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Showing posts from December, 2015

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए ग़म अपना हम सुनाने कहाँ जाए लोग  हाथों  में पत्थर लिए बैठे हैं ऐसे में हम सर छुपाने कहाँ जाएँ चोट पे नमक छिड़क देते हैं लोग ऐसे में ज़ख्म दिखाने  कहाँ जाएँ जाने किधर रूठ के तुम चले गए बेगाने शहर में ढूंढने कहाँ जाएँ ? तुम भी नहीं हो शहर में, ऐसे में नया साल हम मनाने कहाँ जाएँ  हर शख्श ग़मज़दा दिखता यहाँ मुकेश बता मुस्कुराने कहाँ जाएँ  मुकेश इलाहाबादी -----------------

सिलसिला बनाये रखिये

सिलसिला बनाये रखिये दोस्ती  निभाए   रखिये हार गए हो तो भी क्या हौसला  बनाये  रखिये फल  मिले  या न मिले प्रेम पौध लगाये रखिये   भले कोई कांटे बोता रहे आप फूल खिलाये रखिये मुकेश इलाहबदी ------

जुएँ बीनती औरत

अक्सर जब थके बदन कम हीमोग्लोबिन वाली औरत धूप में बैठ दूसरी अपनी जैसी औरत के बालों से जूएँ बीन रही होती है तब दरअसल वह अपने दुःख बीन रही होती है  ज़मीन पे रख के अंगूठे पे तर्जनी के दबाव पे अपना क्षोभ, गुस्सा और हताशा जुएँ को मार के निकाल रही होती है औरत जब दूसरी औरत के सिर से जुएँ निकल कर मार रही होती है मुकेश इलाहाबादी ----------------- मौलिक और अप्रकाशित जुएँ बीनती औरत

तुम इतना न, लाड दिखाया करो

तुम इतना न, लाड दिखाया करो कभी तो मुझपे गुस्सा हुआ करो तुम बिन अब जिया लगता नहीं मुझे छोड़ कर न तुम जाया करो माना कि गुस्से में प्यारे लगते हो जब प्यार करूँ तो मुस्काया करो मुकेश बिखरी बिखरी मेरी लट  अपनी उंगली से सुलझाया करो तुम इत्ती प्यारी ग़ज़लें कहते हो कभी तो मेरे लिए भी गाया करो मुकेश इलाहाबादी -----------------

मेरा नाम सुन के मुस्कुराते हैं

मेरा नाम सुन के मुस्कुराते हैं या  फिर लोग खफा हो जाते हैं कुछ तो अलहदा होगा मुझमे  लोग यूँ ही नहीं खिचे आते हैं   अपनों का सुःख दुःख मेरा है सब अपनी बात बता जाते हैं मुकेश नेकियाँ भूल कर सभी वक़्त पे गलतियाँ गिनाते  हैं मुकेश इलाहाबादी -----

जब अँधेरा घना होता है

जब अँधेरा घना होता है साया  भी  जुदा  होता है डाल से बिछड़ के फूल फिर जाने कहाँ होता है पास माँ और गुब्बारा हो खुश तब बच्चा होता है सावन के अंधे के लिए चारों तरफ हरा होता है मुकेश चराग़ के तले तो हमेशा ही अँधेरा होता है मुकेश इलाहाबादी -----

गर हमको अपनी आँख का काजल बना लिया होता

गर हमको अपनी आँख का काजल बना लिया होता तेरी ख़ूबसूरती में कुछ और ही निखार आ गया होता सुना है बातचीत में तुम्हे एहसास ऐ नाज़ुकी पसंद है मै भी तुम्हारे नाज़ुक कदमो पे चाँदनी सा बिछा होता लोग तो मेहबूब बातोँ के चाँद सितारे तोड़ लाते होंगे ग़र तूने कहा होता मै खुदबखुद सितारा बन गया होता मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

देखो सूरज कितना प्यारा है

देखो सूरज कितना प्यारा है मै भी आग वो भी अंगारा है मल ली,राख फकीरी की,तो  क्या अपना क्या तुम्हारा है घूम - घूम कर दुनिया देखी हर कोई तो ग़म का मारा है ग़र  राम  नाम  की  नैया है, फिर तो दूर कहाँ किनारा है हो दीन दुःखी या रोगी कोढ़ी कान्हा हमसब का सहारा है मुकेश इलाहाबादी ----------

