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Saturday, 22 July 2017

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो

तुम इतना भी सज संवर के न आया करो
हद से ज़्यादा नाज़ो नखरे न दिखाया करो

पानी पे लिखो रेत पे लिखो दिल पे लिखो
इश्क़ लिख कर फिर फिर मिटाया न करो

तुम अपने सारे रंजो ग़म मुझको सुना देना
अपना सुख दुःख किसी को सुनाया न करो

इक बार कह दिया तो कह दिया 'तू मेरी है'
बार बार मुझसे यही बात कहलाया न करो

पुराना रिन्द हूँ मैखाना का मैखाना पी जाऊँ
अपनी आँखों से इस क़दर पिलाया न कर

दिल हमारा कच्ची ज़मीन का है जानेमन
सावन भादों सा मुहब्बत बरसाया का करो

मुकेश इलाहाबादी --------------------------- 

चाहे आग और पानी का रक्खो

चाहे आग और पानी का रक्खो रिश्ता पहाड़ और खाई का रक्खो मुझसे कोइ तो एक रिश्ता रक्खो दोस्ती न सही दुश्मनी का रक्खो

शुबो रोशनदान तक आती धू

शुबो रोशनदान तक आती धूप
जाने क्या सोच लौट गयी धूप

इंद्रधनुष का आँचल सतरंगी
देखो कित्ती प्यारी लगती धूप

जाड़े में जब कोहरे में से झांके
सब को अच्छी लगती है धूप

है सुबह मुस्काती दोपहर,चुप
सांझ छत पे गुनगुनाती धूप

जब जब तू सज कर निकले
तेरे चेहरे पे खिलती है धूप

मुकेश इलाहाबादी -------------

Friday, 21 July 2017

हारिल चिड़िया

एक
हारिल चिड़िया
रोज़ मेरे कमरे में आती है
एक चक्कर लगाती है
कुछ देर बंद पंखे की पंखुड़ी पे
या रोशन दान पे बैठेगी
अपनी चोंच वाली गर्दन इधर उधर घुमाएगी
और फिर फुर्र से उड़ जाती है
बाहर

शायद वो अपने चिड़े को ढूंढने आती है
और फिर चिड़े को न पा के लौट जाती है

मै अपने कमरे में उदास बैठ के सोचता हूँ
काश तुम भी हारिल चिड़िया होती ?
और फिर उदास हो कर
मुँह में सिगरेट दबा
खिड़की के बाहर न जाने क्या - क्या देखता रहता हूँ
शायद
खाली आसमान
शायद
दूर तक सूनी सड़क
या फिर इनमे से कुछ भी नहीं

मुकेश इलाहाबादी ---------------------

तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे



ये
और बात
तुम्हारे पास तमाम रस्ते थे
मगर
तुमसे  मिलने के बाद
मेरे पास, और कोई विकल्प न था
सिवाय तुमको चाहते रहने के

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Thursday, 20 July 2017

माना कि तुम्हारी आँखे सुंदर हैं

माना
कि तुम्हारी आँखे
सुंदर हैं
पर तुम्हारी आँखों से
सुंदर है तुम्हारा 'दिल'

माना
तुम्हारे गाल बहुत
मोहक हैं
गोरे, गुलगुले
और रूई के फाहे से मुलायम
पर तुम्हारी बातें
इससे भी प्यारी हैं

माना कि तुम्हारे बाल
बहुत सुंदर हैं
काले , घुंघराले और प्यारे
पर तुम्हारे विचार और व्यवहार
इससे भी अच्छे हैं

मै ये मानता हूँ
तुम बहुत सुंदर हो
पर तुमसे भी
सुंदर और प्यारा है 'प्रेम'
व 'अपनापन'
जो तुमने दिया है मुझे

इस लिए 'मै' तुम्हे
तुम्हारे प्रेम से कम सुंदर कहूंगा

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Tuesday, 18 July 2017

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है

दिन की थकन रतजगे की ख़ुमारी मिट जाती है
तुमसे मिलूं तो, बिखरी दुनिया भी संवर जाती है
तुम साथ चलो तो, ज़िंदगी ज़िंदगी सी जी लूँगा
ज़िंदगी का क्या? ज़िंदगी सभी की कट जाती है

मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

उन्मुक्त हंसी

तुम्हारी
उन्मुक्त हंसी
भर देती है
उजास से
मेरे अंतरतम को
और मै डूबने से बच जाता हूँ
उदासी के गहन गह्वर में

मुकेश इलाहाबादी ---------

सुबह की धूप


जैसे
सुबह की धूप
भर देती है
अंतरतम तक को
रोशनी से
पूरी दुनिया के लोगों के

वैसे ही
तुम्हारी
हंसी भर देती है
उजास से
उल्लास से
पूरी सृष्टि को

और
मेरे अंतरतम को

मुकेश इलाहाबादी ---

ishq charm pe

ईश्क़ शुरू में बहुत बोलता है जैसे -जैसे गहराता है कम बोलता है अपने चरम पे मौन हो जाता है आज कल तुम भी मौन रहती हो कंही ये मेरे प्रति तुम्हारे प्यार का चरम तो नहीं ?? मुकेश इलाहाबादी -----

दंतकथाओं सा

चाह
के भी तुम्हारी यादों को
नहीं मिटा पाता हूँ अपने ज़ेहन से
वे बरसों बाद आज भी ज़िंदा हैं
दंतकथाओं सा मेरी स्मृतियों में
और रहेंगी
न जाने कब तक

मुकेश इलाहाबादी ---------------

Monday, 17 July 2017

हवा फुसफुसाते हुए हौले से बहती है

हवा
फुसफुसाते हुए
हौले से
बहती है

गुलाब की
दो पत्तियां
कांप के रह जाती हैं

हवा मुस्कुरा के बढ़ जाती है
पत्तियां शरमा के सिर झुका लेती हैं

दोनों जान लेते हैं
क्या कुछ  पूछा गया
क्या कुछ कहा गया

मुकेश इलाहाबादी ------

तुम मुझसे मिलने चाँदनी रातों में मत आना

तुम
मुझसे मिलने
चाँदनी रातों में मत आना

चाँद तो पुराना आशिक़ है ही
सितारे भी तुम्हारे दीदार के लिए बेक़रार हैं
ये तुम्हे छेड़ सकते हैं

तुम मुझसे मिलने तब मत आना
जब हवा चल रही हो मद्धम मद्धम भी
किसी ने बताया, ये हवा
तुम्हारे बदन की खुशबू से जलती है
तुम्हारे ऊपर जादू टोना कर सकती है

सुनो
तुम मुझसे मिलने तब भी मत जाना
जब सूरज आसमान में ऊगा हो
ये तुम्हे अपना न बना पायेगा तो जला देगा

फिर भी तुम मिलने आना

मुकेश इलाहाबादी -------------




तुम सबसे जुदा हो

तुम्हारी
तस्वीर किसी भी तरफ से देखो
खूबसूरत ही लगती हो

तुम्हे किसी भी रूप में सोचो
आसमानी परी लगती हो

जज़्बात और ऊर्जा से भरपूर दिखती हो

षड ऋतुओं में बसंत ऋतु हो

ब्रह्माण्ड  की तमाम निहारिकाओं में
आकाश गंगा हो
सितारों की भीड़ में शुक्र तारा हो

वर्णमाला के सारे वर्ण मिला के भी
तुम्हारे बारे में सब कुछ नहीं कह पाएंगे

लिहाज़ा इतना ही कहूँगा
तुम सबसे जुदा हो
सब से अलहदा हो

मुकेश इलाहाबादी -----------------



किसी गर्मी की


किसी
गर्मी की
ऊँघती दोपहर में ही
आ जाओ छाँव बन के
फिर सो जाऊँ मै
तुमको ओढ़ कर

निचिंत - खुश - खुश


किसी
जाड़े की सुबह सुबह
आ जाओ गुनगुनी धूप सा
दिन भर बैठा रहूँ छत पे
बदन सेंकता हुआ

