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Showing posts from March, 2017

दिन के उजाले में तुझे, ढूँढता है दिल

दिन के उजाले में तुझे, ढूँढता है दिल तुझे रात ख्वाबों में भी देखता है दिल मेरे मेहबूब ये तेरे ही नाम का जादू है सिर्फ तेरे ही नाम से धड़कता है दिल  कंही भी जाऊँ कंही भी आऊं, मुकेश जाने क्यूँ सिर्फ तुझे, खोजता है दिल मुकेश इलाहाबादी ------------------

स्वाति नक्षत्र

कभी , तो, बरस जाओ  स्वाति नक्षत्र की दिव्य बूँद सा उग, आने दो इक मोती,  इस सीप के अंदर मुकेश इलाहाबादी --

कुछ, रिश्ते,

कुछ, रिश्ते, प्रेमी - प्रेमिका माँ - बाप दोस्त, नाते -दारी, रिश्तेदारी कि परिभाषा की परिधि में नहीं आते  यहाँ तक कि, दोस्त- गाईड - फिलॉसर की परिधि को भी छू कर निकल जाते हैं परिभाषाओं की परिधि के पार बहुत पार अक्सर - कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------

अगर, तू ख्वाब है?

अगर, तू ख्वाब है? तो, ख़्वाब में क्यूँ नहीं आती ? गर, तू हक़ीक़त है तो ? दिन के उजाले में क्यूँ नहीं मिलती ? क्यूँ - क्यूँ - क्यूँ  ,मेरी सुमी ? मुकेश इलाहाबादी ---------------

आज नहीं तुम कल, आना

आज नहीं तुम कल, आना थोड़ी फुरसत ले कर आना अम्मा - बाबू, भाई - बहन सारी झंझट घर रख आना अपनी, शोख अदाएं लाना हया मत लाना जब आना कोई मना करे गर, तुमको मंदिर जाना है, कह  आना कोई बहाना मत कर, कल साँझ ढले पुलिया पर आना मुकेश इलाहाबादी ---------

samiksha 'astitv'

जंगलों और गुफाओं से निकल के 'आदम' और 'हौव्वा' ने एक साथ विकास का सफर शुरू किया और बराबर का योगदान दिया।  जहाँ आदम ने घर के बाहर की ज़िम्मेदारी निभाई वहीं 'हव्वा' ने घर की ज़िम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और वक़्त पड़ने पर आदम के साथ क़दम दर क़दम हर मोर्चे पे साथ दिया, चाहे वो युध्द का मैदान रहा हो, विज्ञानं की प्रयोगशाला रही हो या फिर शिक्षा का क्षेत्र रहा हो, पर आदम ने हमेशा  शारीरिक क्षमता और हव्वा की भावुकता का फायदा उठाते हुए सिर्फ और सिर्फ अपने आप को महिमा मंडित किया और खुद को ही श्रेष्ठ बताता रहा, आज चाँद सितारों तक पहुचने के बाद और नारी ससक्ती करण  की बात करने के बावज़ूद, जब कभी हव्वा पीछे पलट के अपने अस्तित्व को टटोलती है तो खुद को नदारत पाती है, और वह एक बार फिर अनंत पीड़ा में डूब जाती है. हव्वा,  'नारी ' की इसी पीड़ा को, 'कुसुम पालीवाल' जी ने बहुत खूबी से व्यक्त किया है। कुसम जी ने अपने अस्तित्व को तलाशती औरत के दुःख के साथ साथ उसके हिस्से में आये थोड़े से सुखों को, इक्षाओं, को प्रेम को, ख्वाबों को परत - दर- परत न केवल महसूस किया...

यादें , किसी पंछी सा

यादें , किसी पंछी सा अनंत आकाश में उड़ती हैं, दूर तलक नज़रों से ओझल हो जाने की हद तक, फिर सांझ थक कर लौट आती हैं अपने ठिये पे और चहचहाती हैं देर तक मुकेश इलाहाबादी ---------

तुम, खिलखिलाती हुई आतीं हो

तुम, खिलखिलाती हुई आतीं हो और बिखेर देती हो टोकरा भर  हँसी जिसे अपनी हथेलियों में  तमाम कोशिशों के बावज़ूद बटोर न नहीं पाता हूँ और हताश लेट जाता हूँ औंधे, तकिया में मुँह लपेट के इस उम्मीद पे शायद अगली बार समेट लूँ तुम्हारी उजली - उजली हँसी मुकेश इलाहाबादी ---

लोग, लिखते होंगे हाज़ारहां पेज ,

लोग, लिखते होंगे हाज़ारहां पेज , मेरी डायरी में तो सिर्फ एक पन्ना है जिसमे, सिर्फ तुम्हारा नाम दर्ज है सच ! सुमी, तेरी कसम ,,,,,, मुकेश इलाहाबादी --

पीली पड़ती उस ग्रुप फोटो में

पीली पड़ती उस ग्रुप फोटो में एक चेहरा जो बतियाता है मुझसे, आज भी, जब कभी  खोलता हूँ पुराने एलबम को  मुकेश इलाहाबादी ---

बार बार सुलझाया बार बार उलझी

बार बार सुलझाया बार बार उलझी ज़ुल्फ़ तुम्हारी बड़ी बेवफा निकली हम तो समझे सिर्फ हमी प्यासे,पर  नदी हमसे ज़्यादा, प्यासी निकली मुकेश इलाहाबादी ----------------

