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Showing posts from June, 2014

अवसाद के काले नागों का डेरा है

अवसाद के काले नागों का डेरा है शहर में हमारे अँधेरा ही अँधेरा है ये किसी शैतान की साज़िश है, हमारे ऊपर बुरे वक़्त का फेरा है हम बंजारों का घर नहीं होता है जहाँ रुक गए वही हमारा डेरा है तुम ही सम्हालो,अपनी अमानत अब से ये दिल हमारा नहीं तेरा है बाद मरने के साथ कुछ न जाएगा यहां न कुछ मेरा है न कुछ तेरा है मुकेश इलाहाबादी --------------------

ऐसा नहीं कि सिर्फ उजाले मिले

ऐसा नहीं कि सिर्फ उजाले मिले किले में कई अँधेरे तहखाने मिले महफ़िलें सज़ती रहीं रास रंग की वहाँ भी कई साज़ सिसकते मिले बुलंद दरवाज़ा ऊंची मेहराबें थीं मगर वहाँ बंद सारे दरीचे मिले किताब ऐ  दिल भी पढ़ के देखा वहाँ भी हमको झूठे फसाने मिले जिन्हे हम फरिस्ता समझते रहे वे भी हमारी तरह कमीने मिले मुकेश इलाहाबादी ------------------

तनहा सूरज तनहा चाँद

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तनहा सूरज तनहा चाँद तनहा धरती तनहा रात कौन नहीं तनहा जग में तू मुझको बतला दे आज मुकेश इलाहाबादी ---------

रात, एक नदी है

रात, एक नदी है जिसमे अँधेरा बहता है साझ होते ही इस नदी में मै डूब जाता हूँ अपने ग़म और खुशी के साथ अपनी तन्हाई और तुम्हारी यादों के साथ और फिर बहुत देर तक डूबा रहता हूँ सुबह जब सूरज  इस अंधेरी नदी को सोख लेता है तब मै ताज़ादम हो जाता हूँ एक बार फिर से भागने के लिए दौड़ने के लिए ढेर सारा गम और खुशी इकट्टा करने के लिए मुकेश इलाहाबादी -------------

माज़ी का इक - इक धागा चुनता हूँ

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माज़ी का इक - इक धागा चुनता हूँ फिर यादों की झीनी चादर बुनता हूँ तुम मुझको भूल गए हो लेकिन,पर  मै हर शाम तुम्हारी ग़ज़लें सुनता हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------------------

कभी अदाओं से करते हैं

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कभी अदाओं से करते हैं कभी बेवफाई से करते हैं ये ठहरे सितमगर ज़नाब, हर हाल में सितम करते हैं मुकेश इलाहाबादी ------------ 

खुश्बुओं के पाँव नहीं महक होती है

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खुश्बुओं के पाँव नहीं महक होती है ढूंढ लेना तुम इन्हे अपनी साँसों में मुकेश इलाहाबादी -------------------

धूप का टुकड़ा भी आखिर मचल गया

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धूप का टुकड़ा भी आखिर मचल गया फूल बन कर गालों पे खिल गया मुकेश इलाहाबादी ------------------

घुल गया है मुकेश इन फ़िज़ाओं में

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घुल गया है मुकेश इन फ़िज़ाओं में क्यूँ ढूंढते हो उसे रेत के इन ढूहों में खुश्बुओं के पाँव नहीं महक होती है कि ढूंढ लो तुम उसे अपनी साँसों में मुकेश इलाहाबादी -------------------

हवा मुसलसल बहती रही

हवा मुसलसल बहती रही बेहया ज़ुल्फ़ मचलती रही आँचल पतंग सा उड़ता रहा इधर बिजलियाँ गिरती रही बेहद नाज़ुक से दिल पे मेरे अदाओं की छूरी चलती रही   ग़ज़ल उसके नाम की कहूँ रख काँधे पे सर सुनती रही मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम्हारी बोलती सी आखें अच्छी लगी

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तुम्हारी बोलती सी आखें अच्छी लगी ये महकती चहकती बातें अच्छी लगी यूँ गुमसुम बैठे कर झील के पानी में पत्थर  फेंकने की अदाएँ अच्छी लगी  जिस्म से लेकर रूह तक महक जाए धुप सी सुवासित साँसे अच्छी लगी जी चाहे है, क़त्ल हो जाऊं तेरे हाथों तेरी खंज़र सी निगाहें अच्छी लगी इस बे मुरव्वत ज़माने में मुकेश, मुहब्बत और वफ़ाएँ अच्छी लगी मुकेश इलाहबादी ---------------

