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Showing posts from April, 2019

तुम्हारे प्यार में हूँ

मै तुम्हारे प्यार में हूँ या मै तुम्हे प्यार करता हूँ हो सकता है दोनों बातें एक ही लगती हो पर ऐसा मै नहीं समझता क्यों कि तुम्हारे प्यार में होने का अर्थ है तुम मेरे और मै तुम्हारे स्वाभाव में शामिल हूँ मेरे पास कोइ ऑप्शन नहीं है और न कोई इक्षा तुमसे अलग होने की जब कि प्यार करने का अर्थ हुआ मै वो कर रहा हूँ जो मेरा स्वाभाव नहीं है यानि ऑप्शन मौजूद है किसी और को चाहने या न चाहने का इस लिए अब मै  ये नहीं कहूंगा मै तुम्हे प्यार करता हूँ बल्कि कहूंगा - मै तुम्हारे प्यार में था तुम्हारे प्यार में हूँ और तुम्हारे प्यार में रहूंगा क्यूँ समझ रही हो न ? मेरी सुमी मुकेश इलाहाबादी ---------------- या मै तुम्हे प्यार करता हूँ हो सकता है दोनों बातें एक ही लगती हो पर ऐसा मै नहीं समझता क्यों कि तुम्हारे प्यार में होने का अर्थ है तुम मेरे और मै तुम्हारे स्वाभाव में शामिल हूँ मेरे पास कोइ ऑप्शन नहीं है और न कोई इक्षा तुमसे अलग होने की जब कि प्यार करने का अर्थ हुआ मै वो कर रहा हूँ जो मेरा स्वाभाव नहीं है यानि ऑप्शन मौजूद है किसी और को चाहने या न चाहने का इस लिए अ...

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं लोग यहाँ के मशरूफ बहुत हैं जिस्म तो पास पास हैं मगर दिल इक दूसरे से दूर बहुत हैं रूह पे गर्द की परत दर परत चेहरे पे बनावटी नूर बहुत हैं मुकेश इलाहाबादी -------------

मेरे घर में भी एक चिड़िया है

मेरे घर में भी  एक चिड़िया है कुछ काली कुछ भूरी आँखों वाली चिड़िया जो हर वक़्त उड़ती फिरती है पूरे घर में कभी बेड रूम - कभी ड्राइंग रूम कभी बॉलकनी तो कभी किचन अक्सर जब वो उड़ -उड़ के थक चुकी होती है तब आते ही मेरे  कंधे पे अपनी चोंच रख के आँखों को नचाती  है न जाने क्या -क्या इशारे करती है - कहती है सुनती है तब मै सिर्फ और सिर्फ उस चिड़िया को मन्त्र बिद्ध सा देखता हूँ कुहकते हुए  और उस की आँखों की भाषा अपनी हथेली से समझने के लिए  उसे सहलाता हूँ तो  वह  हंसती हुई फिर से फुर्र - फुर्र उड़ जाती है अक्शर किचन में ही उड़ के जाती है  और तब  मै मुक्सुराता हुआ - चाय के इंतज़ार में होता हूँ मुकेश इलाहाबादी --------------------------

रीढ़

मैंने शायद ही कभी अपने पिता की रीढ़ को सीधी और तनी देखा है सिवाय खाट पे सीधे लेटने  के बाकी हमेसा झुके हुए ही पाया कभी ज़िम्मेदारियों के बोझ से कभी महंगाई के बोझ से तो कभी बड़ी होती पुत्रियों और बेरोज़गार पुत्र को देख कर कई बार खीझ भी जाता पिता सीधे और तन के क्यों नहीं चलते किन्तु पिता सिर्फ मुस्कुरा के रह जाते और कुछ न कहते पर मेरी भी रीढ़ उस दिन थोड़ा झुक गयी जिस दिन बाप बना बाकी उस दिन झुक गयी जिस दिन  जिस दिन पिता की अर्थी उठाई थी और अब मै भी झुकी रीढ़ का हो गया हूँ और अब मेरा बेटा मेरे सामने तन के चलता है सीधी रीढ़ से मुकेश इलाहाबादी --------------------

नीम की पत्ती

मीठे शब्दों की चासनी में अपने स्वार्थ को नहीं परोसने से बेहतर  मै बना रहना चाहता हूँ कड़वी नीम की पत्ती भले तुम उसे थोड़ा चबा के थूंक दो पर जिसकी तासीर तो तुम्हारे लिए स्वास्थ्य वर्धर्क तो होगी अब ये तुम्हे तय करना है तुम्हे क्या पसंद है  मुकेश इलाहाबादी --------------------

मेरे लिए कविता

मेरे लिए कविता लिखना महज़ आदत नहीं है कविता के द्वारा  तुम्हरी यादों की बेल को काटता छाँटना और सहेज के मन के गुलदश्ते में सजाना होता है  कविता लिखना मेरे लिए चारों तरफ फ़ैली रेत् को उलीचना और उसके नीचे बहते जल को ढूंढना भी है  कविता लिखना और पढ़ना मेरे लिए प्राण वायु को अंदर लेना और बाहर ले जाना भी है या कह सकते हो कविता पढ़ना और लिखना मेरे लिए साहित्यिक प्राणायाम भी है  मुकेश इलाहाबादी ----------------

मशीन का पुर्जा हूँ ?

