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Showing posts from November, 2014

हर धुन पे कोई गा सके वो गान नही हूं

हर धुन पे कोई गा सके वो गान नही हूं हर साज पे बजा ले मै वो राग नही हूं खिलता हूं फूल सा अपने महबूब के लिये कोई भी सजा ले बालों में वो हार नही हूं ज़माने भर की दास्तां छपी है रुह मे मेरी हर कोई पढ़ले मुझे मै वो अखबार नही हूं हजारों ज़ख्म खाये हैं जमाने से हमने पर तमाम ग़म ले कर भी मै अश्कबार नही हूं मुकेश उम्रभर जोडा किये टूटे दिल हमने जिस्मों जॉ पे वार करे वो तलवार नही हूं मुकेश इलाहाबादी --------------------------  

आसमाँ पे अपने ख्वाब लिखूंगा

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आसमाँ पे अपने ख्वाब लिखूंगा बादल से मांग के आब लिखूंगा दहकते हुये दिल की ज़मीन पर हिज्र की रात व बरसात लिखूंगा मांगके आबनूसी गेसुओं से स्याही पलकों पे प्यार का जवाब लिखूंगा ये फूलों सा बदन, झरने सी हंसी तेरी हर अदा लाजावाब लिखूंगा मुकेश ग़जल मे मै अपनी तुम्हे ज़मीं  पे खिला महताब लिखूंगा मुकेश इलाहाबादी ---------------

हथेली पे चाँद उतर आने दो

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हथेली पे चाँद उतर आने दो ख़्वाब हकीकत हो जाने दो रात को शमा की ज़रुरत है अपना घूंघट तो हटाने दो ये दो जिस्म दो किनारे हैं मुहब्बत का पुल बनाने दो ईश्क में दूरियां अच्छी नहीं कुछ और नज़दीक आने दो मेरे पहलू में दो पल बैठ के   मुकेश को भी मुस्कुराने दो   मुकेश इलाहाबादी ---------

तुमको मुझसा न मिला

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तुमको मुझसा न मिला मुझको बावफा न मिला शबें हिज्र ग़मज़दा रहीं चॉद चमकता न मिला बाद मेे तुझको ढूँढा बहुत तेरा अता - पता न मिला इबादत मे  ही  कमी थी मुझे मेरा खुदा न मिला पूरा मेला घूम आये पर कोई तुम जैसा न मिला मुकेश इलाहाबादी .....

कई - कई मुखैटे लगा लेता हूं मै

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कई - कई  मुखैटे लगा लेता हूं मै रोज अनकों किरदार निभाता हूं मै घर में पिता पति भाई व बेटा हूं तो ऑफिस मे नौकर बना रहता हूं मै सांझ घर वापस आउं इसके पहले ही इक झूठी मुस्कान चिपका लेता हूं मै बेटा मुझसे खिलौना मॉगे इसके पहलेे उसे नये बहाने से बहला देता हूं मै पत्नी राशन लाने के लिये कहती है बडी बेचारगी से उसे  निहारता हूं मै     अपने शहर में इक शरीफ इन्सांन हूँ महफिलों मैं शायर बन जाता हूं मै आइने में जब अपने को देखता हूं तो खुद को इक जोकर नजर आता हूं मै मुकेश इलाहाबादी ----------------------

हम घर फूंक आये, भले सिंकदर तो नही

हम घर फूंक आये, भले सिंकदर तो नही येे मेरी मस्ती है, मै कोई कलंदर तो नही मै दरिया हूँ मेरी मौज़ों से तुम खेलो ज़रा डूबने से मत डरो मै कोई समंदर तो नहीं मुकेश इलाहाबादी --------------------------

जिस्मो जॉ के क़रीब लगता है

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जिस्मो जॉ के क़रीब लगता है ग़म भी मुझे अज़ीज लगता है इतनी नफरतें पायी हैं हमने कि लफजे़ मुहब्बत अजीब लगता है   यूँ तो हर कोई दौलतमंद मिलेगा दिलसे हर शख्श ग़रीब लगता है चॉद बादल की बाहों मे छुप गया   मुझको ये बादल रक़ीब लगता है ये बेरुखी बेवफाई और तन्हाइयां ये अंधेरा ही मेरा नसीब लगता है मुकेश इलाहाबादी --------------------

जिन्दगी मेेरे दर पे सराब रख गयी

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जिन्दगी मेेरे दर पे सराब रख गयी रात मेरे सिरहाने ख्वाब रख गयी लिखा था ख़त, मैने बडी उम्मीद से खाली स़फ़े का वह जवाब रख गयी जब मैने उससे जवाब के लिये कहा किताब में छुपा के गुलाब रख गयी मुंडेर पे बैठी कोयल थी वो,उड गयी ऑखों को गंगा और चनाब दे गयी फिर मैने उससे बेरुखी की बात की तमाम मुलाका़तों का हिसाब दे गयी मुकेश इलाहाबादी --------------------

