Pages

Saturday, 22 July 2017

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो
हद से ज़्यादा नाज़ो नखरे न दिखाया करो

पानी पे लिखो रेत पे लिखो दिल पे लिखो
इश्क़ लिख कर फिर फिर मिटाया न करो

तुम अपने सारे रंजो ग़म मुझको सुना देना
अपना सुख दुःख किसी को सुनाया न करो

इक बार कह दिया तो कह दिया 'तू मेरी है'
बार बार मुझसे यही बात कहलाया न करो

पुराना रिन्द हूँ मैखाना का मैखाना पी जाऊँ
अपनी आँखों से इस क़दर पिलाया न कर

दिल हमारा कच्ची ज़मीन का है जानेमन
सावन भादों सा मुहब्बत बरसाया का करो

मुकेश इलाहाबादी --------------------------- 

चाहे आग और पानी का रक्खो

चाहे आग और पानी का रक्खो रिश्ता पहाड़ और खाई का रक्खो मुझसे कोइ तो एक रिश्ता रक्खो दोस्ती न सही दुश्मनी का रक्खो

शुबो रोशनदान तक आती धू

शुबो रोशनदान तक आती धूप
जाने क्या सोच लौट गयी धूप

इंद्रधनुष का आँचल सतरंगी
देखो कित्ती प्यारी लगती धूप

जाड़े में जब कोहरे में से झांके
सब को अच्छी लगती है धूप

है सुबह मुस्काती दोपहर,चुप
सांझ छत पे गुनगुनाती धूप

जब जब तू सज कर निकले
तेरे चेहरे पे खिलती है धूप

मुकेश इलाहाबादी -------------

Friday, 21 July 2017

हारिल चिड़िया

एक
हारिल चिड़िया
रोज़ मेरे कमरे में आती है
एक चक्कर लगाती है
कुछ देर बंद पंखे की पंखुड़ी पे
या रोशन दान पे बैठेगी
अपनी चोंच वाली गर्दन इधर उधर घुमाएगी
और फिर फुर्र से उड़ जाती है
बाहर

शायद वो अपने चिड़े को ढूंढने आती है
और फिर चिड़े को न पा के लौट जाती है

मै अपने कमरे में उदास बैठ के सोचता हूँ
काश तुम भी हारिल चिड़िया होती ?
और फिर उदास हो कर
मुँह में सिगरेट दबा
खिड़की के बाहर न जाने क्या - क्या देखता रहता हूँ
शायद
खाली आसमान
शायद
दूर तक सूनी सड़क
या फिर इनमे से कुछ भी नहीं

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे



ये
और बात
तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे
मगर
तुमसे  मिलने के बाद
मेरे पास, और कोई विकल्प न था
सिवाय तुमको चाहते रहने के

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Thursday, 20 July 2017

माना कि तुम्हारी आँखे सुंदर हैं

माना
कि तुम्हारी आँखे
सुंदर हैं
पर तुम्हारी आँखों से
सुंदर है तुम्हारा 'दिल'

माना
तुम्हारे गाल बहुत
मोहक हैं
गोरे, गुलगुले
और रूई के फाहे से मुलायम
पर तुम्हारी बातें
इससे भी प्यारी हैं

माना कि तुम्हारे बाल
बहुत सुंदर हैं
काले , घुंघराले और प्यारे
पर तुम्हारे विचार और व्यवहार
इससे भी अच्छे हैं

मै ये मानता हूँ
तुम बहुत सुंदर हो
पर तुमसे भी
सुंदर और प्यारा है 'प्रेम'
व 'अपनापन'
जो तुमने दिया है मुझे

इस लिए 'मै' तुम्हे
तुम्हारे प्रेम से कम सुंदर कहूंगा

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Tuesday, 18 July 2017

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है
तुमसे मिलूं तो, बिखरी दुनिया भी संवर जाती है
तुम साथ चलो तो, ज़िंदगी ज़िंदगी सी जी लूँगा
ज़िंदगी का क्या? ज़िंदगी सभी की कट जाती है

मुकेश इलाहाबादी --------------------------------