तेरी खुश्बू आस पास है

तेरी खुश्बू आस पास है बस  यही  ख़ास बात है  मेरा - तेरा मिलना भी इक हसीन इत्तफ़ाक़ है सुबहो शाम की बेचैनी ये ईश्क की शुरुआत है ये फूल कलियाँ बेमानी मेरे लिए तू ही गुलाब है चाँद सितारे दुनिया के तू  ही  मेरा महताब  है मुकेश इलाहाबादी -----

सुब्ह धुली धुली लगती है

सुब्ह धुली धुली लगती है ओस  में  नहाई लगती है गलियों से जब गुज़रे तू सचमुच हिरनी लगती है जब भी तू मुझपे हंसती है तू  बेहद  प्यारी  लगती है तेरी आँखें गंगा - जमना  नदी  सी  बहती लगती है जाने ऐसा क्या है गोरी तू मुझको अपनी लगती है मुकेश इलाहाबादी ------

दिन के ख्याल रात के ख़्वाबों में मिलता कौन है

दिन के ख्याल रात के ख़्वाबों में मिलता कौन है ऐ सितमगर गर तू नहीं तो सच सच बता कौन है साँझ से ही मेरे छत व आँगन में चांदनी चांदनी है गर तू चाँद नहीं, तो चाँदनी सा  बिखरता कौन है ? मुकेश मुद्दतों हुई मेरे घर बसंत आया ही नहीं, गर तू नहीं तो मेरे आस पास महकता कौन है मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

बज़्म में तेरी मौजूदगी है

बज़्म में तेरी मौजूदगी है तभी तो खुश्बू खुश्बू सी है जबसे तुझसे मिला हूँ मै तभी से दिल में बेकली है तू सिर्फ तू ही वज़ह, मेरी शामो सह्र की आवारगी है मेरी धड़कन और साँसे तू मेरी अब तू ही ज़िंदगी है तेरा इश्क ही पूजा मेरी मुकेश अब यही बंदगी है मुकेश इलाहाबादी ---------

तेरा ग़म है और तेरी यादें हैं

तेरा ग़म है और तेरी यादें हैं मेरे पास सिर्फ यही बातें हैं सूरज चाँद सितारे तेरे साथ साथ अपने तो स्याह रातें हैं लोग फूल लिए बैठे हैं, वहाँ यहाँ हमारे हाथ में अंगारे हैं गर तुमको पसंद नहीं दोस्त बज़्म से हम ही चले जाते हैं  मुकेश इलाहाबादी ----------

ठोकरों से हम लड़खड़ा क्या गए

ठोकरों से हम लड़खड़ा क्या गए लोग समझे हम नशे में आ गए बात हमने हंसने हंसाने की, की ज़माने वाले हमको ही रुला गए हम आये थे दास्ताँ अपनी कहने लोग अपनी ही कहानी सुना गए मैंने ग़ज़ल में तेरा नाम  लिक्खा लोग आये हर्फ़ दर हर्फ़ मिटा गए निकले तो थे हम मैखाने के लिए मुकेश हम फिर तेरे दर पे आ गए मुकेश इलाहाबादी ----------------

सच बोलना आदत है

सच बोलना आदत है खुद्दारी मेरी ताकत है  है  ईश्क  मेरा ईमान मेहनत ही इबादत है घर हो या फिर बाहर हर और सियासत है गूँगों का शहर है और  बहरों के अदालत है ढूंढता हूँ बस्ती बस्ती बची कहाँ शराफत है मुकेश इलाहाबादी -----

रात तुम हँसी थी छत पे

रात तुम हँसी थी छत पे  चाँदनी बिछ गयी थी और हरश्रृंगार बरसे थे अब सुबह कोहरे को छांट के तुम्हारी यादों की धूप बिखरी है जिसकी गुनगुनी धूप में भीगा है तन बदन मेरा मुकेश इलाहाबादी -----------

