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Showing posts from January, 2014

कोई ज़रूरी तो नहीं,

कोई ज़रूरी तो नहीं, नाचघर जाया जाए हो रहा शहर में तमाशा चलो आओ देखा जाए साधे पाँव संग भूखे पेट, रस्सी पे नाचती लड़की देख थरथराती छातियाँ चंद सिक्के उछाला जाए हूत तू तू सब बोल रहे खेल कबड्डी खेल रहे चुनाव अखाड़ा खुल गया चल सत्ता दंगल देखा जाए है सरे आम बाल बिखेरे देखो महंगाई झूम रही औ नेता बन के नाच रहे भालू - बन्दर देखा जाए मुकेश इलाहाबादी -----

प्यार मुहब्बत झूठी बातें

इक राजा इक रानी लिख फिर से वही कहानी लिख प्यार मुहब्बत झूठी बातें रिश्ते हैं जिस्मानी लिख बाँध ले गठरी सच्चाई की धन दौलत बेमानी लिख देश - प्रेम की खातिर तू अपनी चढ़ी जवानी लिख रोना - धोना छोड़ दे प्यारे ग़ज़ल कोई तूफानी लिख मुकेश इलाहाबादी ---------

आप भी अज़ब दिल्लगी करते हो जनाब

आप भी अज़ब दिल्लगी करते हो जनाब पलकें बंद करके कहते हो आखों में बस जाऊं मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

दिल में ताज़ी हवा रक्खो

दिल में ताज़ी हवा रक्खो दिले दरीचा खुला रक्खो इतनी मायूसी अच्छी नही चरागे हौसला जला रक्खो शख्शियत महक उट्ठेगी गुले मुहब्बत खिला रक्खो कोई भला करे या बुरा करे अपने होठों पे दुआ रक्खो ग़म अपना सूना सको तुम ऐसा कोई इक ठिया रक्खो मुकेश इलाहाबादी ----------

गर अपने आंसुओं को

गर अपने आंसुओं को तन्हाइयों की जगह मेरी हथेली में गिर जाने दिया होता खुदा कसम अब तक ये आंसू फूल बन के खिल गए होते मुकेश इलाहाबादी ------

किताबे ज़िंदगी का इक इक सफ़ा पलटता हूँ

किताबे ज़िंदगी का इक इक सफ़ा पलटता हूँ माज़ी के हर लफ्ज़ में सिर्फ तुझे ही पढता हूँ अंधेरी रात जब नींद किसी करवट आती नहीं रह - रह के ख़्वाबों में तेरा ही अक्श देखता हूँ जब कभी दास्ताने ज़िंदगी लिखता हूँ तब - तब गीत ग़ज़ल और रुबाई में तेरा ही नाम लिखता हूँ यूँ तो ज़माने में कई दोस्त हैं महफ़िल है रौनके हैं फिर भी शामो सहर तन्हाइयों में रहना चाहता हूँ अब तो तमाम उम्र गुज़र गयी सफ़र में ऐ मुकेश तेरा दर और मेरी मंज़िल कब आयेगी सोचता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ----

SWATANTRATA DIWAS PER MERE BHEE DO SHABD

श्रद्धेय अतिथगण एवं बाल मित्रों, आप सभी को स्वाधीनता दिवस की 65वीं वर्षगाठं की बहुत बहुत शुभकामनाएं। मित्रों मुझे यह बडी अजीब बात लगती है कि हम लोग बिना स्वाधीनता का अर्थ जाने ही स्वाधीनता दिवस मनाते रहते हैं और बिना स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझे स्वतंत्रता दिवस मनाते रहते हैं। मेरे देखे स्वाधीनता का अर्थ है जो ‘स्व’ के आधीन हो और स्वतंत्रा को अर्थ होता है जो स्व के तंत्र मे स्थित हो। और विडंबना ये भी है कि हम लोग न तो स्व को जानते हैं न अपने तंत्र को जानते हैं और नही ही अधीनता वह परतंत्रता के वास्तबिक अर्थो मे समझते हैं। मेरे देखे स्वतंत्रता और परतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू है। बिना परतंत्रता के स्वतंत्रता अराजक हो जाती है तो निखालिष परतंत्रा सारे विकास को अवरुद्ध कर देती है। शायद इसी कारण भारतीय मनीषा से इन दोनो बातों को जानकर ही इन दोनेा अदभुत शब्दों का श्रजन किया है। और मेरा भी मानना है कि इनसान को स्वतंत्रा होनी चाहिये विचार की भाव की रहने की खाने की कमाने की । मगर साथ ही धर्म की संस्कार की समाज के नियमों के प्रति आधीनता भी होनी चाहिये। तभी एक सभ्य सुसंस्क्रत और खूबसूरत सम...

उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है

उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है गुलशन के फूल बेरंग बेनूर नज़र आये है इक मुद्दत के बाद हाल पुछा है जनाब ने कि लम्बी रात के बाद सहर नज़र आये है दूर - दूर तक रेत है तपन है और तन्हाई है ज़िंदगी हमें मुस्किल सफ़र नज़र आये है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ऐसा भी नहीं कि हम मुहब्बत की ज़ुबाँ नहीं रखते

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ऐसा भी नहीं कि हम मुहब्बत की ज़ुबाँ नहीं रखते ये अलग बात देख कर तुम्हारे तेवर हम चुप रह गए मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

बचपन से ही दुनियादार हो गए

बचपन से ही दुनियादार हो गए ग़रीबी में बच्चे समझदार हो गए खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में छोटे छोटे बच्चे बारोजगार हो गए मासूमियत को भूल कर ये बच्चे तमाम बातों के जानकार हो गए कम्पुटर और मोबाईल के युग मे खो खो व गुल्ली डंडा बेकार हो गए इक्कीसवीं सदी में राम की बातें ? सच कह के हम गुनहगार हो गए मुकेश इलाहाबादी --------------------

जीभ से होठो को तर कर लेता है

जीभ से होठो को तर कर लेता है प्यास को वो झूठी तसल्ली देता है जब भी तिश्नगी हद से गुज़रती है क़तरा भी समन्दर दिखाई देता है कि कुछ लोग दरिया छुपाये बैठे हैं और ज़माना प्यासा दिखाई देता है सोख रहा है सुबह के गाल से ओस आफताब भी प्यासा दिखाई देता है जब धरती प्यास से कुनमुनाती है तब बादल बरसता दिखाई देता है इन झील सी आखों में डूब जाने दो कि मुकेश भी प्यासा दिखाई देता हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------

दिल में अरमान आखों मे दरिया है

दिल में अरमान आखों मे दरिया है सीने में वो तूफ़ान छुपा के जिया है ये सच है, अन्धेरा घना है फिर भी कोशिशों का चराग़ रौशन किया है वो उठती हुई लहरें रूठा हुआ माझी मुस्किल से कश्ती किनारे किया है महफ़िल मे जलजला आयेगा आज उसने चेहरे से नक़ाब हटा लिया है घुप्प करियाई अंधेरी रातों में मुकेश चमकते जुगनुओं के सहारे जिया है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

जिसकी खुमारी मे हम जी रहे हैं

जिसकी खुमारी मे हम जी रहे हैं वो किसी और के जाम पी रहे हैं अपने ही हाथो से कुरेद कुरेद कर खुद ही अपने ज़ख्मों को सी रहे हैं गो कि तमाम शहर जानता है हमें नज़रों में हम उनके अजनबी रहे हैं जिस्म के तमाम खरीदारों के बीच हम जैसे मुहब्बत के सौदाई रहे हैं लाखों और करोणों के मालिक तुम मुकेश हम तो महज़ इकाई रहे हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------

गर हवा के रुख पे बहे होते ?

गर हवा के रुख पे बहे होते ? हम भी किनारे लग गए होते गर दिल को फलक बनाया होता ? तेरे आँचल में भी सितारे जड़े होते गर एक भी बीज बोया होता ? चमन में फूल ही फूल खिले होते गर इतना मगरूर न हुए होते ? तेरे दर पे भी आशिक़ खड़े होते मुकेश इलाहाबादी ------------------

हथौड़े की चोट सह गया पत्थर

हथौड़े की चोट सह गया पत्थर बुत बन कर मुस्कुराया पत्थर पत्थर दिल इन्सां क्या समझेगा कित्तने तूफ़ान सहता है पत्थर ? कितनी नदियों समेटे है पत्थर ? यही परवत बन के खड़ा है पत्थर कितनी दूर और किधर है मंज़िल राह दिखाता बन मील का पत्थर मुकेश इलाहाबादी -----------------

ये कैसा ग़म था हमें रोना न आया

ये कैसा ग़म था हमें रोना न आया तुम बदल गए हमें जताना न आया मुद्दत से जो इक दर्द है दिल में निहां उस दर्द की कहानी सुनाना न आया धूप ही धुप मिली हमको सफ़र में छाँव हो ऐसा कोई ठिकाना न आया कभी आंधी तो कभी तूफान आया मुकेश मंज़र कोई सुहाना न आया मुकेश इलाहाबादी -------------------

मोटी दीवार दरवाज़ा ऊंचा पाओगे

मोटी दीवार दरवाज़ा ऊंचा पाओगे किले में तुम न खिड़कियाँ पाओगे दरबान मिलेगा पै राजा न पाओगे फ़रियाद ले कर  जब वहाँ जाओगे इत्र से महमाते मखमली लिबास, तमाम चेहरों पे सिसकियाँ पाओगे हर शख्श तुमको मशरूफ मिलेगा दर्दे फ़साना सुनाने कहाँ जाओगे ? है रात अंधेरी और चिराग भी गुल तुम उजाला ढूंढने कंहाँ जाओगे ? राजा भी रूठा औ ख़ुदा भी रूठा है बोलो मुकेश अब कहाँ जाओगे ? मुकेश इलाहाबादी -----------------

