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Friday, 15 February 2019

बाप - दादों की निशानी अच्छी लगती है

बाप - दादों की निशानी अच्छी लगती है
घर में कुछ चीज़ें पुरानी अच्छी लगती है

बच्चे कित्ता ही चम्पक चंदामामा पढ़ लें
उनको नानी की कहानी अच्छी लगती है

राष्ट्र को सूरत नही जिस्मानी ताकत नहीं 
भगत सिंह जैसी जवानी अच्छी लगती है 

हम रूहानी इश्क़जादे हैं हमें खूबसूरत नहीं
हमें  तो मीरा सी दीवानी अच्छी लगती है

मुकेश जिस्म की बात कभी करते नहीं हम 
हमको तो मुहब्बत रूहानी अच्छी लगती है

मुकेश इलाहाबादी --------------------------

Thursday, 14 February 2019

हंगामा मचा रहता है मेरे सीने में

हंगामा मचा रहता है मेरे सीने में 
कोई है जो चीखता है मेरे सीने में  

न सूरज न चाँद न सितारे है फिर    
कौन रोशनी रखता है मेरे सीने में  

रात होते ही बर्फ सा जम जाता हूँ 
दिन बर्फ सा गलता है मेरे सीने में

रह रह के चीख पड़ते हैं मेरे ज़ख्म
कौन है अंगार रखता है मेरे सीने मे

इस दिल मकाँ में कोई रहता नहीं 
फिर कौन टहलता है मेरे सीने में 

मुकेश इलाहाबादी --------------

Tuesday, 12 February 2019

ये जिस्म है कि मोम गलता जा रहा है


ये जिस्म है कि मोम गलता जा रहा है 
कुछ तो है जिस्म में, जलता जा रहा है 

न लहरें हैं अब न ज्वार भाटा आता है 
जिस्म का समन्दर जमता जा रहा है  

जैसे जैसे रोशनी का सफर तय किया 
अँधेरा अंदर ही अंदर बढ़ता जा रहा है 

न  इधर मंज़िल दिखाई दे न ही उधर 
फिर भी कारवाँ है कि बढ़ता जा रहा है 

तूफ़ान के आगे हैसियत कुछ भी नहीं 
चराग है कि अँधेरे से लड़ता जा रहा है 

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Thursday, 7 February 2019

सुबह होते ही

एक
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सुबह
होते ही सज जाती हैं
झूठ की चमकीली दुकाने
और सच ठिठका खड़ा है
फुटपाथ पे अपनी ठेलिया लिए दिए 

दो
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सुबह
होते ही जेब में
उम्मीद का सिक्का ले कर
चल पड़ता हूँ दुनिया के हाट में
दिन भर चिमकीली दुकानों को
देखने और हाट में घूमने के बाद
सांझ लौट आता हूँ
झोले में ढेर सारी निराशाओं को लिए दिए

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

Wednesday, 6 February 2019

दुपहरिया सूनसान सड़क पे

दुपहरिया
सूनसान सड़क पे 
धूप की चादर तनी हो
पसीना चुह चुहा रहा हो
तनबदन पे
अचानक
बदरिया बन छा जाओ
तुम,
बरसो खूब बरसो
मै भीगता रहूँ
देर तक बहुत देर तक
जब तक ये सूनी सड़क पार न हो जाए
तब तक

या, 
कि ऐसा हो
किसी दिन मै घुल जाऊँ
हवा में
और लिपट जाऊँ
तुम्हारे इर्दगिर्द खुशबू सा 

सच ! सुमी ऐसा हो तो कैसा हो ????

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

Tuesday, 5 February 2019

किसी दिन ऐसा हो तो कैसा हो ??

फूल खिलें
और ! खिले ही रह जाएं
अपनी खुशबू और ख़ूबसूरती लिए दिए

सुबह ! सूरज की किरणों के उतरने के साथ ही
बुलबुल मुंडेर पे आ बैठे
पंचम सुर में गाए और
गाती ही रहे अनंत काल तक

ठीक उसी वक़्त
जब तुम मुझसे मिलने आई हो
हर साल की तरह बसंत आये
और ठिठक जाए द्वारे मेरे

या कि, ठीक उसी वक़्त
जब मै मल रहा होऊँ गुलाल
तुम्हारे गालों पे
फागुन आये और ठहर जाए
जैसे खिल के ठहर गया है
ये काला तिल तुम्हारे गालों पे

हमेशा - हमेशा के लिए

सच ! सोचो सुमी किसी दिन
ऐसा हो तो कैसा हो ??

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

Monday, 4 February 2019

तुम्हारी , यादें

तुम्हारी ,
यादें 'व्हाट्स ऐप ' के मेसेज नहीं 
जिन्हे डिलीट कर
दुसरे के मेसेज सेव कर लूँ

तुम्हारी हंसी
कोई इमोजी नहीं जिसे
जिसे फॉरवर्ड कर
किसी और के साथ शेयर कर सकूँ

और - अगर तुम्हारी यादें
खूबसूरत मेसेज 
और मेरा दिल एंड्रॉइड फ़ोन
तो तुम्हारी यादों के मेसेज
मेरे वो प्राइवेट मेसज हैं
जिन्हे मै हरगिज़- हरगिज़ शेयर नहीं कर सकता
किसी से भी कभी भी

ये बात कान खोल कर सुन लो
और समझ लो
मेरी सुमी !
मेरी प्यारी सुमी

मुकेश इलाहाबादी ---------------------