धूप ! आज भी हुलस, कर आती तो है

धूप ! आज भी हुलस, कर आती तो है सुबह, छत पर  मगर साँझ होते - होते लौट जाती है मायूस, दबे पाँव  तुम्हे न पा कर, छत पर  ख्वाब ! आज भी आते तो हैं मगर तुम्हे न पा कर खो जाते हैं न जाने किस अँधेरे बियाबान में मुकेश इलाहाबादी ------ मुकेश इलाहाबादी ------

मन और देह पाइथागोरस का प्रमेय भी नहीं

मन और देह पाइथागोरस का प्रमेय भी नहीं कि, हल कर लिया जाये गणित के किसी फार्मूले से मन और देह द्र्व्यमान और सूर्य की किरणे भी नहीं कि, बांध लिया जाए e=mcᒾ के सूत्र में शायद मन और देह ऐसे सवाल जिसे सुलझाने में और भी उलझ जाते हैं और भी  गुत्थम - गुत्था हो जाते हैं हम ओ .....  रे मन ....  ओ .....  री देह  ..... (सुन रही हो न सुमी ) मुकेश इलाहाबादी ---

इत्ती सी इल्तज़ा है

दरिया, तू मेरी उतनी ही प्यास बुझा जितने में तू मैली न हो मेरी प्यास का क्या? बुझे न बुझे। बस अपनी तो इत्ती सी इल्तज़ा है मुकेश इलाहाबादी --

तारा जो सिर्फ और सिर्फ मेरा है

तनहाई, एक समंदर जसके बीचों - बीच तेरी यादों का टापू है जिसपे बैठ निहारता हूँ आकाश गंगा के अन्तं तारों के बीच उस शुक्र तारे को जिसपे तेरा नाम लिखा है वो शुक्र तारा जो सिर्फ और सिर्फ मेरा है सुमी - तुम्ही से मुकेश इलाहाबादी --

आप की सादगी आप की हंसी

आप की सादगी आप की हंसी न कभी देखी है, न कंही सूनी होंटों पे ये छुपी -छुपी मुस्कान बादलों से छन के आती चांदनी कँवल से भी कोमल है बदन हया से समेटे पंखुरी - पंखुरी मुकेश इलाहाबादी -----------

आवारा बादल सा

आवारा बादल सा बरस के खाली हो जाना चाहता हूँ किसी भी खेत पे मैदान पे नदी में नाले में मगर नहीं नहीं बरसूँगा उमडूंगा - घुमडूंग बहूँगा देर तक - दूर तक हवा के संग संग जब तक मिलेगी नहीं वो धरती जो तप रही होगी जल रही होगी सिर्फ और सिर्फ मेरे इंतज़ार में (सुमि के लिए ) मुकेश इलाहाबादी -----------

खाली टोकरा फूलों से भर लूँ

खाली टोकरा फूलों से भर लूँ आ, कुछ देर तुझसे बातें कर लूँ मुकेश इलाहाबादी ----------------

आदम ने होठों पे, प्रेम गीत सजाए

आदम ने होठों पे, प्रेम गीत सजाए ईव बांसुरी बन गईं आदम, कि इच्छा थी सूरज बन जाये ईव - फूल बन खिल गयी आदम, बादल बन बरसा ईव - धरती बन भीगती रही लहराती रही अपना धानी आँचल सुमी, मेरी ईव सुन रही हो न ?? मुकेश इलाहाबादी ----------------

अधूरा ख़्वाब

अधूरा ख़्वाब घुटनो को मोड़ के एड़ियों पे बैठी हो तुम गोद में तकिया लिए शैम्पू की खुशबू से तर बॉब्ड कट बाल तुम्हारे कंधो को साधिकार चूम रहे हैं, (जिन्हें हथेलियों में ले सूँघना चाहता हूँ - देर तक आँखें बंद कर के ) तुम्हारे चंदा से गोल चेहरे पे मासूम सी शरारत लिए हँसी तैर रही है जिसे अपनी बाँहों में क़ैद करने के लिए गुदगुदाता हूँ तुम्हे मछलियों की मुस्कराहट हंसी में तब्दील हो जाती है तुम हंसती जाती हो और गुदगुदाने के लिए मना भी करती जाती हो और मुक्की मारती हुई लिपट जाती हो और मैं - मगन देखता हूँ पूर्णिमा के चाँद को अपनी बाँहों में खुश, तृप्त और पूर्ण मुकेश इलाहाबादी --

ख्वाब, महल,जिसे कभी

ख्वाब, महल,जिसे कभी बड़ी शिद्दत से तामील किया था हमने और तुमने खंडहर में तब्दील हो चूका होगा जब तक तुम लौट कर आओगे मगर उसकी ध्वंश दीवारों में तुम अपना नाम लिखा पाओगे मुकेश इलाहाबादी -----------

शोर के नाम पे हवा सनसनाती है

शोर के नाम पे हवा सनसनाती है या कि,मेरी खामोशी गुनगुनाती है जब कभी सुनहरा ख्वाब देखा तब आँखे मुस्कृराती नींद कुनमुनाती है तुम्हारी मासूम हँसी को क्या कहूँ  चांदी के सिक्के सी खनखनाती है मुकेश इलाहाबादी --------------