पुरानी हवेली हूँ

पुरानी हवेली हूँ
यंहा सिर्फ
सन्नाटा बोलता है
या फिर,
रोशनदानों और
गुम्बद पे
कबूतर बोलता है
हर वक़्त यहां
खामोशी पसरी रहती है
हाँ , कभी - कभी 
झींगुर भी बोलता है
अगर तुम
सुनना ही चाहते हो  तो
मेरे जिस्म पे
कान रख दो
मेरा हर ज़ख्म
हर घाव बोलता है

मुकेश इलाहाबादी --

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