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Showing posts from July, 2013

बैठी है उदासी देर से

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बैठी है उदासी देर से ओढ़े खामोषी देर से रोषनी के इन्तजार मे फैली है तीरगी देर से बादलों के हिजाब मे छुपी है चांदनी देर से प्रिय के वियोग मे गोरी बैठी है अनमनी देर से उदास ऑखों मे मुकेष ठहरी है नमी देर से मुकेष इलाहाबादी ....

सजा जुर्म ए खुददारी सहे जाता हूं

सजा जुर्म ए खुददारी सहे जाता हूं जमाने मे सबसे जुदा हुए जाता हूं मुहब्बत इमानदारी मेहनत उसूल है इन उसूलों को लिये जिये जाता हूं रुह तडपती है मुहब्बत की खातिर और आग का दरिया पिये जाता हूं जिस्म मे जोष औ नरमी रवां थी अब सारा लहू तेजाब हुऐ जाता है गर इन्सानियत न सुधरी तो देखना कयामत आयेगी जरुर कहे जाता हूं मुकेष इलाहाबादी ...................

चांदनी सा उजाला ले के बैठे हैं

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चांदनी सा उजाला ले के बैठे हैं अपने महबूब के पहलू मे बैठे हैं आज मैखाने हम न जायेंगे दोस्तों कि हम जाम ए लब पी के बैठे हैं फरिस्ते भी आयें तो कह दो कि, अभी हम दिलेजॉ को लेके बैठे हैं गुले गुलशन ले के क्या करेंगे ? कि खजाना ऐ खुष्बू ले के बैठे हैं चॉद निकले न निकले उसकी मर्जी हम तो अपना चॉद ले के बैठे हैं मुकेश  इलाहाबादी .................

जिंदगी गुजर रही है मैखानो मे

जिंदगी गुजर रही है मैखानो मे हैं अश्क मेरे ढल रहे पैमानो मे दवा ऐ इश्क ढूंढता फिर रहा हूं इन चकमक दकमक दुकानो मे इक जंगल छुपा है मेरी ऑखों मे क्यूं दूर जा रहे हो वियाबानो मे तुम बेकार ढूंढ रहे हो इन्सानो को मुर्दे रहा करते हैं इन मकानो मे जो खिलखिलाती रही धूप दिन भर शाम से उदास बैठी है दालानों मे मुकेश  इलाहाबादी .................

पत्थर ही सही हमको छू के तो देखा होता

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    पत्थर ही सही हमको छू के तो देखा होता मोम न बन गये होते हो कहा होता ???? मुकेष इलाहाबादी ....................... —

हुस्न खुदा की नेमत है इसपे इतना इतराना क्या ?

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हुस्न खुदा की नेमत है इसपे इतना इतराना क्या ? जरा जरा सी बात पे इस तरह रुठ जाना कया ? दोस्ती की है तो थोडा दिल भी बडा रखिये जनाब हर किसी की हर बात पे तंग नजर रखना क्या ? कोई जरुरी तो नही कि हर इन्सान गलत ही हो,, हर शख्श,हर रिष्ते को इक तराजू मे तौलना क्या ? फिर मुकेश तो अलग किस्म का इन्सान था दोस्त उसे भी तुम्हारा इस तरह बिन बात छोड जाना क्या? मुकेश  इलाहाबादी ..................

एक दिन मै अपने दिले आइना से

एक दिन मै अपने दिले आइना से रुबरु हुआ मेरे एक नही कई कई रुप हैं महसूस हुआ झूठा चोर आलसी स्वार्थी के साथ साथ बाहर से लेकर अंदर तक गंदा भी हू मालूम हुआ मैने घबरा कर अपने मुह को पोछा बालों को कंघी किया और अपने को कई कई एंगल से देखने लगा दिले आइना हंसने लगा जिस्म चमकाने से रुह नही चमकती एंगल बदलने से सच नही बदलते मै कुछ शरमा गया कुछ और ज्यादा घबरा गया दिले आइना पे परदा लगा दिया अब मै अपने नही दूसरों के आइने मे देखता हूं और अपना काम चला लेता हूं मुकेश इलाहाबादी ..................