तितलियों से रंग

तितलियों से रंग फूलों से खुशबू बादलों से स्याही लाया हूँ खाली कैनवास में तेरी तस्वीर बनाऊंगा मगर उस तस्वीर में तेरी मुस्कान और ताज़गी कहाँ से लाऊँगा ??? मुकेश इलाहाबादी ---------

समंदर हूँ सूरज ने मुझे सुखाया बहुत

समंदर हूँ सूरज ने मुझे सुखाया बहुत बादल बना औ हरबार मै बरसा बहुत तवा,तलवार,तमंचा और हथौड़ा बना लोहा हूँ आग में खुद को गलाया बहुत फल दिया, फूल दिया और खुशबू दी पेड़ हूँ इंसानो के लिए मै उजड़ा बहुत कोड़े, जीन, नकेल और पैरों में नाल घोडा हूँ दौड़ा और हिनहिनाया बहुत ज़ख्म देकर लोग तो रुलाने पे तुले थे ये और बात जोकर बन,हंसाया बहुत  मुकेश, जो लोग खंज़र लिए फिरते थे उन्ही लोगों को मैंने गले लगाया बहुत मुकेश इलाहबदी -----------------------

तुम पहली बार मिली थी

तुम पहली बार मिली थी वह शाम - ऐ-जनवरी थी दिल की बंज़र ज़मीं पर ईश्क की कली खिली  थी तेरी वो मासूम मुस्कान,  ज्यूँ ,कोई तितली उड़ी थी   ख्वाब के गगन में,मगन प्यार  की  पतंग  उड़ी थी मुझे जो अच्छी लगी, वो  सिर्फ और सिर्फ सुमी थी मुकेश इलाहबदी --------

बदन पे हमारे खुशबू का लिबास है

बदन पे हमारे खुशबू का लिबास है सफर में अपना तो फूलों का साथ है लोगों के हाथ में गीता और कुरआन मेरे पास तो मुहब्बत की किताब है  लोग हैं, कि  दरिया लिए फिरते हैं पास अपने, तेरी आँखों का जाम है फ़लक, चाँद और सितारे भी ले लो मुकेश, पास मेरे तो मेरा महताब है मुकेश इलाहाबादी --------------------

तुम कहते हो तुम्हे भूल जाऊं

तुम कहते हो तुम्हे भूल जाऊं ये क्यूँ नहीं कहते, दुनिया छोड़ जाऊं छीन कर मुझसे, मेरी खुशियाँ ज़माना कहता है, ' मै मुस्कुराऊँ ' ज़ालिम अदाओं के तीर चलाता है फिर ये कहता है 'मै अपने ज़ख्म न गिनवाऊँ ' ऐ ख़ुदा ! अब तू ही बता तेरी ये दुनिया छोड़ मै कहाँ जाऊँ ?? मुकेश इलाहाबादी -------------------

अरमानो के फ़लक पे

अरमानो के फ़लक पे तेरी यादों की बुलबुल देर और बहुत देर तक पंख फड़फड़ाती है चहचहाती है फिर न जाने कब थक कर ख्वाबों के डैनों पे अपनी चोंच रख सो जाती है एक बार फिर से उड़ने और चहचाने के लिए   (सुमी -- सुन रही हो न ?? - सो तो नहीं गयी ?? )

धुआं बनाम गुलाब

धुआं बनाम गुलाब ‘एक बेहद अच्छे इंसान व दोस्त, सुरेंद्र पवार जी को नज़र . जिनकी ज़िंदगी से यह कहानी चुरायी है’ बाल्कनी से ताजा खिलें फूलों की भीनी भीनी खुषबू उसे पूरा का पूरा कब भिगो गयी राजा को पता ही न लगा। राजा को यह भी पता न लगा कब सुबह की नर्म मुलायम गुलाबी किरणों ने चुपके से आ के रात के अंधेरे को, व ओस की बूंदों को सोखना षुरु कर दिया था। पंक्षियो की चहचह और फूलों की खुषबू से चारों तरफ एक उत्सव सा लगने लगा था। यही सुबह तो रोज होती थी। सूरज तो रोज खिलता था। हवा रोज ही तो चलती थी। फूल तो रोज ही खिलते थे। पर राजा क्यों नही देख पाता था। क्यों नही इन खुषबुओं को अपने नथूनों में भर पाता था। क्यांे नही इन किरणों को आखों से पीने की ख्वाहिष होती थी। सना का जादू भी तो न जाने कब धीरे धीरे चुपकेे चुपके उसके वजूद को घेरने लगा था। सना का जादू ही तो है जो हर चीज को हर बात को हर एहसास को यहां तक की राजा को पूरा का पूरा बदल दे रहा है। अगर नही तो फिर यह सुबह पहले की तरह उदास क्यों नही लगती। क्यों उसे नही लगता कि यह वही तो सूरज है जो रोज रोज उगा करता है। यह वही तो गुलाब व गेंदा हैं जो उसी तरह गुलाबी व ...

