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Showing posts from March, 2012

जुगनू सा पीठ पे रोशनी लादे हुए

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बैठे ठाले की तरंग -----------   जुगनू सा पीठ पे रोशनी लादे हुए स्याह रातों में फिरता हूँ जगमाते हुए ख़्वाबों की झील में तेरा अक्स हर रोज़ हम देखा किये झिलमिलाते हुए तफरीहन उनपे ज़रा सा तंज़ कास दिए चल दिए महफ़िल से तमतमाते हुए दिन ज़रूर मायूसी में गुज़रते रहे मगर शाम बिताया किये गुनगुनाते हुए   मुकेश इलाहाबादी -------------

तूफां में सारा जन्हा बह गया

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          बैठे ठाले की तरंग -----------             तूफां में सारा जन्हा बह गया                मकीं बह गया, मकाँ बह गया                     फ़क़त  उजड़ी  यादो  के सिवा                       जो भी था सारा सामाँ बह गया                           रेत पे छोड़  तड़पती  मछलियाँ                               समंदर फिर जाने कंहा बह गया...

गिनते थे जिन्हें हम पर्दानशीनो में

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बैठे ठाले की तरंग ----------------------- गिनते थे जिन्हें हम पर्दानशीनो में आज उन्हें भी देखा, तमाशबीनो में चाँद ने जब जब  भी अंगडाईयाँ  ली तमाम कश्तियाँ डूबी इन सफीनो में  सूरत ही नहीं सीरत भी उसकी अच्छी लोग  लेते  हैं  नाम  उसका  नगीनो में ऐ मुकेश कपडे तो ज़रा झटक के पहन  अक्शर सांप पलते हैं इन्ही आस्तीनों में मुकेश इलाहाबादी -----------------------

अंग अंग संदल भयो,

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बैठे ठाले की तरंग ----------------   अंग अंग संदल भयो, महके बावरे नैन गोरी से लिपट प्रेमी क्यों न पावे चैन ? बाँवरे पिऊ के नयन, पगला मोरा मन पिऊ पिऊ की तेर सुन काटे कितने रैन   मुकेश इलाहाबादी --------------------

ठिठका हुआ चाँद, ठहरा हुआ समंदर

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बैठे ठाले की तरंग --------------------- ठिठका हुआ चाँद, ठहरा हुआ  समंदर हर तरफ देखूं आज,सहमा हुआ मंज़र क्या हाल बयाँ करूं, अब इस शहर का ये टूटी हुई मस्जिद, ये टूटा हुआ मंदर बस  इक  जिश्म ही रह गया है साबुत वरना है रेज़ा रेज़ा बिखरा हुआ अन्दर मुकेश इलाहाबादी ----------------------

परती धरती और पहली बारिस (pahlee kisht)

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            परती धरती और पहली बारिस बारिस की हल्की हल्की बूंदो के गिरते ही लगा बरसों की परती पडी धरती थरथरा उठी हो। माटी की पोर पोर से भीनी भीनी सुगंध चारों ओर अद्रष्य रुप से व्याप्त हो गयी थी। लॉन से आ रही हरसिंगार, मोगरा, गुड़हल और चमेली की खुषबू को संध्या अपने नथूनों में ही नही महसूस कर रही थी बल्कि अपनी संदीली काया के रोम रोम में सिहरन सा महसूस कर रही थी। बेहद तपन के बाद बारिष के मौसम की तरह वह अपने अंदर आये इस बदलाव से वह अंजान नही थी। पर उम्र के इस उत्तरायण में इस क़दर भावुक मन होना वह स्वीकार नही कर पा रही थी और अस्विकार भी। फिलहाल, संध्या अपने मन के सारे विक्षोभों को परे धकेल, अपने आप को पूरी तरह मन के हवाले कर देना चाह रही थी। और फूलों की तरह किसी डाली से लगी रह कर डोलना व तितली की तरह उडना चाह रही थी। इस हल्की हल्की बारिस की बूंदों की सिहरन अंदर मन तक महसूस कर लेना चाहती थी। दिल तक।  इस अंजानी खुषी व षीतल छुअन ने पेड़ पौधों लताओं व गुल्मों को हौले हौले तो कभी जोर से हिलते पत्तों के संगीत में डूब जान ह...

