Pages

Sunday, 20 August 2017

विडंबना ही तो है,

विडंबना ही तो है,
---------------------
अनाज
से एक - एक कंकर,
पत्थर बीन कर अलग करने वाली औरत
ज़िदंगी भर नहीं पहचान पाती
या अलग कर पाती है
अपनी ज़िंदगी में आये कंकर पत्थर

मुकेश इलाहाबादी ---------

Saturday, 19 August 2017

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे
तुम हवा देते रहो, सुलग उठेंगे

यादों के अलाव जलाये रखो ये,
हिज़्र की सर्द रातों में मज़ा देंगे

बारिश की बूंदो से कंहा बुझेंगे
अंगार चाहत के, और दहकेंगे

मुहब्बत में खुशबू भी होती है
जित्ता दहकेंगे उतना महकेंगे

मुकेश इलाहाबादी -------------

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे
तुम हवा देते रहो, सुलग उठेंगे

यादों के अलाव जलाये रखो ये,
हिज़्र की सर्द रातों में मज़ा देंगे

बारिश की बूंदो से कंहा बुझेंगे
अंगार चाहत के, और दहकेंगे

मुकेश इलाहाबादी -------------

Thursday, 17 August 2017

रोशनी दे भी सकता था किसी ने जलाया ही नहीं


रोशनी दे भी सकता था किसी ने जलाया ही नहीं
मै हीरा हो भी सकता था किसी ने तरासा ही नहीं

यूँ बेवजह उदास रहने का मुझको कोई शौक नहीं
वज़ह ये रही मुझको, किसी ने गुदगुदाया ही नहीं

मरूंगा तो फ़क़त मेरे करम साथ जाएंगे, लिहाज़ा
सच्चाई और ईश्क़ के सिवाए कुछ कमाया ही नहीं

महफ़िल में सभी की चाहत थी मै कुछ तो सुनाऊँ
बज़्म  में तू नहीं थी इसलिए कुछ सुनाया ही नहीं

सच पूछो तो  जिस दिन से तुझसे मिला हूँ, मुकेश
किसी और को मैंने, अपना दोस्त बनाया ही नहीं

मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

तू अपना बना ले या हमको गैर बता दे


तू अपना बना ले या हमको गैर बता दे
तुम्हारा रहूंगा चाहे हंसा दे चाहे रुला दे

न आज है न रहेगा तुमसे, कोई शिकवा
ये जां तेरी है ज़िंदा रख,कि ज़ह्र पीला दे

किताबे ज़ीस्त पे लिख दिया, तेरा नाम
मै तेरी ग़ज़ल मुझे पढ़ या इसे मिटा दे

ये ज़िंदगी की सर्द रात है,यूँ ही न कटेगी  
मेरी दास्ताँ सुन, या फिर अपनी सुना दे


मुकेश इलाहाबादी -----------------------

Wednesday, 16 August 2017

ज़मी से ऊपर आसमा से नीचा रहने दे


ज़मी से ऊपर आसमा से नीचा रहने दे
अपना क़द अपने साये से बड़ा रहने दे

सूरज का क्या? सांझ होते डूब जाएगा
साथ, अँधेरे के लिए, इक दिया रहने दे

कभी तो कोई तो पढ़ेगा तेरी ये दास्ताँ
लिख दिया है तो इसको लिखा रहने दे

वफ़ा नहीं करनी है तो मत कर मुकेश
कम से कम अपना दोस्त बना रहने दे

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

Monday, 14 August 2017

जैसे अँधेरे बंद कमरे में

जैसे
अँधेरे बंद कमरे में
किसी झिर्री से आती है
थोड़ी सी रोशनी
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी हवा
बस
ऐसे ही तुम आती हो
मुझ तक
यादों की पतली सुनहरी
रोशनी की तरह
और दे जाती हैं
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी हवा
थोड़ी सी ज़िदंगी

कुछ समझी, लाडो  ??
मेरी सुमी,

मुकेश इलाहाबादी ---------