छत पे गुनगुनी धूप सा

सर्द मौसम में जब कोहरे की चादर बदन को लपटे होती है सच तब, तुम्हरी यादें छत पे गुनगुनी धूप सा बिछ जाती हैं मुकेश इलाहबदी --

हर महफ़िल में तू दिल की नुमाइश न किया कर

हर महफ़िल में तू दिल की नुमाइश न किया कर हर किसी से मुहब्बत की फरमाइश न किया कर छोटा हो,बड़ा इज़्ज़त हर किसी की करनी चाहिए दोस्त!रिश्तों की तू पैसे से पैमाइश न किया कर कौन कहाँ और कब तुझसे सवा सेर निकल आये मुकेश हर किसी से ज़ोर आज़माइश न किया कर मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

सबको गले लगा के रखना

सबको गले लगा के रखना ग़म सबसे छुपा के रखना भले तुम बिखर जाओ,पर घर अपना सज़ा के रखना जाने कब कौन काम आये रिश्ता सबसे बना के रखना राही कोई भटकने न पाये शाम,दिया जला के रखना लाख कोई कांटे बोये, तुम फूल इक खिला के रखना मुकेश इलाहाबादी -------

प्रेम की गागर लबालब भरी होती है.

कई बार यूँ होता है. प्रेम की गागर लबालब भरी होती है. सिर्फ गर्दन खाली होती है. जो शायद खाली भी नहीं होती, दरअसल जीवन में पाये प्यार के छलक जाने से उपजा खालीपन होता है. जिसे व्यक्ति प्यार देने वाले से इतर किसी जल से भरना चाहता है. पूरा होना चाहता है. जो किसी दोस्त किसी हमसफ़र किसी अजनबी से भी ये चाहत हो उठती है. शायद इसी खालीपन को भरने में हम अक्सर उम्र गुज़ार देते हैं उस थोड़े से खालीपन को भरने की खातिर मुकेश इलाहबदी ----------------------------------------

बोगन बेलिया के फूलों की पत्तियां

सुमी, जानती हो ? बोगन बेलिया के फूलों की पत्तियां बेहद पतली व मुलायम तो होती ही हैं पर उसमे कोई सुगंध नही होती। जैसे मुझमें। शायद  इसीलिये मैने अपने घर के चारों तरफ बोगन बेलिया की कई कई रंगो की कतारें सजा रक्खी हैं। जो सुर्ख, सुफेद और पर्पल रंगों में एक जादुई तिलिस्म का अहसास देती हैं। जब कभी इनकी  मासूम, मुलायम पत्तियां हवा के झोंके से या कि आफताब की तपिश से झर- झर कर जमीन पे कालीन सा बिछ जाती हैं, तब उसी मखमली कालीन पर हौले से बैठ कर या कि कभी लेट कर, तुम्हारे ख़यालों- ख्वाबों में डूब जाता हूं। तब बोगन बेलिया की एक एक पत्ती उसके चेहरे केे एक एक रग व रेषे की मुलायम खबर देती है। तब मै ख्वाबों के न जाने किस राजमहल में पहुचं जाता हूं। जहां सिर्फ सिर्फ और सिर्फ तुम होती हो और मै होता हूँ , और होते हैं ये चाँद सितारे और बोगन बलिया की सतरंगी पत्तियाँ।  ऐसा ही एक अजीब ख्वाब उस दिन दिखा था। अजीब इस वजह से कि वह एक साथ भयावह व  खुशनुमा था। जानती हो उस ख्वाब में मैने देखा ? कि मुहब्बत की रेशमी  ड़ोरी और रातरानी की मदहोष खुषबू से लबरेज़ झूले मे तुम झूल रही हो । किसी परी की...