जब से आईना बन के देखा है

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बैठे ठाले की तरंग ----------- जब  से  आईना बन के देखा है दुनिया  को  कई  रंगों में देखा है बहुतों  ने  पत्थर से वार  किया, कईयों  ने  मुहब्बत  से   देखा है  चाँद को भी आग सा जलते, और सूरज को धुंध में लिपटते देखा है क़तरा ऐ अब्र को समंदर बनते,औ समंदर को कतरे  में  डूबते  देखा है जो सिकंदर बनके इतराते थे, कभी इक दिन ख़ाक में मिलते हुए देखा है मुकेश इलाहाबादी --------------------- सूरज को धुंध में लिपटते

आपकी दोस्ती, आपकी बातें, आपकी यादें आपकी कशिश

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बैठे ठाले की तरंग -------------------------------------- आपकी दोस्ती, आपकी बातें, आपकी यादें आपकी कशिश ज़िन्दगी इतनी खूबसूरत होगी हमने अब तक न जाना था या खुशबू , ये बारिस, या बादल का पानी और ये पुरनम हवा मौसम इतना भी खूबसूरत होता है हमने अबतक न जाना था मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------------

डूबती आखों में सवाल ज़िन्दगी का

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बैठे ठाले की तरंग -------------   डूबती आखों में सवाल ज़िन्दगी का मिला नहीं माकूल जवाब ज़िन्दगी का तमाम हसरतों का होना था यही हश्र मिलना फिर बिछड़ना अंजाम ज़िन्दगी का मुकेश इलाहाबादी ----------------------

न कभी खुद को बढ़ा के देखा

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बैठे ठाले की तरंग ------------ न कभी खुद को बढ़ा के देखा न कभी खुद को घटा के देखा जितनी रही मेरी चादर, अपने बदन को उसमे सिमटा के देखा हर एक की कुछ मजबूरियां थी हमने सभी को आजमा के देखा हकीकत की ज़मीं तो छोटी थी ख्वाब कोही हमने बढ़ा के देखा चाँद  तो  रोज़ ब रोज़  बढ़ता है  उसे भी हमने घटता हुआ देखा सूरज भी जो दिन भर तपता है दिन ढले उसे छुपता हुआ देखा कल  तलक  जो इंसान ज़िंदा थे मुकेश उसे आज मरता हुआ देखा  मुकेश इलाहाबादी ----------------

चॉद और डैम

चॉद और डैम डैम का गहरा नीला पानी पूरी तरह शांत था। बिलकुल खामोश  रोज की तरह। कंही कोई हलचल नही आवाज नही। चारो तरफ खडे पहाड भी किसी योगी की तरह खडे थे समाधिस्थ।चारो तरफ हर वक्त एक सन्नाटा पसरा रहता। जो कभी कभी मोटरसायकिल की फटफट या किसी बैलगाडी की चरर मरर और गाड़ीवान के हर्र.हर्र से थोडी देर के लिये भंग होती फिर वही सन्नाटा पसर जाता है। मानो रह रह के जल मे कोई छोटा सा कंकड डाल दिया जाता हो और लहरे थोड़ी  दूर जाके फिर शांत  हो जाती हों। आसपास  बसे लगभग आधा दर्जन गांवो का जीवन भी तो बांध के पानी की तरह  है। उपर से कितना शांत हलचल रहित पर अंदर से कहीं गहरा तो कहीं उथला कहीं जंगली झाडियां तो कहीं पेडो के ठूंठ खडे हैं। लेकिन ये सारी चीजे उनके जीवन के अन्दर  उतर के ही जानी जा सकती हैं। किनारे  पे बैठ के नही। पर कभी कभी उपरी सतह पर भी कुछ हलचल होती रहती है जो  मेरे जैसे व्यक्ति को किनारे पे बैठ के भी दिखायी पड जाती है। जो कुछ देर के लिये विचलित करती है फिर शांत  हो जाता हूं इसी डेैम के पानी की तरह। भाव शून्य,संवेदना शून्य। रधिया को ...