मुकेश इलाहाबादी ---------

धुऑ बनाम गुलाब


धुऑ बनाम गुलाब

10.12.2009
‘एक बेहद अच्छे इंसान व दोस्त, सुरेंद्र पवार जी को नज़र . जिनकी ज़िंदगी से यह कहानी चुरायी है’

बाल्कनी से ताजा खिलें फूलों की भीनी भीनी खुषबू उसे पूरा का पूरा कब भिगो गयी  राजा को पता ही न लगा। राजा को यह भी पता न लगा कब सुबह की नर्म मुलायम गुलाबी किरणों ने चुपके से आ के  रात के अंधेरे को, व ओस की बूंदों को सोखना षुरु कर दिया था। पंक्षियो की चहचह और फूलों  की खुषबू से चारों तरफ एक उत्सव सा लगने लगा था। यही सुबह तो रोज होती थी। सूरज तो रोज खिलता था। हवा रोज ही तो चलती थी। फूल तो रोज ही खिलते थे। पर राजा क्यों नही देख पाता था। क्यों नही इन खुषबुओं को अपने नथूनों में भर पाता था। क्यांे नही इन किरणों को आखों से पीने की ख्वाहिष होती थी। सना का जादू भी तो न जाने कब धीरे धीरे चुपकेे चुपके उसके वजूद को घेरने लगा था। सना का जादू ही तो है जो हर चीज को हर बात को हर एहसास को यहां तक की राजा को पूरा का पूरा बदल दे रहा है। अगर नही तो फिर यह सुबह पहले की तरह उदास क्यों नही लगती। क्यों उसे नही लगता कि यह वही तो सूरज है जो रोज रोज उगा करता है। यह वही तो गुलाब व गेंदा हैं जो उसी तरह गुलाबी व पीले रंग में उगते हैं। पर अब क्यों गुलाब और ज्यादा गुलाबी और गंेदा ओैर ज्यादा पीला दिखायी पड़ता है। पर अब क्यों उसे हर चीज नयी नयी लगती है। आफिस जाना क्यों बोझ नही लगता। एक उत्सव मे षामिल होना लगता है। राजा यह सब जितना सोंचता उतना ही अपने आप में मुस्कुराता। पर यह भी जानता कि इस मुस्कुराहट के पीछें एक ऐसा फैसला है जिसे वह अभी तक मुल्तवी किये है। एक ऐसा फैसला जिसमे उसका पूरा का पूरा वजूद सना है। जिसमे एक सना है जो उसकी सारी तपस्या को भंग कर सकती है।
राजा के मन मे उस फैसलें का ख्याल आते ही अजीब सी उदासी तारी हो गयी। हाथों ने  खुद ब खुद न जाने कब पैकेट से सिगरेट निकाल के होंठो पे लगा दिया।
राजा जब कभी भी अपने आपको अर्निणय की स्थिति मे पाता तो वह अपने आपको कमरे मे अकेले बंद कर लेता फिर एक दो तीन चार दिनों तक न कहीं आना न कहीं जाना न कोई फोन न किसी से बात चीत बस। राजा रहता और रहता एक निपट निचाट अकेला पन। जिसमे वह सिर्फ सोचता सोचता और सोचता। उस समस्या के हर  पहलू पे सुबह से षाम तक षाम से सुबह तक जब तक कि कोई निर्णय नही आ जाता। और अक्सर ऐसा होता कि अचानक या किसी मंथन से उस समस्या का हल निकल ही आता।
आज भी उसने अचानक दो दिन की छुटटी और रविवार को ले कर तीन दिन तक कमरे में ही बंद रहने का फेैसला कर लिया था। रह रह  कर एक षेर उसके जहन मे उभर  रहा  था ....
मै समझता था मुहब्बत की ज़बां खुषबू है
फूल  से  लोग  इसे  खूब  समझते होंगे

इस दौरान उसे महज सोचना था और सोचना था। सना के बारे मे अपने बारे में सना के भविष्य के बारे मे अपने भविष्य के बारे में। अपने उन सिद्धांतो के बारे मे जो उसके सीने से कवच कुण्ड़ल से चिपके पडे थे। जिन्हे वह निकाल फेंकना चाह के भी नही निकाल पा रहा था। वे तो उसके साथ ही जुडें हैं, और षायद मरने के बाद तक जुडें रहेंगे।
यही सिद्धांत ही तो रहे हैं जिनको ढोते ढोते वह आज एक टूट जाने की स्थिति मे आ चुका है। न जाने कितनी बार टूटा भी है पर हर बार पता नही किस अंदरुनी ताकन ने उसे उबारा है वह खुद भी नही जानता। भले ही उपर से लगे कि इमारत कितनी बुलंद व अच्छी है। पर नीव की कमजोरी तो उसे ही पता है।
कई बार तो भावनाओं के तूफान आये पर हर बार वह अपने आप को बचा लेता। हालाकि एक तूफान के अलावा तो बाकी छुट पुट बारिष की ही जद मे आते है। पर इस बार तो वह लगता है कि टूट ही जायेगा।
पर टूटना फितरत मे नही।

