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Thursday, 21 September 2017

सच है मैं 'सच ' के साथ नहीं हूँ

यह
सच है मैं 'सच ' के साथ नहीं हूँ
पर इसका ये अर्थ कतई नहीं
कि मै झूठ के साथ खड़ा हूँ
हाँ ! ये ज़रूर है
'मै ' सही वक़्त के इंतज़ार में हूँ
'सच' के साथ खड़ा होने के लिए

लिहाज़ा ! मेरी उदासीनता को
कायरता कतई न समझा जाये

मुकेश इलाहाबादी -------------

Wednesday, 20 September 2017

झूला

रस्सी
का एक छोर तुम्हारे शहर से होते हुए
तुम्हारी छत के कुंडे से लगा हो
और दूसरा छोर मेरे घर की कुंडी से
बीच में मुहब्बत की पाटी लगी हो
और झूल रहे हों हम दोनों
झूला ईश्क़ का

मुकेश इलाहाबादी --------------------

सारी इन्द्रियों ने बग़ावत कर दिया है

मेरी
सारी इन्द्रियों ने
बग़ावत कर दिया है
तुमसे मिलने के बाद

आँखें
सिर्फ तुम्हे देखना चाहती हैं
कान
सिर्फ तुम्हे सुन्ना चाहते हैं
आँख और कान ही क्यूँ

नासापुट भी
तुम्हारी ही खुशबू से,
तरबतर हो जाना चाहते हैं

जिस्म तुम्हे छूना चाहता है
मन बुद्धि सिर्फ और सिर्फ
तुम्हे सोचना व जानना चाहते हैं

तुम मेरे लिए किसी बग़ावत
से कम नहीं हो।

मुकेश इलाहाबादी ---------

Tuesday, 19 September 2017

जब तुम कुछ नहीं बोल रही होती हो

सुनता
हूँ तुम्हे प्रण -प्राण से
जब तुम कुछ नहीं बोल रही होती हो

जैसे कोई सुनता है
बहुत ऊपर से बहते हुए जल प्रपात की लहरों को
बस ऐसे ही सुनता हूँ
तुम्हारी चूड़ियों की खनक

जैसे कोई सुनता है
गर्मी की एकांत,चुप दोपहरिया में
चिडया की चुक - चुक ,
बस ऐसे ही सुनता हूँ
तुम्हरी खटर -पटर घर के काम निपटाते हुए

सुनता हूँ तुम्हारे आँचल की सरसराहट
जैसे कोइ  भक्त सुनता है -
कबीर का शब्द या कोई भजन

बस ऐसे ही सुनता हूँ तुम्हे
अपनी धड़कनो में
तुम्हे बजते हुए
जैसे कंही दूर सीलोन रेडियो से आ रही कोई गीत की आवाज़

बस ऐसे ही सुनता हूँ
तुम्हारे की पैड की आवाज़ (दूर से ही )
उस मेसेज की जो तुम मुझे लिख रही होती हो
चुप रह कर

मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

Monday, 18 September 2017

मौन के कोटर में

वह,
रह -रह कर
चली जाती है
मौन के कोटर में
बुदबुदाती रहती है
देर तक कागज़ पे
फिर अचानक आक्रामक हो कर
कागज़ को अपने ही हथेलियों के बीच
तुड़ी-मुड़ी कर के फेंक देती है
वहीं कोने में
फिर देर तक उन टुडे मुड़े कागज़ के
अल्फ़ाज़ों से रिस्ता रहता है लहू
और वह सुबकती रहती है
देर तक
अपने ही बनाये मौन के कोटर में

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Saturday, 16 September 2017

साँझ की दहलीज़ पे


नेट खोलते ही तुम्हारा मैसेज मिला, दिल थोड़ा खुश हुआ पर न जाने क्यूँ,
आज फिर ज़िंदगी साँझ की दहलीज़ पे इंतज़ार के तेल में डूबा उदासी का दिया जला गयी,
ऐसे में तुम बहुत याद आईं हालांकि तुम्हे भूला ही कब हूँ ?
अभी भोजन करूंगा। कुछ देर नेट पे बैठूंगा, फिर सो जाऊँगा, एक और उदास सुबह के लिए
एक और उदास साँझ के लिए , एक और अंतहीन मृगतृष्णा में भटकते रहने के लिए,

बोल ! उछालूं सिक्का ??

मै हथेली पे सूरज उगाऊँगा
तुम धरती बन के घूमना उसके चारों ओर

मेरे पास इक इश्क़ का सिक्का है
चित गिरा तो 'तू मेरी'
पट गिरा तो ' मै तेरा'
बोल ! उछालूं सिक्का ??

(राज़ की बात तो ये है, सिक्के के दोनों तरफ सिर्फ तेरा नाम
खुदवा के लाया हूँ, हा - हा - हा )


मुकेश इलाहाबादी -----------------------