डूबती आखों में सवाल ज़िन्दगी का

बैठे ठाले की तरंग -------------
 
डूबती आखों में सवाल ज़िन्दगी का
मिला नहीं माकूल जवाब ज़िन्दगी का

तमाम हसरतों का होना था यही हश्र
मिलना फिर बिछड़ना अंजाम ज़िन्दगी का

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है