सुबहो शाम बदल दूँ क्या

सुबहो शाम बदल दूँ क्या सूरज-चाँद बदल दूँ क्या तू है लागे मस्त शराब सी   अपना जाम बदल दूँ क्या तू मुझको अपना सा लागे अपना राम बदल दूँ क्या चंद सिक्कों की खातिर मै दीनो-ईमान बदल दूँ क्या मै कँही और चला जाऊं ? ये दरो-बाम बदल दूँ क्या मुकेश इलाहाबादी ------

मेरे घर की तरफ से रास्ता है

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मेरे घर की तरफ से रास्ता है मेरा सिर्फ इतना ही राब्ता है जिस दिन पड़ोस में रहने आयी ज़िदंगी का वो इक हसीं हादसा है आज भी उसके लिए मै अजनबी हूँ, ये दिल जिसके नाम से धड़कता है तूने जब  हिना ग़ैर के नाम की रचा ली फिर मेरे ग़म ऑ खुशी से क्या वास्ता है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

जब चराग़े रूह जगमगाता है

जब चराग़े रूह जगमगाता है अन्धेरा मीलों दूर हो जाता है दिनभर की उदासी खो जाती है बच्चा जब गोद में मुस्कुराता है जब पाकीज़गी दिल में होती है तब खुदा अपना नूर बरसाता है इंसान बड़ा मग़रूर होता है,उसकी  जब जेब में सिक्का खनखनाता है  ये नीली झील है दर्पन ज़मीन का रात जिसमे चाँद झिलमिलाता है  मुकेश इलाहाबादी -----------------

मुकेश हिचकियों में भी तुम हमारा नाम पढ़ लेना

मुकेश हिचकियों में भी तुम हमारा नाम पढ़ लेना भेजा है यादों का ख़त हिचकियों के साथ पढ़ लेना मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

ख़तो किताबत से दिल अब भरता नहीं,,

ख़तो किताबत से दिल अब भरता नहीं,, कि मुकेश मुलाक़ात होना बहुत ज़रूरी हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

बेवज़ह दिल दुखाती

बेवज़ह दिल दुखाती हैं बातें बेवफाई की, होती जो निशानियाँ वफ़ा की तो रख लेते मुकेश इलाहाबादी ------------------------

बुझा हुआ अलाव हूँ सिर्फ धुआँ बाकी है

बुझा हुआ अलाव हूँ सिर्फ धुआँ बाकी है यँहा रोशनी मत ढूंढो सिर्फ अँधेरा बाकी है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

न वो जज़्बात बाकी हैं

न वो जज़्बात बाकी हैं न वो एहसास बाकी हैं न जाने क्यूँ,, फिर भी, न वो जज़्बात बाकी हैं लहरें साहिल के सीने पे अपना सिर फिर- फिर पटकती हैं। उधर, अँधेरा पूंछता है हमसे ये आ,आ कर उजाला क्यूँ मिला तुमसे इस उम्र में आ कर जबकि, न वो जज़्बात बाकी हैं न वो एहसास बाकी हैं हमने , इक उम्र गुज़ारी है अंधरे के आँचल में अब इस उम्र में आकर कैसे छोड़ दूँ उसको उजाले की ज़द में आकर ? जबकि, न वो एहसास बाकी हैं न वो जज़्बात बाकी हैं छोड़ आया हूँ इन बातों को वक़्त के उन पड़ावों पे जिनकी न तो याद बाकी है न निशान बाकी हैं अब तो, ढूंढता हूँ खुद को अंधेरों की इन रिदाओं में जहां न कोई आस बाकी है न कोई पहचान बाकी है मुकेश इलाहाबादी -------

परों में मै अपने इतनी जान रखता हूँ

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परों में मै अपने इतनी जान रखता हूँ फ़लक़ तक उड़ने का अरमान रखता हूँ मुकेश भले कोई मुझसे करे या न करे होठो पे मुहब्बत का पैगाम रखता हूँ   मुकेश इलाहाबादी ------------------------

पुरानी हवेली हूँ

पुरानी हवेली हूँ यंहा सिर्फ सन्नाटा बोलता है या फिर, रोशनदानों और गुम्बद पे कबूतर बोलता है हर वक़्त यहां खामोशी पसरी रहती है हाँ , कभी - कभी  झींगुर भी बोलता है अगर तुम सुनना ही चाहते हो  तो मेरे जिस्म पे कान रख दो मेरा हर ज़ख्म हर घाव बोलता है मुकेश इलाहाबादी --

