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Showing posts from August, 2018

सावन भादों सा बरस गयी आँखें

सावन भादों सा बरस गयी आँखें तेरे दीदार  को  तरस  गयी आँखे मुद्दतों से यँहा वीराना वीराना था  तुझे  देखा तो  निखर गयीं आँखे  यूँ तो निगाह में कोई और ही था तुझे देख वंही अटक गयी आँखे  ज़रा सा उसकी तारीफ क्या की लाज से उसकी लरज़ गयी आँखे पलकों पे हया के  हीरे- मोती थे नज़रें मिली तो बहक गईं आँखे मुकेश इलाहाबादी --------------

हर रोज़ उलीचता हूँ

हर रोज़ उलीचता हूँ अहर्निश  दुःख के हरहराते समंदर को अपनी चोंच से टिटिहरी की तरह फिर शाम थक कर सो जाता हूँ - उसी समंदर की रेत् के किनारे मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

दर्द जैसे जैसे बढ़ता है

दर्द  जैसे  जैसे  बढ़ता है ज़ख्म वैसे वैसे हँसता है तेरी  हँसी  इक झरना है मुझको  ऐसा  लगता है तेरा हँस  के  बातें करना  मुझको अच्छा लगता है आखिर तू मुझको बतला मुक्कु तेरा क्या लगता है  मुकेश इलाहाबादी -----

मै एक अँधा कुआँ हूँ।

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मै एक अँधा कुआँ हूँ -------------------------------- एक ----- मै एक अँधा कुआँ हूँ। जिसमे से सिर्फ थोड़ा सा आकाश दीखता है थोड़ी सी धूप , थोड़ी सी हवा आती है धूप नीचे मेरी तलहटी तक आती - आती गुप्प अँधेरे में तब्दील हो जाती है और हवा - नीचे आते - आते बहना बंद हो जाती है और गुप्प अँधेरे से गलबहियाँ करके ज़हरीली हो जाती है लिहाज़ा अब तो मै भी ज़हरीला हो गया हूँ इतना ज़हरीला कि मेरी तली तक मेरे अंदर उतरने वाला भी ज़हरीला हो जाता है - या मेरी तरह मृत हो जाता है दो --- मै, एक अँधा कुँआ हूँ जिसकी तलहटी में निर्मल नहीं थोड़ा सा पानी का डबरा सा बचा है - वो भी मेरे अंदर की ज़हरीले हवा से ज़हरीला हो चुका है थोड़े से कंकर और बाकी मिट्टी दिखती है ऊपर मेरी जगत से देखोगे तो सिर्फ और सिर्फ अँधेरा दिखेगा इस लिए कुछ लोग मुझे अँधा कुँआ भी कहते हैं तीन ----- मै एक अँधा और सूखा कुँआ हूँ जिसके अंदर गाँव कि न जाने कितनी सुखिया , बुधिया , रधिया सीता, क़र्ज़ में डूबे किसान समा चुके हैं कई खूँटा तुड़ा के भागी गाय - बछिया बकरी - बैल भी मुझमे समा के अब कंकाल शेष बचे हैं मेरी तलहटी में - कुछ कंकर पत्थर थोड़े से ज़हर...

तू न आया तेरा इंतज़ार कर कर सोया

तू न आया तेरा इंतज़ार कर कर सोया दिल बच्चा था तेरा नाम लेले कर रोया जाने कौन सा जंगल, भूल भुलैया हो तेरे पास से गुज़र कर ही ये दिल खोया मुकेश इलाहाबादी --------------------

गाँठे

एक ---- मर्यादा में, बंधे - बंधे हमने खोली एक दूजे की गाँठे और बंध गए एक अटूट रिश्ते में दो --- आओ, खोल दे उन अदृश्य गाँठो को जिनके उग आने से बिखर गए थे हम दोनों मुकेश इलाहाबादी ----------

न धूप खिलेगी न पानी रहेगा न हवा बहेगी

न धूप खिलेगी न पानी रहेगा न हवा बहेगी प्रकृति के साथ खेलोगे तो त्राहि त्राहि मचेगी जिस तरह रोज़ जंगल और पहाड़ कट रहे है देखना आसमान से पानी नहीं आग बरसेगी सत्ता के मद में ये बात मत भूलो सात्तदेशों अगर जनता चाह लेगी तो तुम्हे कुचल देगी मुकेश इलाहाबादी -------------------------

