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Showing posts from April, 2013

बुढ़ापा क्या आया पढ़े हुए अखबार हो गए

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बुढ़ापा क्या आया पढ़े हुए अखबार हो गए  माँ - बाप बच्चों के लिए  चौकीदार हो गए ज़माने  ने  तो  पहले ही कमर तोड़ दी थी ब्लड प्रेसर औ शुगर के भी बीमार हो गए पेन्सन से घर और छोटे की पढाई हो गयी लडकी  की शादी  के  लिए  कर्ज़दार हो गए  बेहतर  इलाज़ के बगैर पत्नी चल बसी,अब इस उम्र में तनहा और गुनाहगार हो गए अब   तो  बुढापे मे खुद के लिए भी बोझ और  ज़माने  भर के  लिए बेकार हो गए मुकेश इलाहाबादी ------------------------ ----

रंग हमारे चेहरे का बचपन जाते ही उड़ गया था,,

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रंग हमारे चेहरे का बचपन जाते ही उड़ गया था,, अब तो मुद्दत से  बेरंग बेनूर सूरत लिए फिरते हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

मेरे जिस्म मे तेरी रूह सांस लेती है

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मेरे बदन मैं तेरी रूह सांस लेती है वगरना मैं भी फना कब का हो गया होता ____________मुकेश इलाहबादी

लहू की बूँद भी अक्शर मूंगे सी चमकती है

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लहू की बूँद भी अक्शर मूंगे सी चमकती है देख रहा है यही बात वह आईने पे चलकर मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

आइना खुद ब खुद क्यूँ टूटा उससे टकरा कर

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आइना  खुद  ब खुद  क्यूँ  टूटा उससे टकरा कर खुश है पत्थर टूटने का दोष मढ़कर  आइना पर मुकेश इल्हाबाबदी ----------------------------------

आइना खुद ब खुद क्यूँ टूटा उससे टकरा कर

आइना  खुद ब खुद क्यूँ टूटा उससे टकरा कर खुश है पत्थर टूटने का दोष मढ़कर आईने पर मुकेश इल्हाबाबदी --------------------------------

ये अलग बात कि सह गया चोट ज़माने भर की

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ये अलग बात कि सह गया चोट ज़माने भर की वरना जिस्म हमारा भी  पत्थर का न था मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

सोच के आये थे दिल जीत के जायेंगे

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सोच के आये थे दिल जीत के जायेंगे लगता है अब तो हम मर के जायेंगे मुकेश इलाहाबादी --------------------

मुंसिफ भी जब क़त्ल हुआ उस मासूम के हाथो

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  मुंसिफ भी जब क़त्ल हुआ उस मासूम के हाथो तब फैसला किया यही मुजरिम है ज़माने वालों मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

तेरे ख्वाब, लोरियां सुनाते हैं

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तेरे ख्वाब, लोरियां सुनाते हैं रात, तब हम सो पाते हैं यूँ तो  कारवाँ मंजिल के रुख पे है पर लगता है हम खोये जाते हैं हर  सिम्त अँधेरा ही अँधेरा है, वो तो तेरी यादों के कंदील जगमाते हैं चेहरे पे थकन और गर्द की परतें हैं वो तो, ख्वाबे वस्ल है जो इन्हें पोछ जाते हैं मुकेश इलाहाबादी ---

मज़मून मेरी मुस्कुराहाट का

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मज़मून मेरी मुस्कुराहाट का कोई पढ़ न ले इसलिए खामोश रहा करता हूँ ये अलग बात तेरा ख़याल आते ही मै , मुस्कुरा देता हूँ मुकेश इलाहाबादी ---

