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Wednesday, 17 January 2018

न कोई शोर न कोई शराबा हुआ

न कोई शोर न कोई शराबा हुआ
क़त्ल जब मेरे एहसासों का हुआ

हम ही सबको अपना मानते रहे
कोई आज  तक  न  हमारा हुआ

ये पहली बार नहीं जब दिल टूटा
कई बार मेरे साथ ये हादसा हुआ 

मिलने आ जाओ कभी सहरा में
दिख जाऊँगा रेत् सा बिखरा हुआ

कोई तो बता दे कँहा मेरी मंज़िल
मै हूँ इक मुसाफिर भटका हुआ

मुकेश इलाहाबादी ---------------

अँधेरी रातों में चाँद सितारा मत ढूंढ

अँधेरी रातों में चाँद सितारा मत ढूंढ
मै  समन्दर हूँ मेरा किनारा मत ढूंढ

मै गया वक़्त हूँ, लौट के न आऊँगा
मुझे बेवज़ह अब तू,दोबारा मत ढूंढ

अन्धो के शहर में चराग़ नहीं होते
फज़ूल  में यंहा  उजियारा मत ढूंढ़ 

बुझ चुके, हैं शोले तन -के - मन के
तू चिंगारी मत ढूंढ अंगारा मत ढूंढ

मुकेश, अपने पैरों पर चलना सीख 
लाठी मत ढूंढ कोई सहारा मत ढूंढ़

मुकेश इलाहाबादी -----------------

Tuesday, 16 January 2018

जिस्म थरथराता है, और होंठ कंपकंपाते हैं

जिस्म थरथराता है, और होंठ  कंपकंपाते  हैं
धड़कने कह देती हैं, जो हम नहीं कह पाते हैं

कौन कहता है,चाँद की तासीर ठंडी होती है
चाँदनी रातों में तमाम जिस्म जल जाते हैं

हम नवाबों के लिए फूल भी वज़नी होता है
ये और बात तेरे नखरे हम  शौक से उठाते हैं

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

Monday, 15 January 2018

हर रात तुम्हारे ख्वाब कुछ कह जाते हैं

हर रात तुम्हारे ख्वाब कुछ कह जाते हैं
शुबो मेरे होंठ ग़ज़ल सा गुनगुना लेते हैं

तुम हमसे लब से तो कुछ नही कहते हो
थरथराते हुए लब बहुत कुछ कह देते हैं

यूँ  तो आदतन तुम खामोश ही रहती हो
गर हँसती हो तो भौंरे फूल समझ लेते हैं

गर मेरे चले जाने से तुम खुश रहती हो
यकीनन मै चला जाऊँगा, मै कहे देता हूँ

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

अभी परों में जान बाकी है

अभी परों में जान बाकी है
हौसलों की उडान बाकी है

कुछ और दर्द दे सकते हो
होठों पे मुस्कान बाकी है

तुम तो अभी से रोने लगे
असली दास्तान बाकी है 

ज़िंदगी की पाठशाला में 
कई  इम्तिहान बाकी  हैं

स्याह खामोशी अभी भी
हमारे दरम्यान बाकी है

मुकेश इलाहाबादी ------

Sunday, 14 January 2018

वक़्त के खामोश दरिया में

वक़्त
के खामोश दरिया में
हम दोनों
पाँव लटकाये बैठे हैं

दूर,
जीवन का सूरज अस्तगत है

रात,
अपना श्रृंगार करे

इसके पहले 'मै '
तुम्हरी स्याह ज़ुल्फ़ों
में ख़ुद को क़ैद कर के
खो जाना चाहता हूँ

न ख़त्म होने वाली
रात की नदी में

ओ ! मेरी सुमी
ओ ! मेरी प्रिये

मुकेश इलाहाबादी --------------

Friday, 12 January 2018

तुम हंसती हो तो ऐसा लगता है,

तुम
हंसती हो तो ऐसा लगता है,
जैसे
किसने ने अनार के दाने बिखरा दिए हों
सब कुछ - रस व लालिमा से भर गया हो

सच -- तुम बहुत प्यारा हँसती हो
देखो - इस तारीफ से गुस्सा मत होना
बस - मन में मुस्कुरा के -
थोड़ा सा सिर हिला देना
बस - और मन ही मन कहना
बुद्धू - पागल

मुकेश इलाहाबादी -------------