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Monday, 10 September 2018

ख़ुदा ने एक बार बहोत खुद्बसूरत चाँद बनाया

ख़ुदा
ने एक बार
बहोत खुद्बसूरत चाँद बनाया
हाला कि उसमे कुछ दाग़ थे
फिर भी बहुत खूबसूरत था
उसकी तारीफ फरिश्तों ने भी की
उस खूबसूरत चाँद को फ़लक़ ने
देखते ही अपने लिए मांग लिया

बाद उसके ख़ुदा ने एक और
चाँद बनाया
बेदाग़
और नूर ही नूर से भरपूर
जिसे उसने अपने हाथों से
ज़मी पे उतारा
जानती हो उसका नाम क्या है ???

उसका नाम है - सुमी

क्यूँ है न सुमी???

मुकेश इलाहाबादी ------------------

Sunday, 9 September 2018

आजकल भाभियाँ आंटियां कहर ढा रही हैं

आजकल भाभियाँ आंटियां कहर ढा रही हैं
ऍफ़ बी ट्विटर सब जगह नज़र आ रही हैं

नए तेवर नए अंदाज़ नई नई सी हैं अदाएं
छोटा हो बड़ा हो,बूढा सब को लुभा रही हैं

है उम्र को तो इन्होने पल्लू में बाँध रखा
पचास  में भी पचीस की नज़र आ रही हैं

ये आंटियां भाभियाँ रोती नहीं, दबती नहीं
अपने काम से हर जगह डंका बजा रही हैं

घर भी संभालें बच्चों को भी हैं ये संभाले
दकियानूसी सासों को सबक सीखा रही हैं

इन अंटियों भभियों की क्या तारीफ करूँ
नारी सिर्फ अबला नहीं हमें बता रही हैं


मुकेश इलाहाबादी ------------------------




Friday, 7 September 2018

अब तो लब हमने सी लिए हैं अपने


अब तो लब हमने सी लिए हैं अपने
दर्द  तन्हाइयों से कह दिए हैं अपने

साँझ हो गयी है अब न आएगा वो
निराश, हम घर चल दिए है अपने

तीर तो हमारे भी तरकश में थे बस
युद्ध के भाव को तज दिए है अपने

मुकेश इलाहाबादी ------------------

उमड़ते घुमड़ते बादलों संग रहा जाये

उमड़ते घुमड़ते बादलों संग रहा जाये
आओ  कुछ देर बारिश में भीगा जाये

भीगे -भीगे पत्ते भीगे - भीगे हैं फूल
कुछ देर इनके संग - संग डोला जाये

वो  इक चिड़िया भीगी बैठी है डाल पे
आ उससे उसका हालचाल पूछा जाये 

मुझको तो बारिश में अच्छा लगता है
तुमको दिक्क्त हो तो रुक लिया जाये

चलो उस बुढ़िया से गर्म गर्म भुट्टे लेके
मुकेश उसी पुरानी पुलिया पे बैठा जाए

मुकेश इलाहाबादी --------------------

Thursday, 6 September 2018

यूँ , ही राह चलते मिल गया था

यूँ , ही राह चलते मिल गया था
वो एक ही नज़र में भा गया था

वो हमारा है हमारा ही रहेगा, ये
सितारों ने भी हमसे ये कहा था

मिल के उससे होश खो बैठा था
बातों में उसके जादू था नशा था

कंही मत जाना तुम यहीं रहना
लौट के आऊँगा जल्दी,कहा था

जिसकी बातें कह रहा हूँ, उसकी  
आँखे काली काली रंग गोरा था

मुकेश इलाहाबादी ---------------

ज़मी पे दरी चादर बिछा के बैठें


ज़मी पे दरी चादर बिछा के  बैठें
आ चार यार पुराने बुला के  बैठें

काजू, नमकीन और थोड़े वैफर्स
साथ में कोल्ड ड्रिंक मंगा के बैठें

जब जमी हो महफ़िल दोस्तों की
फिर अपना मुँह क्यूँ फुला के बैठें

रोज़ रोज़ ऐसे मौके कंहा मिले है   
मस्तियों के जाम छलका के बैठें

बहुत किस्से हैं सुनने सुनाने को
कुछ देर,  दर्दो  ग़म भुला के बैठें

 मुकेश इलाहाबादी ---------------

Monday, 3 September 2018

ज़रा सी बात पे खटपट कर बैठे


ज़रा सी बात पे खटपट कर बैठे
फिर हमसे वे दूर दूर रह कर बैठे

पहली मुलाकात हुई, जब उनसे
हया के घूँघट में सिमट कर बैठे

पहले तो हुईं इधर-उधर की बातें
फिर हमारे नज़दीक आ कर बैठे

इक दिन ऐसा भी आया कि, वे
हमारे सीने से  लिपट कर बैठे

उनकी तुनकमिज़ाज़ी ही है जो
आज हम उनसे बिछड़ कर बैठे

मुकेश इलाहाबादी --------------