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Friday, 14 July 2017

असमंजस

तुम्हारी

शोख चंचल आँखों की
मासूम चितवन को

कच्ची अमिया सी
खट - मिट्टी बातों को

झरने सी करती कल-कल
मधुर हंसी को

और,,,,
तुम्हारे ढेर सारे
अल्हड़ प्यार को अपने दिल के
छोटे से रुमाल में कैसे बाँध पाऊँगा ?

कैसे इस असमंजस से उबर पाऊंगा ?
तू ही बता, ओ ! मेरी प्रिये

ओ री, मेरी सुमी

मुकेश इलाहाबादी -----------------