सना। सलोनी नायिका जिसे वह स.ना लिखती है। सना कहाना पसंद करती है। सना खुष्बू ही तो है जो चुपके चुपके से चंदन की भीनी भीनी महक के साथ उसके मन मे फैल चुकी है। पर यह खुषबू उसके वजूद में बिखर के उसे ही पूरा का पूरा बिखेर देना चाहती है।
राजा ने जोर से सांस ली। वह सना को सूंघ लेना चाहता था। यादों मे ही पूरा का पूरा। पर सना तो खुषबू की तरह उड़ रही थी। अब महक दरवाजों और खिडकियों से बह बह के दूर और दूर जा रही थी। राजा खुषबू के लिये खिडकी तक आया तब तक खुषबू उड के दूर कहीं आसमान मे ढेर सारी खुषबुओं मे घुल मिल गयी थी, जिसमे यह पहचानना मुष्किल था, इसमे कौन सी खुषबू सना की है कि कौन सी फिजां की है या कि दूसरी चंपा या चमेली की। पर अब इस वक्त तो वह फिजां की खुषबू ही ढूंढ रहा था।
जो फिजां के गुलाब से गालों से महमह कर के महकती थी। जो इस बुझते हुए अलाव की राख मे न जाने कितनी दूर दबे अंगारों को कुरेद रही थी,  जिन्हे वह पता नही कब दफन कर आया था। ,
षायद उसी दिन जिस दिन फ़िजा से दूर हुआ था। तब जब उसने अपने व फ़िजा के घर के रास्ते मे पडने वाले कब्रिस्तान मे ही उन यादों को दबा दिया  था। और उस दिन के बाद आज तक उसने कभी भी मुहब्बत की घाटी मे दुबारा न झांका था। उसे विष्वास था कि दुनिया मे सिर्फ एक फ़िजा थी जो उसके लिये थी और अब कोई दूसरी फ़िजा नही हो सकती । हुआ भी यही । इतनेे सालों तक वह अपने आप मे मगन रहता सुबह से षाम तक कभी पल दो पल की फुरसत भी मिली तो ‘और भी ग़म हैं ज़माने मे मुहब्बत के सिवाय’ यह सोच किन्ही और कामो मे अपने आप को उलझाता रहा।
पर वह तो हर वक्त फ़िजा के आबनूसी गेसुओं में ही उलझा रहता था। जब भी रात होती तो लगता यह चांद फिजां के काली घनी अलकावलियों में ही तो खिला है। जो रात भर यादों की भीनी सी चांदनी बरसाता रहता और राजा उसी मे धीरे धीरे भीगता रहता। मन से दिल मे दिल से और भीतर और भीतर तक । फिर न जाने कब यह रात चुपके चुपके कहीं हवाओं मे और फ़िजाओं मे खो जाती और फिर चांद सूरज बन हल्की हल्की सी तपन के साथ उसके तन व मन से यादों के मोती चुन के फिर दूसरी यादों के झोंको से सेंकती रहती। राजा घर मे हो या आफिस मे राजा बस मे हो या पैदल। राजा यहां हो कि वहां। जहां जहां भी जाता फिजां संग संग ड़ोलती हंसती मुस्कुराती। वह राजा के साथ एक साये सी लगी रहती। कभी कभी तो राजा अपने आप से भी झुंझला जाता। फिर इन यादों को मय मे ड़ुबो देना चाहा पर यह भी न हो पाया।
सिगरेट का एक लम्बा कष खींच के ढेर सा धुआं उगल दिया राजा ने। कमरे में अब गुलाब गेंदा की महक मे धुएं की तीखी महक भर गयी।
फिजां गुलाब सी गुलाबी व षोख तो सना गंेदा सी खिली खिली सरसों सी पीली। और राजा धुआं।
चाहता तो वह गुलाब की महक से अपने को भर सकता था। पर उसी ने तो नही चाहा। और आज जब एक बार फिर किसी फूल ने उसके जीवन को महकाने की हौले से कोषिष की तो वह क्यों उदासीन सा है। यह उसे समझ मे ही नही आ रहा।
अब वह उस अजीब सी महक में से सिर्फ गुलाब को अपने नथुनों मे भर रहा था।
और फ़िजां ग़जल बन गयी।
हां फ़िजां गुलाब ही तो थी। जिसका एक एक अंग गुलाबी। एक एक अदा षराबी। वह जब हंसती तो मूंगे से होंठ खिल जाते। जिसे देख के ही तो उसने जिंदगी का पहला षेर कहा था.........
सर्द  मौसम मे  सुलगते  से होंठ
कुदरत का करिष्मा ही हैं ये होंठ
तब ज्यादा से ज्यादा चुप रहने व कम से कम बोलने वाले राजा को यह नही पता था कि षेेर के काफिये कहां और कैसे तंग होते हैं या झोल खा जाते हैं। पर अनायास ही उसके होंठों से निकली ये चार लाइने ही तो थी जिसने उसे गजल व षेरों व षायरी की दुनिया का रास्ता दिखा दिया था। फिर तब का दिन है और आज का कि राजा सिर्फ षब्दों मे जीने लगा था।
षब्द षब्द और षब्द ही तो बच रहे हेै। उसके पास खैर ...
हंसती खिलखिलाती गुनगुनाती फ़िजां जब भी घर आती  घर भर की फ़िजा बदल जाती।  मॉ पिताजी व बहन सभी के साथं हंसती ठिठोली करती। सभी को किसी न किसी बात से किसी न किसी चुटकुले से या चुटकुले सी बात से हंसाती रहती गुदगुदाती रहती। बस सबसे कम बोलती तो वह राजा ही था। एक तो राजा के कम बोलने की आदत दूसरे फ़िजां के घर का माहौल भी जो मदों से कम से कम बोलने व मतलब रखने की हिदायत देता रहता था। पर इसके बावजूद वह अक्सर राजा को छेडती और कहती। राजा तो बाजा है। जिसके सारे बैंड व स्विच खराब हैं जो कभी कभी बजता है। और जब बजता है तो बस घर्र घर्र करता है। यह कह के वह खिल्ल से हंस देती। राजा भी बुरा न मानके बस मुस्कुरा के रह जाता।
फ़िजां आयी हो और राजा घर मे है तो वह किसी न किसी बहाने उसे देखने की कोषिष मे रहता। यह बात धीरे धीरे पता नही कैसे फ़िजां को महसूस होने लगी थी।
एक दिन जब उसने उसे चोरी से देखते देख लिया था तो मॅुह चिढ़ा चली गयी थी। तब राजा षरमा के रह गया था।
लेकिन उस दिन के बाद से यह लुका छिपी का खेल अक्सर होने लगा था।
एक दिन राजा ने कागज की पुरजी मे दो लाइने लिख के उसकी तरफ सरका दिया जिसे फ़िजां ने चुपके से उठा लिया।
मूंगा कहें गुलाब कहें जाम से ये होंठ ू
माषूक की पलकों पे सजते हैं ये होंठ