तेरी जुल्फों मे ये गेंदा गुलाब सजा दूं क्या

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तेरी जुल्फों मे ये गेंदा गुलाब सजा दूं क्या हथेली पे तेरा नाम लिख के चूम लूं क्या ? आसमॉ सा तेरा ऑचल बादल तेरी जुल्फें कहो तो तोड़ के चॉद सितारे सजा दूं क्या अपने ही खयालों मे मुंस्कुरा रही हो तुम चुपके से बाहों मे ले के तुझे चौंका दूं क्या विरह गीत क्यूं गा रही हो तुम इस तरह गा के गीत मिलन के तुझको हंसा दूं क्या अब तक तुमने बहुत जुल्म सहे जमाने मे छुई मुई की जगह तुझे दुर्गा बना दूं क्या ? मुकेश इलाहाबादी --------------------------

net friend -story

मित्रों -- ये एक कहानी का शुरुआती भाग है - जो पत्रोतर शैली मे आगे लिखने का विचार है पर उसके पहले आप लोगों की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------------------------------- दोस्त , आज पहाड़ी सुबह कुछ ज्यादा ताजी और धुली धुली नजर आयी, चैट बाक्स मे पडे आपके मैसेज ने उसे कुछ और ही खूबसरत बना दिया।  सुबह की हल्की रोषनी ने ओस के साथ साथ रात की बची खुची खुमारी भी सोख लिया।  फक्त दो दिन की दोस्ती और चैट बाक्स मे हुयी बातो का असर इन खुनखुनाती हवाओं मे घुल घुल के न जाने कैसी तासीर पैदा कर रहा था कि उंगलियां अपने आप मोबाइल के कीपैड से खेलने लगीं और न जाने कव आपके नाम पे रुक गयी जो आपको कॅाल कर के ही मानीं। महज दो तीन वाक्यों मे हुयी बात का असर काफी देर अपने वजूद पे महसूस करता रहा। न जाने क्यूं लगा आप उस वक्त घबराहट मे या संकोच मे या किसी और कारण से बात नही कर पा रही थी। लिहाजा मैने कॉल को वहीं खत्म करना ही उचित समझा। फिर दोपहर मे जब आपका मैसेज आया उस वक्त मै कुछ काम मे व्यसत था। खैर ... इस वक्त षाम का झुटपुटा धीरे ध...

अच्छा हुआ तुमने बेवाफाई की

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अच्छा हुआ तुमने बेवाफाई की वर्ना हम शायर न हुए होते मुकेश इलाहाबादी -----------

न माँगता वो तेरी तस्वीर तो क्या करता ?

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न माँगता वो तेरी तस्वीर तो क्या करता ? ख़्वाबों मे आ आ के जो चली जाती हो तुम मुकेश इलाहाबादी --------------------------

तेरा तसव्वुर भी तेरी तरह चंचल है,,,

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तेरा तसव्वुर भी तेरी तरह चंचल है,,, आता तो है ख़्वाबों मे पर ठहरता नही मुकेश इलाहाबादी ---------------------- 

अब तो हम भी शहर मे बदनाम हो गए

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अब तो हम भी शहर मे बदनाम हो गए महफ़िलों मे लोग हमारा नाम लेने लगे मुकेश इलाहाबादी ----------------------

रात तूफानी कटने तो दो

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रात  तूफानी  कटने  तो दो थोड़ी सी  सहर  होने  तो दो वे  कुछ  और इंतज़ार करलें मुहब्बत परवान चढ़ने तो दो भले  काट  लो  तुम सर मेरा मुझे  सच  बात कहने तो  दो हवाएं  अब  क्यूँ  नहीं  बहतीं कुछ  औ  जंगल कटने तो दो महफ़िल  मे  जान जायेगी ज़रा  मुकेश को  आने तो दो मुकेश इलाहाबादी --------- --

बेवज़ह माँगता रहा मुहब्बत की भीख,

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बेवज़ह  माँगता  रहा मुहब्बत की भीख, लोग आते रहे और मुस्कुरा के जाते रहे मुकेश इलाहाबादी ------------------------

मिया मुकेष अब है फाख्ता उड़ा रहे अकेले मे

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  मिया मुकेष अब है फाख्ता उड़ा रहे अकेले मे लिख.2 के ग़जल खुद को सुना रहे अकेले मे हसीनो ने न दी तवज्जो उनकी गजलों को अब ख्वाबों की परियां बुला रहें हैं अकेले मे तंग आके बीबी बच्चों संग जा बैठी मॉयके मे मायूस से फ्रेंचकटिया दाढी खुजा रहे अकेले मे सुबह से वो हंसीन पडोसन भी न दिख रही चाय संग सिगरेट के छल्ले उडा रहे अकेले मे नई गजल के लिये कोई मतला भी न मिला लिहाजा पुरानी गजल गुनगुना रहे अकेले मे       मुकेष इलाहाबादी ..................