ख़ुद को ख़ुद से जलता हुआ देखूं

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बैठे ठाले की तरंग ---------------   ख़ुद को ख़ुद से जलता हुआ देखूं अपने ही जिस्म को बर्फ सा गलता हुआ देखूं अजाब आदतों का शिकार हो गया हूँ ख़ुद को कभी रोता हुआ, कभी हंसता हुआ देखूं बात मै किसी ग़ैर की नहीं कर रहा मुहब्बत के नाम पे ख़ुद को ही मरता हुआ देखूं मीलों तलक सहरा,मंजिल की राह में तपती हुई रेत पे ख़ुद को चलता हुआ देखूं यूँ तो मेरे मकां में दरीचे ही दरीचे ही हैं फिर भी अपनी सांस को घुटता हुआ देखूं मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

महकी महकी रातें हैं, बहके बहके दिन

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बैठे ठाले की तरंग ----------------------- महकी महकी रातें  हैं, बहके बहके दिन बोली तेरी सुन कर हम चहके सारे दिन फीका महुआ, आम दशहरी,खटटे सारे फल मीठी मीठी बातें  तेरी, हम गुनते सारी दिन जान न पायी दुनिया सारी, पी कर आये बोतल थोडी़  तेरी ऑखों से पी, हम बहके सारा दिन मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

मुहब्बत बेशर्त होती है

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दोस्त, मुहब्बत बेशर्त  होती है। मुहब्बत जब होती है तो बस होती है। जैसे धूप खिली हो, सूरज चमक रहा हो और अचानक बदरिया तन जाये, ओर सूरज ढ़क जाय। बस, ऐसे ही मोहब्बत होती है। बदरिया सी। बदरिया जब बरसती है तो खूब बरसती है। बदरिया कभी नही देखती कब बरसना है, कहां बरसना है, कितना बरसना है। कोई पैरामीटर लेकर नही बरसती, बस बरसती है ओर बरस कर खाली हो जाती है, ओर फ़िजां ताजा ताजा हो जाती है। धुली धुली। बस ऐसे ही मुहब्बत कब हो जाये कहां हो जाये किससे हो जाय पता नही। सच मुहब्बत को कुछ पता नही होता। वह तो बस होती है और हो जाती है। बिना शर्त - बिना बात। ओर सुना है जब मुहब्बत होती है, रोंवा रोंवा पुलक से भर जाता है। मन हुलस हुलस जाता  है । कदम बहक बहक जाते हैं। ऑखें नशे  में डूबी डूबी रहती हैं। मुहब्बत को इससे कोई लेना देना नही रहता। वह जिसपे बरस रही है। वह काला है, गोरा है, बड़ा है, छोटा है उंच है नीच है बस उसे तो होना होता है और अपने महबूब पे प्रेम उडेलना है, उसे दुलराना है, बतियाना है, लडियाना है, लड़ना है, झगड़ना है बस  उसी के लिये पलके पांवडे़ बिछाये रखन होता है। अगर ऐ...

