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Showing posts from April, 2014

ख़ुद को मिटा देने की चाह में है,

ख़ुद को मिटा देने की चाह में है,, क़तरा समंदर बनने की राह में है सारा चमन ही उजाड़ लगने लगा इक तितली उसकी निगाह में है बद्दुआ दे मुकेश, ये फितरत नहीं वर्ना बहुत आग उसकी आह में है मुकेश इलाहाबादी ----------------

सुबह से सूरज उबल रहा था

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सुबह से सूरज उबल रहा था अच्छा हुआ जो तुम आ गये पल दो पल के लिए ही सही,,, हम बादलों के साये में आ गये  हो गए थे हम तो गुमसुम से,, ग़म दिए इतने ज़माने वालों ने चलो अच्छा हुआ तुम आ गए हम फिरसे हंसने गुनगुनाने लगे मुकेश इलाहाबादी --------------

उम्रभर बेगानों की तरह साथ रहने से

उम्रभर बेगानों की तरह साथ रहने से मुहब्बत भरी इक मुलाक़ात अच्छी है झूठ के पुल से दरिया पार किया जाए इससे तो दिलों के बीच दीवार अच्छी है मुकेश ताउम्र झूठ का पैमाना पीता रहूँ इससे बेहतर तो मेरी ये प्यास अच्छी है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

अभी भी हरहरता है

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अभी भी हरहरता है अंतश में बेचैन सागर वाष्प बनकर उड़ जाने को अनंत आकाश में तमाम कोशिशों के बावजूद तप्त सूर्या रश्मियाँ लौट जाती हैं महज़ चमड़ी को सुखाकर मुकेश इलाहाबादी ------

तुम तो

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तुम तो मुहब्बत में सब कुछ भूलने की बात करती हो,, हम तो सिर्फ इक मुलाक़ात में ही भी खुद को भूल बैठे हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------------

लिक्खाडों की जातियां व प्रजातियां

संसार  में जिस तरह जीव जंतुओं, पेड़ पौधों और इन्सानों की अनेक जातियां व प्रजातियां प्राप्त होती हैं। उसी तरह लिक्खाडों की भी कई प्रजातियां होती हैं। जिनका एक वर्गीकरण लेखन विषय को लेकर है जिससे तो लगभग सभी सुधीजन परिचित हैं जिन्हे हम कवि, कहानीकार, आलोचक , पत्रकार के रुप में जानते हैं। इसके अलावा मै आपसे एक और वगींकण के बारे में आपसे बात करना चाहूँगा, जो  इन लिक्खाडों की प्राबित्तिनुसार  किया गया है। जन्हे आप निम्न वगींकरण मे बांट सकते हैं। एक ..  पेशेवर  लिक्खाड दो ..   घोर सहित्यिक लिक्खाड तीन.. आदर्शवाशी लिक्खाड चार ..  शौकिया लिक्खाड पहला --- पेशेवर  लिक्खाड लेखकों की यह वह प्रजाति है जो लगभग सभी पत्र पत्रिकाओं के आफिस में या गाहे बगाहे फ्री लांसर के रुप में भी पाई जाती है। यह लिक्खाडों की वह प्रजाति होती है। जिसके पास हर वक्त हर विषय पे लेखन सामग्री तैयार होती है। और अगर नहीं भी होती है तो आप अपना आर्डर दे कर अपनी पसंदानुसार लेख कहानी कविता निबंध आदि कुछ भी लिखवा सकते हैं। इनके पास हर जानकारी का खजाना तैयार रहता हैं। यह पाक शास्त्र...

सभी तो बेलिबास दिख रहे जँहा जाऊं

सभी तो बेलिबास दिख रहे जँहा जाऊं फिर मै ही क्यूँ अपनी उरनियाँ छुपाऊँ मरहम ले के आये हो तो बताओ वरना बेवज़ह ज़ख्म अपना तुम्हे क्यूं दिखाऊँ हर शख्स तो बौना दिखाई देता है यंहा फिर भला किस दरपे सर अपना झुकाऊँ अपना जिस्म खुद से सम्हाला जाता नहीं अब  ग़म तेरे जाने का किस तरह उठाऊं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

लड़की,

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लड़की, रेशमी धरातल पे उगा रही है फूल बेखबर, इस बात से कि, फ़िज़ाएं अपने आगोश में पाल रही हैं, तूफ़ान लरज़ जाने को बरस जाने को बाद जिसके रह जाएगी शेष जगह जगह से दरकी पानी से लबालब धरती और , खो जाएगी लड़की न जाने कँहा मुकेश इलाहाबादी ------

जी चाहता है,

जी चाहता है, सभ्यता के पाँच हज़ार साल और इससे भी ज़्यादा लड़ाइयों से अटे -पटे स्वर्णिम इतिहास पे उड़ेल दूँ स्याही फिर चमकते सूरज को पैरों तले रौंद कर मगरमच्छों व दरियाईघोड़ों से अटे - पटे गहरे, नीले समुद्र में नमक का पुतला बन घुल जाऊं और फिर हरहराऊँ - सुनामी की तरह देर तक दूर तक मुकेश इलाहाबादी ----

कुछ बेहतर करने से

कुछ बेहतर करने से नहीं घबड़ाता अकेला पड़ने और विरोध सहने से बस , दुःख होता है लोगों की मक्कारी और दोमुहेपन से वक़्त के श्यामपट्ट पे सिर्फ मै ही बेहतर लिख सकता हूँ ऐसा मेरा दावा नहीं हाँ, इतना ज़रूर है मै , 'सच' को 'सच' और 'झूठ' को 'झूठ' लिख सकता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------

साँझ होते ही सो जाता हूँ

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साँझ होते ही  सो जाता हूँ अतीत की चादर ओढ़ कर, बेसुध न जाने कब चादर विरल होने लगती है इतनी विरल कि चादर तब्दील हो जाती है एक खूबसूरत बाग़ में जिसमे तुम मुस्कुराती हो फूल बन कर और मै मंडराता हूँ भँवरे सा तुम इठलाती, इतराती रात भर, तो कभी ऐसा भी हुआ जब मै बृक्ष बन उग आता हूँ और तुम, बेल बन लिपट जाती हो मै हँसता हूँ तुम मुस्कुराती हो फिर तुम चाँद बन जाती हो और मै - चकोर और मै लगाने लगता हूँ  टेर पिऊ , पिऊ की और तभी, सारा जादुई आलम फिर से सघन होकर तब्दील हो जाता है चादर  में जिसे फिर से सहेज रख देता हूँ सिरहाने रात फिर ओढ़ सो जाने को  मुकेश इलाहाबादी --------