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Showing posts from April, 2015

सडक एक नदी है। बस स्टैण्ड एक घाट।

सडक एक नदी है। बस स्टैण्ड एक घाट। इस नदी मे आदमी बहते हैं। सुबह से शाम तक। शाम से सुबह तक। रात के वक्त यह धीरे धीरे बहती है। और देर रात गये लगभग रुकी  रुकी बहती है। पर सुबह से यह अपनी रवानी पे रहती है। चिलकती धूप और भरी बरसात मे भी बहती रहती है । भले यह धीरे धीरे बहे। पर बहती अनवरत रहती है। सडक एक नदी है इस नदी मे इन्सान बहते हैं। सुबह से शाम बहते हैं। जैसा कि अभी बह रहे हैं। बहुत से लोग अपने घरों से इस नदी मे कूद जाते हैं। और बहते हुये पार उतर जाते हैं। कुछ लोग अपने अपने जहाज ‘कार व मोटर’ मे बैठ कर इस नदी को पार करते हैं।  जैसे यह चौडा मोड इस नदी का एक घाट है। उसी तरह इस नदी के किनारे किनारे तमाम घाट हैं। लोग इस घाट पे इकठठा होते हैं फिर बहुत सी नावें आती हैं। जिसमे लद के ये लोग पार उतर जाते हैं या दूसरे घाट  लग जाते हैं। मै जब सुबह इस घाट पे अपनी नाव याने की बस पे बैठने के लिये पहुंचूंगा। तब तक न जाने कितनी नावें आके जा चुकी हांगी।  न जाने कितने आदमी बह चुके होंगे इस नदी से इस घाट से इस चौडा मोड के घाट से। और न जाने कितने लोग बहने के लिये या उस पार जाने के लिये या...

तुम्हारे खततुम्हारी तस्वीरतुम्हारे संग बिताये लम्हों के संग

तुम्हारे खत तुम्हारी तस्वीर तुम्हारे संग बिताये लम्हों के संग गाड आया था घर के पिछवाडे आंगन मे ताकि भूल जाउं तुमको तुम्हारी यादों के संग और भूल भी गया था लगभग पर तुम्हारी यादों ने आकाश,हवा,मिटटी,बादल व रोशनी के संग जाने क्या साजिश की कि उग आया एक बिरुआ मेरे आंगन मे ठीक उसी जगह जहां गाड आया था तुम्हारी यादें आज,वह बिरुआ हरश्रंगार का एक बडा सा पेड बन कर झूमता है मेरे आंगन मे और महमहाता है रात भर और गमगमाता है दिन भर और एक बार फिर मै डूब जाता हूं तुम्हारी स्म्रतियों मे और मै भूल जाता हूं तुम्हे भूलने की बात मुकेश इलाहाबाद ................................................

रोशनी एक नदी है

रोशनी एक नदी है जिसमे तैर कर हिलग कर हम पहुंच जाते हैं इस पार से उस पार अपने गंतव्य तक पर रोशनी का विलोम अँधेरा एक समुद्र है जिसमे डूब कर हम किसी किनारे नहीं पहुँचते इस लिए बचो अँधेरे से चाहे वह अंदर का हो या  बाहर का मुकेश इलाहाबादी -----------------

जब अंधेरा लील चुका होता है

जब अंधेरा लील चुका होता है दिन को और सब कुछ डूब चुका होता है एक काली नदी मे तब खिडकी से चॉद मुठठी भर रोशनी फेंकता है मेरे कमरे मे और मै मुस्कुरा देता हूं मुकेश इलाहाबादी ......

