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Showing posts from June, 2015

तेरी मासूमियत हमें कुछ कहने नहीं देती

तेरी मासूमियत हमें कुछ कहने नहीं देती वरना, सोच के तो आये थे बातें बहुत हम मुकेश इलाहाबादी -------------------------

सुख , दुःख के हरहराते समंदर के बीच

सुख , दुःख के हरहराते समंदर के बीच तुम्हारी यादों का टापू मुकेश इलाहाबादी --

जब, तुम होती हो साथ

एक -------- जब, तुम होती हो साथ बरसता रहता है मौन संगीत अहर्निश (अब एक लम्बी खामोशी है ) दो ------- देखना एक दिन छंट जाएंगे हिज़्र के बादल तब मुसुकुरायेगा चाँद हँसेगी रात मुकेश इलाहाबादी ---------

चलो,मुस्कुरा कर देखते हैं

चलो,मुस्कुरा कर देखते हैं  ग़मो को छुपा कर देखते हैं  वह भी तो बहुत उदास है   उसको हंसा कर देखते हैं  चाँद निकल आया होगा ? छत पर जा कर देखते हैं  जानता हूँ, वह न  मानेगी  फिर भी मना कर देखते हैं   महताब बदली में छुपा है  ज़ुल्फ़ हटा कर देखते  हैं     मुकेश इलाहाबादी ------

खिलखिला के हंसती है

खिलखिला के हंसती है,मुस्कुराना नहीं आता मासूम इतनी कि सजना संवरना नहीं आता ईश्क  की  बातें वह समझती नहीं और इधर हाले दिल हमको भी तो समझाना नहीं आता हमारी तमाम कमियां एक -२ कर गिना गया मगर हमको अपनी खूबियां बताना नही आया  मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

कुछ तो खुरदुरापन रख ,ऐ दोस्त

कुछ तो खुरदुरापन रख ,ऐ दोस्त नज़रें टिकती ही नहीं तेरे शीशा ऐ जिस्म पे मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

गर ऐतबार नहीं तुझको

गर ऐतबार नहीं तुझको, मेरी बात पर क्या रख दूं तेरे सामने मैं दिल निकाल कर मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

आवारगी छाई रही उम्र भर

आवारगी छाई रही उम्र भर  परिंदगी रास आयी उम्र भर  भले ही तू छोड़ गयी मुझको  रूह याद करती रही उम्र भर  ये और बात हँसता रहा हूँ मै  चेहरे पे मुर्दनी  रही उम्र भर  इक  ठिकाने  की तलाश में  ज़ीस्त भटकती रही उम्रभर  मुझसे  बिछड़  कर वह  भी   खुश  न  रह  सकी उम्र  भर  मुकेश इलाहाबादी -----------

ज़िंदगी जैसे ठहर गयी हो

ज़िंदगी जैसे ठहर गयी हो बहती नदी रुक गयी हो  खिलखिला  के  हसीं थी  चांदनी  सी बिछ गयी हो दो बोल मीठे  से उसके मिश्री  सी  घुल गयी हो सन्नाटा सुनता हूं, शायद  उससे कुछ  कह गयी हो मुकेश तुम चुप हो,  ऐसे जैसे ज़िदगी लुट गयी हो मुकेश इलाहाबादी -----

महर्षि पतंजलि योग दर्शन - मेरे व्यक्तिगत नोट्स -

ओम श्री  गणेशाय नमः ----------------------------- महर्षि पतंजलि योग दर्शन - मेरे व्यक्तिगत नोट्स - योग दिवस पर आप सब से साझा करना चाहता हूँ - और आपके सुझाव व विचार आमंत्रित हैं ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- योग। योग ही तो हैं हम। योग के सिवा कुछ हो भी कैसे सकते हैं। क्योंकि हम सिर्फ एक योग हैं महा योग। योग षरीर और मन का। योग मन और चित्त का। योग चित्त और आत्मा का। योग आत्मा और परमात्मा का। हम कहीं से भी तो खण्ड नही हैं। खण्ड होते तो हम अखण्ड से न जुड पाते। कोई संभावना ही न होती। खण्ड होते तो किसी से प्रेम न कर पाते। खण्ड होते तो हम संवेदनषील न होते, किसी और के प्रति। खण्ड खण्ड होते तो र्धम की कोई अवधारणा न होती। खण्ड खण्ड होते तो समाज की कोई मुकम्मल तस्वीर न होती। खण्ड खण्ड होते तो परमात्मा को पाने का उस परमप्रसाद को पाने का  कोई उपाय ही न होता। हम खण्ड खण्ड नही हैं। हम एक जोड हैं, योग हैं। जिसका गवाह यह सारा पसारा संसार है।...

हिज़्र, जीने नही देता

हिज़्र, जीने नही देता ईश्क मरने नहीं देता शर्म ओ हया हमको कुछ कहने नही देता  ज़ोर ऐ तूफ़ान है,कि  हमे  बहने नहीं  देता पर लेकर बैठा हूँ पर सूरज उड़ने नही देता शोरो - गुल इस क़दर  कुछ सुनने नहीं देता मुकेश इलाहाबादी ---

तुझे फिर याद करना चाहता है

तुझे फिर याद करना चाहता है दिल मेरा उदास होना चाहता है देख लेने भर से जी नहीं भरता जी तुझे जीभर देखना चाहता है या तो तेरा साथ हो सुबहो शाम वर्ना दिल तन्हा रहना चाहता है सिर्फ एक बार मेरी बात सुन लो दिल बहुत कुछ कहना चाहता है मेरे पास लतीफों का खज़ाना है   आ,मुकेश तुझे हँसाना चाहता है मुकेश इलाहाबादी ---------------