जब आग में गला होगा

 जब आग में गला होगा  तब साँचे में ढला  होगा  कीचड़ में  उतर कर ही  कमल सा खिला  होगा सब  का दामन  मैला है, कौन दूध का धुला होगा बदन पे खुशबू खुशबू,तू रात फूलों से मिला होगा मुकेश शाम  से खुश है, महबूब  से  मिला होगा मुकेश इलाहाबादी ----

गुप- चुप बहती एक नदी है

गुप- चुप बहती एक नदी है नीली नीली लहरें हैं बिलकुल तुम्हारे आँचल सी लहराती आकाश में कुछ सितारे हैं तुम्हारे दूधिया दन्त पंक्ति सा चमकते हुए एक चाँद भी है बिखरा दी है जिसने शुभ्र चाँदनी बिलकुल तुम्हारी निर्मल हंसी सा देखो दूर कोयल कूक रही है गाती है कोई प्रेम गीत सुमी, सुन रही हो न तुम देखो ! कितना प्यारा मौसम है आओ, क्यों न बहें हम भी इस गुपचुप- गुप- चुप बहती दूधिया नदी में (एक अधूरा सपना जो न सच हुआ, शायद न होगा ) मुकेश इलाहाबादी ---

सुनता हूँ तुम्हे - पूरे प्रण -प्राण से

नदियां, छोड़ देती हैं उत्तल तरंगो में बहना चुप चाप, बहने लगते हैं झरने गड़गड़ाना छोड़ देते हैं बादल बारिशों के वक़्त कोयल भूल जाती है कूकना झूमना छोड़ शांत हो जाते हैं गुलमोहर कचनार, रजनीगंधा और महुआ के साथ साथ सभी पेड़ समाधिस्थ हो जाता है ये आकाश तब, जब, तुम हंसती हो खिलखिलाती हो या की गुनगुनाती हो खुशी से कोई प्रेम गीत सच,,  तब - तब सुनती है तुम्हे पूरी प्रकृति पूरे ध्यान से और मै भी देखता हूँ सुनता हूँ तुम्हे - पूरे प्रण -प्राण  से (सुमी , सच ऐसा ही होता है जब तुम हंसती हो बोलती हो खिलखिलाती हो ) मुकेश इलाहाबादी ----

ज़ख्म गहरा हो गया

ज़ख्म गहरा हो गया जिस्म दोहरा हो गया और कितना चीखूँ मै शहर  बहरा  हो  गया नागों के संग  रह  मै ज़हर मोहरा हो गया तेरे गालों  पे  ये तिल हुश्न पे पहरा हो गया मुकेश  तेरे  जाते  ही जीवन सहरा हो गया मुकेश इलाहाबादी --

तुम्हारी निर्मल हँसी

जी तो चाहता है तुम्हारी निर्मल हँसी की दूधिया धार को अंजुरी में समेट आचमन कर मै भी हूँ जाऊँ पावन पवित्रतम तुम्हारे निश्छल प्रेम सा  और महमहाऊं तुम्हारे आस पास  पूजा की धूप सा मुकेश इलाहाबादी -------

तुमसे मिलने की कोई सूरत न होती

गर, पुनर्जन्म की अवधारणा न होती तुमसे मिलने की कोई सूरत न होती मुकेश इलाहाबादी ------------------------

हर बात पे मुस्कुराना आ गया

हर बात पे मुस्कुराना आ गया अब मुझे, दर्द छुपाना आ गया साज़ ऐ ईश्क क्या छेड़ा तुमने हमको भी गुनगुनाना आ गया जब भी  जलता  है जिस्मो जाँ अश्कों से आग बुझाना आ गया पहले चुप  रह  जाता था मुकेश राज़ - ऐ- दिल सुनाना आ गया मुकेश इलाहाबादी -----------

कैसे बनाऊँ कोई पुल ?