अभी प्रातः सुन्दरी अंगडांइयां ले रही थी

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अभी प्रातः सुन्दरी अंगडांइयां ले रही थी कि ऑख खुल गयी। खिडकी के बाहर झांक के देखा, बाहर उजाला अपने पंख फडफडा रहा था। सडक पे कार मोटरों की आमदरफत शुरु हो चुकी थी। पक्षियों का झुडं का झुड अपने अपने नीड छोड के  दाना दुनका की तलाश में चहचहाते हुए निकल चुके था। चौकीदार अपना डंडा एक दो बार फिर से सडक पे यूं ही फटकार के चाय की गुमटी पे बैठ चुका था। चाय वाला दुआ सलाम करके फिर से अपनी भटटी को गरम करने में लग चुका था। भटटी सुलगने के पहले ढेर सारा धुंुआ उगल रही थी। सडक का आवारा कुत्ता रात भर भोंक कर वहीं किनारे अपनी पुछं पीछे दबा के और अगली दो टांगों के बीच अपनी मुॅह रख के सो चुका था। पेड पे पत्तियां धीरे धीरे डोल रही थीं जबकि कुछ पेड बिलकुल समाधिस्थ सा खडे थे। कलियां खिलने की तैयारी में थीं कुछ तो खिल के मुस्कुरा भी रहीं थीं जबकि रातरानी अपने आंचल से ढेर सारे फूल गिरा के माहौल का महमहा चुकी थी जिसकी खुशबू खिडकी से आ आ कर ताजगी दे रही थी। इसी ताजगी ने बिस्तर छोडने पे मजबूर कर दिया और मै एक और व्यस्त व तनाव भरे दिन की तैयारी में जुट गया। रोज या स्नान ध्यान और नास्ते के बाद लैपटाप पे बैठा ह...

बदन मेरा भी रात भर सुलगता रहा

बदन मेरा भी रात भर सुलगता रहा और चॉद मेरी बाहों में पिघलता रहा बस इक बार मिला था उस फूल से बाद उसके मै उम्र भर महकता रहा यूं तो मेरी कम बोलने की आदत है मिल के उससे देर तक चहकता रहा मैने शराब पी नही, फिर भी जाने क्यूं उसके घर से निकल के बहकता रहा मुकेश ज़िंदगी कट गयी स्याह रात में इक उम्मीद का सितारा चमकता रहा मुकेश इलाहाबादी -------------------------

ईश्क के सिवा काम नही

ईश्क के सिवा काम नही कहीं भी चैनो आराम नही लोग मुझे कम जानते हैं पर मै कोई गु़मनाम नही अंधेरे से अपनी यारी है रोशनी का इंतजाम नही उस शख्स से प्यार किया जिससे दुआ सलाम नही हथेली पे तो धूप लिखी है मेरी लिये काई शाम नही मुकेश इलाहाबादी -------

कभी सुख तो कभी दुख लाती हैं जिंदगी

कभी सुख तो कभी दुख लाती हैं जिंदगी जाने क्या क्या येे रंग दिखाती है जिंदगी कभी दूर तक धूप ही धूप के मंजर मिलेगें कभी तो ये ठंडी छांव में सुलाती हैं ज़िंदगी पहले तो अपने जाल में फंसाती है सबको फिर हमारी मजबूरी पे मुस्काती है जिंदगी उम्र गुजर जाती है सुलझाने में इसको पै हर रोज नये तरीके से उलझाती हैं जिंदगी मुकेश ज़िदगी के कीचड से उबर गये तोे कंवल के फूल सा खिल जाती है जिंदगी मुकेश इलाहाबादी -------------------------

फितरत ए गुल लेकर पत्थर पे खिल नहीं सकता

फितरत ए गुल लेकर पत्थर पे खिल नहीं सकता मै दरिया की रवानी हूं आग से मिल नहीं सकता तुम मुझको पत्तियों पे गिरी ओस की बूंद समझो धूप ने ग़र सोख लिया, दोबारा मिल नही सकता आखिरी मुसाफिर के जाने तक यहीं गडा रहूंगा मै मील का पत्थर हूं, यहां से हिल नही सकता ये जरुरी तो नही हरबार मतलब से मिला जाये क्या बेगैर काम के कोई मिल-जुल नही सकता तुम्हारी इस खूं आलूदा खंजर सी जु़बां से मुकेश अपने ज़ख्मी दिल को हरगिज सिल नही सकता मुकेश इलाहाबादी ............................................ ....

सुलग रहे हैं हम अपने ही अलाव में

सुलग रहे हैं हम अपने ही अलाव में या कि बह रहे हैं वक्त के बहाव में ड़ालियां फूलों के बोझ सेतो नहीं पर झुक रही रही हैं ये हवा के दबाव में देखकर ज़्ामाने की रईसी लगता है बीत रही है ज़िदगी कितने अभाव में सफरे जिंदगी का लुत्फ ही न लिया रास्ता कटगया यादों के रखरखाव में डूबने से हरगिज डरता नही है मुकेश छोड दिया खुद को चढते दरियाव में मुकेश इलाहाबादी ........................

