सृष्टि के पहले दिवस से लेकर
सृष्टि के पहले दिवस से लेकर प्रलय के अंतिम क्षणों तक मै तुम्हारी मुस्कान की सुनहरी और गुनगुनी धूप सेंकना चाहता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”