सुनो तो सन्नाटा बोलता है

सुनो तो सन्नाटा बोलता है सुबह शाम परिंदा बोलता है तुम जुबाँ क्यों नहीं खोलते? इशारों से तो गूंगा बोलता है हम सुनना नहीं चाहते, वर्ना शहर का हर हादसा बोलता है जनता सिर्फ चुपचाप सुनती है हमारे यंहा सिर्फ नेता बोलता है शायद हम बहरे हो गए मुकेश क़ायनात का ज़र्रा- २ बोलता है  मुकेश इलाहाबादी --------------

अब इस शहर में बचा कुछ नहीं

अब इस शहर में बचा कुछ नहीं रंज़िशो ग़म के सिवा कुछ नहीं खुशनुमा मौसम हुआ करता था अब कड़ी धूप के सिवा कुछ नहीं सिर्फ मुट्ठी भर ख़ाक मिली मुझे, तलाश गुहर की,मिला कुछ नहीं  यूँ तो मैख़ाना था सामने ही मेरे,, देखता ही रह गया पीया कुछ नहीं बेवज़ह गुलशन ढूंढते हो मुकेश उजड़े चमन के सिवा कुछ नहीं मुकेश इलाहाबादी --------------

आखें पत्थर की हो गयी

आखें पत्थर की हो गयी दिल हो गया फौलाद का या ख़ुदा अब तू ही बता दे आगे क्या होगा इंसान का अभी इंसानियत ज़िंदा है फिर राज़ होगा शैतान का  अभी धरम बिकता है,फिर   होगा व्यापर भगवान का मुकेश इलाहाबादी ----------

सर पे सूरज और रेत के मंज़र हैं

सर पे सूरज और रेत के मंज़र हैं  शहर में नीला नहीं सुर्ख समंदर है फ़िज़ाओं में बादल औ खुशबू नहीं सिर्फ धूल और आंधी के बवंडर हैं चमचाती इमारतें तुमको मिलेंगी दिल ऐ मकाँ मगर सारे खंडहर हैं   जब से शेर गायब हुए हैं जंगल से तब से वहां राजा औ मंत्री बन्दर हैं सिर्फ मुकेश तबियत का कलंदर है वर्ना बहुत से मुक़द्दर के सिकंदर हैं मुकेश इलाहाबादी ---------------------

मै उसके असर में हूँ

मै उसके असर में हूँ ज़माने की नज़र में हूँ अखबार के पन्नों में सबसे बड़ी खबर में हूँ मिलने तो चले आओ तुम्हारे ही शहर में हूँ इंतज़ार की घड़ियाँ हूँ मै ज़ेहन मे आठों पहर में हूँ सिर्फ तेरे बारे में सोचूंगा इस वक़्त मै बिस्तर में हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------

कहो तो अपना सन्नाटा बाँट दूँ

कहो तो अपना सन्नाटा बाँट दूँ सीली दीवार उजड़ा कमरा बाँट दूँ उम्र भर साथ -साथ रहने के बाद क्या क्या भला बुरा कहा बाँट दूँ मेरे पास थोड़ी खुशी ढेरों ग़म हैं   अपने सीने में फैला धुँआ बाँट दूँ  तुम भले आदमी लगते हो दोस्त गर सुनो तो अपना दुखड़ा बाँट दूँ तुम भी तो बहुत तनहा हो मुकेश तुम्हे भी यादों का खिलौना बाँट दूँ मुकेश इलाहाबादी ----------------

आओ हंसा हंसाया जाए

आओ हंसा हंसाया जाए ग़म को दूर भगाया जाए जंहा नदियां नहीं बहतीं वहाँ  नहर निकला जाए दुनिया पत्थर की हो गयी ख़ुद को मोम बनाया जाए धूप ने गुलशन जला दिया कुछ नए फूल खिलाया जाए तुम्हारी बोली बानी मीठी है चेहरे से नमक चुराया जाए मुकेश इलाहाबादी -----------

दिल की सूरत में, है फूल रख तो दिया

दिल की सूरत में, है फूल रख तो दिया हमने, चुपके से उनके दीवाने ग़ज़ल में मुकेश सूख ना जाए, तितली के ये पंख, कंही उस दीवाने के दीवान ऐ ग़ज़ल में  मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------------------------

बार- बार आना और जाना है

बार- बार आना और जाना है दुनिया भी इक सरायखाना है है दौलत के नशे में हर शख्श मियाँ मग़रूर बड़ा ज़माना है नज़र में तेरी शुरूर है नशा है आखें हैं या कि शराबखाना है रहता है जिस घर में मेरा यार  अपने लिए तो वो बुतखाना है मुकेश अपने बदन में क़ैद हूँ  जिस्म बन गया क़ैदखाना है मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम्हारी मुस्कराहट का राज़ क्या है