मीठे पानी का झरना है कैसे बहता देखूं तो

मीठे पानी का झरना है कैसे बहता देखूं तो कभी हमसे मिलो तुझे हँसता हुआ देखूं तो आ मेरे पहलू में कुछ देर बैठ और मुस्करा  खुशियों के फूलों को खिलता हुआ देखूं तो  मुकेश इलाहाबादी -------------------------

मान लेता हूँ मै बहुत सच और खरा नहीं

मान लेता हूँ मै बहुत सच और खरा नहीं ये भी सच है, इंसान इतना भी बुरा नहीं यूँ तो, दुश्मनो ने कोई कसर छोड़ी नहीं फिर भी बेशर्मो सा मै ज़िंदा हूँ मरा नहीं नक़ाब अपने चेहरे से यूँ ही उठाए रखो कुछ और देख लूँ तुझे , दिल भरा नहीं मुकेश इलाहाबादी ------------------------

ये सच है मर नहीं जाऊँगा तुम्हारे बिना

ये सच है मर नहीं जाऊँगा तुम्हारे बिना पर मै जी भी नहीं पाऊँगा  तुम्हारे बिना तुम थे तो हँस लेता था खिलखिला लेता अब मै मुस्कुरा न पाऊँगा, तुम्हारे बिना यूँ तो मेरे पास कोई और हुनर नहीं है हाँ ग़ज़लों के  गुल खिलाऊँगा तुम्हारे बिना मुकेश इलाहाबादी ----------------------

लड़ेगा झगडेगा और मनुहार करेगा

लड़ेगा झगडेगा और मनुहार करेगा जो शख्श तुमसे सच्चा प्यार करेगा हो सकता है किसी बात पे झूठा कहे ज़रूरत पड़े तो तुमपे एतबार करेगा गर रूठ के तुम उससे मुँह फुला लो छेड़ छेड़,बात तुमसे बार बार करेगा गर देखेगा तुम्हारे आस पास खतरा सबसे पहले तुमको खबरदार करेगा  दिन हो कि रात हो या हो शुबो शाम प्यार करने वाला सिर्फ प्यार करेगा मुकेश इलाहाबादी -----------------

पत्थर की मूर्ति थी - वह

पत्थर की मूर्ति थी - वह ------------------------ सुना तो यह गया है वह पत्थर की देवी थी। पत्थर की मूर्ति थी। संगमरमर का तराशा हुआ बदन। एक एक नैन नक्श बेहद खूबसूरती से तराशे हुए। मीन जैसी ऑखें, सुराहीदार गर्दन, सेब से गाल। गुलाब से भी गुलाबी होठ। पतली कमर चौडे नितम्ब। बेहद खूबसूरत देह यष्टि। जो भी देखता उस पत्थर की मूरत को देखता ही रह जाता। लोग उस मूरत की तारीफ करते नही अघाते थे। सभी उसकी खूबसूरती के कद्रदान थे। कोई गजल लिखता कोई कविता लिखता। मगर इससे क्या। वह तो एक मूर्ती भर थी। पत्थर की मूर्ती। सुना तो यह भी गया था कि वह हमेसा से पत्थर की मुर्ति नही थी। बहुत दिनो पहले तक वह भी एक हाड मॉस की स्त्री थी। बिलकुल आम औरतों जैसी। यह अलग बात वह जब हंसती तो फूल झरते थे। बोलती तो लगता जलतरंग बज उठे हों। चलती तो लगता धरती अपनी लय मे थिरक रही हों। उसके अंदर भी हाड मासॅ का दिल धडकता था। वह भी अपनी सहेलियों संग सावन मे झूला झूला करती थी। उसके अंदर भी जज्बात हुआ करते थे। वह भी तमाम स्त्रियों सा ख्वाब देखती थी। वह सपने मे घोडा और राजकुमार देखा करती थी। और एक दिन उसका यह सपना सच भी हुआ था। जब ...

हैरत में हूँ देखकर चेहरा तेरा

हैरत में हूँ देखकर चेहरा तेरा चाँद से भी बेहतर चेहरा तेरा गुलों पे शुबो की शबनम जैसे पसीने से तरबतर चेहरा तेरा सर्द मौसम में, गुनगुनी धूप है जाड़े की दोपहर चेहरा तेरा चुप रहती हो फिर भी हमसे बोलता है अक्सर चेहरा तेरा और भी खिल गया, झीने से  नक़ाब में छुपकर चेहरा तेरा मुकेश इलाहाबादी ---------

