बुनियाद में नमी बैठी है

बुनियाद में नमी बैठी है
दीवार  सीली दिखती है

चहचहाटें उड़ गईं यहाँ से
तन्हाई गुटरगूं करती है

जिस्म नहीं खाली मकां है
जाँ गैर के दिल में रहती है

दरियाए ईश्क सूख चुका
अब रेत की नदी बहती है

तुम्हारी ग़म ज़दा आखें
आज भी कुछ कहती हैं

मुकेश इलाहाबादी  ----

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