तुम मगरूर हो तुमसे पूछा न जाएगा,

तुम  मगरूर  हो तुमसे पूछा न जाएगा, हमसे भी हाल ऐ दिल बताया न जाएगा वो कोई और होंगे, ईश्क में गुलामी करें हमसे ये नाज़ो नखरे उठाया न जाएगा आज नहीं तो कल इज़हार हो ही जाएगा ईश्क होगा तो तुमसे छुपाया न जाएगा अभी हम तुम अकेले हैं बता दो वरना सरे महफ़िल, तुमसे जताया न जाएगा मुकेश इलाहाबादी -------------------

जब भी मै कोई प्रेम गीत गाना चाहता हूँ

जब भी मै कोई प्रेम गीत गाना चाहता हूँ मै, और बेसुरा हो जाता हूँ मुँह से सिर्फ फों फों की आवाज़ आती है इसके बावजूद कोशिश करूँ तो मेरा प्रेम गीत शोक गीत में तब्दील हो जाता है तब मेरा अधेड़ और पकी दाढ़ी वाला चेहरा और भी ग़मगीन व मरा - मरा लगता है  और मेरी बीबी इस बेसुरे गीत को सुन के अपने तमाम दुखों के बावजूद मुस्कुरा के किचन में काम करने चली जाती है यह कह के कि अब तुम्हारी उम्र नहीं रही प्रेम गीत गाने की मुकेश बाबू मै तुमसे पूछना चाहता हूँ क्या सचमुच में प्रेम गीत गाने की कोई उम्र होती है या फिर प्रेम गीत सिर्फ कुछ लोग ही गा सकते हैं जिनके बाल व दाढ़ी काली हो और जिन्हे कोई  दाल रोटी की फिक्र न हो ? और उनके गाल मेरी तरह पिचके न हों मुकेश इलाहाबादी -----------------------

कुछ चीज़ें होती हैं और सिर्फ होती हैं

कुछ चीज़ें होती हैं और सिर्फ होती हैं जैसे कि, गुलाब,गुलाबी होता है और खूबसूरत होता है आसमान नीला होता है भव्य और प्यारा दिखता है कोयल जब भी बोलती है कानो को अच्छा लगता है बिना सरगम जाने भी उसी तरह तुम भी मुझे अच्छी लगती हो बस कह दिया न अच्छी लगती हो मुकेश इलाहाबादी ----------  

जिन्हे हम कम जानते हैं

अक्सर जिन्हे हम कम जानते हैं उनके बारे मे ज़्यादा सोचते हैं और बहुत कम सोचते हैं जिनके बारे में बहुत ज़्यादा जानते हैं इसे तरह दुनिया से बाख़बर और नज़दीकियों से बे- खबर होते हैं घर में माँ कई दिनों से बीमार है कई दिनों से बुखार है नहीं पता, मगर शाहरुख़ खान और मोदी को छींक आयी है पता है तुम्हे क्या मालूम मुकेश बाबू ? यही दुनिया है और दुनिया ऐसी ही है और ऐसी ही रहेगी मुकेश इलाहाबादी -----------------

हुस्नो ईश्क की आग में जलने का मज़ा ही कुछ और है

हुस्नो ईश्क की आग में जलने का मज़ा ही कुछ और है हज़ारों फना हो गए और सैकड़ों कतार मे हैं मुकेश जी मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------

सूरज के खिलते ही इठलाकर खिलता है सूरजमुखी ,

सूरज के खिलते ही इठलाकर खिलता है सूरजमुखी , शरमा कर लेकिन नजरें झुका लेता है तब जब, तुम नहाकर सूरज को देती हो जर्लाध्य तुम्हारे हंसने से खिलता है गुलाब और झरते हैं हरश्रंगार जिसकी खुशबू से महमहा जाते हैं मेरे दिन और रात मुकेश इलाहाबादी ---

आज भी दिल किसी के हिज़्र औ तस्सवुर में रहा आया

आज भी दिल किसी के हिज़्र औ तस्सवुर में रहा आया सुबह से शाम तलक दिले नादाँ कल सा मायूस पाया जब - जब फुर्सत रही दिल खयाले यार में मशगूल रहा मुहब्बत है ही ऐसी शै जिसमे हर इंसा को डूबता पाया मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

साथ अजनबी सा कोई कारवाँ मे रहे,,

साथ अजनबी सा कोई कारवाँ मे रहे,, ज़िदंगी अक्सर यूँ भी तो बीत जाती है मुकेश इलाहाबादी ----------------------