ये तो दुनिया है इसी तरह चलती रहेगी

ये तो दुनिया है इसी तरह चलती रहेगी कंही तूफ़ान होगा तो कंही आग लगेगी  आज हम यंहा हैं कल हम लोग न होंगे दुनिया फिर भी इसी तरह चलती रहेगी ज़माने की कब तक तुम परवाह करोगी दुनिया तो हर हाल में बदनाम ही करेगी आ हम भी ईश्क़ की दास्तान लिख जाएं फिर दुनिया हमें भी सदियों सुनती रहेगी मुकेश तुम्हे जो सही लगता है तुम करो दुनिया का क्या ? वो तो कुछ भी कहेगी मुकेश इलाहाबादी -----------------------

एक रिश्ता होता है दुनियावी

 एक रिश्ता  होता है दुनियावी जिस्म से जिस्म का मन  से मन का जिसमे कुछ वायदे होते हैं कुछ कसमे होती हैं कुछ ज़माने की बनाई मर्यादाएं होती हैं इनकी इक उम्र होती है कुछ दिन कुछ महीने या कुछ साल भी कई बार उम्र भर भी होती है बस ! उसके बाद सब कुछ खत्म पर इक रिश्ता और होता है वो होता है रूह से रूह का  जिसमे न कोई वायदा न कोइ कसम  न कोइ बंदिश  यंहा तक कि कोई नाम भी नहीं होता बस,  इक खुशबू भर होती है जो महकती रहती है - अहर्निश एक दुसरे की रूह की रूह तक जिसे सिर्फ दो रिश्तेदार ही जानते हैं समझते हैं - निभाते हैं उम्र भर - कई - कई बार कई जन्मो तक भी इस रिश्ते की सलेट पे सिर्फ एक ही लफ़ज़ होता है "मुहब्बत "  बे पनाह "मुहब्बत "  बाकी सलेट कोरी की कोरी होती है और ये लफ़्ज़े मुहब्बत भी दिल की सलेट पे - "आब" से लिखा होता है जिसे सिर्फ - मुहब्बत की आँख वाला ही पढ़ पाता है बस ऐसा ही इक रिश्ता है शायद - तेरा और मेरा दिल से दिल का रूह से रूह का समझी कि  नहीं समझी समझी ??? मेरी  लाडो -  मेरी क्यूटी मेर...

जब - जब याद आते हो तुम

भूल जाता हूँ अपने सारे  दुःखों को सारे संघर्षों को अवरोधों को जिस्म और रूह पे लगे घावों को जब - जब याद आते हो तुम अंधेरों से निकल सुनहरे उजाले में आ जाता हूँ जब - जब याद आते हो तुम  मुकेश इलाहाबादी --------------

कुछ भीड़ में खो गए कुछ मसरूफ हो गए

कुछ भीड़ में खो गए कुछ मसरूफ हो गए कुछ हमसे दूर हो गए कुछ मगरूर हो गए बहुत कोशिशें की, रिश्ते  बनाए रखने की आखिरकर  हम भी औरों की तरह हो गए मिज़ाज़पुर्शी के लिए भी कोई नहीं आता शहर भर के लिए हम बासी खबर हो गए मेहराबों पे सिर्फ कबूतर गुटुर-गुं करते हैं कभी हवेली थे अबतो हम खंडहर हो गए फूल सा खिलने की चाहत थी हमें मुकेश ज़माने का हुआ असर कि, पत्थर हो गए मुकेश इलाहाबादी ------------------------

विकास के घने जंगलों में खो गया है

विकास के घने जंगलों में खो गया है आदमी मज़हबी बातों में खो गया है उजाला ढूंढ़ने निकला था  इल्म का वो इंसान अंधेरी रातों में खो गया है रोशनी का  कोई नया इंतज़ाम करो सूरज स्वार्थ के अँधेरों में खो गया है अन्धे - अन्धो को रास्ता दिखा रहे हैं और आँख वाला विवादों में खो गया है मुकेश इलाहाबादी -----------------

तुम फूलों की तरह खिलना

तुम फूलों की तरह खिलना मै - भौंरे की तरह मँडराऊँगा मुकेश इलाहाबादी -----

भर में राजा की डुगडुगी बज रही है

शहर भर में राजा की डुगडुगी बज रही है सिपाही चाक -चौबंद हैं घोड़े हिनहिना रहे हैं गधे पूँछ हिला रहे हैं रियाया सिर झुकाये चल रही है सभी दिशाएं खामोश हैं जो नहीं थी उन्हें भी खामोश करा दिया गया है बोलने की इजाज़त सिर्फ राजा को है और मुस्कुराने की उसके मंत्रियों की बाकी जनता को सिर्फ राजा के मन की बात सुनने का आदेश है बाकी देश में सब खुशहाली है मुकेश इलाहाबादी ----------------------