दोस्त, ये तो नसीब नसीब की बात है

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बैठे ठाले की तरंग --------------------   दोस्त, ये तो नसीब नसीब की बात है मिली है तुझे वफ़ा और मुझे बेवफाई  गर मानता है तू ,है ये खुदा का करम तब  तो खुदा की  भी अज़ब  है खुदाई मुकेश इलाहाबादी ---------------------

ऐ खुदा तू ये बता,

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बैठे ठाले की तरंग --------------- ऐ खुदा तू ये बता, वो हमसे दूर क्यूँ हुई ? उसकी कुछ मजबूरियां थी ? या हमसे कुछ भूल हुई ? राह जो फूलों से गुज़र रही थी, वह अचानक शूल क्यूँ हुई ? ऐ खुदा ये बता - वो हमसे दूर क्यूँ हुई ? ( मित्र एस एस रावत जी के द्वारा सूनी हुई व्यथा से ) मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------  

उठा के ख़ाक राह की कलेजे से लगा लूं

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बैठे ठाले की तरंग ----------------- उठा के ख़ाक राह की कलेजे से लगा लूं अभी अभी इधर से मेरा मासूक गुजरा है मुकेश इलाहाबादी ---------------------

धूप का टुकडा भी आखिर मचल गया

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बैठे ठाले की तरंग ---------------- धूप का टुकडा भी आखिर मचल गया जुल्फों से छन के गालों पे खिल गया अज़ब नाज़ुकी देखी उनके बदन की फूलों की छूने से भी  छिल छिल गया बहुत  सख्त  जाँ बनता था,खुद को पाके मुहब्बत की आंच पिघल गया मुकेश इलाहाबादी -------------------

सहरा,हर सिम्त नज़र आता है

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बैठे ठाले की तरंग ----------- सहरा,हर सिम्त नज़र आता है चाँद भी सूरज नज़र आता है ज़रा लिबास उतार के भी देख इंसान जानवर नज़र आता है खिला हुआ सुर्ख गुलाब डाल पे जाने क्यूँ अंगार नज़र आता है मुकेश इलाहाबादी ----------------

उनका, तफरीहन मेरी गली में आना हुआ

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बैठे ठाले की तरंग ---------------- उनका, तफरीहन मेरी गली में आना हुआ मेरे लिए तो ज़िन्दगी भर का फ़साना हुआ मुकेश इलाहाबादी ------------------

मेरे ख़्वाबों में बस्ती क्यूँ हो ?

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बैठे ठाले की तरंग ---------- मेरे ख़्वाबों में बस्ती क्यूँ हो ? मेरी यादों में रहती क्यूँ हो ? ज़ब तुम मुझसे हो गयी जुदा हर मोड़  पे  मिलती  क्यूँ हो ? मेरे  गीतों  में जब नहीं रवानी शामो सहर गुनगुनाती क्यूँ हो ? ज़ख्म भरने की खातिर आया रह रह के नमक छिड़कती क्यूँ हो ? ज़ब प्यास नहीं बुझानी थी झरने सा फिर बहती क्यूँ हो ? मुकेश इलाहाबादी ---------------

तोड़े हैं सैकड़ों जाम शौक की खातिर

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बैठे ठाले की तरंग -----------------   तोड़े हैं सैकड़ों जाम शौक की खातिर जाम टूटने की खनक उनको भा गयी   मुकेश इलाहाबादी--------------------

हमने भी पी है शराब किसिम - किसिम की

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बैठे ठाले की तरंग ---------------------------- हमने भी पी है शराब किसिम - किसिम की तन्हाई की,रुसवाई की औ उनकी बेरुखी की   मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

तुम्हारी इन नशीली जुल्फों के साथ

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बैठे ठाले की तरंग ------------------------------------------------------ तेरी इन नशीली जुल्फों के साथ लहराना हमने भी सीख लिया झटकती हो इन्हें किस कदर,पर बिखरना हमने भी सीख लिया मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------------------

शामो सहर वीरानियाँ सी क्यूँ है ?

