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Showing posts from February, 2017

जब, तुम ठुनकते हुए जब नाराज़ होती हो --

जब, तुम ठुनकते हुए जब नाराज़ होती हो हमें मालूम है तब तुम लाड़ में होती हो जब कभी तुम चुप चाप होती हो हमें मालूम होता है अंदर ही अंदर कोई दर्द पीती रहती हो हमें मालूम होता है, तुम कब दर्द में होती हो तुम कब प्यार में होती हो गर नहीं मालूम तो ये तुम किसके प्यार में होती हो ? सुमि !!! मुकेश इलाहाबादी -------- नाराज़ होती हो हमें मालूम है तब तुम लाड़ में होती हो जब कभी तुम चुप चाप होती हो हमें मालूम होता है अंदर ही अंदर कोई दर्द पीती रहती हो हमें मालूम होता है, तुम कब दर्द में होती हो तुम कब प्यार में होती हो गर नहीं मालूम तो ये तुम किसके प्यार में होती हो ? सुमि !!! मुकेश इलाहाबादी --------

सलीके से मिले तमीज से मिले

सलीके से मिले तमीज से मिले सभी, झूठ  के लिबास में मिले हँसे भी सभी, खिलखिलाये भी वे दिल नहीं,जिस्म ले के मिले जानता हूँ कोई काम न आएगा फिर भी इक उम्मीद ले के मिले वो भी प्यासा हम भी प्यासे थे हम दोनों नदी के किनारे मिले निकले तो थे, रोशनी  के लिए मगर हमें अँधेरे ही अँधेरे मिले मुकेश इलाहाबादी ------------

हक़ से कोई मुझसे रूठे तो

हक़  से  कोई  मुझसे रूठे तो टूट कर कोई मुझको चाहे तो नाज़ो - नखरे उठा मैं तो लूँ पहले मुझको अपना बोले तो खुशबू -  खुशबू हवा बनूँ पर कोई मुझ संग संग डोले तो गीत ग़ज़ल नज़्म निछावर पहले मेरे संग कोई गाये तो मुकेश इलाहाबादी -----------  

पानी रेत् में तब्दील हुआ

पानी रेत् में तब्दील हुआ तुम्हारे जाने के बाद हुआ चन्द लम्हे की मुलाकात शह्र में चर्चा ए आम हुआ तुम मुझसे मिलने आओ  ऐसा सिर्फ इक बार हुआ गले लगने को कहा,क्यूँ   चेहरा हया से लाल हुआ इक दर्द था मेरे सीने में,  अब जा के आराम हुआ मुकेश इलाहाबादी -------

तुम्हारी, नाक की

तुम्हारी, नाक की लौंग चमकती है ध्रुव तारा सा मेरे जीवन के उत्तर में मुकेश इलाहाबादी ---

तू चाँद भी तो नहीं

अगर तू इक खूबसूरत ख़ाब है तो ख्वाब ही रह अगर, तू हकीकत है तो, मिलने तो आ मुकेश इलाहाबादी ------- तू चाँद भी तो नहीं मैं, फ़लक़ तक उड़ूँ और पा लूँ , तुझे तू , ख्वाब भी नहीं मैं , आँखें बंद करूं पलकों में तू आ बसे तू , झरना भी नहीं कि बहे तू मेरे पर्वत से सीने पे यहाँ तक कि तू बादल भी नहीं कि मैं धरती बन जाऊँ और तू बरसे - झम- झम - झम मैँ तो हारा, अब ! तू ही बता तू क्या है? मुकेश इल्लाहाबदी ------------

तुम आते हो तो आता है बंसत

तुम आते हो तो आता है बंसत वर्ना जाने कहाँ रहता है बसंत मस्ती, फूल, खुशबू, झूला संग तेरी आँखों  में  देखा  है बसंत तितली भौंरा चिड़िया बुलबुल कितना तो बतियाता है बसंत जब जब तुम लहराओ आँचल तुझसे मिल, इठलाता है बसंत तेरी झील सी नीली आँखों  में मुकेश ने लहराते देखा है बसंत मुकेश इल्लाहाबदी ------------

मेरी आँखों की झील में तेरी तस्वीर

मेरी आँखों की  झील में तेरी तस्वीर महताब पानी में लरज़ता हुआ देख यूँ तो मैं उड़ता हुआ बादल आवारा कभी अपनी बाँहों में सिमटता देख गज़रा हूँ अपने गेसुओं में सजा कर तू फिर आईने में अपना चेहरा देख

आँख में आँसू आये, बहुत

आँख में आँसू आये, बहुत  मगर हम मुस्कुराये बहुत  तुम्हारा ज़िक्र छिड़ गया  और फिर हम रोये बहुत  रात मुस्कुराता चाँद देखा  फिर तुम याद आये बहुत  दर्द ने बयाँ कर दिया वर्ना  ज़ख्म हमने छुपाये बहुत  हया ने कुछ कहने न दिया  बाद में हम पछताये बहुत  मुकेश इलाहाबादी --------

दिले गुलशन उजाड़ के बिलखता हुआ देख

दिले  गुलशन उजाड़ के बिलखता हुआ देख तेरी यही तमन्ना है तो मुझे रोता हुआ देख अगर तू  पत्थर है तो, इक बार छू ले मुझको मुझे काँच सा छन्न - छन्न टूटता हुआ देख सोचता हूँ  मैं भी, इक दिन सूरज बन जाऊँ तू ज़मी पे रहके, मुझको सुलगता हुआ देख इक लम्हे को सही बेनक़ाब झरोखे पे तो आ राह चलते हुए मुसाफिर को रुकता हुआ देख मेरा वज़ूद फूलों की सिफ़त रखता है मुकेश मसल दे पंखुरी - पंखुरी बिखरता हुआ देख मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