दूसरे दिन फिंजा ने भी एक पुरजी उसकी मेज पे उछाली।

होंठो को  अपने न सिल के रखिये
राज़ अपने दिल का ख्ुाल के कहियें।
उस दिन के बाद न जाने कितनी पुरजियां ली और दी जाने लगी। फ़िजां अब उसके लिये गजल बन गयी थी। जिसे वह हर वक्त गुनगुनाता रहना चाहता था।
अब दिन खूबसूरत नदी सा बह रहे थे। जिसमे राजा और फ़िजा छपक छइयां करते।
कभी फिजां फूल बन जाती जिसकी खुषबू को राजा रेषा रेषा पी लेना चाहता कभी। फिजां खूबसूरत झरने सा बहने लगती जिसकी धवल धार मे राजा अठखेलियां करता। तो कभी राजा बादल बन जाता फ़िजां के लिये और फ़िजा बादलों में उडती रहती।
बया सी। बया जो एक सुंदर सा घोंसला बनाने का सपना देखा करती जिसमे बस वह रहती और रहता राजा। राजा भी ऐसा ही कुछ सोंचता और खुष रहता।
मग़र बया का घोसला बना कब ?
राजा ओैर फिजा। फिजां और राजा। बस दो ही थे एक दूसरे की दुनिया मे । बाकी तो दुनिया एक सपना थी।
फ़िजां खुषबू थी रुहानी खुषबू जिसमे राजा ड़ूबता उतराता तो कभी उड़ता दूर दूर आसमान के भी पार। जहां सारा जहां खत्म होता है। रहता है सिर्फ एक ख्वाब महल। जिस ख़्वाब महल मे सिर्फ रहते राजा और फ़िजां। ओैर रहती सिर्फ मुहब्बत मुहब्बत सिर्फ मुहब्बत।
और यह ख्वाब महल हकी़कत का जामा पहन पाता इसके पहले ही। फ़िजां ने कहा।
‘राजा, घर वाले मेरे को जल्दी ही रुखसत करना चाहते है।’
‘क्यों’
‘मम्मी डैडी को लगता है कि वे अपनी जिम्मेदारी जल्दी से जल्दी पूरी करदें। एक रिष्ता आया भी है। लिहाजा तुम जितनी जल्दी हो सके षादी का फैसला करो’
‘पर अभी तो मैने इस बारे मे सोचा ही नही है। वैसे भी जब तक अपने पैरों पे नही खड़ा हो जाता कुछ सोच नही सकता’
‘पर मेरे घर वाले अब रुकने को तैयार नही है।’
‘तुम्हारा क्या ख्याल है। अगर तुम मेरी  नौैकरी लगने तक रुक सकती हो तो ठीक है। वर्ना तुम्हारी मर्जी।’
फ़िजां काफी देर चुप रहने के बाद बोली ‘मेरे लिये यह काफी मुष्किल है। अगर अभी कुछ फैसला करो तो घर वालों से कह सुन के कुछ किया जा सकता है।’
पर राजा इतनी जल्दी तैयार न था। षादी के लिये।
कई बार फ़िजा के जोर देने पर भी राजा अपने फैसले पर अड़िग रहा।
इसके बाद बस एक दिन फ़िजां ने ही सूचना दी कि घर वालों ने उसकी षादी की डेट तय कर दी है।
और एक दिन फ़िजां किसी और के बंधन मे बंध गयी।
और राजा ने अपनी मुहब्बत को अपने सीने मे ही दफ़न कर लिया।
न तो राजा रोया न ही ग़म के पैमाने मे डूबा उतराया। बस अब राजा रहता और रहता उसका लेखन।
वह खबरों की दुनिया मे रहता। धीरे धीरे वह एक सफल और सफल पत्रकार व लेखक बनता गया। उसका नाम खबरों की दुनिया मे छपता पर वह अपने आपको गुमनामी के अंधेरे मे ही डुबाये रहता। यहां तक कि,
सावन भादों आते बरस के चले जाते
जेठ बैसाख आते तपा के चले जाते, कोई भी रुत आये या जाये,
राजा के लिये बस - तेरी सांसों की महक फूलों में, लुत्फ़ हर रुत में तेरे प्यार का है।
अब बस राजा रहता और रहती फिजां की याद  और ....
धीरे धीरे दिन बीते महीने बीते साल बीते  और बीते दो दषक।
राजा जिंदगी की राह मे अकेला ही चलता रहा। फिजां की यादों को लिये दिये।
धीरे धीरे फ़िजां की यादों के साथ वह अपनी जिंदगी आराम से काट रहा था।
तभी। मिली सना। आफिस की एक कम उम्र अल्हड़ सी बाला। जिसे वह एक छोटी से बच्ची समझता। थी भी वह बच्ची। वही बच्ची धीरे धीेरे हंसते बोलेते न जाने कब बेतल्लुफ होने लगी।
और यही बेतकल्लुफी इस हद तक परवान चढी कि कब वह उसकी यादों में कैद हो गयी। फिर कब वह उसकी धडकनों मे कैद हुयी। फिर कब उसकी सांस सांस में समा गयी राजा को कुछ पता ही न लगा।
बस जैसे एक फूल खिला हो और उसकी भीनी भीनी खुषबू नासा पुटों मे अपने आप भर जाती है। सांसों के साथ साथ। बस उसी तरह सना भी राजा की रातों मे सपने की तरह आने लगी।
कई बार राजा ने इन खयालों से पीछा छुटाना चाहा पर बात न बनती। हर बार उसकी मासूम ऑखेे ऑखों के सामने आ जाती तो कभी उसका मासूम जिददीपन याद आ जाता। और वह अकेले मे ही मुस्कुरा देता।
राजा अक्सर उससे कह भी देता .......
तेरी झील सी ऑखों मे अजब भोलापन
मेरी जान न ले ले, तेरा मासूम जिददीपन......  और वह हंस के कहती यही तो मै चाहती हूं। तब राजा आदतन मुस्कुरा के रह जाता। जवाब कुछ न देता।
जिस दिन सना न आती लगता कुछ खो सा गया है। वह रहता तो आफिस मे, पर रोज सा खिलापन न रहता।
इसे राजा अपनी कमजोरी मानता और मन ही मन इससे उबरने की कोषिष करता।
पर हर बार मन व दिल दगा दे जाते।
हार के आज राजा ने फैसला लेने की गरज से अपने आपको इस कैद मे डाल लिया।
राजा सोच रहा था कि यदि सना के प्रति ये लगाव मुहब्बत है तो फ़िजां के प्रति क्या था। और अगर फ़िजां के प्रति प्रेम था तो सना की तरफ आर्कषित होना क्या है। यदि फ़िजां के प्रति उस लडकपन का आर्कषण मानें तो इस उम्र मे कम उम्र के प्रति इतना मोह क्या है। कहीं ऐसा तो नही यह अपने एकाकी पन को भरने की कोषिष है। या रुप का आकर्षण। अगर रुप को कारण माने तो एक से एक खूबसूरत लडकियां या औरतों से मुलाकते होती रही है। बातें होती रही है वे क्यों नही अपने आर्कषण मे बांध पायी। और अगर कोई देैहिक आर्कषण भर है तो वह भी राजा को मंजूर नही। किसी को भोग लेना और फिर छोड़ देना राजा का सिद्धांत नही।
तो राजा क्या करे। फ़िजां की यादों से बेवफाई करे या सना से मुहब्बत। सना से मुहब्बत करे या फ़िजां से बेवफाई।
भले ही फ़िजां उसकी न हो पायी पर उसे तो राजा ने अपना माना है। फिर उसकी यादों से भी वह क्यों कर बेवफाई करे। अगर बेवफाई कर भी ले तो क्या वह अपने आप को फिर माफ कर पायेगा। और फिर अगर यही करना था तो बहुत पहले ही क्यों नही किया। इतने सालों तक क्यों तन्हा भटकता रहा ।
मान लो किसी वजह से वह सना की दोस्ती को हवा दे भी देता है तो क्या समाज उसे  स्वीकार कर पायेगा। क्या वह समाज से लड़ के उसकी हो पायेगी। और अगर नही तो क्यों फिर से इस म्रगत्र्रष्णा में फंसना।
राजा जितना ही सोंचता उतना ही उलझता जाता। पर राजा जिद किये बैठा था कि जब तक फैसला नही कर लेता कि उसे फ़िजां की यादों के साथ जीना है या फिर सना की दोस्ती कुबूल करना हेै तब तक उसे कमरे से बाहर नही निकलना है।
राजा के कुछ समझ न आया तो जोर से सांस ली और सिगरेट का ढेर सा धुआं बाहर फेंका मानो वह अपने सारे अंर्तद्धंद को बाहर फंेक देना चाह रहा हो।
ढेर सा धुआं आस पास फैल गया। राजा ने दो तीन कष और जोर जोर से लिये।
फिर एक ही झटके में फैसला किया।
मोबाइल से सना का नंबर डिलीट कर दिया।        
कमरे मे फूल की खुषबू तो अभी भी आ रही थी।
उस खुषबू मे जिसमे कुछ महक फ़िजां की तो कुछ महक सना क्ी सनी थी।
और ढेर सारा धुआं था जो राजा के सीने से निकले धुएं मे कहीं खो सी गयी थी।
इस उम्मीद मे कि षायद ..
आग  तो बुझ जायेगी बस इक धुआं रह जायेगा
यह धुआं भी रफ़ता रफ़ता फिर कहां रह जायेगा

मुकेष श्रीवास्तव
12.01.10
नई दिल्ली।














तुम नदी नहीं हो


एक
---

तुम
नदी नहीं हो
मै भी समुंदर नही हूँ
फिर क्यूँ
डूबती जा रही
नाव,
नहीं
सम्भलते
जीवन के पाल


दो
----

तुम
नदी नहीं हो
फिर क्यूँ तुझसे हिल मिल
मै हो जाता हूँ
तजा दम

तीन
----

वही
बादल तो तुमको भी
आपूरित करते हैं जल से
और तुम बन जाती हो
नदी मीठे पानी की

वही
बादल तो मुझपे भी बरसते हैं
वही मीठे पानी की नदी
मुझे आपूरित करती है
फिर भी 'मै कितना खारा ?


चार
----
नदी
तुम मेरे प्रेम में
अपने उद्गम को छोड़
तमाम जंगल पर्वत
बाधाओं को पार करती रही

मै,
समंदर तुम्हारे लिए
तिल भर भी न हिला अपने दर से
सिर्फ और सिर्फ अहंकार वश
राह ताकता रहा तुम्हारे आने की
तुम्हारे समर्पण की


तुम आती हो
 हरहरा के समां जाती मुझमे
समां जाती हो मुझमे
पा जाती हो सर्वस

जब की मै वहीं का वहीं रह जाता हूँ
मीठे जल को तरसता
और और नदियों की राह ताकता

हे नदी ! तुम्हारे प्रेम व समर्पण को नमन

मुकेश इलाहाबादी -------

Sunday, 16 July 2017

चाँद सितारे तेरी झोली में डालूं तो

चाँद सितारे तेरी झोली में डालूं तो
तुझको, जबरन अपना बना लूँ तो

बारिश के मस्त - मस्त  मौसम में
आवारा सड़कों पे तुझ संग भीगूँ तो

तू बना रही हो जब चाय या कॉफी
चुपके से आ के बाहों में भर लूँ तो

तू चाहे मल्टी प्लेक्स में मूवी देखें
पर मै तुझे गांधी मैदान घुमाऊं तो

काली- काली ज़ुल्फ़ों में गज़रा बन
तेरी साँसों में, रातों दिन महकूँ तो

तू चाहे सुनना रोमांटिक गाना पर
तुझको मै अपनी ग़ज़ल सुनाऊँ तो

मुकेश इलाहाबादी -----------------

रंग

मुझे
हर वो रंग अच्छा लगता है
जो तुमपे फबता है
ये और बात
तुम पे
हर रंग फबता है

मुकेश इलाहाबादी ------------

Saturday, 15 July 2017

एकांत मुझे अच्छा लगता है

एक
----

एकांत
मुझे अच्छा लगता है

क्यूंकि,

तुम्हारे बारे में 'मै '
सोच सकता हूँ
तफ्सील से


'मै ' रो सकता हूँ
अपने दुःखो पे
अपने मर्दपन के
अहंकार से अलग हो के

लिख सकता हूँ
तुम्हे प्रेम पत्र
बिना डर के

एकांत
मुझे अच्छा लगता है
क्यूँकि तब 'मै '
पूर्ण स्वतंत्र और मौलिक
बिना किसी मुखौटे के