बंद सीलिंग फैन

बंद सीलिंग फैन  की पंखुडी पे बैठी चिडिया को देखती है  टुकुर टुकुर,, चिडिया कुछ देर यूं ही झूलेगी, फिर  कमरे का चक्कर लगा के  उड जायेगी वातायनो से  अनन्त आकाश मे और,  वह फिर रह जायेगी सुनती हुयी कमरे की खामोशी  सनन सनन  मुकेश इलाहाबादी .....

अपनी हाथ की लकीरों मे हमे ढूंढते हैं

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!!अपनी हाथ की लकीरों मे हमे ढूंढते हैं,,!! !!उन्हे क्या पता हम उनकी रुह मे बसे हैं!! मुकेश  इलाहाबादी..........................

दिन दोपहरी या रात नही देखती

दिन दोपहरी या रात नही देखती अब ऑखें मेरी ख्वाब नही देखती देह थक के चूर होती है तो नींद जमीन या टूटी खाट नही देखती मौत आती है तो आ ही जाती है मौत धूप या बरसात नही देखती प्रक्रित जब इंषा से खफा होती है महल हो या टूटा छप्पर नही देखती इंषान मेहनत करने पर आये तो किस्मत हाथ की लकीर नही देखती मुकेष इलाहाबादी ..............

हम मीर के घर गये मीर न मिला

हम मीर के घर गये मीर न मिला ग़ालिब भी अपने घर से थे लापता गजल की जगह लिख रहे हैं हजल मुकेष तुम्हे मुकम्मल उस्ताद न मिला मुकेष इलाहाबादी .................

वो तो मेरी सूरत देख कर मुड़ गया पत्थर

वो तो मेरी सूरत देख कर मुड़ गया पत्थर उसने तो निशाना साध कर मारा था पत्थर धूप पानी और हजारों चोट सह गया पत्थर आ करके तेरे पहलू मे मोम हो गया पत्थर जर्रा जर्रा टूट कर है सहरा हो गया पत्थर देख इन्सानियत शर्मिन्दा हो गया पत्थर आदम को पहला घर गुफा था दे गया पत्थर खुदा जब सामने आया बुत बन गया पत्त्थर भटकने से बचाता यही बनके मील का पत्थर अपना सीना चीर के दरिया बहा गया पत्थर अब कॉच के घर बना इंसा भूल गया पत्थर अब आदम कांच के घर पे फेंकता है पत्थर मुकेश इलाहाबादी ........................

बिन चॉद सितारों का

बिन चॉद सितारों का आसमॉ देखते हैं ख्वाब मे भी खुद को   तन्हा देखते हैंछोड़ के गये हो जब से तुम ये घर कभी सूना ऑगन कभी सूनी दालान दालान देखते हैं कभी अरगनी पे उदास चुनरी तो कभी खाली आईना देखते हैं रसोंई मे पडे चुपचाप बर्तनो को देख्ता हैं तो कभी बिस्तर पे बिन सलवटों की चादर देखते हैं जरा सी आहट हो तो लगे कि तुम आयी हो फिर छत पे जा के सूनी छत से सड़क पे दूर तक, हम यहां से वहां तक देखते हैं जब से छोड के गये हो तुम हम तुम्हे न जाने कहां कहां देखते हैं कभी सूना घर तो कभी सूना ऑगन देखते है ख्वाब मे भी आजकल खुद को तनहा देखते हैं मुकेश इलाहाबादी ....

बादल भी तेरे शहर मे थम थम के बरसते हैं,,

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बादल भी तेरे शहर मे थम थम के बरसते हैं,, जो तुम अपने गीले गेसू रह रह के झटकती हो मुकेश  इलाहाबादी ......................

रह रह के सीने मे टीस ये उभर आती है

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रह रह के सीने मे टीस ये उभर आती है वो हमारे फन के तो कायल हैं,हमारे नही मुकेष इलाहाबादी ....................