आज पहाड़ी सुबह कुछ ज्यादा ताजी और धुली धुली नजर आ

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  मित्रो - ये मेरी एक कहानी पहला भाग है - आगे भी पत्र शैली मे चलेगी -- दोस्त, आज पहाड़ी सुबह कुछ ज्यादा ताजी और धुली धुली नजर आयी, चैट बाक्स मे पडे आपके मैसेज ने उसे कुछ और ही खूबसरत बना दिया। सुबह की हल्की रोशनी ने ओस के साथ साथ रात की बची खुची खुमारी भी सोख लिया। फक्त दो दिन की दोस्ती और चैट बाक्स मे हुयी बातो का असर इन खुनखुनाती हवाओं मे घुल घुल के न जाने कैसी तासीर पैदा कर रहा था कि उंगलिय ां अपने आप मोबाइल के कीपैड से खेलने लगीं और न जाने कव आपके नाम पे रुक गयी जो आपको कॉल कर के ही मानीं। महज दो तीन वाक्यों मे हुयी बात का असर काफी देर अपने वजूद पे महसूस करता रहा। न जाने क्यूं लगा आप उस वक्त घबराहट मे या संकोच मे या किसी और कारण से बात नही कर पा रही थी। लिहाजा मैने कॉल को वहीं खत्म करना ही उचित समझा। फिर दोपहर मे जब आपका मैसेज आया उस वक्त मै कुछ काम मे व्यसत था। खैर ... इस वक्त शाम का झुटपुटा धीरे धीरे अंधेरे की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में मै देख रहा हूं। बादलों की ओट से सिंदूरी सूरज को, पहाड़ं के पीछे छुपते हुये। पेड़ और इंसान की लम्बी परछाइयों को अंधेर में विली...

ऐ दिल चल अब कोई साथी ढूंढ लेते हैं

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ऐ  दिल  चल अब कोई साथी ढूंढ लेते हैं कब तक रहूँ  तनहा जिंदगानी ढूंढ लेते हैं देख  लिया खूब बेवफा जमाने का चलन हो  जो  जमाने से जुदा  साथी ढूंढ लेते हैं चंद लम्हों की थी मुलाक़ात एक सफ़र मे भूला नहीं जिसे अबतक राही ढूंढ लेते हैं डसा गया हूँ इतना ज़हर मोहरा हो गया अपने लिये नागिन ज़हरीली ढूंढ लेते हैं बरसों की प्यास मिटती नहीं किसी तौर ख़त्म न हो शराब ऐसी शुराही ढूंढ लेते हैं मुकेश इलाहाबादी --------------------------

इश्क के बहाने ही सही ये काम तो हुआ

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  इश्क के बहाने ही सही ये काम तो हुआ गुमनाम था मुकेश कुछ नाम तो हुआ थक गया था बहुत ज़िन्दगी के काम से जुल्फों की छांव मे कुछ आराम तो हुआ मुकेश इलाहाबादी -----------------------

करके दोस्ती वो हमसे, पछता रहे हैं जनाब

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करके दोस्ती वो हमसे, पछता रहे हैं जनाब अब उन्हें कोई अच्छा लगता नहीं मेरे सिवा मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

दिलरुबा का दिल तोडना अच्छा नहीं

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  दिलरुबा का   दिल  तोडना अच्छा नहीं तोडने   से  पहले  खुदा    से डरा कीजिए मुहब्बत  भी  खुदा की इबादत होती है इसे  भी नमाज़  की तरह अता कीजिए दिल  मेरा हो तेरा हो या किसी गैर का दिल मासूम बच्चा है न  रुलाया कीजिये मुकेश इलाहाबादी ------------------- --

