Posts

Showing posts from May, 2015

फिर - फिर तुम सावन लिखना

फिर - फिर तुम सावन लिखना मौसम तुम मनभावन लिखना जिन  आखों  मे  मै  सूरत देखूं  उन  नैनों  को  आनन  लिखना हैं  छह  रितुऐं और बारह मॉह प्यार के हफते बावन लिखना मन  की  चादर उजली रखना प्यार की गंगा पावन लिखना लोग कहें हैं मुझको मुक्कू पर तुम तो मुझको साजन लिखना  मुकेश इलाहाबादी ---------

आग नहीं सिर्फ धुआं बाकी है

एक मत्ला - दो शे 'र -------------------------------- आग नहीं सिर्फ धुआं बाकी है निशाँ कहर ऐ तूफाँ बाकी है पनिहरिने अब नहीं आती हैं पानी नहीं सिर्फ कुआँ बाकी है यूँ तो ख़ाक में मिल चूका हूँ बस खुद्दारी का गुमाँ बाकी है मुकेश इलाहाबादी ------------

दिन आवारा, बेहया रातें हैं

दिन आवारा, बेहया रातें हैं रेत की नदी कागजी नावें हैं इस आग  बरसते मौसम मे  सुलगते दिन दहकती रातें हैं हालात मे तब्दीली आयेगी  छोडिये,  बेकार की बातें हैं दरार होती तो पट भी जाती  रिस्तों मे उंची - २  दीवारें हैं कहीं कांटे हैं,  तो कहीं खाई  मुकेश बडी मुस्किल राहें हैं मुकेश इलाहाबादी ----------

दर्द तो बहुत हुआ, तुझे भूल जाने में

दर्द तो बहुत हुआ, तुझे भूल जाने में लेकिन अब कुछ शुकून सा रहता है मुकेश इलाहाबादी -------------------

सांझ का अंधेरा घना है

सांझ का अंधेरा घना है मन मेरा भी अनमना है मुस्कान रख ली जेब मे खुल कर हंसना मना है है खुशी देर से लापता दुख सीना ताने तना है रिश्तो मे सर्दपन  सही लहजा तो  गुनगुना  है मुकेश अच्छा लिखता है यह  तो  मैने भी सुना है मुकेश इलाहाबादी ------

मै लिखना चाहता था - कविता

मै लिखना चाहता था -  कविता पर, मेरे पास कागज़ न था स्याही न थी तुम,  मुस्कुराईं तुमने फैला दिया अपना आँचल बिखेर दी स्याह ज़ुल्फ़ें  मै, युद्ध रत था रथ पे सवार था विश्व विजेता बनने की चाह थी तुम - पहिये की धूरी बन गयी घूमती रही - अहर्निश - चुपचाप मै, बनना चाहता था धर्मराज, हारा, तुम्हे जुएं मे पाया वनवास पर तुमने भी तो गहा वनवास मेरे साथ गेसुओं को खोले - खोले मेरे पुरुषोत्तम, बनने की राह में भी तुम  रहीं साथ - साथ फिरीं वन - वन और देती रहीं अग्नि परीक्षा - अकेले ही चुपचाप पर अब - मै करना चाहता हूँ पश्चाताप हो जाना चाहता हूँ तुम्हारा - सिर्फ तुम्हारा वही, आदम -हव्वा सा शिव - पार्वती सा फूल और खुशबू सा एक प्रेम गीत सा और - उसके भाव सा मुकेश इलाहाबादी -----------

सब के सब मजबूर मिले

सब के सब मजबूर मिले दर्द ओ ग़म से चूर मिले केवल मै ही था गुमनाम बाकी सब मशहूर मिले जिस्मो की नजदीकी थी दिलसे लेकिन दूर मिले चेहरे हमने जितने देखे सबके सब बेनूर मिले दूजे की क्या बात करें ? तुम भी तो मगरुर मिले  मुकेश इलाहाबादी --------------

आंसू

जब, शब्द, भावाभिव्यक्ति में असमर्थ हो जाते हैं तब, जिस्म का पानी जिस्म के नमक के साथ घोल लेता है तमाम सुख- दुःख हर्ष - विषाद आशा - निराशा प्यार - घृणा या फिर बरसों का संजोया दर्द और, बह निकलता है आखों से, जिसे हम आंसू कहते हैं लिहाज़ा, इस एक बूँद को महज़ नमकीन पानी की एक बूँद मत समझो मुकेश बाबू अगर, अभी नहीं समझे तो, उस दिन समझोगे जिस दिन सूख जाएंगे तुम्हारी, आँख के आँसू मुकेश इलाहाबादी ----