हमारे ही सितारे गर्दिश मे थे, वर्ना

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    हमारे ही सितारे गर्दिश मे थे, वर्ना लोग हम पे यूं ही उंगलियां न उठाते मुकेश इलाहाबादी ..............

जज्बा औ हौसला बनाये रखिये

जज्बा औ हौसला बनाये रखिये दरिया ऐ मुहब्बत बहाये रखिये जमाना आज नही तो कल बदलेगा मशाल ऐ इन्कलाब जलाए रखिये मानता हूं दौर बहुत कठिन है पर थोडी तो इन्सानियत बचाऐ रखिए जब तक सच्चा हमदर्द न मिले तो ग़म अपना सबसे छुपाये रखिये पेड़ औ पौधे जमीन के जेवर हैं  इस मॉ के गहने बचाए रखिये मुकेश  इलाहाबादी ................

लब पे कुरान लिये फिरते हैं

लब पे कुरान लिये फिरते हैं दिल मे दुकान लिये फिरते हैं रोज कसम खाते हैं गीता की हाथों मे ईमान लिये फिरते हैं सत्य अहिंसा प्रेम की बाते हैं तीर औ कमान लिये फिरते हैं षिर छुपाने के इक छत चाहिये तमन्ना ऐ मकान लिये फिरते हैं गरीबी न सही गरीब मिटा दो हुक्मरान फरमान लिये फिरते हैं मुकेष इलाहाबादी ..............

गोरी पनघट पर आओ तुम

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गोरी पनघट पर आओ तुम दरिया हूं भर ले जाओ तुम चॉद सितारा बन चमका हूं आंगन मे आ के नाचो तुम बनके फूल मोगरा महका हूं गूंथ के गजरा सजा लो तुम प्रिय सावन का मै झूला हूं अब प्रेम पींग बढा लो तुम  प्रेम नगीना बन के आया हूं कंठ हार मे जडवा लो तुम मुकेष इलाहाबादी ...........

तुम भी अजब यार लगते हो

तुम भी अजब यार लगते हो मुहब्बत के बीमार लगते हो किसी के ग़म मे हो शायद ? उजडे से बरखुरदार लगते हो बडे अपनेपन से बात करते हो तुम इंसान तमीजदार लगते हो रिश्तों मे फासला भी रखते हो मियॉ बडें दुनियादार लगते हो मुकेश जमाना तुमसे भीहै खफा तुम सच के तरफदार लगते हो मुकेश  इलाहाबादी .............

यादों को बिखेर के बैठा हूं

यादों को बिखेर के बैठा हूं अपने को समेट के बैठा हूं चॉद हमसे बेवजह खफा है अब अंधेरा लपेट के बैठा हूं पैरों की जमीन न खिसके दरो दीवार टेक के बैठा हूं न जाने कौन डंक मार दे जगह खूब देख के बैठा हूं लोग सूरज लिये फिरते हैं अपनी छांह छेक के बैठा हूं मुकेष इलाहाबादी ........

धूप मे तपन है

धूप मे तपन है चुप सा चमन है खुदगर्ज जहां है अपने मे मगन है धुऑ ही धुऑ है तभी तो घुटन है सभी परॆशान  हैं ये कैसा चमन है तुम्हारे शहर मे झूठ का चलन है मुकेश इलाहाबादी ..

रोशनी कम होती जा रही है

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रोशनी कम होती जा रही है परछाइयां बढती जा रही हैं विष्वास और प्रेम की नदी हर रोज सूखती जा रही है यादों ने जोड़ रखा था तुमसे वह कडी भी टूटती जा रही है विरह यामिनी सौत बन गयी प्रेम की लडी टूटती जा रही है तुम्हारे वियोग मे सखी देह रात दिन गलती जा रही है मुकेश इलाहाबादी ............

