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Friday, 25 November 2016

मेरे मन की माला में तेरे ही नाम के मनके हैं

मेरे मन की माला में तेरे ही नाम के मनके हैं
कौन कमबख्त कहता है हम किसी गैर के हैं
पहले मिल, बैठ, समझ, परख मुझको ढंग से
तब तू भी कहेंगी मुकेश तो है,ज़माने से हट के

मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

थोड़ा सा प्यार थोड़ा सा दुलार चाहिए

थोड़ा सा प्यार थोड़ा सा दुलार चाहिए
तेरी आँखों में ही सारा संसार चाहिए
दौलते दुनिया से क्या गरज़ मुझको
मुझको  तो  बस  तेरा दीदार चाहिए
मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Thursday, 24 November 2016

और बिखर जाता हूँ ख़ुद को समेटते हुए



और बिखर जाता हूँ ख़ुद को समेटते हुए
आँख हो नम जाती है दर्द से , हँसते हुए

तुम्हारे इस चाँद जैसे चेहरे की आँच में
देखे हैं बर्फ ही नहीं पत्थर, पिघलते हुए

कैसे लिक्खूँ तुझको अपने दिल की बात
हाथ लरज़ जाते हैं, तुझे ख़त लिखते हुए

ऐसा भी नहीं तेरे बिन ये रात न कटेगी
काट दूंगा ये तमाम रात तारे गिनते हुए

बस इक ग़ज़ल सुना दे तू आज की रात
मुकेश रात सो जाऊँगा, तुझे  सुनते हुए

मुकेश इलाहाबादी -----------------------

Wednesday, 23 November 2016

परिंदो का भी ठिकाना है

परिंदो का भी ठिकाना  है
बूढा बरगद आशियाना है

मुसाफिर मैं उम्र भर का
फ़क़त चलते ही जाना है

तेरी  खामोश  निगाहों से,
किया वादा भी निभाना है

तुमको  मुहब्बत ही न  थी
रुसवाई फ़क़त बहाना था

इक दिन तुम भी मानोगे
मुकेश अजब दीवाना था

मुकेश इलाहाबादी ----------
परिंदो का भी ठिकाना  है
बूढा बरगद आशियाना है

मुसाफिर मैं उम्र भर का
फ़क़त चलते ही जाना है

तेरी  खामोश  निगाहों से,
किया वादा भी निभाना है

तुमको  मुहब्बत ही न  थी
रुसवाई फ़क़त बहाना था

इक दिन तुम भी मानोगे
मुकेश अजब दीवाना था

मुकेश इलाहाबादी ----------

Sunday, 20 November 2016

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है

अक्सर
ऐसा क्यूँ होता है
भीड़ में  कोई इक चेहरा
अच्छा लगता है, और
जी भर के देख पायें इसके पहले ही
भीड़ में ही  गुम हो जाता है ,

अक्सर, ऐसा क्यूँ होता है?
कोई दिल से अच्छा लगता है
मिलने - बतियाने को जी करता है
और वो ही ,,
मिलते - मिलते रह जाता है

जैसे - होठों तक कोई प्याला आते आते रह जाता  है

पर, क्यूँ ? क्यूँ ?क
ऐसा क्यूँ अक्सर  होता है?
कोई ख़्वाब हकीकत होते होते रह जाता है ???

मुकेश इलाहाबादी ------------

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है

अक्सर
ऐसा क्यूँ होता है
भीड़ में  कोई इक चेहरा
अच्छा लगता है
जिससे,
मिलने, बतियाने को
जी करता है

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है
कोई दिल से अच्छा लगता है
और वो ही ,,
मिलते मिलते रह जाता है

जैसे - होठों से कोइ प्याला गिर जाता है

पर, क्यूँ क्यूँ क्यूँ
ऐसा होता है
कोई अपना होते होते रह जाता है ???

मुकेश इलाहाबादी ------------

Saturday, 19 November 2016

मोबाइल

मेरे ,
दिल के मोबाइल में
फीड हो तुम
सब से
प्रिय नंबर की तरह
जिस नंबर के लिए
मैंने सबसे जुदा
और सबसे मीठी
कान्हा की बांसुरी की
रिंग टोन लगा रखी है

रह - रह के देख लेता हूँ
दिले मोबाइल को
की कहीं
तुम्हारी कॉल
या मेसेज तो नहीं आया है
और हर बार
मायूस हो के रख देता हूँ फिर से
मोबाइल को

वैसे,
भी तुम
मेरे दिल के एंड्रॉइड फ़ोन का वो प्रोगग्राम हो
और नेट सर्विस हो
जिसके बिना मेरा ये दिले फ़ोन
सिर्फ एक खिलौना है
जिससे ज़माना खेलता है जी भर के
और तोड़ता फोड़ता रहता है,
किसी शैतान बच्चे सा,

मेरी प्यारी सुमी,
तुम्हारी सिर्फ और सिर्फ एक मिस कॉल या मैसेज के मैसेज के इंतज़ार में

मुकेश इलाहाबादी --------------------------









Tuesday, 15 November 2016

तेरी मासूमियत

तेरी
मासूमियत
और साफगोई ही तो है
जो, हम तुझपे मरे जाते हैं
वर्ना,
ईश्क़ करने के लिए तो
बहुत से मिल जायेंगे  
ज़माने में

