किसी को मै कह सकूँ अपना कोई ऐसा न मिला
किसी को मै कह सकूँ अपना कोई ऐसा न मिला आखों को सफर में कोई मंज़र सुहाना न मिला ख्वाहिश थी कोई तो मुझको भी टूट कर चाहे तो उम्र बीत गयी मगर कोई ऐसा दीवाना न मिला अपने ख्वाबों के गिर्दाब में डूबता- उतराता हूँ बहुत कोशिशों के बाद भी कोई किनारा न मिला तुझसे मुलाक़ात के बाद एक उम्मीद जगी थी लेकिन तुमसे भी हमको कोई सहारा न मिला मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------