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Monday, 18 August 2014

छत पे कब तक टंगी रहती धूप

छत पे कब तक टंगी रहती धूप
साँझ होते ही उतरने लगी धूप

बदन तरबतर पसीने से उसका
ज़िंदगी हो गयी दोपहर की धूप

गोरी छत पे गीले गेसू सुखा रही
उसके मुखड़े पे मुस्कुरा रही धूप

जाड़े के मौसम में नरम लिहाफ
तपते मौसम में बेहया सी धूप

काली स्याह रात के बाद ज़मी पे
उजली चादर सी बिछ गयी धूप

मुकेश इलाहाबादी ----------------