Posts

Showing posts from February, 2018

दो मासूम शावक

जैसे, जाड़े की नर्म धूप में दो मासूम शावक फुदक रहे हों बस, ऐसा ही लगता है  तुम्हारे हँसते हुए उजले और कोमल गालों को देख कर मुकेश इलाहाबादी ----------------

अब कोई भी राह कोई भी मोड़ दे

अब कोई भी राह कोई  भी मोड़ दे ज़िंदगी मुझको मेरे हाल पे छोड़ दे सहा नहीं जाता कि कोई और खेले ये दिल नाज़ुक खिलौना तू तोड़ दे मुकेश इलाहाबादी ----------------

काँटो के बीच फूल सा खिल जाऊँगा

काँटो के बीच फूल सा खिल जाऊँगा तमाम दर्द लेकर भी मै मुस्कुराऊँगा भले, तू मुझसे कितना ही नाराज़ रह तू मेरी है मेरी है मेरी है मेरी है कहूँगा मुकेश इलाहाबादी -----------------

चक्रवात

जब भी चित्त शांत होता हुआ महसूस होता है  चलने लगते हैं तुम्हारी यादों के अंधड़  पहले धीरे -धीरे फिर तेज़ और तेज़ और तेज़  इतनी तेज़ की अंधड़ अपनी जगह पे घूमने लगता है  गोल - गोल और गोल  जो अपनी जगह पे एक छोटे और छोटे और छोटे  वृत्त में लीन होने लगता है  तुम्हारी हंसी  तुम्हारी मुस्कान  तुम्हारी साथ बिताये सारे पल  यंहा तक कि मै भी उस चक्रवात में  डूबने लगता हूँ पूरा का पूरा  रह जाता है  सिर्फ और सिर्फ  एक वृत्त  शून्य में डूबता हुआ  जिसमे सिर्फ 'तुम' हो  और कुछ भी नहीं  कुछ भी नहीं  कुछ भी...  मुकेश इलाहाबादी ---

प्रेम अगर 'ठोस' होता

प्रेम अगर 'ठोस' होता सोने जैसा गढ़ लेता एक 'मुंदरी' तुम्हारे नाम की अगर प्रेम तरल होता जल जैसा ले कर अंजुरी में आचमन कर लेता तुम्हारे नाम से गर होता 'प्रेम' वायु बस जाता तुम्हारी साँसों में चंदन बन के जो होता 'प्रेम' पंचतत्व तो पृथ्वी से जल जल से वायु वायुं से आकाश आकाश से आत्म तत्व बन मिल जाता तुझमे परमतत्व तत्व की मानिंद हमेशा हमेशा के लिए मुकेश इलाहाबादी ------------

यक्ष प्रश्न

ये जानते हुए भी कि, स्वप्न कभी सच नहीं होते क्यूँ देखता हूँ दर रोज़ तुम्हारे सपने ये, बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है मेरे सामने मुकेश इलाहाबादी --------

जैसे तुम, ढालती हो कप में, चाय,

जैसे तुम, ढालती हो कप में, चाय, धीरे - धीरे बस, ऐसे ही ढारो अपनी हँसी धीरे - धीरे ताकि भरता जाये मेरा खालीपन धीरे - धीरे कप की मानिंद मुकेश इलाहाबादी ------------

अगर हमारे ज़ख्मो को कुरेदा जायेगा

अगर हमारे ज़ख्मो को कुरेदा जायेगा ईंट गारा और पत्थर ही पाया जायेगा अपने हित की बात करने जाऊँगा तो धकियाया जायेगा गरियाया जायेगा हमसे ही ताजमहल तामील कराया के हमारा ही हाथ - अंगूठा काटा जायेगा रियाया हैं हम, हम  रियाया ही रहेंगे कोई राजा हो हुकुम चलाया जायेगा मुकेश इलाहाबादी ------------------

शायद उम्र का पहिया उल्टा चल रहा है

शायद उम्र का पहिया उल्टा चल रहा है रोज़ ब रोज़ तेरे चेहरे का नूर बढ़ रहा है है शायद आफताब भी तेरी मुहब्बत में तभी तो उसका तन - बदन जल रहा है मुकेश इलाहाबादी -----------------------