हो सके तो सच की निगाहों से देखना

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हो सके तो सच की निगाहों से देखना झूठे इल्जामात से परदा हटा के देखना तुम्ही मुंसिफ तुम्ही मुददा तुम्ही मुददई मेरे सबूतों को मददेनजर रखके देखना सिर्फ इतनी इल्तजा है आप मुहब्ब्त को गुनाहों की फेहरिस्त से हटा के दखना मुकेष इलाहाबादी .....................

रिश्तों की गुत्थी सुलझाउं कैसे ?

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  रिश्तों की गुत्थी सुलझाउं कैसे ? रुठ गया है मेरा यार मनाऊँ कैसे ? अब के बरस बनवाना था झुमका,, इस महंगाई मे वादा निभाऊं कैसे दर्द ही दर्द बह रहा है जिगर मे,, दर्दे दरिया के पार जाऊं कैसे ? दश्त है तीरगी है औ राह मे काटे अब तू ही बता तेरे दर आऊँ कैसे फैसला दे रहे हो बिना कुछ पूछे,, अपनी बेगुनाही बताउं मै कैसे ? मुकेश  इलाहाबादी .................

इन दरो दीवारों को तुम घर कहते हो

इन दरो दीवारों को तुम घर कहते हो हाथ की लकीरों को मुकददर कहते हो कयूं उदास ऑखों का पानी नही दिखता तुम न जाने किसको समन्दर कहते हो ? अजनबी की तरह रहता रहा उम्र भर तुम तो उसको भी हमसफर कहते हो कल भी सरे आम कली मसली गयी तुम इस हादसे को भी खबर कहते हो पिला रहा हूं तुम्हे जाम ऐ मुहब्बत इस आब ए हयात को तुम जहर कहते हो मुकेष इलाहाबादी ....................

अपना किरदार बदल दूं क्या ?

अपना किरदार बदल दूं क्या ? इश्क ऐ व्यापार बदल दूं क्या ? तू इजहारे मुहब्ब्त करती नही अपना घर बार बदल दूं क्या ? अपनी बाहों की माला बना के ये नौलखा हार बदल दूं क्या ? तुझे खुश  करने रखने की खातिर बात और व्यवहार बदल दूं  क्या ? लोग होली दिवाली भी खुश नही मुकेश सारे त्यौहार बदल दूं क्या ? तुझे खुष करने रखने की खातिर बात और व्यवहार बदल दूं क्या ? मुकेश  इलाहाबादी ...............

रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं

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रात पूनम की इल्तजा मे अमावश ले के बैठे हैं भूल बैठा चॉद कि हम इक आस ले के बैठे हैं कभी तो चस्मा ऐ मुहब्बत उनके दिल मे फूटेगा सदियों से इसी सहरा मे हम प्यास लेके बैठे हैं मुकेश  इलाहाबादी ...............................

गर उनकी यादें भी खत की मानिंद होतीं तो लौटा दिये होते

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    गर उनकी यादें भी खत  की मानिंद होतीं तो लौटा दिये होते कि मुकेश अब उनकी ये अमानत हमासे सम्हाली नही जाती मुकेश  इलाहाबादी.........................................

रह रह के धूप छांह आती रही

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  रह रह के धूप छांह आती रही चिलमन से वह झांक जाती रही दरिया के साहिल पे बैठा हूं चुप लहरें आती रहीं और जाती रही जब जब वक्त ने स्याही फैलायी हंसी उसकी चॉदनी फैलाती रही यौवन को चुनर मे छुपाती रही औ कांटो से दामन बचाती रही आदत से भलेही शरमीली है वो गजल पे मेरी  मुस्कुराती  रही मुकेश  इलाहाबादी ............

रह रह के धूप छांह आती रही

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  रह रह के धूप छांह आती रही चिलमन से वह झांक जाती रही दरिया के साहिल पे बैठा हूं चुप लहरें आती रहीं और जाती रही जब जब वक्त ने स्याही फैलायी हंसी उसकी चॉदनी फैलाती रही मुकेष इलाहाबादी ............