न कोई शोर न कोई शराबा हुआ

न कोई शोर न कोई शराबा हुआ रात क़त्ल मेरे एहसासों का हुआ हम तो मिले भूल के गिले शिकवे फिर क्यूँ पीठ पे वार दुबारा हुआ? लगने ही वाली थी साहिल पे कश्ती ऐसा तूफाँ बरसा दूर किनारा हुआ भले ही धड़कता दिखे मेरे सीने मे अब हरहाल में दिल तुम्हारा हुआ  अब सूरज भी सियासतदां हो गया कि दूर गरीबों के दर से उजाला हुआ मुकेश इलाहाबादी ------------------

ग़रीबी ओढ़ता मज़बूरी बिछाता हूँ

ग़रीबी ओढ़ता मज़बूरी बिछाता हूँ सुबह से शाम तक रिक्शा चलाता हूँ याद करता हूँ माँ बाप बीबी बच्चे फिर कुछ सोचकर लौट आता हूँ शहर में दंगा और जुलूस  के बीच मुश्किल से दो चार पैसे कमाता हूँ राशन किराया औ बच्चों की फीस आंधी - तूफ़ान में भी मुस्कुराता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------

तुम भी तो बदल गये

वक्त का तकाज़ा था हमको चुप रहना था तुम भी तो बदल गये तुमको तो बोलना था कब तक चराग लड्ता ज़ोरे तूफान ज़्यादा था वज़ह दशहत गरदी थी सड्कों पे सन्नाटा था रात की तीरगी मे भी उम्मीद का उज़ाला था आफताब के चेहरे पे गाढा काला धब्बा था मुहब्बत की ज़ुस्त्ज़ूं मे अपना भी कारवां था रात आस्मां से जो टूटा वो मासूम सितारा था खुद् ग़रज़ों के शहर मे मुकेश एक मशीहा था मुकेश इलाहाबादी ---

इन्सानियत के लिबास मे रह्ता था

इन्सानियत के लिबास मे रह्ता था अमीरो गरीब सबसे मिला करता था चुभे थे बेसुमार खन्ज़र दिल मे मगर लबों पे मुस्कुराहट सजाये रखता था मुहब्बत से बडा कोई भी मज़हब नही यही बात वह बार बार कहा  करता था बद्शाहियत तो उसकी फितरत मे थी भले ही  दौलत से फकीर दिखता था अज़ब तबियत का शख़्श था मुकेश मोम के पैरों से आग पे चल्ता था मुकेश इलाहाबादी -------------------

सूनसान जंगल में गुपचुप बहती रही

सूनसान जंगल में गुपचुप बहती रही वह नदी थी रास्ता खुद चुनती रही जिसे ज़माना पत्थर दिल कहता रहा वही संगतराशों की चोट सहती रही पहले दमियां काँटों के खिली फिर फूल बन के हर सिम्त महकती रही परिंदा खुले आसमान में उड़ता रहा खुद रातो दिन कफस में रहती रही ज़माने की तीरगी मिटाने की खातिर जला के जिस्म मोम सा पिघलती रही मुकेश इलाहाबादी ------------------

ज़रा से हादसे में ही बदल जाता है

ज़रा से हादसे में ही बदल जाता है खूबसूरत चेहरा देख मचल जाता है पा के तेरी बाहों का सहारा ये दिल हर बार गिरने से संभल जाता है मेरा दिल हो या गोया कोई बच्चा ज़रा सी मुहब्बत में बहल जाता है ये तेरी जादुई छुअन का ही है जादू सुर्ख अंगारा फूल में बदल जाता है मुकेश इलाहाबादी ------------------

बेहद घने सन्नाटे मे

बेहद घने सन्नाटे मे मीलों फैले वीराने में भी अक्सर, चौंक उठता है मेरा मन तब उझक कर देखती हैं मेरी निगाहें अपने आस पास फिर, किसी को न पा कर उदास हो जाती हैं और मन एक बार फिर सिमट जाता है अपने एकाकीपन मे मीलों फैले बियाबान में मुकेश इलाहाबादी -------  

सन्नाटा पसरा है चौपाल मे

सन्नाटा पसरा है चौपाल मे घर फसल बह गई है बाढ़ मे लूट घसोट हो राज्नीत रही बाढ और राहत के काम मे बूढे बच्चे इन्सान औ मवेशी रह रहे सभी खुले आसमां मे आज बाढ़ तो कल सूखा है किसान मर रहा हर हाल में नेता और अफ्सरों को छोड कौन खुश है इस माहौल में मुकेश इलाहाबादी -------