सुमी, तुमने कभी ज़मी को सिसकते सुना है ? नही न। हाँ , कैसे सुनोगी, क्योंकि ज़मीन की सिसकन में कोई आवाज़ नहीं होती। वो बड़ी खामोशी से सिसकती है, औरत की तरह। जैसे औरत अपने हर दुःख दर्द को अपने अंदर ही अंदर हरहारने देती है, छुपाये रखती है. हाँ ,, जब दर्द हद से गुज़रता है, तो दिल ही दिल में सिसक लेती है, अपने आंसुओं को खुद ही पोछ लेती है। अगर कभी सिसकी में कुछ आवाज़ भी हुई तो वह इतनी मद्धम होती है जो बिना गौर से सुने सुनाई ही नहीं देती है। और फिर ज़माने के इतने शोर शराबे में तो बिलकुल दब ही जाती है, और फिर किसे फुर्सत है जो सुने ज़मी की सिसकी को। हाँ, अगर कभी तुम ज़मी के दुःख दर्द को महसूसना चाहो, सुनना चाहो, उससे एकाकार होना चाहो तो तुम्हे, उस वक़्त का इंतज़ार करना होगा , जब रात अपना आँचल फैला चुकी हो, पूरी दुनिया दिन भर की थकन के हल्ले- गुल्ले और थकन के बाद सो चुकी हो. सिर्फ और सिर्फ बच रहा हो, तारों भरा आकाश - निचाट काला - धूसर आकाश - जो कभी कुछ नहीं कहता किसी से कुछ नहीं बोलता, किसी बात पे कोई प्रतिक्रिया नहीं करता - निर्विकार निःश...