जला के खाक कर दिया जमाने को तेरे जलवों ने

जला के खाक कर दिया जमाने को तेरे जलवों ने अब कहते हो ‘कि हम इसपे चल के देखेंगे’ मुकेष इलाहाबादी ..............................

धूल मिटटी फांका मस्ती मेरे हिस्से मे

बटवारा .............................. धूल मिटटी फांका मस्ती मेरे हिस्से मे ऐषो आराम मौज मस्ती तेरे हिस्से मे बाढ सूखा बैंक का कर्जा मेरे हिस्से मे है पैसा कुर्शी बंगला गाडी तेरे हिस्से मे केवल लाठी और लंगोटी मेरे हिस्से मे क्यूं खादी औ गांधी टोपी तेरे हिस्से मे मुकेश  इलाहाबादी .................

शबनमी अश्क ले कर रात रोती रही

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  शबनमी  अश्क ले कर रात रोती रही साथ मेरे घरकी दरो दीवार रोती रही   शानो शौकत,ऐषो आराम सब कुछ था जिंदगी किसी की याद लेकर रोती रही हवाओं मे नमी इस बात की गवाह है चांदनी शब भर सिसक कर रोती रही दहषत गर्द चैन ओ अमन लॅट ले गये खौफजदा बस्ती शामो सहर रोती रही तुम्हारे सामने चुप चुप रहा करती थी बाद मे तुम्हारा नाम लेकर रोती रही मुकेश  इलाहाबादी ....................

तेरी ऑखों, ने तेरी बातों ने, तेरे गोरे गालों ने और तेरी इन अदाओं ने,,

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  तेरी ऑखों, ने तेरी बातों ने, तेरे गोरे गालों ने और तेरी इन अदाओं ने,, है किया मजबूर कि न चाह के भी खो जाऊं तेरी इन महकती सांसो मे तेरी यादों ने तेरी हंसी ने तेरी खुशबू ने तेरे संग संग बिताये लमहों ने है किया मजबूर कि न चाह के भी मै खो जाऊं इन तनहा बियाबानो मे मुकेश  इलाहाबादी ---------------------------------------------------------------

हो गया है दिल जिददी, मानता ही नही

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हो गया है दिल जिददी, मानता ही नही सिर्फ वही चॉद चाहिये या कुछ भी नही मुकेष इलाहाबादी .....................

जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें

जिंदगी तुझे अब ढूंढने कंहा जायें अजनबी शहर है घूमने कहां जायें समन्दर,झील,दरिया सब उथले हैं ऑख बिन पानी डूबने कहां जायें तुम भी रहते हो खफा, मनाते नही छोड़ कर तुम्हे हम रुठने कहां जायें सारे सावन विदा हो गये, तुमने भी बाहें सिकोड ली है झूलने कहां जायें वो अलग दौर था पी के बहकने का अब पी भी लें तो झूमने कहां जायें मुकेश  इलाहाबादी .................

मुददतों बाद होश मे घर गया

मुददतों बाद होश मे घर गया  देख तन्हा घर दिल भर गया  फूल ने प्यार से क्या छू लिया? दिल मेरा पत्थर था संवर गया निस्तरंग स्वच्छ जल देख कर चॉद झील की गोद मे उतर गया  देख कर छत पे तुझे मुसाफिर भूल के मंजिल वहीं ठहर गया था हमारा प्यार रेत का घरौंदा पा हवा का झोंका बिखर गया मुकेश  इलाहाबादी ..............

कुछ नये दरख्त लगाओ गुलशन मे

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  कुछ नये दरख्त लगाओ गुलशन मे कि  पुराने  पेड  अब फल देते नही,, वादों की खेती उगाना बंद कीजिये सिर्फ नारों से अब पेट भरते नही  MUKESH ALLAHABAADEE

मिस कॉल करके छोड़ दिया करती है लैला

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  मिस कॉल करके छोड़ दिया करती है लैला कॉल बैक न मिले तो गुंस्सा होती है लैला सिर्फ चैट और फोन पे बात करती है लैला मिलने की बात करो तो मुकर जाती है लैला नक़ाब को सजा के रख के अलमारी मे अब जींस टॉप और कॅप्री पहन घूम रही है लैला मीरा और राधा बनने का वो वक्त अब गया हरएक लड़की आजकल की बन रही है लैला लड़के भी आजकल के उस तरह के मजनू नही साथ मे उनके एक नही दर्जनो घूम रही हैं लैला मुकेष इलाहाबादी .....................

