Posts

Showing posts from October, 2017

दरिया में आग लगा देती है

दरिया में आग लगा देती है इस अदा से मुस्कुरा देती है गुज़र जाए जिधर से भी वो  गली व शहर महका देती है उसकी बातों में अजब जादू हर किसी को बहका देती है बादल भी टूट के बरस जाएँ  जब अपने गेसू लहरा देती है  मुकेश हँसने पे आ जाए तो हज़ारों मोती बिखरा देती है मुकेश इलाहाबादी ----------

तूने जो घूँघट उठा दिया होता

तूने जो घूँघट उठा दिया होता शहर में उजाला हो गया होता तू अपने गीले गेसू झटक देती कोई नदी नाला न सूखा होता नज़र भर देख लेती जो तुम,, मुकेश यूँ दीवाना न बना होता मुकेश इलाहाबादी -------------

जैसे जैसे सांझ कजराती है

जैसे जैसे सांझ कजराती है तुम्हारी बहुत याद आती है मै लौट गया होता कब का तेरी मुहब्बत बुला लाती है ज़िन्दगी मेरी मज़बूरी पर हँसती है, खिलखिलाती है तन्हाई की बुलबुल मुझको रोज़ इक ग़ज़ल  सुनाती है तुझसे कभी मिला नहीं पर ख्वाबों  में  तू रोज़ आती है मुकेश इलाहाबादी ---------

बातों के फूल भी खिलाया करो कभी - कभी

बातों के फूल भी खिलाया करो कभी - कभी हंसो नहीं तो मुस्कुराया ही करो कभी- कभी तुम नहीं आते जाते हो कंही कोई बात नहीं मुझी को अपने घर बुलाया करो कभी-कभी हर बार हमी अपनी दास्ताने सफर सुनते हैं तुम भी तो दुःख दर्द बताया करो कभी कभी औरों के संग तो हमेशा खेलते कूदते रहते हो चंद लम्हे मेरे संग भी बिताया करो कभी कभी मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

दोस्त ! दर्द किसके जिगर में निहां नहीं है ?

दोस्त ! दर्द किसके जिगर में निहां नहीं है ? कोई बयाँ कर देता है, कोई कहता नहीं है !! ये अलग बात हमने कभी पलट वार न किया वरना अपने कानो से क्या क्या सुना नहीं है!! बेवज़ह मेरा दिले दरवाज़ा खटखटा रहे हो ?? इस बेजान घर में अब कोई रहता नहीं है !! मुकेश इलाहाबादी -------------------------

दीप हो तुम दिवाली हो तुम

दीप हो तुम दिवाली हो तुम घरभर की खुशहाली हो तुम कौन कहता है सिर्फ पत्नी हो रिद्धि- सिद्धि, लक्ष्मी हो तुम हो लाई लावा खील बताशा अक्षत,फूल व रोली हो तुम अन्नपूर्णा, हो हम सब की छप्पन भोग मिठाई हो तुम चकरघिन्नी सा नाचती हो हँस दो तो फुलझड़ी हो तुम मुकेश इलाहाबादी -----------

ग़ैर नहीं अपनी सी लगती है अब तो

ग़ैर नहीं अपनी सी लगती है अब तो ये तन्हाई बहुत बतियाती है अब तो  स्याह रात किसी लिहाफ से कम नहीं सांझ होते ही लिपट जाती है अब तो जवानी में ईश्क़ के बारे में सोचा नहीं    इक साथी की कमी खलती है अब तो याद आते हैं गुनाह अपने तो, मेरी ही  रूह मुझसे ही लड़ने लगती है अब तो  मुकेश इलाहाबादी --------------------

जाने कौन सा जादू जानते हो संवरते जा रहे हो

जाने कौन सा जादू जानते हो संवरते जा रहे हो उम्र बढ़ने के साथ -साथ और खिलते जा रहे हो कौन सी नदी या फुहारे में  नहाते हो तुम जो ? जिधर से गुज़रते हो इत्र सा महकते जा रहे हो मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

तुम्हे छू लेना चाहता हूँ

मै तुम्हे छू लेना चाहता हूँ बिलकुल वैसे ही जैसी सुबह की ठंडी बयार छू कर गुज़र जाती है किसी ताज़े खिले फूल को और फिर देर तक महकती रहती है छत पे मुकेश इलाहाबादी -------------------------

मशालें कंही खो गयी

हैलोजम और नियॉन बल्ब की रोशनी में मशालें कंही खो गयी हैं आओ एक बार फिर चलें हम मनाने चलें उन हाथों को जो मशालें लिए आगे - आगे चला करते थे लड़ने के लिए अँधेरे एक ख़िलाफ़ मुकेश इलाहाबादी -------------

ऐसा क्यूँ होता है ?

ऐसा क्यूँ होता है ? राजा और सत्ता को सिर्फ फ़ैली हुई हथेलियां ही अच्छी लगती हैं ? ऐसा क्यूँ होता है ? जब, फ़ैली हुई हथेली मुट्ठी में तब्दील हो जाती है तो सत्ता को उसमे से बग़ावत की बू आने लगती है , मुकेश इलाहाबादी -----------------------

हे गंगे, अच्छा होता, तुम

हे गंगे, अच्छा होता, तुम पाप के साथ- साथ पुण्य भी धो देतीं क्यूँ कि पाप के बोझ से  ज़्यादा पुण्य के अहंकार से धरती पाताल में धंसती जा रही है मुकेश इलाहाबादी --------------

जब भी तुम खुश हो

जब भी तुम खुश हो हँसना खूब हंसना जोर जोर से उड़ना चिड़िया सा या फिर फुदकना गिलहरी सा और नाचना आंगन में बड़े से घांघरे को गोल गोल फहरा के पर जिस दिन जी उदास हो मन रोने -रोने को हो किसी के कांधे पे सर रख सोने को मन हो बेशक - आ जाना मेरे पास मिलूँगा मै तुम्हे तुम्हारे इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी ----------------------

तेरी अदाओं की सोंधी मिट्टी

तेरी अदाओं की सोंधी मिट्टी को  चाहत के आब से गूंथ के वक़्त के चाक पे रख दिया है देखना एक दिन ईश्क़ का चराग़ ज़रूर मुकम्मल होगा जिसकी रोशनी से रौशन होंगे हमारे, दिन और रात मुकेश इलाहाबादी ------------------