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Monday, 10 July 2017

एक समुन्दर है

मेरे
अंदर एक समुन्दर है
हरहराता हुआ

एक सुप्तज्वाला मुखी है
जो जिसके अंदर का लावा
कभी फूट के नहीं बहा

एक पहाड़ है
दुखों का

एक
टिमटिमाता तारा है
उम्मीदों का

एक सूरज है
अपने भरोसे का

एक चाँद है
तुम्हारी मुस्कान का

यादों की आकाशगंगा है


देखो तो ! मेरे अंदर पूरा ब्रम्हांड है

 मुकेश इलाहाबादी ---------------