रोज तेरा इन्तजार होता है

रोज तेरा इन्तजार होता है रोज दिल उदास होता है समन्दर के बीच टापू मै इक पन्छी तन्हा रोता है दिल बहलता ही नही जब कोई अपना दूर होता है रात की स्याही मे लिपट चॉद कितना उजला होता है धूप मे तब कर देखो तो पसीना भी मोती होता है मुकेष इलाहाबादी ........

उम्र लगा दी ख्वाब सजाने मे

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  उम्र लगा दी ख्वाब सजाने मे इक लम्हा लगा बिखर जाने मे कासिद अब तक संदेशा  न लाया शायद कुछ वक्त लगा हो मनाने मे   अब जो चंद उखडी साँसे बची है तुमने बहुत देर लगा दी आने मे ग़म मे तो सभी संजीदा होते हैं बहुत मुस्किल  है मुस्कुराने मे जिक्रे यार हमसे अब न कीजिये बहुत वक्त लगा है उसे भुलाने मे मुकेश  इलाहाबादी ..............

शाख से टूट कर पहले तो खुश हुआ पत्ता

शाख से टूट कर पहले तो खुश हुआ पत्ता कुछ दूर उडता रहा फिर सूख गया पत्ता शाख से कलियों टूटीं तो सब को बुरा लगा सब चुप रहे जब ड़ाल से तोडा गया पत्ता तपते सूरज ने जला कर खाक किया चमन दिखता नही अब यहां एक भी हरा पत्ता मुकेश  इलाहाबादी ........................

कलंदरी पेशा, मुहब्बत मजहब,फकीरी हमारी जात

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  कलंदरी पेशा, मुहब्बत मजहब,फकीरी हमारी जात हमारे पास दुआओं के सिवा कुछ न पाओगे, दोस्त मुकेश  इलाहाबादी ...............................

हुस्न हया और मुहब्ब्त छुपा लेते हैं,

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  हुस्न हया और मुहब्ब्त छुपा लेते हैं, लेने वाले भी नकाब से क्या क्या काम लेते हैं? मुकेष इलाहाबादी ......................

वस्ले यार की बेचैनियॉ तो हम भी समझते हैं?

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  वस्ले यार की बेचैनियॉ तो हम भी समझते हैं? ये अलग बात हमसे कोई मिलने नही आता ! मुकेष इलाहाबादी .........................

वस्ले यार की बातें न करो, ऐ दोस्त

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  वस्ले यार की बातें न करो, ऐ दोस्त महबूब को देखे हुए हमको जमाना हुआ मुकेष इलाहाबादी .........................

हमसे तो नही किसी और से कह रहे थे

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  हमसे तो नही किसी और से कह रहे थे ‘महफिल मे सिर्फ मुकेश ने हमे गौर से नही देखा’ मुकेश  इलाहाबादी .............................

ज़िदगी से शिकायत भी नही

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  ज़िदगी से शिकायत भी नही चेहरे पे मुसकुराहट भी नही हमारे घर अंधेरा न पाओगे लेकिन जगमगाहट  भी नही ऐसा भी नही हम बेखाफ हैं पै चेहरे पे घबराहट भी नही चौराहे पे लाश  पडी है कबसे बस्ती मे सुगबुगाहट भी नही सूरज कब का विदा हो गया चॉद उगने की आहट भी नही मुकेश  इलाहाबादी ...........