इसी बात का गुनाहगार है

इसी बात का गुनाहगार है  दिल  तेरा ही तलबगार है  बाहर - बाहर सर्द दिखेगा  ये दिल अंदर से अंगार है  मुकेश इलाहाबादी -------

रात का अँधेरा बटोर लाया

रात का अँधेरा बटोर लाया  अपना  उजाला  बाँट आया  ये और बात मैं ग़मज़दा था  बज़्म में हमेशा मुस्कुराया  जिस्म पत्थर हुआ तो क्या  दिल में अपने गुल खिलाया   बुलाया तो मैंने कई बार था  तूही कभी मिलने नहीं आया  मुकेश मैं कोई चाँद तो नहीं  चांदनी मगर हरदम लुटाया   मुकेश इलाहाबादी ---------

अहमक हूँ बेवजह फिरता हूँ

अहमक हूँ बेवजह फिरता हूँ   अंधेरी रात में सूरज ढूंढता हूँ  भीड़ अब अच्छी नहीं लगती  अपने में ही सिमटा रहता हूँ  जानता हूँ  तू जवाब न देगी,  तुझे ख़त फिर भी लिखता हूँ  फ़ना हो के फूल सा महकूंगा  तू देख लेना मैं सच कहता हूँ  किस्सागोई मुझे आती नहीं,  बातें सारी ग़ज़ल में कहता हूँ  मुकेश इलाहाबादी ---------

गुल ,गुलदश्ता या कि फिर चाँद सितारा ले आऊँ

गुल ,गुलदश्ता या कि फिर चाँद सितारा ले आऊँ उलझन है क्या पहनूं जब मैं तुझसे मिलने आऊँ   हुआ इंतज़ार का इक - इक पल, सदी से बढ़ कर तुझसे मिलने की खातिर उड़न खटोला से आऊँ ? सुन ! सांझ की बेला नदी किनारे मिलने आ जा या  कह दे तो, मैं तुझसे मिलने डोली ले के आऊँ? मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

यादों की मुंडेर पे

आँख खुलते ही यादों की मुंडेर पे चहचहाने लगती है तुम्हारे नाम की चिड़िया और फिर दिन भर फुर्र- फुर्र उड़ने के बाद साँझ होते ही अपने पंखो पे चोंच रख के सो जाती है एक बार फिर चहचहाने के लिए सुबह होते ही यादों की मुंडेर पे तुम्हारे नाम की चिड़िया सुमी, के लिए मुकेश इलाहाबादी -----

लोग हमसे पूँछते हैं तुम इत्र सा महकते कैसे हो ?

लोग हमसे पूँछते हैं तुम इत्र सा महकते कैसे हो ? ज़माने को कैसे बताऊँ आप मेरी साँसों में बसते हो मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

जैसे कोई मुझको आवाज़ देता है

जैसे कोई मुझको आवाज़ देता है मुड़ के देखूँ तो कोई नहीं होता है सोचता हूँ मैं भी बेवफा हो जाऊँ दिल को जाने कौन रोक लेता है कई बार मैंने उजाले को पकड़ा पर मुट्ठी खोलूँ तो जुगनू होता है मुकेश खुद से ख़ुद के आँसू पोंछ किसको कौन तसल्ली देता है ? मुकेश इलाहाबादी ---------------

एक लघु कथा

एक लघु कथा --------------- इक अदृश्य पुल के नीचे इक खामोश दरिया बहता रहा बहुत दिनों तक आखिर एक दिन, नदी सूख गयी पुल भी टूट गया सुना है ! अब वहां रेत् ही रेत् है मुकेश इलाहाबादी -------

भले ही न दे मुझको कुछ भी मौला

भले ही न दे मुझको कुछ भी मौला सबको दे ज़हान भर के खुशी मौला रहे क्यूँ हर सिम्त अँधेरा ही अँधेरा बिखरा दे तू हर तरफ चांदनी मौला मुकेश, जलता हुआ जिस्म है मेरा मुझको  दे बर्फ की इक नदी मौला मुकेश इलाहाबादी ----------------

तमाम रस्ते थे मेरे ज़ानिब मगर

तमाम रस्ते थे मेरे ज़ानिब मगर रुके थे राह में, तेरी खातिर  मगर कि जाने कब ख्वाब में तू जा जाये कुछ यही सोच, न सोये फिर मगर जनता हूँ तेरी सोच में मैं हूँ ही नहीं मेरी रग रग में शामिल है तू मगर मुकेश इलाहाबादी ------------------

यूँ तो हज़ार ग़म हैं बताने को

यूँ  तो हज़ार ग़म हैं बताने को  वजहें और भी हैं मुस्कुराने को  बहुत दूर से आया हूँ,  तुझको   अपना दर्दों - ग़म सुनाने को  इक दिन तो मिलने  आ जाओं  ढेरों बातें हैं  तुमको  सुनाने को   सावन भादों के बादल हो,तुम    आ, दिल की आग बुझाने को  मुकेश इलाहाबादी -----------

अँधेरा तो तैयार बैठा है, मिटने को

अँधेरा तो तैयार बैठा है, मिटने को कोई तैयार ही नहीं सूरज बनने को तमाम दरिया बह उठेंगे सहारा में इक हिमालय तो हो पिघलने को ग़र चाहते हो तिशनगी मिट जाए राज़ी तो हो, बादल बन, बरसने को कबीर यूँ  ही नहीं बन जाता कोई ? पहले हिम्मत तो हो घर फूंकने को ज़माना इक दिन में बदल जायेगा मुकेश लोग तो राज़ी हों बदलने को मुकेश इलाहाबादी ------------------