सुमी, तुमने कभी रेगिस्तान देखा है ? रेत ही रेत। रेत के सिवा कुछ भी नही। रेत, समझती हो न ? पत्थर, जो कभी चटटान की तरह खडा रहता है, सदियों सदियों तक, पर धीरे धीरे आफताब की तपिश और बारिश व तूफान से टूट - टूट कर रेजा - रेजा होकर बिखर जाता है। तब वही पत्थर रेत का ढेर कहलाता है, और जब पूरा का पूरा पहाड़ रेजा - रेजा बिखर जाता है, तो वह रेगिस्तान कहलाता है। उसी रेगिस्तान को कभी गौर से देखना, जो दिन में आग सा दहकता और रात में बर्फ सा ठंड़ा होता है। जिसके सीने पर मीलों तक सन्नाटा पसरा रहता है, मौत सा गहरा सन्नाटा। जिसमें साथ देने के लिये पहाड़ों कि तरह चीड़ व चिनार के दरख्त नही होते। खूबसूरत लहलहाते फूल के गुच्छे नही होते। दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाले ठंडे़ पानी के चष्में नही होते। झील व कलकल करती नदियां नही होती। वहां जंगल में नाचने वाले मोर और कूकने वाली कोयल भी नही होती। शेर व चीता जैसे चिंघाड़ने वाले जानवर भी नही होते। यहां तक कि मासूस शावक व फुदकती हुयी गिलहरी भी नही होती। और ,,,,,, न ही होती है मीलों तक एक के पीछे एक कतार से चलने वाली चींटियां। ऐसा ही एक रेगिस्तान मेरे अंदर भी फैेला है। जि...