना ही बिखर जाती हूँ दिन में समेटती हूँ तो रात बिखर जाती हूँ रात करवटों में समेटती हूँ तो दिन में बिखर जाती हूँ सच ! अब तो उम्मीद भी छोड़ दी है खुद को समेटने की अगर कुछ टुकड़ों में ही टूटी होती तो शायद अपने आँचल में आँसुओ संग समेट लेती अगर रेत् सी ज़र्रा - ज़र्रा हो के बिखरी होती तो भी शायद अंजुरी में समेट लेती और एक मुट्ठी यादों की रेत् के सहारे ही जी लेती लेकिन, अब तो रोज़ रोज़ इतने हिस्से में टूट चुकी हूँ इतना बिखर चुकी हूँ की शायद मेरे वज़ूद के सारे हिस्से टूट टूट के शून्य में विलीन हो गए हैं - तुम्हारी ही तरह शायद , इस शून्य को भी अपनी आखों में समेट लेती पर तुम्हारी उन यादों को कैसे समेटूँ तुम्हारे शायद बिताये इतने खूबसूरत लम्हों को कैसे समेटूँ तुम्हारी सारी पर्सनल बिलोंगिंग्स को कैसे समेटूँ जिनमे तुम्हारे सपर्श की खुशबू है जिन्हे तुमने इस्तेमाल किया है चाहे वो तुम्हारी पसंदीदा कमीज हो - ट्रॉउज़र हों जूते, मोज़े - घर में पहनने वाली स्लीपर हो शेविंग किट हो तुम्हरे पहने हुए जाड़े के सूट हों सच उन्...

जया

मोबाइल पे मेसेज फ़्लैश होते ही, जया ने ओपन किया। " जया जी, जब भी आप अपने को शांत और संयत पायें।  अपने न ख़त्म होने वाले दुःख से थोड़ा भी उबर पायें तो बताइयेगा ...." पहले तो जया राज के इस छोटे से संयत और बहुत कुछ कहते हुए मेसेज को देर तक देखती रही, फिर डबडबाई आँखों और काफी प्रयास से संयत की उसकी उँगलियाँ की पैड पे चलने लगीं।  "राज जी ! मुझे नहीं पता मै कब उबर पाऊँगी अपने इस दुःख से या उबर पाऊँगी भी या नहीं और अगर उबरी भी तो क्या अपने को इतना संयत और शांत कर पाऊँगी कि आपसे बात कर सकूँ। निःसंदेह आप एक सुलझे और संयत इंसान हैं। शायद यही वजह रही आप  सोशल मीडिया से मिले इतने सारे मित्रों में से आप से ही इतना बात कर लेती थी। किन्तु पहले की बात कुछ और थी।  पर इस हादसे के बाद से मेरे माँ  या बेटा या कोई न कोई रिश्तेदार मेरे आस पास रहता ही है।  मेरी निजता के साथ साथ मेरा मोबाइल भी सार्वजानिक हो गया है।  इधर उधर कंही भी पड़ा रहता है - वैसे भी अब इसकी मुझे ज़रूरत नहीं फिलहाल।  लिहाज़ा आप बार बार मेसज न करें। यदि कभी लगा मुझे आप से बात करनी है, तो खुद ब खुद ...

सुनो ! अवि

सुनो ! अवि , मुझे नहीं मालूम तुम इस वक़्त कहाँ हो किस दुनिया में हो, किस लोक में हो पर इतना विस्वास है, तुम जहाँ कहीं भी हो अच्छे से हो, अपने से श्रेष्ट आत्माओं के बीच हो जो तुम्हे इस संसार की नस्वरता और सत्यता के बारे में बता रहे होंगे, तुम्हारे दुःख को कम कर कर के एक परम शांत अवस्था में ला चुके होंगे - हाँ, उस वक़्त ज़रूर तुम थोड़ा असहज और दुखी हो जाते होंगे जब तुम अपने लोक से इस नश्वर लोक में झांकते होंगे और अपनी नीना - ईशू और परिवार वालों को दुःखी देखते होंगे - तो मै दूसरों की तो नहीं पर अपनी तरफ़ से विस्वास दिलाती हूँ, मेरे लिए मत दुखी होना - जहाँ भी हो वहां खुश रहना - हमें ये मालूम तो नहीं पर ये भी विस्वास है कि तुम जिस लोक में हो वो लोक इस लोक इस लोक से बहुत दूर नहीं है, वो लोक भी इस लोक के साथ दूध और पानी सा घुला मिला है , बस फर्क इतना है की उस लोक और इस लोक के बीच ज़िंदगी और मौत का एक ऐसा पर्दा है जिसके गिरने के बाद आत्मा उस लोक से इस लोक को तो देख सुन और समझ पाती है - पर इस लोक  के लोग उस पर नहीं देख सुन पाते - जैसे कांच के एक कमरे में तुम हो और दुसरे कमरे में मै ...