तुम्हारी मुस्कराहट का राज़ क्या है अलसाई आखों में ख्वाब किसका है ज़ुल्फ़ों को झटका औ बारिस हो गयी सच बताना ये किसका प्यार बरसा है चन्दन की कलम और थरथराते हाथ तुमने किसके ख़त का जवाब लिखा है मुकेश इलाहाबादी ----------------------

माना आप हंसी और खूबसूरत हो, मगर ऐ दोस्त

माना आप हंसी और खूबसूरत हो, मगर ऐ दोस्त, मुझको इतनी तुनक मिज़ाजी अच्छी नहीं लगती मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ----

यादों के आस पास गुज़री

यादों के आस पास गुज़री मेरी हर शाम उदास गुज़री नज़रें उस - उस तरफ घूमीं जिस-जिस तरफ वो गुज़री कभी जागे कभी लेटे तो बैठे बड़ी मुस्किल से शब गुज़री ज़िदंगी इक रेत का जंगल वह  नहर की तरह गुज़री कैसे कह दूँ , खुश हूँ मुकेश ज़िंदगी ही ग़मगीन गुज़री मुकेश इलाहाबादी -----------

बादलों की राह चला हूँ

बादलों की राह चला हूँ बुझाने मै प्यास चला हूँ मासूम ज़िद्दी खूबसूरत साथी के साथ चला हूँ कोई साथ हो कि न हो मै अपनी राह चला हूँ मंज़िल ज़ेरे क़दम थी मै सुबहो शाम चला हूँ   राह फ़क़ीरी में मुकेश मै अपने आप चला हूँ मुकेश इलाहाबादी ----

मुकेश हम भी सूरत के नहीं सीरत के थे क़ायल

मुकेश हम भी सूरत के नहीं सीरत के थे क़ायल मग़र वो कमबख्त भोली सूरत कर गयी घायल उसकी ज़िद उसकी मासूमियत औ अल्हड़पन में था कुछ ऐसा जादू कि ऐ दोस्त हम हो गए घायल मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ -

ऐ खुदा, या तो मुझको भी फूलों सा दिल दिया होता

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ऐ खुदा, या तो मुझको भी फूलों सा दिल दिया होता या फिर इतनी नाज़ुक व,मासूम सूरत न बनाया होता मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

सच के साँचे में ढल गया

सच के साँचे में ढल गया मोम बनकर पिघल गया ज़माना देखने की चाहत में यायावर बन निकल गया गाँव का सच्चा सीधा इन्सां शहर की हवा में बदल गया ज़िंदादिली उसकी ऐसी कि ज़ख्म फूल बन खिल गया दिल मुकेश का बच्चा था देखकर चाँद मचल गया मुकेश इलाहाबादी ----------

पत्थर होता तो बूत परस्ती से खुश हो गया होता

पत्थर होता तो बूत परस्ती से खुश हो गया होता अजब शख्श है वो किसी बात से खुश नहीं होता मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

दर्दो ग़म तो छुप जाता है

दर्दो ग़म तो छुप जाता है चेहरे की शिकन नहीं छुपती दिन के उजाले में मेरा बदन, मेरी परछाई नहीं छुपती चाँदनी तो बरस रही है, दरीचों से इस क़दर इस शब के आलम में भी मेरी उरनियाँ नहीं छुपती दिल में तेरे लिए चाहत है कितनी ये बात मेरे असआर औ, मेरी आखों से नहीं छुपती मुकेश इलाहाबादी ---------

झूठ भी मुहब्बत में अक्सर में कितना हंसी हो जाता है

झूठ भी मुहब्बत में अक्सर में कितना हंसी हो जाता है मुकेश ये बात तेरे नमकीन चेहरे से बखूबी बयां होती है मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

आप हम पर तोहमद लगा दीजिये

आप  हम पर तोहमद लगा दीजिये मुहब्बत को मुल्ज़िम बना दीजिये हमको कोई भी शिकायत न होगी जो जी चाहे हमको सज़ा दीजिये मुकेश इलाहबादी -------------------

है अपनी कोई चाह नही

है अपनी कोई चाह नही दुनिया की परवाह नहीं देख समंदर इतना गहरा है जिसकी कोई थाह नही दर्द  के मारे दोहरा था, पर निकली उसकी आह नही बड़े हुलस के मिलने जाऊं  अपना ऐसा भी उत्साह नहीं मुकेश तेरे दर पर आना है ये इतनी भी आसाँ राह नहीं मुकेश इलाहाबादी ------------