पुरानी, चादर में लपेट ली है

पुरानी, चादर में लपेट ली है तुम्हारी थोड़ी सी हँसी थोड़ी सी मुस्कराहट तुम्हारे साथ बिताये ढेर सारे पलों की यादें ढेर सारी तनहाई थोड़ी सी उदासी और न ख़तम होने वाली रात की कालिमा जिस लाद चल दिया हूँ शब्दों के अंतहीन सफर में जंहा हैं कहानियों के जंगल स्मृतियों के पहाड़ मीठी - मीठी कविताओं के प्यारे- प्यारे झरने जिनके बीच अब काफी शुकून महसूस करता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------

आओ हम तुम चलें - जंगल में

आओ हम तुम चलें - जंगल में जंहा सिर्फ दो फूल खिले हों एक "तुम" और एक "मै " मुकेश इलाहाबादी --------

चीज़ें जो मेरे आस पास से गायब होती गयीं

चीज़ें जो मेरे आस पास से गायब होती गयीं - संस्मरण - एक  ------------------------------------------------------------------- होश संभालने के बाद से हमारे आस पास से बहुत सी चीज़ें गायब होने लगीं। जिनमे सब से पहले गायब होने वाली चीज़ों में थी, श्यामा की लकड़ी की टाल। घर से सटे चौराहे के ठीक दाहिनी तरफ, एक नीम के पेड़ के नीचे श्यामा  की बाँस के टट्टर से घिरी लड़की की टाल थी. जलावन लकड़ी , लकड़ी का बुरादा , लकड़ी और पत्थर के कोयले के ढेर के बीच एक कोने में छोटी सी बरसाती में बैठे गहरे सांवले रंग के बड़ी बड़ी मूंछो हंसमुख चेहरे के श्यामा की लकड़ी की टाल में हमेसा सुबह से देर शाम तक चहल पहल रहती - आस पास के कई मुहल्लों में उनके यंहा से जलावन लकड़ी - और कोयला जाता - केवल गंजी और तहमद लपेटे शयामा कभी मजूरों से लकड़ी चिरवाने में व्यस्त रहते तो कभी तुलवाने में , तो कभी गल्ला संभालने में - वहीं नीम के पेड़ के नीचे बनी छोटी सी बरसाती में वो खाते- पीते और सो भी जाते - कभी कभी पास के गाँव अपने घर जाते या कभी उनकी घरैतिन एक दो दिन को आ के उसी बरसाती में रह जाती। श्यामा के टाल में लगा नीम का पेड़ सिर्फ श्यामा...

अब घर की अंगनाई में बूढ़े दरख़्त नहीं दिखते

अब घर की अंगनाई में बूढ़े  दरख़्त नहीं दिखते कुंडी और साँकल वाले दरवाजे कंही नहीं मिलते तब कच्ची दीवारें पीढ़ियों का बोझ उठा लेती थी अब पक्के घरों में रिश्ते वर्ष भर भी नहीं टिकते  माटी के चूल्हों पे रोटी ही नहीं रिश्ते भी पकते थे अब गैस के चूल्हों पे उम्र भर रिश्ते नहीं सिझते   वो दिन थे फटी धोती टूटी चप्पल में भी हंस लेते अब तो लाखों रुपये कमा के भी चेहरे नहीं खिलते सारे साधू - सन्यासी बड़े बड़े मठाधीश हो गए हैं  तम्बूरा ले कर घूमने वाले सच्चे साधू नहीं दिखते  मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