और इस लिए भी कि
तुमसे चैट कर सकता हूँ आराम से

मुकेश इलाहाबादी -----


ये तिल ही तो है

ऐे,
शोख़, चंचल आँखों
और आबनूसी गेसुओं वाली
भोली, मासूम अल्हड लड़की
तू , अपने खूबसूरत गालों पे
बैठे इस काले तिल को मुझे दे दे
जिसे मै फेंक आना चाहता हूँ
किसी कुआँ, खाई या
बहा आऊँ किसी नदी नाले में
क्यूँ कि यही वो मरदूद काला तिल है
जो किसी सजग चौकीदार सा मेरी नज़रों को
रोक लेता है अपने पास
और नहीं निहारने देता
तुम्हारे गालों की गोराई को
ज़ुल्फ़ों के पेचोख़म को
प्यारी मुस्कान को
और नहीं निहारने देता तुम्हे जी भर के
इसलिए,
ऐ मेरी प्यारी भोली दोस्त
अपना ये क्यूट , नटखट और बदमाश
तिल मुझे दे दे ताकि इसे फेंक आऊं दरिया में

(पर सच ये तिल ही तो है - जो जान ले लेता है )

ओ! माय सोणी
ओ ! माय लव डू यू हियर मी ??)

मुकेश इलाहाबादी ------------------

Friday, 14 July 2017

प्यारी डिंपल वाली भोली लड़की

जी
चाहता है
तुम्हारे गालों के डिम्पल पे
आहिस्ता से रख दूँ
अपनी तर्जनी उंगली
और महसूस करूँ
गुलाब से भी गुलाबी
रेशम से भी मुलायम
इस छोटे से
क्यूट  से गड्ढे को
जिसके आगे सारी क़ायनात भी फीकी हैं

ओ !
प्यारे गालों
और उसपे खूबसूरत डिम्पल वाली
भोली लड़की
कभी कभी तो मेरा जी चाहता है
तुम्हारे गालों के इस डिम्पल के
इस छोटे से गड्ढे में डूब जाऊँ
जैसे नाव डूब जाती है
नदी की भंवर में

ओ मेरी प्यारी डिंपल वाली भोली लड़की
सुन रही हो न ???

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

तनहा रातों में हम आज भी मुस्कुराते है

तनहा रातों में हम आज भी मुस्कुराते है
जब भी तेरी यादों के सितारे जगमगाते हैं
यूँ तो तेरे बगैर जीने का कोई शबब न रहा
मुलाकात की इक उम्मीद में जिए जाते हैं

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

न बिखरने देता है,न संवरने देता है

न बिखरने देता है,न संवरने देता है
न मिलता है न ही बिछड़ने देता है

कभी पानी में रखता है कभी बाहर
न मरने देता है, न  तड़पने देता है

हवा का झोंका  आ के उड़ा ले जाए
न गरजने देता है न बरसने देता है

मुकेश इलाहाबादी -----------------

असमंजस

तुम्हारी

शोख चंचल आँखों की
मासूम चितवन को

कच्ची अमिया सी
खट - मिट्टी बातों को

झरने सी करती कल-कल
मधुर हंसी को

और,,,,
तुम्हारे ढेर सारे
अल्हड़ प्यार को अपने दिल के
छोटे से रुमाल में कैसे बाँध पाऊँगा ?

कैसे इस असमंजस से उबर पाऊंगा ?
तू ही बता, ओ ! मेरी प्रिये

ओ री, मेरी सुमी

मुकेश इलाहाबादी -----------------

जिस दिन भी तू मेरे घर आयेगी


जिस दिन भी तू मेरे घर आयेगी
ज़िंदगी अपनी हसीन हो जायेगी

झूम के बादल बरसेगा आँगन में
रातरानी खिलेगी खिलखिलाएगी

कबूतर का जोड़ा गुंटूर- गुं करेगा
मुंडेर पे बैठी कोयल गुनगुनायेगी

तू ज़रा सी बात पे रूठ के बैठेगी
मै मनाऊंगा तू मान भी जाएगी

अपने हाथो से गूँथूँगा इक गज़रा
जिसे तू अपने बालों में सजाएगी


मुकेश इलाहाबादी ---------------

Thursday, 13 July 2017

चटक रंग

जो
सब  से चटक रंग है
मेरे दिल के कैनवास में
जिसमे
हरे सी हरियाली है
गुलाब सा गुलाबी पन भी है
सफ़ेद की सादगी है
गेरुआ सी सात्विकता है
वो
तुम हो तुम हो तुम हो
वो तुम ही हो जिसमे
हरे  के भी हज़ार शेड हैं

और ????
मुहब्बत के - अनगिनत

क्यूँ , सच है न मेरी सुमी ?

मुकेश इलाहाबादी ----

लापता हो जाता है

चाँद,
लापता हो जाता है
सूरज कहीं समंदर में डूब जाता है
सितारें अंतरिक्ष की
अतल गहराइयों में खो जाते हैं
मै 'मै ' नहीं रह जाता
'मै' चेतना शून्य हो जाता है
ऐसा तब होता है
जब तुम मुझसे
दूर होती हो
या नाराज़ होती हो
सुन रही हो न ?
मेरी दुनिया
मेरी ब्रह्माण्ड
मेरी सुमी

मुकेश इलाहाबादी ---------

Wednesday, 12 July 2017

गोल बिंदी

जैसे
सुबह

के आँचल में
किसी ने टाँक दिया हो
गुलाबी सूरज
बस, ऐसे ही चमकती है
तुम्हारे माथे की गोल बिंदी

(तुम बहुत प्यारी हो - सच्ची मुच्ची )

मुकेश इलाहाबादी --------------------

ख़ुद को और सजा लूँगा

ख़ुद को और सजा लूँगा
दिल के दाग़ छुपा लूँगा

चेहरे पे  मुस्कान  होगी
मुखौटा एक लगा लूँगा

तेरे कोमल कोमल पांव
राह  में फूल बिछा दूंगा

प्यारी प्यारी ग़ज़लों से
अपना तुझे  बना  लूँगा

मुकेश इलाहाबादी ----

आ ईश्क़ का दरिया है कूद जाते हैं


आ ईश्क़ का दरिया है कूद जाते हैं
तन्हाई से तो बेहतर है डूब जाते हैं

ईश्क़ का लुत्फ़ कुछ और बढ़ा लें
हम तुम इक दुसरे से  रूठ जाते हैं

है बारिश का मौसम और हवा ठंडी
आओ टहलते हुए कुछ दूर जाते हैं

बेवफा दोस्तों को याद रक्खा जाए
इससे बेहतर है इनको भूल जाते हैं


मुकेश इलाहबादी -----------------

मेरी ठिठोली पे

मेरी
ठिठोली पे
तुम्हारा 'धत्त' कह के भाग जाना
जैसे,
महुआ चू पड़ा हो
वीरान तपती दोपहरिया में

मुकेश इलाहाबादी -----------

जब कभी तुम अपनी सिसकियों में सुनोगी


जब
कभी तुम अपनी
सिसकियों में सुनोगी
जो तुम्हारे गले में ही घुट के रह गयी
और याद करोगी ऐसे वक़्त में किसका नाम याद आया था

जब
कभी तुम बहुत खुश रही होगी
और वो खुशी किसी विशेष से शेयर करनी चाही होगी
तो किसका नाम याद आया था

गौर से सोचोगी तो शायद मेरा ही नाम याद आया होगा
गर ये सच है तो मेरे लिए सब से बड़ा खूबसूरत सच है

प्यार मुहब्बत झूठी बातें


मुकेश इलाहाबादी ------------------------

Tuesday, 11 July 2017

कपास के फूल


चाहता हूँ
तुम्हारी
हँसी कपास के फूल सा खिलती है  
जिसे मै हवा सा ले उड़ना  चाहता हूँ

