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आवारा फितरत को लगाम दे दूँ

!!अर्ज़ किया है !! आवारा फितरत को लगाम दे दूँ तुम्हारे जिम्मे ये काम दे दूं बहुत उड़ चुका खलाओं में अब तक जिस्म को थोडा आराम दे दूं मै, फैसला कब तक  मुल्तवी  रक्ख्नूं आ, आज इसे मुहब्बत नाम दे दूं, बहुत तिश्न्नालब है मुसाफिर, कहो तो तुम्हारे  लबों से एक जाम दे दूं
नोट --- यह रोजनामचा उनके लिये कदापि नही है जो सडी गली मान्यताओं के हिमायती हैं। जो अपनी खाल से बाहर नही निकलना चाहते। जो पुराने आदर्शवाद  के खंडहर को ही सीने से चिपकाये रखना चाहते हैं। जो हर चीज मे मीन मेख निकालने के आदी हैं। यह रोजनामचा उनके लिये है। जो जिंदगी से पूरी तरह बोर हो चुके हैं जो इस बोर हो गयी जिंदगी को पूरा मजा ले ले के जीने की तमन्ना रखते है। जो जिंदगी को उसकी पूरी संर्म्पूणता के साथ जीने की चाहत रखते हैं। जो संकीणता के दायरे से बहुत बाहर जा चुके है। विशेष -- जिस तरह शाश्त्रीय  संगीत गायक एक ही रागनी को कई कई तरीके से गाता          है। उसी  तरह इस रोजनामचे मे जीवन के थोडे से अनुभव को, एक ही अनुभव  को         कई कई तरीके से कहने की कोशिश  की है।       अस्तु       मुकेश  श्रीवास्तव 30.10.05 बैठा रहूं लेटा  रहूं करवट क्या फर्क  पडेगा पीठ का र्दद तो फिर भी रहेगा  कूबड उग...