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बैठे ठाले की तरंग -------- शामो सहर वीरानियाँ सी क्यूँ है ? हर वक़्त ये बेचैनियाँ सी क्यूँ है ? मिलते भी हैं, गुफ्तगू भी होती है फिर,दर्मयाँ हमारे दूरियां सी क्यूँ है ? प्यारा शख्स है, हंसता भी हैं खूब फिर घर उसके सिसकियाँ सी क्यूँ है ? मुकेश इलाहाबादी -----------------

यूँ तो निकल आया हूँ महफ़िल से बहुत दूर

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बैठे ठाले की तरंग ----------   यूँ तो निकल आया हूँ महफ़िल से बहुत दूर फिर क्यूँ हर नफ़स में तेरी याद महकती है ?   मुकेश इलाहाबादी ------------

किसी उदास दिन की डायरी से ----

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किसी उदास दिन की डायरी से ---- ज़िन्दगी कागज़ पे लिखी इबारत होती तो कब का गंगा में बहा आया होता। रेत पे लिखी नज़्म होती तो लहरों ने खु़द ब ख़ुद मिटा दिया होता। हवा में बने हस्ताक्षर होते तो खुशबू  में ढ़ल गये होते या फिर हवा की तमाम खुश्बुओं में खो गये होते। लेकिन माज़ी तो पत्थर पे लिखी इबारत है जो एक बार खुदने के बाद सदियों सदियों का दस्तावेज बन जाती हैं, जो इंसान के हाथो में लकीरों सा उभर आती हैं। जिनके अर्थों  को समझना हमारे जैसों की बात नही। ये लकीरें उन के लच्छे भी नही जिन्हे सहूलियत से सुलझा लिया जाये। आडी तिरछी, जन्मो जन्मों की दस्तावेजी उलझी लकीरें इन्सान को ताज़िंदगी उलझाए रखती हैं। और इंसान सुख दुख के सागर में गोते लगाता रहता है। यह अलग बात है कोई इस सागर में कुछ दूर तन्हा छटपटाता है तो कोई किसी के साथ हिलोरे खाता है। पर इस भवसागर में डूबते उतराते सभी हैं। आज फिर मै अपने हाथों की आडी तिरछी लकीरों में अपने माज़ी को देखते की कोशिश करता हूं तो खुद उलझ जाता हूं। बेतरह। फिलहाल मै इन उलझी लकीरों के कारण उलझा हुआ हूं या फिर उलझा हुआ हूं इसलिये लकीरें उलझी हैं...

एक लडकी सलोनी सी -------

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दिनांक 20-12-2001 कोल्हू के बैल की मानिन्द जीवन चक्र में गोल-गोल घूमते हुए अड़तीस वर्ड्ढ हो गये। परिणामतः बैल की तरह वहीं का वहीं हूं। बिना किसी मन्जिल पर पहुचे  हुए। जिस तरह कोल्हू का बैल घूम-द्यूम कर ढेर सारा तेल और कचरा निकालता है उसी तरह हमारे पास भी बेचैनी, हताषा और बेकार के अनुभवों का कचरा जमा  हुआ है। जिसकी सडांध से खुद जार-जार होता जा रहा हूं। बेचैनी तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब सोंचता हूं अभी न जाने कितने चक्कर और लगाने है? न जाने कितना कचरा और इक्कठा करना है। कई बार सोंचा और कोशिश  भी की कि इस कचरे को एक एक कर बीनू। शायद  कुछ काम की चीजें हो पर, सब की सब अधूरी कोषिषें ही साबित हुयी। आज फिर एक नए संकल्प के साथ उस कचरे को एक-एक कर बीनने की शुरुआत की है, देखे क्या होता है? 21-12-2001 कल शाम  बेवजह तालाब के किनारे टहलते समय कुछ वजह और कुछ बेवजह के ख्यालो में डूबा हुआ था और ख्याल थे कि लाख कोशिशों  के बाद भी सिलसिलेवार न हो पा रहे थे। थक कर तालाब के किनारे बैठ शांत  और ठहरे हुए पानी को बहुत देर तक देखता रहा और देखता रहा। न जाने कब ...