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Friday, 17 November 2017

मै गुल नहीं हूँ खिल जाऊँ तेरे सहन में


मै गुल नहीं हूँ खिल जाऊँ तेरे सहन में
बादल भी नहीं बरस जाऊँ तेरी छत पे
फक्त अलफ़ाज़ हैं, एहसास हैं, कहो तो
कुछ ग़ज़लें लिख दूँ  तुझे विरासत में

मुकेश इलाहाबादी --------------------

Wednesday, 15 November 2017

जाने किस मिट्टी के बने हो मुकेश बाबू

जाने किस मिट्टी के बने हो मुकेश बाबू
साँझ के चराग़ सा जले हो मुकेश बाबू

यंहा तो लोग छाँह में भी छतरी ढूंढते हैं
तुम पाँव नंगे धूप में चले हो मुकेश बाबू 

गवाह है तुम्हारे बदन के ज़ख्म ज़ख्म
आँधी - तूफ़ान में जिए हो मुकेश बाबू

लोग, एक बार में टूट जाते हैं, तुम तो 
उम्र भर हादसों में जिए हो मुकेश बाबू

लिबास की तरह लोग बदलते हों दोस्त
कैसे एक के हो कर के रहे हो मुकेश बाबू

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

ये और बात ज़माने के लिए अच्छा हूँ

ये और बात ज़माने के लिए अच्छा हूँ
तुम्हारे लिए तो, आवारा हूँ ,लफंगा हूँ

कुछ ग़ज़लें कुछ तुम्हारे नाम के ख़त
सब छोड़ चला जाऊँगा, सच कहता हूँ

यूँ तो शहर में बहुत हैं चाहने वाले मेरे
फिर भी जाने क्यूँ तनहाई में रहता हूँ

खल्वत में अक्सर ये सोचा करता हूँ
मै तुझसे बिछड़ कर भी, क्यूँ ज़िंदा हूँ

मुकेश  इलाहाबादी ------------------

Monday, 13 November 2017

तुम्हारे लिए इतनी बेताबी क्यूँ रहती है ?

 तुम्हारे लिए इतनी बेताबी क्यूँ रहती है ?
 तुमसे मिलनी की बेकरारी क्यूँ रहती है ?
 गर तू मेरा कोई नहीं और तू मेरी नहीं,
 फिर एक दूजे को इंतज़ारी क्यूँ रहती है ?
बातें करती हो तो दिल खुश खुश रहता है
मुकेश वर्ना सारे दिन उदासी क्यूँ रहती है?
 
 मुकेश इलाहाबादी --------------------------

टप्पा खाता रहा उसके हाथ आता रहा


 टप्पा खाता रहा उसके हाथ आता रहा
 हर बार वह मुझे गेंद सा उछालता रहा

 टूटते हुए काँच की खनक उसे पसंद थी
 मेरे दिल के टुकड़े कर कर फेंकता रहा

उसकी हर अदा पसंद आयी ये और बात
दिले खिलौना वो तोड़ता, मै जोड़ता रहा

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Sunday, 12 November 2017

सूरज है तो रात के घर से निकल

सूरज है तो रात के घर से निकल
गर तू चाँद है तो बादल से निकल

बार बार मिन्नत न करा ऐ दोस्त
अब तो ,लाज के घूंघट से निकल

अपनी तस्वीर मेरी आँखों में देख
कुछ देर काँच के दर्पन से निकल

ख़ुदा सब का है, हिफाज़त करेगा
बस अपने अंदर के डर से निकल

चेहरा ही नहीं वज़ूद भी चमकेगा
इक बार आग के पैकर से निकल

मुकेश इलाहाबादी ----------------

बदन के ज़ख्म पाँव के छाले तो छुपा लूँगा

बदन के ज़ख्म पाँव के छाले तो छुपा लूँगा
पेट की आग, दिल के शोले कँहा ले जाऊँगा

जिस्म काट दोगे जला दोगे मार दोगे मगर
ख्वाब में तुम्हारे प्रेत बन - बन कर आऊँगा

तीरगी को मुझसे हर हाल में डरना ही पड़ेगा
कि सूरज हूँ,मै ख़ाक होने तक उजाला बाँटूंगा

सुबह होते ही अपनी खिड़कियाँ खोल देना
बुलबुल हूँ तुम्हारी छत पे देर तक चहकूँगा

मुकेश इत्र के समंदर में नहा के आया हूँ, मै 
ज़माने से लिपट जाऊँगा, देर तक महकूँगा

मुकेश इलाहाबादी ------------------------