तुमसे उम्मीदे वफ़ा भी नहीं

तुमसे उम्मीदे वफ़ा भी नहीं तुमसे ग़िला शिकवा भी नहीं यंहा कोई समंदर नहीं बहता औ यहां कोई दरिया भी नहीं ये पत्थर के बुतों का शहर है और यहां कोई  खुदा भी नहीं ज़रा सी बात पे तुम रूठे, जो  इतना बड़ा मसअला भी नहीं मुकेश इलाहबादी ------------

कभी तो मेरा नगर देख जाओ

कभी तो मेरा नगर देख जाओ उजड़ा हुआ शहर देख जाओ बग़ैर शाख, समर पत्तियों का होता है कैसा शज़र देख जाओ नदी से निकल कर किस तरह बहती है इक नहर देख जाओ ज़र्द पत्तियों सा काँपते चेहरे चेहरों पे छपा डर देख जाओ माना तुम बहुत मशरूफ हो बीमारे दिल को मग़र देख जाओ मुकेश इलाहाबादी -------------

सुना है शहर में ग़म बोलते हैं

सुना है शहर में ग़म बोलते हैं पढ़े लिखे लोग कम बोलते हैं है तासीर सच्चा स्वाद कड़ुआ मुँह में रख कर नीम बोलते हैं मुहब्बत में जब जुबां न बोले समझ लेना कि वहम बोलते हैं सारा जहाँ चुप हो जाए मुकेश महफ़िल में तब हम बोलते हैं मुकेश इलाहाबादी --------------

ग़र मुकेश, दरमियाँ दोनों के न राहू आया होता

ग़र मुकेश,  दरमियाँ दोनों के न राहू आया होता  न चाँद बेवफा कहलाता, न ज़मी को गिला होता मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

यूँ ही, वज़ह- बेवज़ह बैठे रहना

यूँ ही, वज़ह- बेवज़ह बैठे रहना अच्छा लगता है सिर्फ और सिर्फ तेरे बारे में सोचते रहना अच्छा लगता है बंद खिड़की, दरवाज़े और परदे के पीछे तनहा रहना अच्छा लगता है तेरे ख्यालों में ही खोये रहना अच्छा लगता है मुकेश इलाहबादी ----

दर्द की दास्ताँ हो गए

दर्द की दास्ताँ हो गए गुज़रे हुए जहाँ हो गए यंहा कोई नहीं रहता टूटे हुए मकाँ हो गए तेरा प्यार पा के हम बड़े बदगुमाँ हो गए कल तक सहरा थे अब गुलिस्ताँ हो गए तुम तो खफा थे,क्यूँ आज मेहरबाँ हो गए मुकेश इलाहाबादी ---

सरे महफ़िल रुस्वा कर गया

सरे महफ़िल रुस्वा कर गया उम्र भर को तनहा कर गया निगोड़ा सब कुछ छीन कर भी मुझको अपना कर गया मुकेश इलाहाबादी -------

तेरे लब का गीत बनूँ

तेरे लब का गीत बनूँ मै तेरा मनमीत बनूँ खामोश निगाहों की इक नई तहरीर बनूँ खोल दरीचा तू अपना तेरे दर की धूप बनूँ मत्ला मक़्ता बन जा तेरे लिए ग़ज़ल बनूँ  ग़र तू शम्मा बन जा मुकेश तेरा दीप बनूँ मुकेश इलाहाबादी ----

ऐ समंदर,मिट के भी गहराई नाप लूँगा

ऐ समंदर,मिट के भी गहराई नाप लूँगा  मै नमक हूँ तेरे रग राग में घुल जाऊंगा मुकेश इलाहाबादी ------------------------

चल रहे हैं

चल रहे हैं रुक रहे हैं बिन आग जल रहे हैं बिन नदी बह रहे हैं जीवन पर्वत चढ़ रहे हैं दर्द ही दर्द सह रहे हैं तुमसे प्यार कर रहे हैं मुकेश इलाहाबादी ---

कभी ज़ुल्फ़ें , कभी अदाएं , तो कभी आँखें बोलती हैं

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कभी ज़ुल्फ़ें , कभी अदाएं , तो कभी आँखें बोलती हैं फिर भी ज़नाब कहते हैं हम तो कुछ बोलते ही नहीं मुकेश इलाहाबाई ---------------------------------------

ऐसा भी नहीं, तुम चले जाओगे तो ज़िंदगी अधूरी रहेगी

ऐसा भी नहीं, तुम चले जाओगे तो ज़िंदगी अधूरी रहेगी मगर ये भी सच है मुकेश,तुम बिन ज़िंदगी न पूरी होगी मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------

लोग खामखाँ मरे जाते हैं कम उम्र वालों पे ?

