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Showing posts from June, 2016

ख्वाबों के असमा

ख्वाबों के असमा को चांद सुनहरा चाहिए मुकेश जो सिर्फ मेरा हो साथी ऐसा चाहिए मुकेश इलाहाबदी ----------------------------

ख्वाबों के असमा

ख्वाबों के असमा को चांद सुनहरा चाहिए मुकेश जो सिर्फ मेरा हो साथी ऐसा चाहिए मुकेश इलाहाबदी ----------------------------

sumi ke jawaab

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"सुनो सुन रहे हो ना , ख्वाहिशें कब मार दी तुमने मन में , जानते हो ना , मै भी तुम्हारी ही ख्वाहिश हूँ हूँ ना कहो........... जानती हूँ...मै.....हूँ अमरबेल सी ,तुमसे ही लिपटी तुमसे ही जन्मी तुमसे ही उपजी जानते हो ये अमर बेल की फितरत होती है आश्रित होती है जैसे मै तुम पर.........समर्पित ये समर्पण देखा होता तो यूँ ना मारते ख्वाहिशों को ,मगर नहीँ देखा तुमने , मेरा तुमसे जुड़ा होना , जी चाहता है तुम्हारे सीने पर हाथ रख दूँ , जगा दूँ मुरझाई ख्वाहिशें , उदास होंठों पे अपनी हँसी रख दूँ , मुझे तलाशती आँखो में , मेरा अक्स भर दूँ , तुम्हारी पीठ से टिक कर खो जाऊँ तुम्हारे , शब्दों के संसार में , मगर नहीँ हो सकता ऐसा , तुम भी जानते हो ,मै भी , क्योंकि...........मै नहीँ हूँ नहीँ हूँ बिल्कुल नहीँ , मै नहीँ तुम्हारी , "सुमि " अलविदा सुनो , तुम सुन रहे हो ना ? ये सहरा की रेत कब भर ली तुमने अपने अंदर ,जानती हूँ , वजूद तुम्हारा रेत सा ही तो है ,देखी है रेत की फितरत ,मुट्ठीभर उठाओ ,एक एक कण अलग , तुम भी ऐसे ही हो ,सब में रह कर सब से अलग ,रेत...

अाँखों मे ख़्वाब अाने दे

अाँखों मे ख़्वाब अाने दे गुल ए ईश्क खिलाने दे ज़माने से  गमज़दा हूँ थोड़ा तो  मुस्कुराने दे खिड़कियों को खोल दे   ताजी हवा तो, अाने दे जिस्म के ठंडे लहू मे कुछ तो उबाल अाने दे तेरे अरीज़ पी ये लट,, मुकेश को हटाने तो दे मुकेश इलाहाबादी -----

जब तुम चुप रहती हो

जब तुम चुप रहती हो अॉर कुछ नही बोलती या फिर मे्रे लतीफों पे मुस्कुराना चाह के भी नही मुस्कुराती, या कि खुल के हँसना चाह के भी नही हँसती सच तब ऐसा लगता है जैसे, कोई बच्चा जिद्दन मा की जोद से नही उतरना चाहता या कि, चांद बादलों से बाहर नही अाना चाहता है या कोई, पहाड़ी नदी घाटियों मे ही उमड़ - घुमड़ के रह जाए अॉर मैदान मे न उतरे पर, तुम मुझे उस चुप्पी मे भी बहुत अच्छी लगती हो सच बहुत प्यारी लगती हो तुम मेरी प्यारी सुमी 

शहर भर मे अपना चर्चा है तो हुअा करे

शहर भर मे अपना चर्चा है तो हुअा करे ज़माना बदनाम करता है तो किया करे मै तो अपने अाशिक की इबादत करूंगा कोई मुझे काफ़िर कहता है तो कहा करे मुकेश इलाहाबादी ------------------------

सज़ा ही सज़ा हो गई

सज़ा ही  सज़ा हो गई ज़ीस्त बे मज़ा हो गई तुमसे लड़ाई की फ़िर तुम्ही से रजा हो गई बहार  मुस्काना  तेरा नाराज़गी क़ज़ा हो गई मुकेश इलाहाबादी ---

ज़िंदगी तनाव मे है

ज़िंदगी तनाव मे है नदी के बहाव मे है पतंग कैसे उड़ेगी ? हवा के दबाव मे है तुम्हारी सारी यादें मे्रे रखरखाव मे है मुकेश कुछ अंगारे देख तो कुछ अंगारे इस बुझे अलाव मे है मुकेश इलाहाबादी --

यूँ सज संवर के अईना न देखा करो!

यूँ सज संवर के अईना न देखा करो!   अाईने के भी दिल कांच के होते हैं ! मुकेश इलाहाबादी -------------------

चाहत थी, उजाला हो,

चाहत थी, उजाला हो, और, मैंने पी लिया  ढेर सारा अँधेरा अब मैं, जल रहा हूँ - सूरज की तरह कभी चाहा था, भर लूँ चाँद को बाँहों में और मैं, उड़ने लगा आसमान में बादलों सा सुमी ! सुन रही हो न ?? मुकेश इलाहाबादी -- 

देखना ! फूल सा महकेंगे

देखना ! फूल सा महकेंगे अब्र के बादल सा बरसेंगे बहुत दिनों  बाद मिले  हैं अब, ये देर तक  चहकेंगे   दोनों अपना  सुख - दुःख इक दूजे से कहेंगे -सुनेंगे बिछड़ कर फिर ये दोनों बहुत देर तक सिसकेंगे यादों वादों और, बातों  के लम्बे -लम्बे ख़त लिखेंगे उदास तनहा लम्हों में ये मुकेश की  ग़ज़लें सुनेंगे मुकेश इलाहाबादी -------

काश !! मेरे पास कोई ऐसा गुल्लक होता

काश !! मेरे पास कोई ऐसा गुल्लक होता जिसमे मैं अपने हिस्से में मिले दिनों से थोड़ा -थोड़ा वक़्त बचा के रख लेता और उसे उस वक़्त खर्च करता जब तुम मुझसे मिलने बहुत थोड़ा वक़्त ले के आती मुकेश इलाहाबादी -----------

रात एक नदी है

रात एक नदी है और तुम्हारे ख्वाब एक नाव जिसपे बैठ के मैं रोज़ पार करता हूँ इस नदी को मुकेश इलाहाबादी ---

मैंने भी मुखौटा लगा लिया है

मैंने भी मुखौटा लगा लिया है अब मुझे भी ज़िंदगी जीने में सहूलियत हो गयी है मुकेश इलाहाबादी ------------ 

झूठ के पाँव नहीं होते

झूठ के पाँव नहीं होते फिर भी सच से ज़्यादा तेज़ दौड़ता है मुकेश इलाहाबादी --

ऎ फ़लक़ तू ही बता कि,अब मै क्या करूँ ?

ऎ फ़लक़ तू ही बता कि,अब मै क्या करूँ ? अपनी हद कम कर लूँ या तुझसे बातें करूँ ? मुकेश इलाहाबादी -----------

कस्तूरी गंध के लिए

मैं अपने तीरो कमान सहित भाग रहा हूँ आखेट के लिए तुम्हारे पीछे पीछे और तुम मुझे भगा रही हो   एक चतुर मृगी की तरह और मैं पागल हुआ जा रहा हूँ तुम्हारी देह से निकलती कस्तूरी गंध के लिए मुकेश इलाहाबादी ---------------