अपने दरम्यान दरिया होता तो बना भी लेते भला बताओ इस अनकहे समंदर पे कैसे बनाऊँ कोई पुल ? मुकेश इलाहाबादी ------

जो, तुमने नहीं कहा

कह दो न एक बार जो, तुमने नहीं कहा अभी तक जिसे सुनना चाहता हूँ आज तक, प्लीज,,  कह दो न बस एक बार बस एक ....  मुकेश इलाहाबादी

वो एक सुहानी सुबह थी

वो एक सुहानी सुबह थी तुम मिल गयी थी मंदिर जाते हुए मेरे पूछने पे 'तुम मंदिर क्यूँ जा रही हो? देवता तो तुम्हारे सामने है ' तुमने मुस्कुरा के अंजुरी के फूलों में से कुछ फूल तोड़ के मेरे ऊपर फेंका और इधर उधर देख कर किसी ने देखा तो नहीं भाग गयी थी झट से मंदिर के अहाते में दुपट्टे को सँभालते हुए और आँख बंद करके बुदबुदाने लगी थी कोई प्रार्थना कोई कामना पूरी होने की और मै तुम्हे देखता रहा देर तक तुम्हारी पूजा पूरी होने तक मुकेश इलाहाबादी --

देह गंध

जब भी मेरे नथुनो से, टकराती है तुम्हारी महुए सी देह गंध सच, तब मै और भी बौरा जाता हूँ  और खो जाती है तन मन की, सुध - बुध (सुमी से ) मुकेश इलाहाबादी ----

रेत् चांदी की सी हो गयी

रेत् पे तुम्हारा नाम लिखा रेत् चांदी की सी हो गयी ज़ुल्फ़ों को छुआ और ,,, रात सांवली हो गयी फिर याद आये तुम दहकता दिन गुलाबी हो गया मुकेश इलाहाबादी --

गोरी तेरा ऐसा रूप सलोना

गोरी तेरा ऐसा रूप सलोना कर गयी मुझपे जादू टोना गुम-शुम गुम-शुम रहता हूँ भूल गया हूँ जगना - सोना तेरे गालों की उलझी लट मे मै चाहूँ हर दम होना खोना सिर्फ यही, ख़्वाहिश अपनी चाहूँ हर जनम में तेरा होना तेरी यादों बातों की खुशबू, महक रहा है कोना - कोना मुकेश इलाहाबादी --------- कर गयी मुझपे जादू टोना गुम-शुम गुम-शुम रहता हूँ भूल गया हूँ जगना - सोना तेरे गालों की उलझी लट मे मै चाहूँ हर दम होना खोना सिर्फ यही, ख़्वाहिश अपनी चाहूँ हर जनम में तेरा होना तेरी यादों बातों की खुशबू, महक रहा है कोना - कोना मुकेश इलाहाबादी ---------

यूँ तो शामो - सहर उदास रहता है

यूँ तो शामो - सहर उदास रहता है सिर्फ तेरे आने से दिल बहलता है यूँ तो शह्र में है बारिश का मौसम फिर भी दिल रात भर सुलगता है कहने को तो सभी अपने हैं, मगर ये दिल सिर्फ तेरे लिए ठुनकता है बरसों पहले तुम मेरे घर आये थे घर आज भी फूलों सा महकता है भले ही तुम मुझे गैर समझते  हो मुकेश तुम मेरे हो दिल, कहता है मुकेश इलाहाबादी -----------------

आग हमारे शहर तक आ चुकी है

आग हमारे शहर तक आ चुकी है लो, अब तो मोहल्ले और पड़ोस को भी जला रही है जलते हुए लोगों की चीखें भी ठीक ठीक सुनाई पड़ रही है, फिर भी हम आग से लड़ने का फैसला मुल्तवी रखेंगे और अपने घर से नहीं निकलेंगे जब तक, ये आग हामरे घर की चाहरदीवारी तक नहीं आ जाती मुकेश इलाहाबादी -------------