सच की कसौटी पे कसा कीजिये

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  सच  की कसौटी पे कसा कीजिये फिर दूसरों को झूठा कहा कीजिये अपने गिरहबान मे झांक लीजिये तब जमाने पे दोष मढ़ा कीजिये बेहतर है देने से दूसरों की मिसाल दूसरों के लिये मिसाल बना कीजिये आईने मे अपना चेहरा तो देखिये फिर चाँद का मुह टेढा कहा कीजिये सिर्फ अपनी ग़ज़ल सुनाते हो मुकेश दूसरों की भी ग़ज़ल सूना कीजिये ... मुकेश इलाहाबादी -----------------

हवा बह रही मुसलसल आग ले के,

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    हवा बह रही मुसलसल आग ले के, तडपे है दिल मेरा तेरा ही घाव ले के चिलचिलाती धुप बिखरी हर सिम्त बैठा हूँ थक के यादों  की छांव ले के जाने क्यूँ जी को भाती नहीं आवारगी बैठ गया थक के ज़ुल्फ़ की ठाव ले के खुश है जहां सार अपनी रंगीनियों मे बैठा है मुकेश  यहाँ तनहा शाम ले के मुकेश इलाहाबादी ----------------------

एक और गंगा बहा दो

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पिता को तो पूछते नहीं पुरखों को कौन पूजता है ? आज के यूग मे भागीरथ कंहा होता है ? लिहाज़ा शंकर तुम, अपनी जटाओ से एक और गंगा बहा दो  ये गंगा मैली हो चुकी है इसको हटा लो सूख चुके हैं लोगों के ह्रदय भी हो सके तो प्रेम गंगा भी बहा दो शंकर , तुम एक और गंगा बहा दो मुकेश इलाहाबादी ---------------

बच्चे की फीस औ दूध के हिसाब की बातें करो

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  बच्चे की फीस औ दूध के हिसाब की बातें करो अब हमसे प्यार और मनुहार की बातें न करो ऑफिस मे सेक्रेटरी से नैन मटक्का करके,अब हमको अब यूँ मनाने दुलराने की बातें न करो  चुपके चुपके मेरे एस एम् एस पढ़ते हो फिर मुझसे अब  ये वफ़ा औ विश्वास की बातें न  करो मुकेश इलाहाबादी --------------------------------  

मै तुम्हे पूजना नहीं,

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मै तुम्हे पूजना नहीं, चाहना चाहता हूँ तुम्हारे माथे पे, चाँद नही, सूरज उगाना चाहता हूँ तुम खुद दौड़ सको, इसलिए तुम्हारी सदियों की पायल बेडी  तोड़ना चाहता हूँ पुष्प हार की जगह स्वतन्त्रता का हार देना चाहता हूँ सिर्फ नौ दिन पूज कर फिर भूलने की आदत छोड़ना चाहता हूँ अपने बराबर का दर्ज़ा व, मुहब्बत की नई परिभाषा देना चाहता हूँ   ये कुछ नए संकल्पों के तोहफे हैं,जो तुम्हे देना चाहता हूँ मै, तुम्हे पूजना नहीं, चाहना चाहना चाहता हूँ मुकेश इलाहाबादी ----------------

ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी

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   ज़िन्दगी हमे आजमाने लगी कश्ती हमारी डगमगाने लगी देख तेरे खिले महुए सी हंसी हसरते फिर मुस्कुराने लगी मुद्दतों से  वीरान  था आँगन  तुम  क्यूँ पायल बजाने लगी  पुरानी  हवेली  टूटी  मुंडेर पे,, फिर बुलबुल चहचहाने लगी बेवजह  आग  लगा दी तुमने गीली  थी लकड़ी धुआने लगी मुकेश इलाहाबादी --------------

तेरा गुस्सा अच्छा लगता है, तेरी शोखी अच्छी लगती है

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तेरा गुस्सा अच्छा लगता है, तेरी शोखी अच्छी लगती है सोणी सोणी सूरत पे जुल्फें बिखरी -२ अच्छी लगती  हैं पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी से तो तेरी खिचडी अच्छी लगती है चाहे दिन भर हो गुस्सा रात मे मुस्की  अच्छी लगती है मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------------