सुमी, तुम्ही से

मुकेश इलाहाबादी ------------ 

बरबाद हो के भी मुस्कुराता है, कि

बरबाद हो के भी मुस्कुराता है, कि
मेरा दिल भी मुझ सा बेशर्म निकला
मुकेश इलाहाबादी ------------------

अब तो तेरी यादें और तेरे ख्वाब दिल बहलाते हैं

अब तो तेरी यादें और तेरे ख्वाब दिल बहलाते हैं
वरना गर्दिशे दौरां में कौन किसका साथ देता है
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

Saturday, 12 November 2016

सब कुछ कट जाता है, तनहाई नहीं कटती

सब कुछ कट जाता है, तनहाई नहीं कटती
तू आ जा की मुझसे तेरी जुदाई नहीं कटती
मुकेश इलाहाबादी --------------

आग आग और सिर्फ आग पाओगे

आग आग और सिर्फ आग पाओगे
मेरे सीने में  भी, आफ़ताब पाओगे

न फूल न तितली और न कलियाँ
मेरा गुलशन, तुम  बरबाद पाओगे

ज़हर पी चूका हूँ मैं इतना कि तुम
लहू की जगह सिर्फ तेज़ाब पाओगे

मुकेश इलाहाबादी -----------------

मेरी खामोशी मेरी बेचैनी का शबब न बताएगी

मेरी खामोशी मेरी बेचैनी का शबब न बताएगी
पूछ लेना ये राज़ तुम मेरी ग़ज़लों से नज़्मों से
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

अफवाह

इक अफवाह,
फ़ैली है शहर में
कल, निकोलोगे तुम,बेनक़ाब
शहर में
मुकेश इलाहाबादी ---

मेरी तड़पती रूह पाओगे इन ख़लाओं में,


मेरी तड़पती रूह पाओगे इन ख़लाओं में,
सुनोगे सिसकते साज़ तुम हर दिशाओं में
झुलस जाओगे जो निकलोगे घर से, तुम
घुल गया है, तेज़ाब शहर की फ़ज़ाओं में

मुकेश इलाहाबादी -------------------------

Friday, 11 November 2016

साँवली रात चाँदनी- चाँदनी हो जाती है



साँवली रात चाँदनी- चाँदनी हो जाती है
तुमसे मिल के शब रातरानी हो जाती है

तुझमे कुछ तो अलग है वर्ना यूँ ही नहीं
तुझे देख के दुनिया दीवानी हो जाती है

ग़र ईश्क़ में बेचैनी नहीं जुनून नहीं तो
बातें मुहब्बत की जिस्मानी  हो जाती है

मुकेश इलाहाबादी ----------------------- 

साँवली रात चाँदनी- चाँदनी हो जाती है



साँवली रात चाँदनी- चाँदनी हो जाती है
तुमसे मिल के शब रातरानी हो जाती है

तुझमे कुछ तो अलग है वर्ना यूँ ही नहीं
तुझे देख के दुनिया दीवानी हो जाती है

ग़र ईश्क़ में बेचैनी नहीं जुनून नहीं तो
बातें मुहब्बत की जिस्मानी  हो जाती है

मुकेश इलाहाबादी ----------------------- 

तसल्ली कुछ इस तरह कर लेता हूँ

तसल्ली कुछ इस तरह कर लेता हूँ
तू नहीं तो तेरी तस्वीर देख लेता हूँ

अक्सर जब भी दिल उदास होता है
मुकेश, तुम्हारी ग़ज़लें सुन लेता हूँ

मुकेश इलाहाबादी ----------------

Monday, 7 November 2016

वो भी चुप हैं हम भी खामोश चल रहे हैं

वो भी चुप हैं हम भी खामोश चल रहे हैं
तसल्ली ये है हम साथ साथ चल रहे हैं
मुकेश इलाहाबादी ---------------------

Sunday, 6 November 2016

आप के गालों पे मासूम मुस्कराहट

आप के गालों पे मासूम मुस्कराहट
सुबह के आँचल पे फूलों के सजावट
दिले तनहा में हल्की सी भी हलचल
मुकेश,जैसे आपके कदमो की आहट 
मुकेश इलाहाबादी -------------------

Saturday, 5 November 2016

हर रोज़ ज़िन्दगी मेरा मज़ाक उड़ाती क्यूँ है

हर रोज़ ज़िन्दगी मेरा मज़ाक उड़ाती क्यूँ है
गर वो मेरा नहीं तो उसकी याद आती क्यूँ है

ग़र मसले जाना, मुरझा जाना ही नियत है
क़ायनात इत्ते मासूम फूल खिलाती क्यूँ है

न चाँद मेरा है, फ़लक़ के सितारे मेरे, फिर
रात चाँदनी आँगन में यूँ मुस्कुराती क्यूँ हैं

जानता हूँ तू मुझे हरगिज़ याद करती नहीं
फिर साँसों में तू चंदन सा महमहाती क्यूँ है

मुकेश सिवाय दर्द के तुझसे हासिल क्या है
ज़िन्दगी सुबो शाम इत्ता मुस्कुराती क्यूँ है

मुकेश इलाहाबादी -----------------------------