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Saturday, 21 March 2020

जब तुम वाश-बेसिन पे साफ करती हो

जब
तुम वाश-बेसिन पे
साफ करती हो
रास्ते की धूल तब
तुम शायद
अपनी उंगलियों से रगड़ - रगड़ के
साफ कर देना चाहती हो
लोगों की घूरती काली गंदी नजरों को भी
तब तुम मुझे
बहुत मासूम और प्यारी लगती हो
जब तुम
अपनी बड़ी बड़ी आँखों को आईने के सामने
और फैला के देखती हो
आईने के और भी नजदीक जा के
तब जाने क्यूँ ऐसा लगता है
तुम अपनी आँखों में बसे राजकुमार को ढूँढ रही हो
जो शायद मैं कतई नहीं हूं
और ये खयाल आते ही मैं और उदास हो जाता हूँ
ओ ! मेरी बड़ी - बड़ी आँखों वाली राजकुमारी
ओ ! मेरी सुमी
रही हो न ??
मुकेश इलाहाबादी,,,,

इत्र की नदी में नहाई है हवा

इत्र की नदी में नहाई है हवा
तेरा बदन छू के आई है हवा
तुम हँसे तो कमरा हंसने लगा
बहुत देर बाद मुस्कराई है हवा
दम घुट रहा था तन्हाई मेें
मेरा
मुकेश तुम आए तो आई है हवा
मुकेश इलाहाबादी,,,,,

कब से मैं बैठा हूं अंधेरा लेकर

कब से मैं बैठा हूं अंधेरा लेकर
तू आ जा चाँद सा मुखङा लेकर
मेरी मुट्ठी मे थोड़े से जुगनू हैं
तू भी आ चाँद सितारा लेकर
गुपचुप बहती ये झील सी आंखें
आऊँगा इश्क़ का शिकारा लेकर
निकल के आओ तो इन बॉक्स से
इंतज़ार में हूं नज्में व लतीफा लेकर
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,,,,,,

सिरफिरा है कहाँ किसी की बात सुनता है

सिरफिरा है कहाँ किसी की बात सुनता है
चढ़ते हुए दरिया को तैर के पार करता है
जानता है जो शख्स उसका नहीं होगा
फिर भी उसी को शिद्दत से प्यार करता है
झुलस गया जिस आग मे तन बदन उसका
उसी लपट से फिर फिर- खेलूंगा कहता है
चाँद उसी के साथ साथ चल रहा फलक पे
इसी मुगालते मे रात भर वो सफ़र करता है
मुकेश इलाहाबादी,,,,,

कविता दिवस पे एक प्रार्थना - पञ्च महाभूतों से -

कविता दिवस पे एक प्रार्थना - पञ्च महाभूतों से
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अग्नि,
थोड़ी सी ऊष्मा दे दे
कि, हमारे शब्दों में
भावों में बहुत ठंडा पन है
मुझे एक कविता लिखनी है
जल देवता
थोड़ी से स्निग्धता दे दें
हमारे शब्दों को
ताकि हमारे अंदर की रूक्षता
हमारे भावों में और कविता में तो न आये
हे वायु देवता
हमारे शुभ भावों को
आप दूर दूर तक ले जाएँ
और दूर दूर से शुभ भावों को हम तक ले आएं
ताकि हम शुभ सोचे और शुभ ही करें
हे भू तत्व की देवी
पृथ्वी,हमारे शब्दों के में
थोड़ा गुरुता प्रदान करें
हे आकाश देवता
आप तो स्वयं शब्दों के
अक्षरों के अधिष्ठाता हैं
आप हमारे शब्दों में स्वयं सत्य स्वरुप हो के
प्रतिष्ठित हो जाएँ
हे पञ्च देव - आप सभी हमारी वाणी में
प्रष्ठित हो के एक सुंदर काव्य का सृजन करें
जो मानव ही नहीं सभी जी जंतु
जड़ जंगम के कल्याण के लिए हो
और हम सब शीघ्र कोरोना विषाणु की महामारी से उबरें
ॐ शांति - ॐ शांति - ॐ शांति
मुकेश इलाहाबादी --------------------

Monday, 24 February 2020

प्रेम से लबालब कविता का भाव हो तुम

प्रेम
से लबालब कविता का
भाव हो तुम
रस हो तुम
ओर
'मै' शब्दों के बीच का
खालीपन
इस खालीपन भर सकती है
न तो धूप
न हवा
न पानी
न वेद की ऋचाएँ
न कोई शुक्ति वाक्य
इस रिक्त स्थान को
भर सकती हैं तो, बस
तुम्हारी खिलखिलाती हँसी
और
मेरे प्रति तुम्हारे
'प्रेम' की स्वीकृति
मुकेश इलाहाबादी ------

रह रह के अपने ज़ख्मों को

रह रह के
अपने ज़ख्मों को
कुरेदता रहता हूँ
मै ज़िंदा हूँ भी
इस बात की
तस्दीक करता रहता हूँ
मुकेश इलाहाबादी