मुकेश इलाहाबादी ------------

उजली हथेली पे

मेरे
उजली हथेली पे
अपने गुलाबी होठों से लिख दो
अपना नाम
जिसे मै छाप दूंगा अपनी तनहा दीवार पे
और पढूंगा - खल्वत में

मुकेश इलाहाबादी -------------------

तुम्हारी बातों के आरोह अवरोह में

तुम्हारी बातों के आरोह अवरोह में
एक संगीत है -
जो बजता है अहर्निश - मेरे कानो में

मुकेश इलाहाबादी --------------------

बेवज़ह दिल मेरा जलाया न कर

बेवज़ह दिल मेरा जलाया न कर
बात बात पे खिलखिलाया न कर

देखती नहीं मै ग़मज़दा ज़माने से
तू ज़ालिम सा मुस्कुराया न कर

गर तुझे मुझसे मुहब्बत नहीं तो
रोज़ रोज़ तू मुझसे मिला न कर

मुझको ये नाज़ो नखरे पसंद नहीं
बात बात पे, प्यार जताया न कर

मुझको न 'मय' पसंद न मैखाना
यूँ आँखों से जाम पिलाया न कर

मुकेश इलाहाबादी --------------

तुम, तनहा मुसाफिर

तुम,कहती हो  'मै, तनहा मुसाफिर
मै,कहता हूँ 'मै,  सूनी और लम्बी सड़क

(तुम्हे मंज़िल की तलाश है , और सड़क की कोइ मंज़िल नहीं होती )

मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------------------

संग तराश



संग तराश
तुम्हे क्या पता ?
पत्थर के अंदर एक
ठस और बेजान मूर्ति भर नहीं थी
जिसे तुमने अपनी छेनी हथौड़ी से तराशा है
इस पत्थर के अंदर
एक झरना भी था
जो फूटना और बहना चाहता था
एक मोम की गुड़िया भी थी
जो धीमी -धीमी आँच में
पिघलना चाहती थी
और रोशनी भी देना चाहती थी
खैर ! तुम पत्थर की देवी से खुश हो तो खुश रहो
ओ ! मेरे संग तराश

मुकेश इलाहाबादी -----------------





तीर्थ यात्रा

मेरी
तुम तक पहुंचने।
के लिए काफी दूरी तय करनी है
एक लम्बी चढ़ाई तय करनी है
आखिर तीर्थ यात्रा के लिए
इतना तो करना ही होगा
ओ ! मेरी देवी
ओ ! मेरी आराध्य

मुकेश इलाहाबादी -----


किसी दिन सुबह मै आँख खोलूं

किसी
दिन सुबह मै आँख खोलूं
तुम 'जाड़े की नर्म धूप सा
उतर आओ खिड़की से मेरे कमरे में
और बिछ जाओ बिस्तर पे
और मै तम्हे नर्म -गर्म लिहाफ सा
ओढ़ कर फिर से सो जाऊँ दिन भर के लिए
खिड़की पे परदे डाल के

(सोचो  ! ऐसा हो तो कैसा हो ? मेरी सुमी )

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Monday, 10 July 2017

एक समुन्दर है

मेरे
अंदर एक समुन्दर है
हरहराता हुआ

एक सुप्तज्वाला मुखी है
जो जिसके अंदर का लावा
कभी फूट के नहीं बहा

एक पहाड़ है
दुखों का

एक
टिमटिमाता तारा है
उम्मीदों का

एक सूरज है
अपने भरोसे का

एक चाँद है
तुम्हारी मुस्कान का

यादों की आकाशगंगा है


देखो तो ! मेरे अंदर पूरा ब्रम्हांड है

 मुकेश इलाहाबादी ---------------

इसके पहले कि

इसके पहले कि

उम्र,
मेरी आँखों में
मोतियाबिंद उतार दे
और वे धुंधला देखने लगें
तुम्हे देख लेना चाहता हूँ
जी भर के - और बसा लेना चाहता हूँ
आँखों में - उम्र भर के लिए

इसके पहले कि
याददास्त कमज़ोर हो
मुझे तुम्हारा नाम याद करने में वक़्त लगे
तुम्हे याद कर लेना चाहता हूँ
पूरी तसल्ली से

इसके पहले कि
मेरे पार्किंसन से हिलते हाथ
तुम्हारे स्पर्श को महसुने में असमर्थ हों
तुम्हारा स्पर्श हथेलियों में क़ैद कर लेना चाहता हूँ

इसके पहले कि
मै विदा हो जाऊँ
तुम मिल जाओ एक बार

मुकेश इलाहाबादी -----------

Sunday, 9 July 2017

नेट खोलता हूँ


एक
----

नेट
खोलता हूँ
तुम ऑन लाइन नहीं दिखती
उदास हो के
कुछ देर स्क्रीन को स्क्रॉल करता हूँ
दो चार पोस्ट वजह - बेवज़ह लाइक करता हूँ
तुम अब भी ऑन लाइन नहीं दिखी
एक गहरी साँस भर के
नेट ऑफ़ कर देता हूँ
कुछ देर बाद फिर से ऑन करने के लिए
शायद तुम्हारी डी पी के आगे
हरी बत्ती जल चुकी हो
शायद,

दो
---------

नेट
खोलता हूँ
तुम्हारी डी पी के आगे
हरी बत्ती जल रही है
मै खुश हो के तुम्हारे चैट बॉक्स में
इक प्यारा सा कैप्शन उछाल देता हूँ
तुम्हारी तरफ से कोई जवाब नहीं
मै फिर उदास हो कर
कुछ देर स्क्रीन को स्क्रॉल करता हूँ
तुम ऑफ लाइन हो जाती हो
या हमें ऑन लाइन देखे मुझे अपने चैट
से ऑफ कर देती हो
मै उदास हो कर नेट ऑफ कर देता हूँ
कुछ देर बाद फिर से नेट खोलने के लिए

तीन
-------
मेरे
बहुत सरे मैसेज का
तुमने जवाब नहीं दिया
अब सिर्फ तुम्हे
गुड़ मॉर्निंग
गुड़ इवनिंग का मेसेज भेजता हूँ
इस उम्मीद से
शायद किसी दिन इस हरी बत्ती से
कोई प्यारा सा मैसेज 'हाँ' का
मेरे लिए उछल कर बाहर आये

चार
-------
उसकी
तमाम उम्मीदें न उम्मीदी में
बदल चुकी हैं
अब उसके  मेसेज दूसरी हरी बत्ती में जाते हैं
वहाँ से हरा सिग्नल भी मिल रहा है
वह बहुत खुश है
उसका नेट दिन भर और रात में भी
देर तक ऑन लाइन रहता है


मुकेश इलाहाबादी ----------- 

थोड़ा बहुत तो धड़कता है

थोड़ा  बहुत तो धड़कता है
प्यार करो तो डर लगता है

बैठे रहना गुपचुप गुपचुप
तुझको सोचू मन करता है

चंदा बादल बरखा बिजली
हर मौसम सावन लगता है

दुनिया के सारे सुख फीके
ईश्क़ ही सब कुछ लगता है


मुकेश इलाहाबादी -------

रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है

रोज़ रोज़ तो बादल बरसता है
फिर क्यूँ आब को तरसता है

गर चाँद नहीं है तेरी आँखों में
इस झील में कौन लरज़ता है

तू कहती है मुझसे प्यार नहीं
फिर सीने में कौन धड़कता है

किसकी यादें फलक पे टंगी है
सितारे सा शब भर चमकता हैं

मुद्दतें हुई तुझको गए हुए पर
ये दिल तेरे लिए ही ठुनकता है

मुकेश इलाहाबादी ------------

अंजुरी के कटोरे में

सोचता
हूँ, अपनी अंजुरी के कटोरे में
तुम्हारी दूधिया हंसी समेट लूँ
और,
उसमे तुम्हारे होंठों का गुलाबीपन मिला कर
उछाल दूँ आसमान में
फिर दुनिया को गुलाबी गुलाबी देखूं