दुःख, सिर्फ दुःख होता है

थोड़ी छाँव और ज़्यादा धूप  में बैठी बुढ़िया भी अपने चार करेले और दो गड्डी साग न बिकने पर उतना दुखी नहीं हैं जितना नगर श्रेष्ठि नए टेंडर न मिलने पर है कलुवा हलवाई  की भटटी सुलगाते हुए अपने हम उम्र बच्चों को  फुदकते हुए नयी नयी ड्रेस और बस्ते के साथ स्कूल जाते देख भी उतना दुखी नहीं है जितना सेठ जी का बेटा रिमोट वाली गाड़ी न पा के है प्रधान मंत्री जी हज़ारों किसान के सूखे से मर जाने की खबर से भी उतने दुखी नहीं हैं जितना कि मुकेश बाबू आज कविता न लिख पाने की वज़ह दुखी  हैं शायद ऐसा इसलिए है कि दुःख, सिर्फ दुःख होता है जो सहन शक्ति के समानुपाती बड़ा और छोटा होता है  मुकेश इलाहाबादी -------

शाम सिंदूरी है

तुम्हारे न रहने के बावजूद शाम सिंदूरी है तुम होती तब भी इतनी ही सिंदूरी होती ये शाम हाँ ! इतना ज़रूर होता कि कुछ और रंग उभर आते मेरी आखों में तेरी आखों में और तब यह शाम एक अलग तरह की सिंदूरी शाम होती मुकेश इलाहाबादी --

मुहब्बत भी ज़रूरी है

मुहब्बत भी ज़रूरी है ज़िंदगी वर्ना अधूरी है हाले दिल कह तो  दूं हया मेरी मज़बूरी है जिस्म है पास - पास मगर दिलों में दूरी है चिलमन से झांको तो शाम कित्ती सिंदूरी है ज़रा आईना भी देखो  आरिज़ तेरे अंगूरी हैं मुकेश इलाहाबादी ---

दिल में तेरी याद रहती है

दिल में तेरी याद रहती है लबों पे फ़रियाद रहती है उजड़ा उजड़ा दिले -मकाँ उदासी आबाद रहती है है तीरगी मेरा हमसाया वो शाम के बाद रहती है तुम्हारे जाने के बाद से तबियत नाशाद रहती है मुकेश इलाहाबादी ---------

सुना था, दिन के बाद रात होती है

सुना था, दिन के बाद रात होती है हिज़्र  के  बाद  मुलाक़ात  होती है मुझे ऐसी ज़िंदगी दी, मेरे मौला ने न ये बात होती है न वो बात होती है मुकेश इलाहाबादी -------------------

ऐसा भी नही कि उनसे गुफ़्तगू न हुई

ऐसा भी नही कि उनसे गुफ़्तगू न हुई हाल ऐ दिल छोड़, हर बात पे चर्चा हुई मुकेश इलाहाबादी --------------------

दिल मे बेकली सी है

दिल मे बेकली सी है कहीं बिजली गिरी है शब भर रोये हो क्या इन ऑखों मे नमी है दर्दो ग़म की गठरी से पीठ व कमर झुकी है दिल के बहुत नरम हो यही  तो तेेरी कमी है मुकेश झुलस जाओगे, ईश्क आग की नदी है मुकेश इलाहाबादी --

बिखरा - बिखरा मंज़र और मै

बिखरा - बिखरा मंज़र और मै उदास - उदास  शहर  और   मै इक लम्हे को  भी आराम नही भागता - दौड़ता शहर  और मै धूप - पानी , आंधी  सह  चुकी उजड़ी - उजड़ी दीवार  और  मै स्याह, जान लेवा शब के बाद यह ज़र्द - ज़र्द  सहर और  मैँ  दूर -दूर तक कोई साहिल नहीं यह हरहराता  समंदर और मै मुकेश इलाहाबादी -------------