गर अपने आंसुओं को
गर अपने आंसुओं को
तन्हाइयों की जगह
मेरी हथेली में
गिर जाने दिया होता
खुदा कसम
अब तक ये आंसू
फूल बन के
खिल गए होते
मुकेश इलाहाबादी ------
तन्हाइयों की जगह
मेरी हथेली में
गिर जाने दिया होता
खुदा कसम
अब तक ये आंसू
फूल बन के
खिल गए होते
मुकेश इलाहाबादी ------
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