तुम - थोड़ा ख्वाब - थोड़ी हकीकत --------------------------------

तुम - थोड़ा ख्वाब - थोड़ी हकीकत -------------------------------- फूलों से बने तारों से सजे उड़न खटोले पे बैठी हो तुम बॉब्ड कट बालों में सुर्ख गुलाब और सफ़ेद रातरानी के फूलों का हेयर बैंड किसी राजकुमारी के ताज सा दमक रहा है दूज के चाँद सी मुस्करा रही हो तुम्हारे चेहरे पे हमेसा सी खिली है तुम्हारे हाथों में खरगोश के बच्चों सा मुलायम और रूई के फाहों सा सफ़ेद टैडी बियर लिए तुम बेहद खूबसूरत और खुश लग रही हो धीरे - धीरे तुम थोड़े थोड़े भूरे - थोड़े थोड़े थोड़े सांवले बादलों के बीच से उतर रही हो धीरे धीरे - धीरे धीरे अब मेरे कमरे में खिड़की के पास आ के संतूर की सी मोहक आवाज़ में पुकारती हो "हेल्लो - मै सुमी बोल रही हूँ " मै एक गहरी तन्द्रा में "कौन सुमी,,,,??" "अरे मै सुमी बोल रही हूँ - सुमी - बादलों के पार से " बरसों पुरानी तन्द्रा टूटी हो जैसे एक साथ फूलों का टोकरा सिर पे गिर गया हो जैसे एक झटके में स्वर्ग में आ गया हूँ - जैसे बस ऐसा ही लगा  था - एक  अरसे बाद तुम्हारी आवाज़ सुन तुम खिलखिला रही थी फिर - ढेरों बातें - ढेरों शिकायतें ढेरों किस्...

परवरदिगार , ने , खुश्बू बनाया

परवरदिगार , ने , खुश्बू बनाया ख़ूबसूरती बनाई अदाएँ बनाई औरतें बनाई फिर भी उसे तसल्ली न हुई फिर उसने तुम्हे बनाया सादगी बनाई तब जा के  उसे तसल्ली हुई और फिर बड़ी एहतियात से तुम्हे ज़मीं पे उतारा तभी तो, जब तुम चलती हो सभी दिशाएं गुनगुनाने लगती हैं हवाएँ महकने लगती है पंछी चहकने लगते हैं  तड़ागों में कँवल दल खिलने लगते हैं प्रेमियों के दिल मचलने लगते हैं (इसी लिए तुम सबसे जुदा हो सब से अलग हो - समझी कि नहीं ?? देखो : बस अब तुम नहीं - मुझे झुट्टा कह के भागना नहीं ) मुकेश इलाहाबादी -------

मेरे कमरे की खिड़की से चाँद नहीं झांकता

मेरे कमरे की खिड़की से चाँद नहीं झांकता चाँदनी नहीं आती लिहाज़ा मैंने अपनी दीवार पे टांगने के लिए चाँद की तस्वीर बनाने की ठानी जैसे जैसे ही कैनवास पे लकीरें खींचता गया तुम्हारी ही सूरत उभर के आयी लिहाज़ा अब दीवार पे तुम्हारी तस्वीर लगा के खुश हूँ अब चाँद के न झाँकने और चाँदनी के कमरे में न आने का कोई अफ़सोस नहीं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

थोड़ा-थोड़ा सलीका थोड़ी बेतरतीबी है

थोड़ा-थोड़ा सलीका थोड़ी बेतरतीबी है थोड़ा-थोड़ा  शुकून  थोड़ी सी बेचैनी है हंसती भी है और खिलखिलाती भी है गौर से देखो तो, हर आँखों में नमी है घोडा -गाड़ी महल अटारी सब मिलेंगे हर  इक दिल में कोई न कोई कमी है  निकलोगे जब तुम मंज़िल पर, राह   कंही उबड़- खाबड़ कंही पे चिकनी है   जीवन भी है भोजन की थाली,कभी  दाल मखनी तो कभी रोटी चटनी है  मुकेश इलाहाबादी -----------------

एक खूबसूरत परी आती है

रोज , रात - एक खूबसूरत परी आती है ख्वाबों में जो देर तक हंसती है खिलखिलाती है इठलाती है जाते - जाते रख जाती है ढेर सारी - कविताएं मेरी पलकों पे जिन्हे सुबह उठते ही कागज़ पे उतार लेता हूँ जिसे आप मेरी कवितांए समझती हैं (अब उस परी का नाम मत पूंछना जिसका नाम सुमी है - और आँखे बड़ी बड़ी और बड़ा मासूम सा चेहरा है मुकेश इलाहाबादी ---------

तुम, अगर रूप भर होते

तुम, अगर रूप भर होते ढूंढ लेता तुमसे अधिक रूपवान तुम खुशबू भर होते, मै साथ हो लेता गेंदा गुलाब के साथ गर तुम स्पर्श भर होते फ़ागुन की हवा तुमसे ज़्यदा मादक है पर तुम तो रूप,स्पर्श और खुशबू से भी कंही बहुत ज़्यादा हो ज़्यादा ही नहीं - सब कुछ हो - सुब कुछ मुकेश इलाहाबादी -------------------------