मुकेश इलाहाबादी --------------------

Saturday, 8 July 2017

ऊँचे
ऊँचे देवदार और चिनार के
दरख्तों, घनी झाड़ियों, झरनो के बीच
एक मीठे पानी  की झील बहती थी
बिलकुल तुम्हारी आँखों की तरह
उस झील का पानी निस्तरंग बहता दिन में
रात - हौले - हौले बहता
झील में सुनहरी मछलियां मचलती रहती
सांझ होते ही उस झील में
अससमाँ से गुलाबी परिधान पहने चँदा
उतर आता और झील से एक खूबसूरत
जलपरी निकलती फिर दोनों देर तक क्रीड़ा करते
किलोल करते उन खूबसूरत वादियों में
जिसे देख
आखेटक अपना आखेट करना भूल जाते
वादी की गिलहरी,
फुदकना छोड़ चुप हो जाती
कोयल अपनी डाल पे सांस रोक बैठ जाती
हिरन कुलांचे भरना छोड़ देते
हवाएं बहना भूल जाती
अगर बहती भी तो मलय गंध के साथ
आकाश अपनी मौन स्वीकृत दे देता
धरती मगन हो इस किलोल को देखती
ऐसा युगों युगों से होता रहा है
और शायद होता रहता
किन्तु
एक दिन कुछ विकास पुरुष आए
इन वादियों में और उन्होंने इस वादी को
और बेहतर और खूबसूरत बनाने की ठानी
इसके लिए उन्हें बहुत सारे पेड़ काटने पड़े
बहुत सरे झरनो को सुखाना पड़ा
पर्वतों की भुजाओं और सीने पे बुलडोज़र चलाना पड़ा
कई मॉल, इमारतें और सड़कें बनानी पडी
लेकिन झील  की जलपरी जो प्रकृति और शांति प्रियता पसंद थी
ये शोरोगुल और ये पहाड़ व पेड़ों के साथ ज़्यादती पसंद नहीं आयी
और एक दिन,
वह झील छोड़ के अपने लोक में चली गयी और फिर
वापस नहीं आई,
जलपरी के जाते ही झील भी सूख गयी
सुना है अब वहां सुर्ख रेत की नदी बहती है -
ये देख चाँद बहुत उदास हुआ और रोने लगा
यंहा तक कि रोते रोते उसका गुलाबी बदन सफ़ेद हो गया
तब से ही वो मौत सी सफेदी लिए झंगोला पहने आसमान  में टंगा है
तभी से चाँद ज़मीन पे नहीं आता
और चाँद हमें सफ़ेद नज़र आता है

मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

Friday, 7 July 2017

उन्ही - उन्ही गलियों में अटका हुआ है

उन्ही - उन्ही गलियों में अटका हुआ है
मुसाफिर, शायद राह से भटका हुआ है
दरवाज़ा खोल के देखा, कोइ नही, फिर
क्यूं किसी के होने का खटका हुआ है ?
न वो हाँ कहती है, न  ही 'न' कहती है,
दिल अजब कश्मकश में लटका हुआ है
मुकेश इलाहाबादी ------------------------

'कस्तूरी'


जाने कब चुपके से
रख गयी हो 'तुम'
मेरे ज़ेहन की अलमारी में 'कस्तूरी'
आज तक महकती है मेरी साँसे
मेरी रातें
मेरा दिन

मुकेश इलाहाबादी ------------

Thursday, 6 July 2017

उसके द्वार तक गया

वह
उसके द्वार तक गया
कुछ देर ठहरा
कुछ सोचा
फिर
बरसों से बंद दरवाज़े को
बिना सांकल खटकाये
लौट आया

अब वह
सिगरेट के धुंए में
गौर से देख रहा है खुद को विलीन होते हुए
न जाने क्या सोचते हुए

मुकेश इलाहाबादी -------------

किसी , दिन तो

किसी ,
दिन तो सावन से ऊब कर
तुम देखोगी
पतझड़ को
और --- अचानक याद आ जाऊँगा 'मै'

किसी दिन तो
तुम देखोगी
गरजते - बरसते मेघों को
और तुम्हे 'मै ' याद आ जाऊँगा

किसी दिन तो ........ ...
फुर्सत मिलते ही तुम सोचोगी
मेरे बारे में

तब तक मै घुल चूका होऊँगा आकाश में
फिर कभी न जमने के लिए
फिर कभी न बरसने के लिए
सावन भादों के मेघ सा

मुकेश इलाहाबादी -------------- 

यादों के पत्ते पर

यादों
के पत्ते पर
तुम्हारे नाम का चराग़ जला कर
वक़्त के दरिया में बहा आया हूँ

देखना ये चराग़ कभी न कभी तुम तक पंहुचेगा ज़रूर

मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

और रात करवट बदलते बीत जाती है

सुबह
की ताज़ी हवा मुझे
इंसान की तरह जगाती है

किन्तु
कुछ देर बाद 'मै'
अपने अंदर के इंसान को मार के
कुत्ते की खाल ओढ़ कर
ऑफिस चल देता हूँ
दिन भर अपने अधीनस्थों पे
भौंकने, बॉस के आगे दुम हिलाने के बाद
सांझ हाँफता हुआ घर लौटता हूँ

रात कुत्ते की खाल उतार
भेड़िया बन जाता हूँ
बिस्तर पे मेमने का शिकार करने के लिए

नींद में फिर इंसान बनना चाहता हूँ
पर निगोड़े सपने बनने नहीं देते
और रात करवट बदलते बीत जाती है

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

कुछ
चुप्पियाँ  
कुछ सिसकियाँ 
कुछ चीखें 
कुछ आहटें 
जिन्हे हमारे बहरे कान नहीं सुनते 
या फिर हलके से कुछ सुनाई भी दिया तो 
करवट बदल के सो जाते हैं 
अपने लिए एक हसीं सुबह का ख्वाब देखते हुए 

मुकेश इलाहाबादी --------

जैसे लौट लौट आता है बसंत

तुम
जाना चाहती हो ?
बेशक चली जाना
बस,
अपने मेहंदी लगे पाँवो की छाप
पायल की खनखन
छोड़ जाना मेरे द्वार

तुम
जाना चाहती हो तो ,
बेशक चली जाओ
पर
अपनी  चाँद चकोरी चितवन
गोरे - सकोरे चूड़ी भरे हाथों
की छन -छन
रख जाना आले पे

और माथे से सरकी बिंदी
चिपका जाना आईने पे

और
फिर - लौट आना
जैसे लौट लौट आता है बसंत फिर - फिर

मुकेश इलाहाबादी -----------------

तेरे ख्वाबों में उड़ रहा हूँ मै

तेरे ख्वाबों में उड़ रहा हूँ मै
रूई का बादल हो गया हूँ मै

आँचल का नीला आसमान
चाँद - सितारा हो रहा हूँ मैं

लोग खेलते  हैं तोड़  देते हैं
इक खिलौना बन गया हूँ मै

क्यूँ ढूंढते हो इधर - उधर ?
तेरे दिल में हीतो बसा हूँ मै

मुकेश इतना डसा गया हूँ
ज़हर मोहरा हो गया हूँ मै

मुकेश इलाहबादी ----------

मन के आँगन में

अपने
मन के आँगन में
सफ़ेद चौकोर पत्थरों के बीच
थोड़ी कच्ची ज़मीन छोड़ रखना
देखना एक दिन मै उगूँगा
रजनीगंधा सा और महकूँगा
तुम्हारी साँसों में

मुकेश इलाहाबादी ------------

Wednesday, 5 July 2017

एक छत - एक बॉलकनी -एक दृश्य

एक छत - एक बॉलकनी -एक दृश्य
-----------------------------------------
पहले,
उसने छत पे बंधी अलगनी पे 
बाल्टी में रखे धुले कपड़ों को
फैलाया सूखने के लिए
फिर,
शैम्पू की भीनी - भीनी खुशबू से तर
अपने धुले गीले बालों में बंधे तौलियो को
अदा से खोल के बालों को झटका और
फिर उसी तौलिये से झटक- झटक के बालों से
तमाम मोतियों को छत पे बिखर जाने दिया
अब
वह जा चुकी है
सामने की खिड़की पे
एक उचटती सी अजनबी नज़र डालते हुए
उसका - गुलाबी, रोंये दार, हल्का भीगा
बालों की खुशबू से तर तौलिया
अलगनी में शान से टंगा
मुँह चिढ़ाने लगा खिड़की को
खिड़की के भीतर से दो हाथ
खिड़की को बंद कर के
सिगरेट केश की ओर बढ़ गए
मुकेश इलाहाबादी -------------