लाल हरी व नारंगी देखा

लाल हरी व नारंगी देखा दुनिया रंग रंगीली देखा सत्ता औ पैसा वालों को अक्सर बडा घमंडी देखा फूल सी कोमल नारी को भी हमने बनते चंडी देखा देखा हमने बडे - बडों को सबकी चाल दुरंगी देखा सात सुरों से सजा धजा जिस्म बना सारंगी देखा मुकेश इलाहाबादी -----

वो और होंगे जो पैसे से मोल भाव किया करते हैं

वो और होंगे जो पैसे से मोल भाव किया करते हैं हम तो बाजारे मुहब्बत में बेमोल बिका करते हों मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

दिल के मोम थे, पथरीले हो गये

दिल के  मोम थे, पथरीले हो गये  हम इतना टूटे कि, रेतीले हो गये   बातों मे मधुरता न मिलेगी,अब   ज़ुबान  के  भी  ज़हरीले  हो गये   आसानी से कुछ भी नहीं मिलता   हर बात के  लिए, हठीले  हो गये  बदन पे हमने कांटे  उगा  लिए हैं  छू के देखो कितने नुकीले हो गये   मुकेश तेरी आखों की मय पी कर  हम भी तेरी तरह नशीले हो  गये  मुकेश इलाहाबादी ---------------

अपने जिस्म के ताबूत मे जिंदा हूं

अपने जिस्म के ताबूत मे जिंदा हूं देख  तो तू  मै हरहाल मे जिंदा हूं यादों  का  एक  जंगल छोड गये थे आज तक उसी बियाबान मे जिंदा हूं जमाने ने कोई कसर न छोडी पर मै अपनी खददो-  खाल मे जिंदा हूं  टूट गया कांच सा वजूद, फिर भी मुकेश, मै अपनी शान मे जिंदा हूं  मुकेश इलाहाबादी -------------------

छाँव ही छाँव ढूंढते रहे

छाँव ही छाँव ढूंढते रहे धूप को ही उलीचते रहे आब -ऐ -ईश्क़ न मिला तिश्नगी अपनी पीते रहे शब्, ग़मे अब्र खूब बरसे जिस्मो जाँ से भीगते रहे मुकेश दीवारे हया न टूटी जबकि रोज़ ही मिलते रहे मुकेश इलाहाबादी -----

बुझा के चराग़ सोचता है

बुझा के चराग़ सोचता है जालिम, की अब उजाला न होगा  उसको क्या मालूम दिल मेरा किसी आफताब से कम नही   मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------- -----

रोशनी कुछ इस तरह किया जाये

रोशनी कुछ इस तरह किया जाये बुझा के चराग़ चाँद उगा दिया जाए मुहब्बत की आग और भड़काता है कि चेहरे से नक़ाब हटा दिया जाये मेरे हाथों से सारी लकीरे मिटा कर सिर्फ महबूब का नाम  लिखा जाए उसने मेरी मुहब्बत क़ुबूल कर ली उसके  साथ  मेरा नाम लिया जाए किताबे ज़ीस्त में उसका ही नाम हो मुकेश, बाकी  हर्फ़ मिटा दिया जाये  मुकेश इलाहाबादी --------------------

ओस हूं मै,धूप होते ही बिखर जाता हूँ

ओस हूं मै,धूप होते ही  बिखर जाता हूँ  फूल  सा जिस्म छू दे तो संवर जाता हूं  मै वो दरिया नही कि जो समंदर  ढूंढूं  जहां - जहां सहरा है मै उधर जाता हूं  तू मेरे पीछे पीछे आ,और आ कर देख शाम के बाद मै किधर किधर जाता हूँ   चाँद हूं, फ़लक मेरा आसियाना, रात   तेरी झील सी आखों मे उतर आता हूं मुकेश, मै बंजारा, चलना मेरी आदत ये अलग बात तेरे दर पे ठहर जाता हूं मुकेश इलाहाबादी ----------------------

ऑखें दो से चार होना चाहती हैं

ऑखें दो से चार होना चाहती हैं बातें कुछ खाश करना चाहती हैं बदलियां नीर से भर चुकीं, अब कहीं न कहीं बरसना चाहती हैं देखो हो गया है मौसम सुहाना दिले कलियॉ खिलना चाहती हैं मेरे प्यार व जज्बातों की बुलबुल तुम्हारे संग चहकना चाहती है छोडो, गिले शिकवे चले आओ बहारें तुमसे मिलना चाहती हैं मुकेश इलाहाबादी -------------

नशे मे नही दर्द से बोझिल है ऑखें

नशे   मे नही दर्द से बोझिल है ऑखें जाने कितने ग़मो से गाफिल हैं ऑखें यूं देखों तो बडी मासूम सी लगती हैं ईश्क की साजिश मे शामिल हैं ऑखें बेवजह दिल को लोग देते हें इल्जाम हमसे पूछों, कितनी क़ातिल हैं ऑखें तमाम जज्बातों का दरिया समेटे हुये आशिक  के लिये तो साहिल हैं ऑखें मुकेश, जहां चुप हों जायें हैं अल्फाज  हर वो बात कहने मे काबिल हैं ऑखें मुकेश इलाहाबादी -------------------

रोशनी लापता थी

रोशनी  लापता थी शाम  ग़मजदा थी चॉद तो उगा था पर   चॉदनी  बदगुमा थी बादलों मे आग औ तेजाब सी हवा थी मीलों लम्बा रास्ता  सर्द -सर्द  फिजा थी और मै क्या कहूं ? ज़िदगी   ख़फा  थी मुकेश इलाहाबादी --