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लोग खामखाँ मरे जाते हैं कम उम्र वालों पे ? हमने तो ढलते हुए सूरज पे भी शबाब देखा है मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

तुमने कभी जंगल देखा है ?

सुमी, तुमने कभी जंगल देखा है ? जंगल बीहड जंगल, जहां सब कुछ बेतरतीब होता है। जिसकी बेतरतीबी में ही तरतीब होती है, एक खूबसूरती होती है। एक भव्यता होती है। जो कभी लुभाता भी है तो डराता भी है। वही जंगल बीहड जंगल जहां बडे बडे पेड होते हैं चीड के सागौन के महुआ के अषोक के देवदार के महोगनी के। जिनमे कुछ तो इतने कंटीले होते हैं कि जिनसे जिस्म छू भर भी जाये तो अंदर तक छिल जाये। जिस्म तार तार हो जाये। इनमे कुछ तो इतने घने होते हैं कि गर आसमान थोडा भी झुक जाये तो व उसे छू लें, कुछ पेड इतने गझिन होते हैं कि जिनकी छांव मे बैठते ही मुसाफिर की सारी थकन छू मंतर हो जाये। यही जंगल मे तुम्हें अन्जान मुसाफिरों के लिये कंदमूल भी मिल जायेगा जिसे खाकर भगवान राम ने वनवास के चौदह साल विताये थे। यहीं तुम्हे धतूरा भी मिलेगा जो षंकर भगवान का प्रिय फल है यहीं तम्हे आम और महुआ जैसे मीठे फल भी मिल जायेंगे। इन्ही जंगलों मे तुम्हे अमर बेल भी किसी पेड से लिपटी मिल जायेगी जिसके रस को पी कर कहा जाता है इन्सान अमर हो जाता है यहीं तुम्हे किसी  किशोरी सा शरमा जाने वाली लाजवंती भी मिल जायेगी। यहीं तुम्हे हरडा, बहेडा और आ...

चलो कपडे बदल लेते हैं बाहर हो आते हैं

चलो कपडे बदल लेते हैं बाहर हो आते हैं मुफलिसी सही मुकेश बाज़ार हो आते हैं न कोई साथी है न कोई संगी है न पैसे हैं बड़े मनहूस दिन हैं कंही घूम कर आते हैं दो रुपये के भीगे चने और दो सिगरेट में मियाँ मुकेश चलो दुनिया देखकर आते हैं सूना है दुनिया बड़ी रंगी और खूबसूरत है चलो इसी बहाने सब कुछ देख कर आते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

अधूरे वज़ूद के साथ ज़मी

अधूरे वज़ूद के साथ ज़मी के चारों और घूमता है चाँद माह भर फिर रात पूनम की पूरा हो, जी भर चांदनी लुटाता है रात भर मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------- ---

दिले किताब से खूबसूरत कोई किताब नहीं होती

दिले किताब से खूबसूरत कोई किताब नहीं होती दिले किताब पढ़े बग़ैर ज़िदंगी कभी पूरी नहीं होती ग़र आप अपनी दिले किताब पढ़ने न देंगे मुकेश आप के नाज़ो अंदाज़ की कोई कीमत नहीं होगी भी मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------

कभी पानी में देखा कभी आईना में देखा

कभी पानी में देखा कभी आईना में देखा दिल को कभी आईना बना के न देखा मुकेश इलाहाबादी ---------------------

हवा की रवानी है हमारी ज़िंदगानी

हवा की रवानी है हमारी ज़िंदगानी बाद मरने के कोई निशाँ न पाओगे गर कभी ढूंढने भी जाओगे हमको खुशबू सा अपनी साँसों में पाओगे मुकेश इलाहाबादी -------------------

हवा की रवानी है हमारी ज़िंदगानी

हवा की रवानी है हमारी ज़िंदगानी बाद मरने के कोई निशाँ न पाओगे गर कभी ढूंढने भी जाओगे हमको खुशबू सा अपनी साँसों में पाओगे मुकेश इलाहाबादी -------------------

विडम्बना ---

विडम्बना --- अक्सरहाँ ग़म भी इतना अज़ीज़ हो जाता है,,, मुकेश चाह कर भी किसी से बांटा नहीं जाता है मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