Tuesday, 4 July 2017

मै, सूरज सा उगूँ

मै,
सूरज सा उगूँ
तुम
चाँदनी सा छिटक जाओ
आ ! इस तरह हम तुम एक हो जाएँ
आ ! हम तुम रातों दिन हो जाएँ

तुम, फूल सा खिलो
मै , सुगंध हो जाऊँ
आ ! हम तुम गुलशन गुलशन हो जाएँ

मुकेश इलाहाबादी --------------

एक दिन कुछ ऐसा करते हैं

सुनो
एक दिन कुछ ऐसा करते हैं

तुम
अपने शैम्पू लगे बालों की जगह
किसी दिन तेल चुपड़े बालों को
नारंगी रिबन से कास के बाँधी गयी दो चुटिया
कर के, अपने कंधे पे पुराने दुपट्टे को सजाए हुए आओ न

एक बार फिर देखना चाहता हूँ
तुम्हे तुम्हारे पुराने रूप में
अल्हड , मासूम और अलमस्त

और मै
अमिताभ स्टाइल में कानो पे बाल
और लम्बे कालेर की शर्ट पे
बेलबाटम ,
आँखों पे बड़े ग्लास का चस्मा लगा के आऊं

और हम दोनों देखें चोरी से
शहर के सबसे पुराने पिक्चर हाल की पिछली सीट पे
बैठ के कोइ फिल्म

और फिर धड़कते दिल से वापस घर आयें



मुकेश इलाहाबादी ---------

दिल की ज़मीन में

अपनी
साँसों की खुशबू
छोड़ आयी थी
तुम मेरे घर
जिसे मैंने 'बो' दिया था
दिल की ज़मीन में
फिर
वक़्त के सूरज ने धूप दी
यादों ने खाद पानी दिया
मेरी धड़कती सांसो ने हवा दी

अब -
तुम्हारी साँसे रजनीगंधा सा खिल के
महकाती हैं मेरी रातों को

(तुम अपनी सांसो को हर जगह मत भूलना)

मुकेश इलाहाबादी -----------

Monday, 3 July 2017

जमा हुआ दर्द पिघला होगा

जमा हुआ दर्द पिघला होगा
दरिया यूँ ही नहीं बहा होगा

कंठ उसका यूँ नहीं नीला है
ज़रूर हलाहल  पिया  होगा 

धुँए  की लकीर बता  रही है
दिया अभी अभी बुझा होगा

झूला, गोरी, कोयल उदास हैं
बसंत आके चला गया होगा 

मुकेश आजकल हँसता नहीं
तुमने भी ये बात सुना होगा

मुकेश इलाहाबादी -------------

Sunday, 2 July 2017

बड़े और बहुत बड़े आसमान से एक थोड़ा पर काफी बड़ा सा आसमान ले आया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ रातरानी की ढेर सारी खुशबू से थोड़ी सी पर थोड़ी से कुछ ज़्यादा खुशबू मांग लाया हूँ जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ तितली से मांग लाया हूँ दो पर जिन्हे सजा देना चाहता हूँ तुम्हारी बाँहों पे ताकि तुम देख सको थोड़े से महकते सपने और उड़ कर आ सको मेरे पास सपनो में ही सही मुकेश इलाहाबादी -----------------


बड़े
और बहुत बड़े
आसमान से
एक थोड़ा पर काफी बड़ा सा आसमान
ले आया हूँ
जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ


रातरानी
की ढेर सारी खुशबू से
थोड़ी सी पर
थोड़ी से कुछ ज़्यादा खुशबू मांग लाया हूँ
जिसे तुम्हारी पलकों पे रख देना चाहता हूँ

तितली
से मांग लाया हूँ दो पर
जिन्हे सजा देना चाहता हूँ तुम्हारी बाँहों पे


ताकि तुम देख सको
थोड़े से महकते सपने और
उड़ कर आ सको मेरे पास सपनो में ही सही


मुकेश इलाहाबादी -----------------

जीवन के उत्तरार्ध मे

प्रिय। जीवन के उत्तरार्ध मे, अब जब जीवन सूर्य म्रत्यु की गोद मे समा जाने को आतुर है। तब एक बार फिर मेरे सारे भाव मुखरित हो जाना चाहते हैं जो सदैव निश्रत होते रहे हैं, मेरे मौन मे, मेरी ऑखों से, मेरे क्रिया कलापों से मेरे वयवहार से, पर शायद तुम्हे वे भाव, वे शब्द्लाहरियाँ तुम्हे वे अर्थ व आनंद नही दे पायीं। जो तुम्हारी चाहना थी। और तुम हमेशा आतुर रहीं मात्र कुछ शब्दों को सुनने को।
प्रिय, ऐसा नही कि मै उस प्रेमाभिव्यिक्ति को शब्दावरण देना नही चाहता था। ऐसा नही कि मै तुम्हे अपने बाहुपाश मे लेकर कुछ प्रेमगीत गुनगुनाना नही चाहता था। या कि ऐसा नही कि मै सावन की घटाओं मे तुम्हारे साथ किलोल करना नही चाहता था। कि, चांदनी रात मे तुम्हारे साथ नौका विहार नही करना चाहता था।
लेकिन मै ही पुराने आर्दशवाद को अपने सीने से लगाये रहा। और इसके अलावा, मेरा ऐसा मानना था कि क्या मौन ह्रदय की प्रगाढ़ प्रेम की सुकुमार भावनाओं को भावषून्य शब्दों मे प्रकट करना आवष्यक है ?
यदि वह ऑखों से नही पढी जा पा रही है। भावों से व्यक्त नही हो पा रही है। व्यवहार उसे नही समझा पा रहे हैं। तो ये खोखले शब्द क्या कर पायेंगे ?
और शायद यही कारण रहा है, मै अपने अंतरतम भावों को अभिव्यक्ति देने से बचता रहा। चाहे वे कितने ही कोमल और गहनतम प्रेम के क्षण क्यूं न रहे हों। और .. तब भी मै गम्भीरता का लबादा ओढे ही रहता था।
हां ये मै मानता हूं कि कई ऐसे नाजुक क्षण आये हैं जब मै कह देना चाहता था सब कुछ सब कुछ जो तुम सुनना चाहती थीं। जिसे सुनने के लिये तुम्हारा रोंया रोंया आतुर रहता था। और ... मै कहना भी चाहता था दृ लेकिन .....
ऐसे मौके पर मेरा अहम आडे आ जाता जो यह मानता रहा कि प्रेमाभिव्यक्ति तो सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों को ही शोभा देती है। पुरुष तो सागर है। जो शांत और थिर ही अच्छा लगता है। यह सोच मेरे बोलते हुये शब्द मेरे तालू से चिपक के रह जाते । और मै चुप रह जाता था।
लेकिन तुम भी तो न जाने किस माटी की बनी थीं। बिलकुल धरती की तरह अंनंत धैर्य धारण किये हुये कि कभी तो आसमान झुकेगा अपनी अदम्य गडगडाहट के साथ और फिर तुम समा जाओगी उस अनंत नीले आसमान के गहन बाहुपाश मे .. प्रेम मे ... उधर मै सोचता रहा शायद तुम अपनी धूरी पे घूमती हुयी अपने सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती हुयी एक दिन मेरी बाहों मे खुद ब खुद समा जाओगी अपनी इस अनंत खामोशी के साथ दृ लेकिन ऐसा न हुआ . ऐसा न हुआ....
और .. आज आसमान हार गया धरती जीत गयी। मेरा मौन पराजित हो गया तुम्हारा मौन जीत गया।
यह कहते हुये कि दृ मुझे तुमसे प्यार है ... मुझे तुमसे प्यार है ...........
मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------