जलवाए हुस्न और अदाओं से मस्ती बिखेर देते हैं

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जलवाए हुस्न और अदाओं से मस्ती बिखेर देते हैं लिखने वाले ऐसे भी हैं कलम से पत्थर तोड़ देते हैं सूना है प्यारे दुनिया मे कुछ ऐसे जलवागर हुए हैं इक टिड्डी की फ़रियाद पे ही समंदर सोख लेते हैं ढूंढो तो ऐसे भी सिकंदर मिल जायेंगे तुमको प्यारे जो अपनी तलवार के डी दम पे दुनिया लूट लेते हैं आशिक भी कम नहीं मिलेंगे तुमको दुनिया में जो माशूक की खातिर फलक से चाँद सितारे तोड़ लेते हैं कुछ लोग बाजुओं के दम पे दरिया का रुख मोड़ देते हैं हम तो फ़कीर ठहरे दुआओं मे इतना असर रखते हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -------- --

पत्थर दिल हो तो ऐसा हो,

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  पत्थर दिल हो तो ऐसा हो, खा के चोट  अपनों से भी हंसता हो खा के कसम साथ जीने मरने की, कोई हो जाए बेवफा तजुर्बा हो तो ऐसा हो चुभे काँटा एक के दूजा हो जाए बेचैन जमाने मे कोई अपना हो तो ऐसा हो टूटी हुई कश्ती और बढ़ा दरिया हो, हौसला पार करने का हो तो ऐसा हो  मुकेश इलाहाबादी -------------------

चाँद से चाहत की आरज़ू की थी, कि

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  चाँद से चाहत की आरज़ू की थी, कि अब फलक से टूटा हुआ सितारा हूँ मै मुकेश इलाहाबादी --------------------

औरत जो सड़क पे पत्थर तोडती है

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औरत जो सड़क पे पत्थर तोडती है हथौड़े की हर चोट पे खवाब जोडती है  पसीने मे तरबतर बदन छुप नहीं पाता सर झुका के आँचल से बेबसी पोछती है लुच्चे ठेकेदार को क्या पता वह औरत उसे देख कर हिकारत से मुह मोडती है पेड़ की छांह मे सो है रहा उसका छौना बच्चे की खातिर तो  पत्थर तोडती है कलुआ जब नेह से देखता है उसको, शरम  से गडी हुई आँचल मरोड़ती है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

कभी परिन्दगी भी अख्तियार कर के देखा होता

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  कभी परिन्दगी भी अख्तियार कर के देखा होता फलक का नज़ारा ज़मी से बेहतर नज़र आया होता मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -------

बर्फ ने खुद को यूँ कतरा क़तरा न बहाया होता

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  बर्फ ने  खुद को यूँ कतरा क़तरा न बहाया होता दरिया और समंदर इतनी  शान से न बहा होता मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

झूठ अपने लंगड़े पैरों से ज़ल्दी चल नहीं सकता है

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  झूठ अपने लंगड़े पैरों  से ज़ल्दी चल नहीं  सकता है फिर भी सच के आगे दौड़ने की कोशिश मे रहता है दिखाई देता होगा झूठ तुम्हे आगे आगे चलता हुआ सच कछुए की रफ़्तार से सबसे आगे खड़ा मिलता है मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

जीने के ख्वाब खुली आखों से देखना बेहतर

जीने के ख्वाब खुली आखों से देखना बेहतर अच्छे ख्वाब अक्सर नींद छीन लेते हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

दिन के उजाले मे सो जाऊं

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दिन के उजाले मे सो जाऊं रात  का घना साया हो जाऊं आज तक लावा बन के बहा कह दो तो दरिया हो जाऊं उम्र भर मुहब्बत बोता रहा सोचता हूँ कांटे भी बो जाऊं सभी तो ग़मज़दा मिलते हैं किस्से जा के दुखड़ा रो जाऊं  बहुत मैली हो गयी है चादर, मै भी गंगा में जा, धो जाऊं ? मुकेश इलाहाबादी -----------