नेता मुझे वोट बैंक समझता है पांच साल में सिर्फ चुनाव के वक़्त महत्व देता है  मेरा मालिक मुझे मशीन का पुर्जा समझता है थोड़ा भी ख़राब होने पर रिपेयरिंग की जगह रेप्लस करना बेहतर समझता है और मेरे बच्चे की स्कूल प्रिंसिपल लिए मै अभिभावक कम  कस्टमर ज़्यादा हूँ  और, नगर श्रेष्ठि जब अपनी बड़ी सी गाड़ी से निकलता है मुझ जैसे फुटपाथ पे चलने वाले को कीड़ा मकोड़ा समझता है और ढेर सारी धुल उडाता फुर्र से आगे निकल जाता है तब मै गाड़ी की धूल से खुद को बचाते हुए यह सोचने लगता हूँ कि मै वोट बैंक हूँ ? मशीन का पुर्जा हूँ ? कस्टमर हूँ ? या इंसान हूँ ? मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,,,,,,,,

लगती हो कोइ देवी

जब  भी तुम एक पांव के नीचे दबा के ढोलक देती ही मीठी - मीठी थाप अपने मेहंदी लगे कंगन पहने हाथो से थोड़ी से गर्दन झुका के और मुस्कुरा के गाती हो  चैती / कजरी / होरी बन्नी - बन्ना या कोइ देवी गीत तब सच मुझे वो खुद बा खुद लगती हो कोइ देवी आसमान से उतरी हुई मुकेश इलाहाबादी --------

तुम्हारे गाल

कपास के फूल हैं तुम्हारे गाल सर्दियों में खिल जाते हैं स्वेत रूई के फाहों सा जिन्हे हथेलियों में लेते ही होता है गुनगुनी गर्माहट का एहसास और यही तुम्हारे गाल तपते मौसम में हो जाते हैं बर्फ के गोले जिन्हे देखने भर से ही मिल जाती है शीतलता और - जब तुम हंसती हो तो लगता है कोई दूधिया झरना फूट पड़ा हो बर्फ की स्वेत चट्टानों से सच सुमी : तुम्हारे गाल कपास के फूल हैं - बर्फ के गोले हैं और तुम्हारी हंसी है दूधिया झरना जिसे तुम ऐसे ही बहते रहने देना मुकेश इलाहाबादी --------------

अजीब औरत

वो जब दुःखी होती है अपना सारा दुःख मेरे पास उलीच जाती है वो जब खुश होती है अपने सारी खुशी मुझसे साझा कर जाती है वैसे अक्सर मुझसे घंटो बतिया जाती है पर ये भी कह जाती है जता जाती है "मै तुमसे प्यार नहीं करती " तब मै उसे टुकुर -टुकुर देखता हूँ और चुप रह जाता हूँ एक दिन वो कहने लगी 'मेरा आदमी मुझसे प्यार नहीं करता ये कह वो रोने लगी मैंने उसे गले लगा लिया उसकी चिकनी पीठ पे हाथ फेरने लगा मैंने उसे ढांढस बंधाया वो थोड़ा चुप हुई और देर तक सुबुक्ती रही फिर मैंने उसे कई जोक सुनाए वो ज़ोर ज़ोर हंसने लगी और फिर एक बार खुशी से मुझसे लिपट गयी ये बात उसके आदमी को पता लगी उसने उस अजीब औरत को खूब भला बुरा कहा और पीटा भी उसे अँधेरे कमरे में भी बंद कर दिया कई दिन हो गए तो मैंने उसके अँधेरे कमरे में रोशनदान से झाँक कर कहा "तुम को तुम्हारे आदमी ने पीटा ? "हाँ " तुम्हे खाना भी नहीं दिया कई दिन से ? "हाँ " नहीं दिया तुम्हे अँधेरे कमरे में भी बंद कर दिया "हाँ " "तुम इतना सब क्यों सहती हो ?" "क्यों की मै उससे प्यार क...

कुछ ख्वाब कुछ हसरतें अधूरी रही

कुछ ख्वाब कुछ हसरतें अधूरी रही  हम -तुम पास रहे फिर भी दूरी रही माना हमने इज़हारे मुहब्बत न किया  तुम भी चुप रहे हया तुम्हारी मज़बूरी रही मुकेश इलाहाबादी ----------

रेत् की नदी मिली मुझको

रेत् की नदी मिली मुझको ऐसी ज़िंदगी मिली मुझको कहने को बहुत लोग मिले सिर्फ तू नहीं मिली मुझको तेरे संग साथ का सुख न था वर्ना हर खुशी मिली मुझको मुकेश इलाहाबादी ---------

खुश रहता हूँ हर हालात में

खुश रहता हूँ हर हालात में  रोता नहीं मै किसी बात पे   न गर्मी से रही न सर्दी से   न शिकायत है बरसात से  मै सितारा दिन में सोता हूँ  चाँद से बतियाऊंगा रात में  मुकेश इलाहाबादी ---------

खुश रहता हूँ हर हालात में

खुश रहता हूँ हर हालात में रोता नहीं मै किसी बात पे  न गर्मी से रही न सर्दी से  न शिकायत है बरसात से मै सितारा दिन में सोता हूँ चाँद से बतियाऊंगा रात में मुकेश इलाहाबादी ---------

चाँद मगरूर नहीं है तो

अगर चाँद मगरूर नहीं है तो उसे भूलने की बीमारी है रात मैंने उससे पूछा "मुझसे  दोस्ती करोगे?" चाँद ने मुझे देखा कुछ सोचा मुस्कुराया कुछ जवाब देता इसके पहले बादलों ने उसे ढँक लिया बादलों से बाहर जब तक निकलता चाँद तब तक वो सफर करता हुआ बहुत आगे निकल चूका था और ये बात भूल भी चूका था "कि मैंने उससे दोस्ती का हाथ माँगा है " मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------