प्रेम मे, तुमने चुना - मृत्यु

प्रेम मे, तुमने चुना -  मृत्यु मैने चुना - जीवन मै हंसा मैने कहा जीवन है तो प्रेम है तुम चुप रहीं मुस्कुराई बस खिली फूल सा महमहाई खुशबू बन और मुरझा गई जल्द ही फिर फिर खिलने को मरने को प्रेम मे होने को उधर मै भी खिला खिला रहा युगों युगों तक पत्थर बन बिना खुशबू बिना कोमलता पछताता रहा तुम्हारी मूर्खता पे खुश होता रहा अपने मरे हुये जीवन पे और खिलने न दिया एक भी फूल अपने सीने पे आने न दिया एक भी वसंत अपने ह्रदय पे पर तुम हजारों हजार बार खिलती रही मरती रहीं महमहाती रही और अगर कभी मेरा पत्थर पन देव बन किसी देवालय मे स्थापित हुआ तब भी मेरा पूजन अधूरा रहा बिना पुष्प के बिना तुम्हारे मुकेश इलाहाबादी --------------

जब भी कोई मेरे अंदर झांकता है

जब भी कोई मेरे अंदर झांकता है अँधेरा औ प्यासा कुआं दिखता है है दिल मेरा उजड़ा  हुआ गुलशन जिसमे बदहवास  माली रहता है हूँ  उजड़ी  मीनार का टूटा गुम्बद यहाँ  पर सिर्फ कबूतर बोलता है दस्तक देने वाले लौट जाओ तुम यहाँ  इक पागल दीवाना रहता है मुकेश  इक  सूखा  पहाड़ी  झरना जिसे बारिस का इंतज़ार रहता है मुकेश इलाहाबादी --------------

ख़त ,,,, अपने प्रेमी से बिछडे हुये लोगों के लिये एक आस होता है। एक इंतजार होता है

सुमी, मेरी प्यारी सुमी, क्या तुम जानती हो मै तुम्हे इतने सारे ख़त क्यूं लिखता हूं ? नहीं जानती  तो सुनो। मेरे ये ख़त, ख़त नही इस बात की गवाही हैं कि तुम्हारा यह प्रेमी पागल प्रेमी सही सलामत है। आज भी जिन्दा है। और ये खत इस बात की तस्दीक भी करते हैं कि तुम्हारे इस चाहने वाले के दिल की धडकने आज भी तेरे नाम से धडक रही हैं। उसकी रगों मे खूॅ के नाम पे तुम्हारी यादों की कहानी की रवानी है। उसकी सांसो मे तुम्हारी ही खुशबू है जो हर रात चम्पा, चमेली तो कभी रात रानी बन के महकती हैया फिर।  या फिर किन्ही उदास रातों मे महुआ सी टपकती है महकती है जो शराब के फाहे बन के चोटों को सहला जाती हैं। और अगर दर्द फिर भी बरदास्त के बाहर हो जाता है तो यही हर्फ की मानिंद कागजों मे उतर आते है खतों की मानिंद । तो मेरी प्यारी सुमी, मेरी प्यारी महुआ खतों के बाबत एक बात और जान लो। ख़त ,,,, अपने प्रेमी से बिछडे हुये लोगों के लिये एक आस होता है। एक इंतजार होता है जिसके सहारे वे अपने विरह की तमम घडियां काट देते हैं। खत विरह मे डूबे प्रेमी के लिये रेगिस्तान मे पानी की बूंद होता है अम्रत होता है। खत आयेगा इस बात क...

दर बदर मै भटका बहुत

दर बदर मै भटका बहुत उम्र भर रहा तन्हा बहुत जिंदगी तेजाब की नदी झुलसा, मगर तैरा बहुत बचपन की सहेली जिसे मिली नही पै ढूंढा बहुत चॉद नदी मेे उतरा नही दरिया ने मनाया बहुत  मुकेश जैसा इसांन भी फूट फूटकर रोया बहुत मुकेश इलाहाबादी ...

खौलती धूप बरसती है

Image
खौलती धूप बरसती है दिन भर और उग आते हैं फफोले जिस्मो जॉ पे सॉझ मल जाती है संदली मलहम रिसते घावों पे रात तब्दील हो जाती है रातरानी मे जो महमहाती है तेरे रेशमी यादों के ऑचल मे मुकेश इलाहाबादी .