दो मासूम शावक
जैसे, जाड़े की नर्म धूप में दो मासूम शावक फुदक रहे हों बस, ऐसा ही लगता है तुम्हारे हँसते हुए उजले और कोमल गालों को देख कर मुकेश इलाहाबादी ----------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”