सपने को अधूरा छोड़ के

सुमी , मुझे मालूम है इतने  सालों बाद आज भी, तुम अक्सर, रातों को चौंक कर उठ जाती हो सपने को अधूरा छोड़ के जो अक्सरहां तुम्हारी नींद में आ जाता है, फिर, अपनी साँसों को काबू में कर के बालों को सहेजती हो बगल में रखे गलास से ठंडा पानी पी कर तकिये को सहेज कर कोहनी पे सिर रखे हुए देर तक अँधेरे को देखते हुए जाने क्या क्या सोचते हुए सो जाती हो इस उम्मीद पे कि, वो अधूरा ख्वाब इस बार पूरा हो के दिखेगा और इस बार वो बंद आँखों से नहीं खुली आँखों से दिखेगा सच बताना, ऐसा ही होता है या नहीं तुम्हारे जवाब के इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी -- मुकेश इलाहाबादी --

वो बदन पे हया का दुशाला लिये

वो बदन पे हया का दुशाला लिये मिला मुझसे इक फासला  लिये रात छत पे चाँद फिर से चमका  साथ सितारों का जलजला लिये लाख मनाया मैंने उसे मगर वो चला गया दूर दिल में गिला लिये  मुकेश इलाहाबादी ----------------

साहिल पे बैठ के गहराई का पता नहीं लगता

साहिल पे बैठ के गहराई का पता नहीं लगता खुश्क होठो से प्यास का अंदाजा नहीं लगता गले मिलने और हंस के बात कर लेने भर से है कौन अपना कौन पराया पता नहीं लगता हरवक्त मुस्कुराते रहने  की आदत है उसकी किस्से है खुश किस्से ख़फ़ा पता नहीं लगता जिसके दिल में मुहब्बत  होती है, मुकेश तो वो हमें गालियां भी देतो भी बुरा नहीं लगता मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

कड़ी धूप का मंज़र फिर सुहाना न हुआ

कड़ी धूप का मंज़र फिर सुहाना न हुआ तुमसे बिछड़ के दोबारा मिलना न हुआ तुमसे मिल के हंसा था खिलखिला के मै फिर ज़िंदगी में कभी मुस्कुराना न हुआ मुकेश इलाहाबादी ------------------------

आ पलकों पे सजा लूँ तुझे

आ पलकों पे सजा लूँ तुझे फिर सीने से लगा लूँ तुझे   यूँ उदास - उदास न रह तू आ मै फिर से हंसा दूँ तुझे   फलक से हो के आया हूँ मै चाँद -तारों से सजा दूँ तुझे   जिस ग़ज़ल में हो तू ही तू आ ऐसी ग़ज़ल सुना दूँ तुझे    गर तू राज़ी हो जाए मुकेश सच मै अपना बना लूँ तुझे   मुकेश इलाहाबादी -------

हम तो आप के हैं हमसे यूँ न शर्माया कीजिये

हम तो आप के हैं हमसे यूँ न शर्माया कीजिये बात करते वक़्त तो नज़रें उठा लिया कीजये देखिये हुज़ूर इतना तकल्लुफ अच्छा नहीं है कुछ तो हमसे  गिला शिकवा किया कीजिये  मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

फिर हुआ सूरज आग का गोला सबेरे सबेरे

फिर हुआ सूरज आग का गोला सबेरे सबेरे मै भी उठा, फिर से निकल दिया सबेरे सबेरे उदासियों की धुंध सी बिखरी थी हर सिम्त तू मुस्कुराई और मै खुश हुआ सबेरे - सबेरे शब्भर भटकता रहा जाने किस -२ सहरा में तूने ज़ुल्फ़ झटका बादल बरसा सबेरे-सबेरे  कल मेरी महफ़िल में तेरा आना क्या  हुआ फिर हर तरफ हुआ अपना चर्चा सबेरे-सबेरे रात घर से निकालना महफूज़ नहीं, मुकेश कल से तू मुझसे मिलने आना सबेरे - सबेरे मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

खुद को मुगालते में रखता हूँ

खुद  को मुगालते में रखता हूँ तुझको मै अपना समझता हूँ दोस्त - यार बुरा मान जाते हैं आदतन सच व खरा कहता हूँ दर्द थकन पांवो में छाले हैं पर मै हूँ , दिन -रात-चले जाता हूँ खुदपे गुरूर न आ जाए मुकेश साथ अपने आईना रखता हूँ मुकेश इलाहाबादी --------