सुमी, जानती हो ? एक दिन

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  सुमी, जानती हो ? एक दिन किसी प्रेमी ने शायद, मेरी तरह किसी पागल प्रेमी ने अपनी हथेलियों की अंजुरी बना के अपनी मासूका का चेहरा ढंप लिया था और फिर देर तक बहुत देर तक उस खूबसूरत प्रेमिका की ऑखों मे निहारता रहा और उसकी जगमग जगमग करती ऑखों से झर झर झरते मोतियों को अपनी हथेली मे समेट खुशी से उछाल दिया था इस नीरव और वीरान आकाष मे शायद तभी से फलक मे इतने सारे खूबसूरत तारे जगमगाते हैं आकाश भी उस दिन बहुत खुष हुआ था अपने वीराने को आबाद पा के और, आकाश इन चमकते तारों से मुहब्ब्त कर बैठा ... बेपनाह मुहब्रब्त लेकिन तारे बेवफा निकले वे सभी बहुरुपिया चॉद से दिल लगा बैठे मगर चॉद ? चॉद बेवफा ही निकला, फितरतन वह कभी तारो के संग किलोल करता मुस्कराता, आकाष के ही सीने मे तारों संग अठखेलियॉ करता और फिर छुप जाता विदा हो जाता जाने कहां ? शायद फिर कुछ और सितारों से मुहब्बत करने के लिये मगर आकाश फिर भी तारों को अपने रकीब चॉद के साथ अपने सीने मे ही उगे रहने देता अपनी विषालता के साथ विराटता, भव्यता और एकाकीपन के साथ सुमी, तुम मुझे भी ऐसा ही एक निचाट और खाली आकाश ...

सूख गये सब जेठ मॉह मे,तरु पल्लव अरु संसार

सूख गये सब जेठ मॉह मे,तरु पल्लव अरु संसार हर्षित धरती भये मगन ब्रक्ष, मेघा बरसे धारमधार  मुकेष इलाहाबादी ........................

रातों की वीरानी ले ले

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  रातों की वीरानी ले ले मेरी पीर पुरानी ले  ले इक लम्हा प्यार का देके मेरी वो जिंदगानी ले ले अपना सारा दुख देकर मेरी शम सुहानी ले ले कांटों का गुलदष्ता देके मुझसे रातकीरानी ले ले नज्म और गजल के संग मेरी सारी कहानी ले  ले मुकेश  इलाहाबादी ......

उदासी का शबब

उदासी का शबब अब हमसे न पूछिये बहुत चोट खाये हुए हैं जमाने से हम अब जा के एक फूल मयस्सर हुआ, हमे तुम्हारी दोस्ती का, तब जा के हम मुसकुराए हैं मुकेश इलाहाबादी .............

उमड़ घुमड़ दरिया बहे, झर झर बहे प्रपात,

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  उमड़ घुमड़ दरिया बहे, झर झर बहे प्रपात, बादल बन पिया बरसा रात भीगा मेरा गात देख खुमारी अंखियन की सखियां करें ठिठोली रात पिया संग तू ने कितनी की है जोराजारी मुकेष इलाहाबादी ....................

जिन्दगी के सफे तुम सबके आगे यू खोला न करो

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  जिन्दगी के सफे तुम सबके आगे यू खोला न करो किताबे मुहब्बत पढने का सलीका हर किसी का आता नही मुकेष इलाहाबादी ..............................

न ढूंढो तुम मुस्कान चेहरे पे

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  न ढूंढो तुम मुस्कान चेहरे पे छपी है दर्दे दास्तान चेहरे पे नुकीले नुकूश  पे तिरछी नजर है कितने तीरो.कमान चेहरे पे चोट पे चोट खायी है हमने गिन लीजिए निशन चेहरे पे मासूम चेहरे पे उनके छुपा है हल्का सा हुस्ने गुमान चहरे पे सफर बहुत तवील था मुकेश पढ़ लो मेरी थकान चेहरे पे मुकेश  इलाहाबादी ...............

हरा दुषाला ओढ कर है बैठी बाहं पसार

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  हरा दुषाला ओढ कर है बैठी बाहं पसार आया बादल चूम गया धरती हुयी निहाल फूलों के संग जब जब भौंरा करे किलोल कलियों के भी मन मे रह रह उठे हिलोर मुकेश  इलाहाबादी .........................

