बात अपनी हम बताने कहाँ जाए
बात अपनी हम बताने कहाँ जाए ग़म अपना हम सुनाने कहाँ जाए लोग हाथों में पत्थर लिए बैठे हैं ऐसे में हम सर छुपाने कहाँ जाएँ चोट पे नमक छिड़क देते हैं लोग ऐसे में ज़ख्म दिखाने कहाँ जाएँ जाने किधर रूठ के तुम चले गए बेगाने शहर में ढूंढने कहाँ जाएँ ? तुम भी नहीं हो शहर में, ऐसे में नया साल हम मनाने कहाँ जाएँ हर शख्श ग़मज़दा दिखता यहाँ मुकेश बता मुस्कुराने कहाँ जाएँ मुकेश इलाहाबादी -----------------