यादों के सिवा कोई और असबाब नहीं है

यादों के सिवा कोई और असबाब नहीं है ये वो रात है जिसकी कोई सुबह नहीं है ऐ दोस्त, मुकेश वो फ़क़ीर मुसाफिर है  जिसके पास ग़ज़ल के सिवा कुछ नहीं है मुकेश इलाहाबादी -----------------------

ज़मी भी सिसकती है -----------------------

सुमी, तुमने कभी ज़मी को सिसकते सुना है ? नही  न।  हाँ , कैसे सुनोगी, क्योंकि ज़मीन की सिसकन में कोई आवाज़ नहीं होती।  वो बड़ी खामोशी से सिसकती है, औरत की तरह।  जैसे औरत अपने हर दुःख दर्द को अपने अंदर ही अंदर हरहारने देती है, छुपाये रखती है. हाँ ,, जब दर्द हद से गुज़रता है,  तो दिल ही दिल में सिसक लेती है, अपने आंसुओं को खुद ही पोछ लेती है।  अगर कभी सिसकी में कुछ आवाज़ भी हुई तो वह इतनी मद्धम होती है जो बिना गौर से सुने सुनाई ही नहीं देती है।  और फिर ज़माने के इतने शोर शराबे में तो बिलकुल दब ही जाती है, और फिर किसे फुर्सत है जो सुने ज़मी की सिसकी को। हाँ, अगर कभी तुम ज़मी के दुःख दर्द को महसूसना चाहो, सुनना चाहो, उससे एकाकार होना चाहो तो तुम्हे, उस वक़्त का इंतज़ार करना होगा , जब  रात अपना आँचल फैला चुकी हो, पूरी दुनिया दिन भर की थकन के हल्ले- गुल्ले और थकन के बाद सो चुकी हो. सिर्फ और सिर्फ बच रहा हो, तारों भरा आकाश - निचाट काला - धूसर आकाश - जो कभी कुछ नहीं कहता  किसी  से कुछ नहीं बोलता, किसी बात पे कोई  प्रतिक्रिया नहीं करता - निर्विकार निःश...

ऐ मुकेश, किसी रुबाई किसी ग़ज़ल किसी छंद में नहीं आती

ऐ मुकेश, किसी रुबाई किसी ग़ज़ल किसी छंद में नहीं आती उसकी खूबसूरती उसकी पाकीज़गी किसी तौर बयाँ नहीं होती मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------------

मुझी को मेरा पैगाम लौटा के

मुझी को मेरा पैगाम लौटा के मुकेश कहने लगी निगोड़ी हवा महबूब के घर देख कर बजती शहनाइयाँ बैरंग लौट आयी यहाँ  मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------------------

पंछियों का चहकना कब रास आया है बहेलियों को

पंछियों का चहकना कब रास आया है बहेलियों को मुकेश बस, उठाया गुलेल और लगा दिया निशाना मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

मुकेश का सुन के दिल खुश हुआ,

मुकेश का सुन के दिल खुश हुआ, आपके लब पे हमारा नाम आया वर्ना हम तो समझे थे गुज़र जाएगी ज़िंदगी इस ख्वाब को लिए दिए ही मुकेश इलाहाबादी --------------------

मुकेश भेजा था पैगामे मुहब्बत हवाओं के मार्फ़त

मुकेश भेजा था पैगामे मुहब्बत हवाओं के मार्फ़त ले के मेरा पैगाम निगोड़ी हवाएं कंही और चल दीं  मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

मन बहकने लगा है

मन बहकने लगा है तन दहकने लगा है तेरा नाम सुन कर, दिल धड़कने लगा है बेखुदी ऐसी मोगरा हमें महकने लगा है तेरी मासूम हंसी से चाँद जलने लगा है उदास था दिल मेरा फिर उमगने लगा है मुकेश इलाहाबादी ---

तसल्ली मुहब्बत में बारहाँ होती नहीं

तसल्ली मुहब्बत में बारहाँ होती नहीं, जब तक बयाँ न हो मुकेश ये अलग बात कि वो आखों से बयाँ हो कि ज़ुबाँ से मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------

जितनी शिद्दत से,

जितनी शिद्दत से, मै मुहब्बत करता हूँ उतनी शिद्दत से तो वो नफरत भी नहीं करता जितनी शिद्दत से मै उसे याद करता हूँ उतनी शिद्दत से तो उसने मुझे भुलाया भी न होगा मुकेश इलाहाबादी ---------