सुबह से मन खिन्न था

08 - 0 8 -2018 सुबह से मन खिन्न था - कई बातों के ले कर।  ऑफिस आया, नेट बंद था मन और खिन्न हुआ।  फिर काम का बोझ अजीब मनः स्तिथि थी।  खैर दिमाग को एक झटका दिया, एक ग्लास पानी पिया, फाइलें खोली, काम शरू कर दिया अब मन कुछ नहीं सोच रहा था - जो दिमाग में चल रहा था - चलने दे रहा था।  उधर दिमाग अपनी आदतानुसार कुछ न कुछ सोचने में लगा था -इधर हाथ  कंप्यूटर में चल रहा था।  अचानक फ़ोन की घंटी बजती है। हेल्लो जी - मै सुमी बोल रही हूँ किसी अनजान महिला की आवाज़ थी, पहचाना नहीं - दिमाग सोचने लगा ' सुमी ??? इस नाम का कौन है जो इस तरह से बोलेगा ' मै सुमी बोल रही हूँ ' फिर एक पुरानी परिचिता का खयाल आया लगा वो ही होंगी - कई बार फ़ोन कर देती थीं पर इधर कई सालों से उनका कोई फ़ोन नहीं आया था लिहाज़ा , उम्मीद तो नहीं थी फिर भी मैंने जवाब दिया " कौन सुमी नरूला ??" " अरे मै सुमी बोल रही हूँ।  सुमी, कटनी से ' फिर मैंने सोचा कटनी में तो मेरा कोइ रहता नहीं है - परिचत और फिर इस नाम का फिर भी नहीं पहचाना - फिर उसने अपना नाम दोहराया - तब मैंने कहा ' अच्छा तुम जय पुर से बोल रही हो ?? जी ...

जैसे , ही मै उतरता हूँ अंतरतम में

जैसे , ही मै उतरता हूँ अंतरतम में तुम भी उतर आती हो उजास बन के या फिर बरसती हो दिव्य झरने की तरह जिसमे नहा कर हो जाता हूँ ताजा दम बहुत - बहुत दिनों तक के लिए मुकेश इलाहाबादी ------------

साँसे जिसके बदन की खुशबू के साथ घुली मिली नहीं

मेरी, साँसे जिसके बदन की खुशबू के साथ घुली मिली नहीं जिसके बदन की कोमलता को -  हरारत को मेरी हथेलियों ने महसूसा नहीं - जाना नहीं जिसके रक्ताभ होंठो को मेरे जलते होंठो ने छुआ नहीं जिसे मेरी आँखों ने जी भर के देखा नहीं ये दिल उसे क्यूँ पुकारता है अहिर्निश , क्यूँ ? क्युँ ? क्युँ ? मुकेश इलाहाबादी ------------------

तेरी खामोशी तो पढ़ लूँ फिर तुझसे बात करूँ

तेरी खामोशी तो पढ़ लूँ फिर तुझसे बात करूँ पहले मै जी भर देख लूँ फिर तुझसे बात करूँ तेरी दरिया सी इन आँखों में पहले डूब तो लूं मै रूह की खुश्बू सूंघ लूँ फिर तुझसे बात करूँ तेरी अदाओं में हंसी में है अजब जादू मुकेश इन सब से तो मिल लूँ फिर तुझसे बात करूँ  मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ख़ुद से ख़ुद को सजा देता हूँ

ख़ुद से ख़ुद को सजा देता हूँ फिर देर तक रो भी लेता हूँ  मुझको खुद भी नहीं मालूम अपने को क्यूँ सजा देता हूँ ज़िंदगी की बढे दरियाव में तेरे नाम  की  नैया खेता हूँ  मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम चाँद भर होती ??

तुम चाँद भर होती मै अपने पर ले कर उड़ आता तुम तक और - तुम्हे चूम लौट आता धरती  पे अपने नीड में गर तुम चहुँ ओर व्याप्त आकाश भर होती सच मै किसी घाटी में जा कर तुझे पुकारता - तेरा नाम लेकर जब तक तुम न आ जाती मिलने मुझसे यदि तुम खुशबू भर होती ऊगा लेता तुम्हे अपने सहन में और भीगता शब भर तुम्हारी रातरानी खुशबू से गर तुम गुब्बारा होती तो ले तुझे अपने हाथो में खुश होता देर तक किसी बच्चे सा देखो ! देखो - मुस्कुराओ मत मेरी बातों को सुन के अगर मुस्कुराना ही है तो आओ मेरे पास बैठो - और मुस्काओ मुकेश इलाहाबादी -----------------------