लज्ज़ते समर भूल जाऊं सारे चमन का

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लज्ज़ते समर भूल जाऊं सारे चमन का जो मिल जाए स्वाद तेरे सेबे ज़कन का मुकेश इलाहाबादी ---------------------- समर - फल, लज्ज़त -स्वाद, सबे  ज़कन - सेब जैसी ठुड्डी

निगोड़ा ! जब भी आता है खुशबू बन के आता है

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  निगोड़ा ! जब भी आता है खुशबू बन के आता है तन और मन अन्दर तक महका महका जाता है सोचती हूँ साँसों मे भर के उसको छुपा लूं सीने मे ज़ुल्फ़ छेड़ कर बहारों  संग निगोड़ा भाग जाता है आएगा इस बार तो बाँध लूंगी उसको आँचल मे,, देखती हूँ फिर कैसे दामन छुड़ा के भाग जाता है ? मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

अपने पीछे फक्त एक छोटी सी खबर छोड़ गया

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  अपने पीछे फक्त एक छोटी सी खबर छोड़ गया,, इलाहाबाद का एक और शायर शहर छोड़ गया,, जब भी  मिलता जिंदादिली व तपाक से मिलता  कुछ  दोस्त और कुछ  यादों का नगर छोड़ गया,, गर्म जोश बातों  के पीछे बर्फ का परवत छुपा था अपना वजूद पिघला, लावे का समंदर छोड़ गया, पुरानी  चिट्ठियाँ,गए साल का कलेंडर छोड़ गया, कई  दिनो से गुमसुम था, चुपचाप शहर छोड़ गया मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

वक़्त बड़ा जालिम निकला,छीन लिए सारे पैमाने

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वक़्त बड़ा जालिम निकला,छीन लिए सारे पैमाने प्यास क्या बुझती हमारी होठ भी तर न हुए हमारे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

जिन बहारों से हमने भेजा पैगाम आपको

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जिन बहारों से हमने भेजा पैगाम आपको  उन हवाओं को देके हवा अपने आँचल की  उजाड़ा था तुमने आशियाँ हमारा शौक मे अब कहते हो 'लिख - लिख के हमारा नाम तुमने ज़िन्दगी गुज़ार दी मेरे ही नाम से ,, चलो इस बार भी हम ऐतबार कर लेते हैं तुम्हारे ही हाथो फिर फिर उजाड़ जाने को मुकेश इलाहाबादी -----------------------

ऐसा नहीं कि उनको हमसे मुहब्बत नही

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ऐसा नहीं कि उनको हमसे मुहब्बत नही शायद उनको अपने गुस्से इख्त्यार नही मुकेश इलाहाबादी -------------------------

उनकी नज़रें जो झुकी रहती हैं हया के बोझ से

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उनकी नज़रें जो झुकी रहती हैं हया के बोझ से झुक जाती हैं डालियाँ गुलाब की अपने  बोझ से मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

कल रात ख्वाब मे तुमसे गुफ्तगू हो गयी

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कल रात ख्वाब  मे तुमसे गुफ्तगू हो गयी तुमने न की तुम्हारे ख्वाब ने तो बात की मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

जी चाहे तो पी लेते हैं रोज़ ब रोज हम,,,

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जी चाहे तो पी लेते हैं रोज़ ब रोज हम,,, वैसे ये बात हमारी आदत मे शुमार नही मुकेश इलाहाबादी -----------------------

सूना कि चश्मे हयात बहता है आखों में आपकी

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सूना कि चश्मे हयात बहता है आखों में आपकी लो जाम ऐ मुहब्बत ले के हम भी आ गए मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

बोलती हैं खामोशियाँ सुनते हैं हम,

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बोलती हैं खामोशियाँ सुनते हैं हम, बेवज़ह बैठे बैठे ख्वाब बुनते हैं हम सारे फूल और कलियाँ लोग ले गए बिखरी  सूखी  पत्तियाँ  चुनते हैं हम मुकेश इलाहाबादी ------------------

आये तो थे हुलस के वो आहट सुन के

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आये तो थे हुलस के वो आहट सुन के देखा जो हमको , ठिठक के रुक गए मुकेश इलाहाबादी -------------------