आईना तो सच दिखा रहा था

आईना तो सच दिखा रहा था जाला, हमारी ही आखों में था दुनिया जिसे बेदाग़ समझती रही धब्बा, उसी केे दामन में था वो बहुत पहले की बात है जब लोग दो रोटी और दो लंगोटी में खुश रहा करते थे तुम ये जो राजपथ देखते हो कभी वहां पगडंडी हुआ करती थी और एक छांवदार पेड भी हुआ करता था ये तब की बात है जब लोग धन में नही धर्म में आस्था रखा करते थे खैर छोडो मुकेश बाबू इन बातों से क्या फायदा आओ काम की बातें करें या फिर क्रिकेट, मौसम या सटटाबाजार पे तजकरा करें मुकेश इलाहाबादी ...............

ऐ ज़माना तुझे आजमा लिया

ऐ ज़माना तुझे आजमा लिया तजरबा भी बहुत कमा लिया फूलों से एहसास ले कर मैंने काँटों से रिश्ता निभा लिया तुम कहते हो आँसू मोती हैं,, लो,पलकों पे मैंने सजा लिया मुझे भटकने का गिला नहीं आखिर मंज़िल तो पा लिया ज़िंदगी कब तक रूठी रहती मुकेश मैंने  उसे मना लिया मुकेश इलाहाबादी --------

यादों की जुगनू चमकते रहे

रात भर मै यूँ ही बहता रहा खाब की नदी में तैरता रहा यादों की जुगनू चमकते रहे देर तक उन्हें ही तकता रहा चाँद,सितारें,आसमाँ चुप थे पपीहा देर तक बोलता रहा अँधेरे में उँकड़ू बैठ कर मै तेरे बारे में ही सोचता रहा कोई नहीं था बोलने वाला अपनी ही साँसे सुनता रहा मुकेश इलाहाबादी -------

तुम्हारे बदन की रातरानी खुशबू अच्छी लगी

तुम्हारे बदन की रातरानी खुशबू अच्छी लगी सांवली रात चांदनी के लिबास में भली लगी तितलियों के पंख सी झपकती तुम्हारी पलकें रुप के महकते गुलशन में बेफिक्र उडती लगीं जब तुम अपने बाल लहरा के चलती हो सच तुम छलछलाती बलखाती इठलाती नदी लगीं कभी खामोशी कभी गुस्सा कभी खिलखिलाना तुम्हारी हर शोखियां और अदाएं प्यारी लगीं सादगी, मासूम हंसी व अपनी प्यारी बातों से तुम मुझे आसमान से उतरी कोई परी लगाी मुकेश इलाहाबादी ------------------------ --------

तुम्हारे पास भी कोई आईना नहीं है

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तुम्हारे पास भी कोई आईना नहीं है और मेरे पास सच का पैमाना नहीं है तमाम उम्र गुज़र गयी तुझे ढूंढने में तुम्हारे दर से कहीं और जाना नहीं है तुझसे दिल मिल गया तो बता दिया सबको अपनी दास्ताँ सुनाना नहीं है तेरे मासूम चेहरे की रोशनी ही बहुत मुझे कोई और चराग़ जलाना नहीं है किसी से भी पूछ कर देख लेना मुकेश शहर में हम जैसा कोई दीवाना नहीं है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

एक और हंसी रात होगी

एक और हंसी रात होगी चाँद तारों की बारात होगी आज फिर दिन पिघलेगा आज फिर बरसात होगी लम्हा - लम्हा मुस्कुराएगा जब तुमसे मुलाक़ात होगी ये दूरियां सब मिट जाएंगी दिल से दिल की बात होगी हर सिम्त फूल महकेंगे,औ खिली खिली क़ायनात होगी मुकेश इलाहाबादी ------------

डूबती आखों में सवाल ज़िंदगी का

डूबती  आखों  में सवाल ज़िंदगी का नशीली आखों में सवाल ज़िंदगी का मिला नहीं माक़ूल जवाब ज़िंदगी का मिलना बिछड़ना अंजाम ज़िंदगी का ज़माने वाले समंदर लिए फिरते हैं यहां खाली रह गया जाम ज़िंदगी का लगाया है जब से दिल तुमसे मुकेश रातों - दिन जागना काम ज़िंदगी का मुकेश इलाहाबादी ----------------- ------

आज भी मै,तेरी झील सी आँखों का तलबगार हूँ,

आज भी मै,तेरी झील सी आँखों का तलबगार हूँ, ये देख समंदर लौट गया मेरी दहलीज पे आकर मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

मुसलसल बारीसे ग़म थमती नहीं

मुसलसल बारीसे ग़म थमती नहीं ज़िंदगी मेरी इक ठाँव रुकती नहीं  लब तो उसके कंपकंपाते हैं, मगर अपने होठों से कुछ वो कहती नहीं   जी तो चाहे है ख़त उसे इक लिखूं उँगलियाँ थरथराती हैं चलती नहीं    एहसास की छछलाती नदी थी,जो बर्फ सी जम गयी, अब बहती नहीं   कि ज़िंदगी अपनी ज़िद पे अड़ी है लाख कहा पर वो  मेरी सुनती नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------------