ख़ुदा तुझसे लड़ के मांग लूँगा अपनी मुहब्बत

ख़ुदा तुझसे लड़ के मांग लूँगा अपनी मुहब्बत वरना मेरी हथेलियों पे नाम लिख दे उसका मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

हमने तो फ़क़त चंद लम्हे मांगे थे ज़िंदगी के

हमने तो फ़क़त चंद लम्हे मांगे थे ज़िंदगी के ज़ालिम ने कातिलाना हंसी उछाल दी मेरी तरफ मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------

ज़रूरी तो नहीं हर किसी से मुहब्बत की जाए

ज़रूरी तो नहीं हर किसी से मुहब्बत की जाए किसी को बस यूँ ही चाहते रहना गुनाह तो नहीं मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

मुसाफिर को इस तरह भी राह दिखाया करो

मुसाफिर को इस तरह भी राह दिखाया करो मुकेश रात दहलीज़ पे इक दिया जलाया करो  मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

उदासियों से पहचान लेना

उदासियों से पहचान लेना वही मेरा घर है जान लेना ग़र कभी शक ओ शुबह हो बेशक़ मेरा इम्तहान लेना है रात बिस्तर बिछा गयी चादर ग़म की तान लेना जिस दिन भरोसा हो जाए मुझको अपना मान लेना मुकेश इलाहाबादी -------------

ज़मी के पार जाया जाये

ज़मी के पार जाया जाये समंदर पे पुल बनाया जाये दुनिया जला कर रख दिया सूरज का बदल ढूँढा जाये दुनिया इतनी खुदगर्ज़ क्यूँ एकबार ख़ुदा से पूछा जाये सुना है वह फूल था कभी चलो खुशबू में ढूँढा जाये किसी की आहात है शायद मुकेश दरवाज़ा खोला जाये मुकेश इलाहाबादी ----------

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू उसके नाम पे चुप रह जाऊं मै लाश शरम की ऐसी मारी अपनी बातें उससे कह न पाऊँ रह रह करे इशारा छत पे आऊँ पर दिल मोरा धड़के मै न जाऊं बाँध कंकरियां संग फेंकी पाती घबराऊँ,पर बिन पढ़े रह न पाऊँ सखी, जिस दिन से है प्रीत लगी बात बात में मै हँसू और मुस्काऊँ  मै पगली रह रह के शीशे में देखूं अपनी सूरत में खुद से शरमाऊँ मुकेश इलाहाबादी --------------------

सिर्फ घर और ऑफिस के बीच की दूरी रह गयी होती

सिर्फ घर और ऑफिस के बीच की दूरी रह गयी होती ख्वाब न होते तो ये ज़िंदगी कितनी सिमट गयी होती मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------

मै लिखता हूँ प्यार

मै लिखता हूँ प्यार वो लिखता व्यापार  नदी किनारे वो बैठा मै बैठा हूँ  इस पार छोड़ मुझे गैरों से वो है करता आँखें चार मै उसका कुछ नहीं पर वह मेरा संसार थोड़ा नखरीला सही पर है तो मेरा प्यार मुकेश इलाहाबादी --

इंकार में ग़म से मर जाना है

इंकार में ग़म से मर जाना है , और इक़रार में खुशी से मुकेश न थाम इश्क़ का खंज़र इसके दोनों तरफ धार है मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

वह अपना दर्दे ज़ीस्त बयाँ करता रहा

वह अपना दर्दे ज़ीस्त बयाँ करता रहा लोग समझे कि मुकेश शायर हो गया मुकेश इलाहाबादी -----------------------

आसमाँ पे पहरे हैं, उड़ के क्या करूँ ?

आसमाँ पे पहरे हैं, उड़ के क्या करूँ ? आओ चलो रख लूँ अपने पर उतार के मुकेश इलाहाबादी ---------------------

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू

जिसके नाम की चिट्ठी बाँचू उसके नाम पे चुप रह जाऊँ मै लाज शरम की ऐसी मारी अपनी बातें उससे कह न पाऊँ मुझसे करे इशारा छत पे आऊँ कि दिल मोरा धड़के मै,न जाऊं मार कंकरिया संग फेंका चिट्ठी घबराऊँ,एक सांस में पढ़ जाऊं  मुकेश इलाहाबादी --------------

वो मील का पत्थर आज भी तनहा खड़ा है

वो मील का पत्थर आज भी तनहा खड़ा है जिस मोड़ पे उस पत्थर पे छोड़ गए थे जंहा मुकेश इलाहाबादी ------------------------------