कुछ ख़त ओर यादें बच रही थी

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  आज फिर हम उनको मनाने चले फिर हम पत्थर मे जॉ फुकने चले     कुछ ख़त ओर यादें बच रही थी उन्हे भी हम गंगा मे बहाने चले इस मतलबी खुदगर्ज दुनिया मे कयूं तुम अच्छे इंसा ढूंढने चले तुम तो बहुत अच्छे थे मुकेश,, मियां आज तुम भी मैखाने चले मुकेश इलाहाबादी ................

जिनकी वजह से हम खाकसार हैं

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  जिनकी वजह से हम खाकसार हैं आज भी हम उनके तलबगार हैं लुट के भी हम उनकी नजरों पे इजहार ऐ मुहब्ब्त के गुनहगार हैं सौ क्त्ल कर के भी मुस्कुराते हैं हम मुहब्बत करके शरमशार हैं जुल्म पे जुल्म किये जाते हैं हमपे फिर भी सभी उनके तरफदार हैं मुकेश  इलाहाबादी ...................

फूलों की माफिक था अपना दिल

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  फूलों की माफिक था अपना दिल ज़माने ने उसे भी धारदार बना दिया मुकेश इलाहाबादी ---------------------

अब तो शाख पे हिलते हुए पत्ते भी रकीब लगते हैं

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  अब तो शाख पे हिलते हुए पत्ते भी रकीब लगते हैं जो हवाओं से मिल के जो तेरी जुल्फ चूम जाते हैं मुकेश इलाहाबादी .................................

वो कोई और खुशनसीब होंगे

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  वो कोई और खुशनसीब होंगे जो,मुहब्बत की पाती लिखा करते हैं हम तो यंहा  उनकी बेरुखी ओर तनहाइयों का दीवान लिये बैठे है मुकेश  इलाहाबादी ................................................

मन का मनका बना, तेरे नाम की माला जपा किये

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  मन का मनका बना, तेरे नाम की माला जपा किये तुम ही पत्थर के बुत निकले जो न मेरी कदर किये मुकेश  इलाहाबादी ................................

फक़त ये खतो किताबत का काम नही

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  फक़त ये खतो किताबत का काम नही मुहब्बत है जॉ पे खेल जाने का नाम मुकेश इलाहाबादी ......................

उनकी हया का आलम तो देखिये,,

उनकी हया का आलम तो देखिये,, ख्वाब मे भी चिलमन से झांकते हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------

जब हमसे रू - ब -रू होने का फैसला लिया होगा !!

  जब हमसे रू - ब -रू होने का फैसला लिया होगा !! तभी ख्वाब मे आने का फैसला मुल्तवी किया होगा मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ----- ---

किसी का र्दद दिल मे लिये फिरते हैं

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  किसी का र्दद दिल मे लिये फिरते हैं कितनी बेशकीमती जागीर लिये फिरते हैं उसे फुरसत ही नही मेरे दिल मे देखे उसके लिये क्या क्या तोहफे लिये फिरते हैं पलट के देखता भी नही जालिम कि हम उसे मुड़ मुड़ के देखते हैं मुकेश  इलाहाबादी .....................

ओढ कर हमने मासूसी का कफ़न,

ओढ कर हमने मासूसी का कफ़न, कर लिये अपने सारे अरमॉ दफ़न फक्त इक बार और देख लूं तुझे फिर छोड दूं हमेश को तेरा वतन मै तो मौसम बहार हूं चला जाउंगा फिर देखना तुम अपना उजडा चमन भले ही दर्दो ग़म से लबरेज है मुकेश फिर भी गाउंगा औ मुस्कुराउंगा मगन मुकेश  इलाहाबादी ....................

मेरे सर्द जिस्म की हरारत बताती है

मेरे सर्द जिस्म की हरारत बताती है तेरी रूह की सेंक इधर तक आती है मुकेश इलाहाबादी ----------------------