जंगलों और गुफाओं से निकल के 'आदम' और 'हौव्वा' ने एक साथ विकास का सफर शुरू किया और बराबर का योगदान दिया। जहाँ आदम ने घर के बाहर की ज़िम्मेदारी निभाई वहीं 'हव्वा' ने घर की ज़िम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और वक़्त पड़ने पर आदम के साथ क़दम दर क़दम हर मोर्चे पे साथ दिया, चाहे वो युध्द का मैदान रहा हो, विज्ञानं की प्रयोगशाला रही हो या फिर शिक्षा का क्षेत्र रहा हो, पर आदम ने हमेशा शारीरिक क्षमता और हव्वा की भावुकता का फायदा उठाते हुए सिर्फ और सिर्फ अपने आप को महिमा मंडित किया और खुद को ही श्रेष्ठ बताता रहा, आज चाँद सितारों तक पहुचने के बाद और नारी ससक्ती करण की बात करने के बावज़ूद, जब कभी हव्वा पीछे पलट के अपने अस्तित्व को टटोलती है तो खुद को नदारत पाती है, और वह एक बार फिर अनंत पीड़ा में डूब जाती है. हव्वा, 'नारी ' की इसी पीड़ा को, 'कुसुम पालीवाल' जी ने बहुत खूबी से व्यक्त किया है। कुसम जी ने अपने अस्तित्व को तलाशती औरत के दुःख के साथ साथ उसके हिस्से में आये थोड़े से सुखों को, इक्षाओं, को प्रेम को, ख्वाबों को परत - दर- परत न केवल महसूस किया...