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Thursday, 19 July 2018

आओ पानी में छप-छप किया जाए

आओ पानी में छप-छप किया जाए
बारिश के पानी में थोड़ा भीगा जाय

बहुत दिनों बाद इंद्रधनुष निकला है
थोड़ा, मौसम का आनंद लिया जाए

अहा देखो देखो सोने के दाने से भुट्टे 
आओ गरमा गरम भुट्टा खाया जाए

गाँव के सिवान पे पुरानी पुलिया है
कुछ  देर वहाँ पे जा कर  बैठा जाए

मुकेश, उदास हो के यूँ न बैठो तुम
बारिश में इश्क़ का मज़ा लिया जाए

मुकेश इलाहाबादी ------------------

Wednesday, 18 July 2018

मै , पचास का हूँ तुम पैंतालीस की तो होगी ज़रूर

मै ,
पचास का हूँ
तुम पैंतालीस की तो होगी ज़रूर
आज हम दोनों इस पेड़ के नीचे बैठे हैं
एक दुसरे की हथेली में अपनी अपनी
उँगलियाँ फंसाए हुए
पिघलना चाह के भी बिन पिघले हुए
कुछ देर बाद
कुछ गर्म उच्छ्वासें हमारे मुँह से निकलेंगी
और विलीन हो जाएंगी शून्य में
और हम लोग भी अँधेरा होते होते
विलीन हो जाएंगे अपने अपने आदर्शों के
गुप्प अंधेरों में
बिना पिघले हुए
फिर तुम लौट के नहीं आओगी
दुसरे दिन
तीसरे दिन या  भविष्य के किसी और दिनों में
पर मै लौट लौट कर आता रहूंगा
निरास वापस जाता रहूँगा
हो सकता है - कुछ सालों बाद
सत्तर - पचहत्तर सालों बाद जब मै न आ पाऊँगा
पर तब भी मेरी यादें हवा बन कर आयेंगी
और फिर इस पेड़ के नीचे के शून्य में तुम्हे न पाकर
गोल गोल घूमेंगी और फिर चक्रवात में तब्दील हो कर
शून्य में बहुत दूर विलीन हो जाएंगी
या ये भी हो सकता है
मेरी यादें घास का तिनका बन के आज से कुछ सौ सालों बाद
इसी पेड़ के नीचे अपनी नुकीली शान के साथ उगे
इस उम्मीद पे शायद आज भी तुम्हारे पाँव इसी बेंच के नीचे
धरती से लगे होंगे -
लेकिन फिर तुम्हे न पा कर एक बार फिर
वक़्त के हाथों रौंद दिया जाए
मेरी यादों का मेरे ख्वाबों का वो हरा तिनका

मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------


आँखों में अब कोई हसीन ख्वाब नहीं आता


कोई हसीन मंज़र देखा हो, याद नहीं आता
आँखों में अब कोई हसीन ख्वाब नहीं आता

सुर्ख से नीला व तासीर से ठण्डा हो गया है
कित्ता भी खौलाओ लहू में उबाल नहीं आता

न जिस्म में कोई हरकत है न रूह  में जान
मै ज़िंदा हूँ ? अब तो ये भी याद नहीं आता

ज़ुल्म सहने की ऐसी आदत हो चुकी है कि
मेरा भी कोई वज़ूद है ये ख़याल नहीं आता


मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Tuesday, 17 July 2018

अक्सर जो बसे होते हैं सांसों में

अक्सर जो बसे होते हैं सांसों में
दिखते नहीं, हाथ की लकीरों में

मरी तितली के पँख सा अक्सर
ख्वाहिशें मिलती हैं किताबों में

जो चाहो वो मिल जाता है बस
ईश्क़ नहीं मिलता दुकानों में

मिलना है तो आ जाओ जल्दी
वर्ना ढूंढ लेना मुझे सितारों में

तुम आज नहीं तो कल मानोगे
कि मुकेश जैसे होते हैं लाखों में



मुकेश इलाहाबादी ----

Monday, 16 July 2018

मै डरता हूँ तुमको बताने के लिए

मै  डरता हूँ तुमको बताने के लिए
जी रहा हूँ तुझे गुनगुनाने  के लिए

जस का तस हूँ तुम्हारे सामने मै
मेरे मुखौटे तो हैं ज़माने  के लिए

मै कोई जोकर नहीं मसखरा नहीं,  
लतीफे सुनाता हूँ, हंसाने  के लिए

चल - चल के बहुत थक गया हूँ मै
तेरी छाँव में आया हूँ सुस्ताने लिए

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Thursday, 12 July 2018

ठीक दिखता है फिर भी दर्द रिसता है


ठीक दिखता है फिर भी दर्द रिसता है
बद्तमीज़ है ज़ख्म कुरेदो तो हँसता है

बार बार पूछता हूँ,दर्द की दवा क्या है
ज़ख्म सिर्फ मुस्कुराता है चुप रहता है

बहुत कोशिश की ठीक हो जाऊँ मै भी
मगर कोई न कोई ज़ख्म हरा रहता है

हाँफने और गिरने की हद तो दौड़ता हूँ
ज़ख्म भी उतनी तेज़ी से पीछा करता है

बाद  मरने के ही वो मेरा पीछा छोड़ेगा
मुझसे पुरानी दोस्ती है ज़ख्म कहता है


मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Wednesday, 11 July 2018

मैंने आवाज़ तो दी थी किसी को सुनाई न दिया

मैंने आवाज़ तो दी थी किसी को सुनाई न दिया
तनहाई के कुँए में था किसी को दिखाई न दिया

रोशनी कम थी सच्चाई के जुगनू थे मेरे हाथों में
गुप्प अँधेरा था शहर में कुछ भी सुझाई न दिया

मै अकेला था घर में, अकेला ही निकला सफर में
मुकेश किसी ने नम आँखों से मुझे  बिदाई न दिया

मुकेश इलाहाबादी -------------------------------